मंगलवार, 23 जुलाई 2013

आपदाओं से स्कूली बच्चों को बचाने की मुहीम : दैनिक डीएनए में प्रकाशित मेरा लेख



  • शिवानन्द द्विवेदी सहर 
प्राकृतिक आपदाएं ना तो बताकर आती हैं और ना ही उसकी पूर्व सुचना ही किसी को होती है ! हाल ही में उत्तराखंड में आये दैवीय अथवा प्राकृतिक आपदा की विनाशलीला के तमाम पहलुओं पर बहुआयामी चर्चाएं हुईं है ! वैसे तो आपदाओं की आँखें नहीं होती हैं और जब वो अपना कहर बरपाती हैं तो क्या बच्चे और क्या बूढ़े,क्या पुरुष और क्या महिलायें,सबको अपने कालग्रास में लील जाती हैं ! मगर ऐसा भी नहीं है कि आकस्मिक उत्पन्न होने वाली आपदाओं को लेकर हमें हाथ पर हाथ धरे बैठना चाहिए ! बेशक हमारा नियंत्रण आपदाओं को रोकने में बहुत हद तक नहीं है लेकिन कम से कम आपदाओं के प्रति होने वालों क्षतियों एवं उन्हें रोकने के उपायों पर तो हमारे पास नीतियां एवं तैयारियां होनी चाहिए ! प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसानों को अगर वर्गीकृत करके अलग-अलग वर्गों में देखें और समझने का प्रयास करें तो इसी वर्गीकरण के आधार पर काफी हद तक समाधान भी निकाले जा सकते हैं ! नजीर के तौर पर अगर प्राकृतिक आपदाओं में हुई स्कूली बच्चों की मौतों के आंकड़ों पर गौर किया जाय तो आंकड़े वाकई चौकाने वाले नजर आयेंगे ! आपदाओं के संदर्भ में विद्यालयों में सतर्कता एवं उपायों का जिक्र अलग से करना इसलिए भी मुनासिब प्रतीत होता है क्योंकि विद्द्यालय एक ऐसी जगह है जहाँ नियमित सैकड़ों हजारों की संख्या में बच्चें एकत्रित होते हैं एवं किसी भी आपदा का सीधा प्रभाव उन हजारों बच्चों पर एक जगह और साथ पड़ने की संभावना रहती है ! आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि केवल 1990 के बाद आये भूकंपों में लगभग कई हजार की संख्या में केवल स्कूली बच्चे जान गवां दिये जबकि सैकड़ों विद्द्यालयों की इमारतें ध्वस्त हो गयीं ! राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा जारी रिपोर्ट में इस बात का साफ़ तौर पर उल्लेख है कि गुजरात में कुछ साल पहले आये भूकंप में 971 स्कूली बच्चे स्कुल की बिल्डिंग्स गिरने की वजह से जान गवा चुके हैं  ! आपदाओं में जाने वाली जानों को अगर वर्गीकृत करके अलग-अलग आंकड़ों में देखें तो मरने वालों में बड़ी संख्या बच्चों की निकल कर आती है जिसे सही प्रबंधन आदि के द्वारा काफी हद तक कम किया जा सकता है ! दुनिया के तमाम देशों में आपदाओं से निपटने के लिए क्षतियों के वर्गीकरण की यही पद्धति इस्तेमाल की जाती रही है जो कि अभी भारत में व्यापक तौर पर इस्तेमाल नहीं हो रही है ! हालाकि इस दिशा में शुरुआती कदम बढाते हुए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा राष्ट्रीय विद्यालय सुरक्षा कार्यक्रम चलाने की मुहीम शुरू की गयी है ! चुकि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण विभाग सीधे तौर पर प्रधानमंत्री कार्यलय के अधीन आता है एवं वर्तमान में इसके चेयरमैन स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही हैं अत: इस कार्यक्रम की सफलता को लेकर अपेक्षाएं ज्यादा होना लाजिमी है ! राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा लगभग 48.47 करोंड़ रुपये विद्यालय सुरक्षा कार्यक्रम के नाम पर प्रस्तावित किये गए हैं और इस दिशा में काफी हद तक काम पूरा भी किया जा चुका है ! अगर स्कुल सेफ्टी से जुड़े इस पुरे कार्यक्रम को समझने का प्रयास करें तो इस प्रारंभिक स्तर पर इस पुरे मुहीम में फिलहाल 22 राज्यों को शामिल किया गया है एवं प्रत्येक राज्य में दो सर्वाधिक आपदा प्रभावित जिलों को रखा गया है ! इस अभियान के तहत प्रत्येक राज्य से जिन दो जिलों को चुना गया है उनमे प्रत्येक जिले से दो सौ विद्यालयों को “आपदा रिस्क एजुकेशन” का प्रशिक्षण दिये जाने का प्रावधान है ! इसके तहत यह लक्ष्य रखा गया है कि प्राम्भिक स्तर पर प्रत्येक जिले में लगभग 500 शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाएगा ! आपदाओं से निपटने एवं स्कूली स्तर पर उनसे सतर्क रहने के साथ-साथ इस पुरे प्रशिक्षण में इस बात का खास ख्याल रखा गया है कि आपदाओ के प्रति सतर्क होकर किस तरह से विद्यालयों के मरम्मत आदि का ख्याल रखा जाय ! इस पुरे अभियान में केंद्रीय स्तर पर चली इस मुहीम की जिम्मेदारी राज्यों पर भी दी गयी है कि वो केन्द्र की तर्ज पर राज्य स्तरीय स्कुल सेफ्टी कार्यक्रम को चलायें एवं आपदा संभावित क्षेत्रों में इन नीतियों को लागू करने का प्रयास करें ! फिलहाल केन्द्र द्वारा प्राम्भिक स्तर पर चलाये जा रहे इस कार्यक्रम में लगभग देश के 8800 विद्द्यालय एवं लगभग 11000 शिक्षक इसमे जुड़ जायेंगे जो कि आपदाओं से निपटने की दिशा में एक प्रभावी कदम माना जा सकता है ! तमाम नियामकों एवं तय समय के अंदर कार्यक्रम पूरा करने की जवाबदेही आदि के प्रावधानों से युक्त राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का यह प्रोजेक्ट अगर वाकई पूरी इमानदारी के साथ अपने कार्यों को अंजाम देता है तो आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में यह एक तरह का बड़ा परिवर्तन माना जाएगा जो कि फिलहाल भारत में हीला-हवाली के हवाले ही रहा है !
            इसमें कोई दो राय नहीं स्कुल सेफ्टी प्रोग्राम अगर सफल होता है तो इसी के तर्ज पर आपदा प्रबंधन की दिशा में तमाम नए प्रयोगों के रास्ते खुलते नजर आयेंगे ! आपदाओं से निपटने के मामले में हमेशा से देखा गया है कि भारत में कोई ठोस नियामक नहीं रहा है और बड़ी से बड़ी आपदाओं को महज मुआवजे से पाटने की परम्परा रही है ! मुआवजा कभी भी किसी आपदा से निपटने का वाजिब समाधान नहीं होता बल्कि आपदाओं से नीतियों एवं कार्य प्रणालियों से निपटा जा सकता है ! कहीं किसी आपदा की खबर आते ही मुआवजे आदि घोषणाएँ और आरोप-प्रत्यारोप का शुरू हो जाना ही भारत में अबतक आपदाओं के समय की प्रमुख कार्यवाहियों में शामिल रहा है लेकिन तकनीकी रूप से व्यवस्थित शायद यह अपने आप में कोई पहला कार्यक्रम है जो आपदाओं के प्रति लोगों को प्रशिक्षित एवं परिपक्व बनाने की दिशा में काम कर रहा है ! बेशक अभी इस कार्यक्रम के तहत आपदाओं से प्रभावित एक खास तबके को ही चुना गया है लेकिन ऐसा कतई नहीं है कि सफल होने के बाद सके दायरों को विस्तृत नहीं किया जायेगा ! आपदा प्रबंधन से सम्बंधित इस कार्यक्रम के प्रशिक्षण आदि के लिए प्राथमिक स्तर पर शिक्षण संस्थानों को चुनना एक सही फैसला है ! हालाकि भारत जैसे देश में करोंडो की योजनाएं कैसे कागजों तक सिमट कर रह जाती हैं ये कोई नई बात नहीं है मगर बावजूद इसके आपदा प्रबंधन कि दिशा में की गयी इस पहल को फिलहाल साकारात्मक नजरिये से देखने की जरुरत है ! इसको लेकर यह तो कहा ही जा सकता है कि बिना किसी नीति और बिना किसी नियामक के चलते आ रहे आपदा प्रबंधन कार्य को यह ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से काफी मदद मिल सकती है, बशर्ते ये कार्यक्रम फाइलों और कागजों के ढेर में दबे कहीं सिमट ना जायें !

1 टिप्पणी: