बुधवार, 24 जुलाई 2013

यूपी में फिर सुलग रहा आरक्षण का मुद्दा :दैनिक जागरण नेशनल में यह लेख


  • शिवानन्द द्विवेदी सहर 

आगामी लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आते जा रहे हैं सभी राजनितिक दलों द्वारा सियासत की विसात पर अपने-अपने ताल पैंतरे बिछाने का काम शुरू हो गया है ! लोकसभा चुनावों के लिहाज से उत्तरप्रदेश भारत का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे अधिक सीटों वाला राज्य है जहाँ से कुल अस्सी सांसद लोकसभा में चुनकर आते हैं ! अत: लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद सत्ता के समीकरणों में यूपी पर सबकी नज़रें होना लाजिमी है ! यूपी के राजनितिक समीकरणों पर अगर बात करें तो यूपी का राजनीतिक समीकरण बहुत हद तक जातिगत आधार पर तय होता है ! यह एक ऐसा राज्य है जहाँ बड़े-बड़े से मुद्दे भी जातिगत वोटबैंक की राजनीति के आगे घुटने टेकते नजर आते हैं ! अत: यूपी के अंदरूनी सियासी मिजाज के लिहाज से यहाँ  आरक्षण का मुद्दा सबसे ज्यादा फिट और सटीक बैठता नजर आता है ! ऐसा कहना इसलिए गलत नहीं होगा क्योंकि पिछले दो दशकों यूपी में सियासत जाति और धर्म के आधार पर सफलता से होती रही है और आरक्षण के मानक भी कुछ इसी तरह के हैं ! चाहें जाति के आधार पर 22% और 27% की राजनीति हो या पसमांदा समाज की राजनीति हो ! यूपी के हालिया मिजाज को देखें तो एक बार फिर आरक्षण पर सियासत की जमीन तैयार करने की कवायदें शुरू हो चुकी हैं,बेशक इस बार हथियार उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग को बनाया जा रहा है ! लोक सेवा आयोग की परीक्षा प्रणाली में तय आरक्षण नीति में बदलावों को जिस तरह से लागू किया गया है उसके आधार पर इस बात का पूरी संभावना जताई जा सकती है कि चुनावी तापमान का आभास होते ही यह चिंगारी लौ पकडती नजर आयेगी और परीक्षाओं में आरक्षण के नाम पर यूपी में ओबीसी का ध्रुवीकरण करने का पैंतरा सत्तारूढ़ दल द्वारा चल दिया जाएगा !  भविष्य के उन सियासी पैतरों की बुनियाद रखी जा चुकी है जिसका एक उदाहरण है इलाहाबाद लोक सेवा आयोग दफ्तर पर आरक्षण के खिलाफ हुआ प्रदर्शन ! आरक्षण की मूल मान्यता एवं उद्देश्य को अगर समझने का प्रयास करें तो यह एक संविधान निहित शब्द है ! सामाजिक न्याय एवं सत्ता से व्यवस्था तक में सभी वर्गों के लिए सामान अवसर एवं सामान प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए संवैधानिक स्तर पर आरक्षण नीति अपनाई गयी थी !लेकिन सामाजिक न्याय के नाम पर लाये गए आरक्षण का पिछले कुछ सालों में जितना दुरुपयोग राजनितिक दलों दवारा अपना सियासी पैंतरा साधने के लिए किया गया है,शायद ही किसी और मुद्दे का इतना दुरुपयोग किया गया होगा ! अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा प्रणाली की हालिया आरक्षण नीति को लेकर भारी बवाल देखने को मिला जिसमे आरक्षण के विरोध में चल रहा प्रदर्शन अचानक उग्र और हिंसात्मक हो गया ! उच्च स्तरीय परीक्षाओं में अगर तय आरक्षण नीति को देखें तो यह 1994 में लागू आरक्षण अधिनियम के तहत परीक्षा के अंतिम चयन में तय कोटे के हिसाब से आरक्षण नीति लागू करने का प्रावधान रखा गया है जो कि काफी हद तक न्यायोचित भी कहा जा सकता है ! लिहाजा, इस अधिनियम से सबकी हिस्सेदारी और सबके प्रतिनिधित्व की संभावनाओं को बल मिलता नजर आता है ! मगर 1994 में लागू आरक्षण अधिनियम को ताक पर रखते हुए उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर नई आरक्षण नीति वर्ष 2011 में लागू कर दी गयी ! आयोग द्वारा लागू इस नयी नीति के तहत ये प्रावधान रखा गया कि प्रारंभिक परीक्षा से लेकर मुख्य परीक्षा एव साक्षत्कार आदि सभी चरणों में आरक्षण प्रभावी होगा और सभी चरणों के परीक्षा परिणाम इसी नियामक के तहत जारी किये जायेंगे ! इस मामले में सबसे आश्चर्यजनक तथ्य ये है कि आयोग द्वारा इन नए नियामकों को त्वरित कार्यवाही करते हुए तब लागू किया जब 2011 के प्रारंभिक परीक्षा परिणाम निकल चुके थे ! सवाल उठाना लाजिमी है कि आखिर लोक सेवा आयोग द्वारा इतना बड़ा कदम इतनी जल्दीबाजी में क्यों उठाया गया ? हालाकि इस पुरे विवाद का दूसरा पक्ष ये भी है कि परीक्षा प्रणाली में आरक्षण नीति लागू करने का अधिकार आयोग को नहीं बल्कि राज्य और केन्द्र की सरकारों को है ! तार्किक तौर पर अगर उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा लागू किये गए इन नए नियामकों को देखें तो यह कई स्तरों पर न्यायिक मान्यताओं को खारिज करता नियामक प्रतीत होता है !इसमें कोई दो राय नहीं कि उत्तर प्रदेश में लागू इस नयी आरक्षण नीति के कई दुष्परिणाम हैं जिनको आयोग द्वारा संज्ञान में लिए बिना ही नई नीति लागू कर दी गयी ! छात्रो द्वारा दिया जाने वाला यह तर्क वाजिब और प्रासंगिक है कि इस नए नियामक के लागू होने से तीनो चरणों में अलग-अलग स्तर पर आरक्षित वर्ग के छात्र अनारक्षित वर्ग में ओवरलैप हो जायेंगे । लिहाजा,आरक्षित वर्ग के मेरिट वाले छात्रों के अनारक्षित वर्ग में ओवरलैप हो जाने से सामान्य वर्ग के छात्र लगातार तीनों ही चरण में बाहर होते जाएंगे । परिणामत: अगर इसी क्रम से परीक्षा प्रणाली चलती रही तो साक्षत्कार तक पहुंचते पहुंचते सामान्य वर्ग के छात्रों का प्रतिशत घटकर बीस-पचीस प्रतिशत से भी कम हो जाएगा।
अब सवाल ये उठता है कि क्या ये पूरा मसला महज आयोग की अपनी नीति का हिस्सा है या आयोग के कंधे पर बन्दुक रखकर निशाना कोई और साधने की कोशिश कर रहा है ! इतना तो तय है कि परीक्षा में आरक्षण नीति को लागू करना आयोग का काम भी नहीं है और उसका अधिकार भी नहीं है ! अत: संदेह की सुई बार-बार राजनीति के चुनावी पैतरों पर जाकर इसलिए अटकती है क्योंकि इस मुद्दे का लाभ अक्सर राजनितिक दलों द्वारा चुनावों में लिया जाता रहा है ! फिलहाल अभी मामला अदालत के अधीन जा चुका है और अदालत ने इस पुरे मामले में आयोग से रिपोर्ट माँगी है ! हो सकता है कि माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायलय द्वारा आयोग के इस फैसले पर रोक भी लगा दी जाय और मामला लंबित हो जाय मगर यूपी की सियासत में यह मुद्दा तो कायम रहेगा ही ! आगामी लोकसभा चुनाव में ओबीसी को रिझाने की राजनीति करने के लिए यह मुद्दा काफी कारगर साबित हो सकता है जिसे सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी कायम रखना चाहेगी ! परिणाम जो भी आये मगर इतना तो तय है कि आरक्षण को जिन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए हमारे संविधान में जगह दी गयी उन उद्देश्यों की बजाय आरक्षण का प्रयोग राजनीति और पैंतरेबाजी करने में किया जा रहा है ! बेशक राजनीति की पैंतरेबाजी में नुकसान किसी को भी उठाना पड़े चाहे वो सामान्य वर्ग का परीक्षार्थी हो या आरक्षित कोटे से आने वाला परीक्षार्थी ही क्यों ना हो लेकिन आरक्षण की सियासत कर रहीं राजनितिक पार्टियां तो खूब आरक्षण के नाम पर खूब फसल काटती नजर आ रही हैं ! 


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