- शिवानन्द द्विवेदी सहर
दलीय व्यवस्था में सुधार की दिशा में पहल करते हुए जब केंद्रीय सुचना आयोग ने देश के प्रमुख राजनीतिक दलों को सुचना के अधिकार क़ानून के दायरे में रखे जाने की बात की तो देश का कोई भी स्थापित राजनीतिक दल इस निर्णय को मानने को तैयार नहीं दिख रहा ! अक्सर बिना वजह एक दूसरे पर छींटा-कशी करते रहने वाले ये राजनीतिक दल आज केंद्रीय सुचना आयोग के इस निर्णय पर लामबंद होकर एक सुर में इस निर्णय का विरोध करते नजर आ रहे हैं ! देश के वित्तमंत्री चिदंबरम ने इस निर्णय को अतार्किक बताया तो वहीँ प्रधानमत्री कार्यालय के मंत्री नारायण सामी ने इस निर्णय के खिलाफ कोर्ट जाने की हिमायत कर डाली ! आयोग के इस निर्देश के विरोध में बीजेपी सहित वाम दल भी पीछे नहीं दिख रहे बल्कि उन्हें भी इसमें उनके लोकतान्त्रिक अधिकारों पर खतरा नजर आ रहा है और वो भी इसे लोकतंत्र पर चोट बताते नजर आ रहे हैं ! केंद्रीय सुचना आयोग द्वारा दिये गए फैसले को अगर एक नजर देखें तो उस फैसले में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे गलत अथवा लोकतांत्रिक मान्यताओं के विरुद्द कहा जाय ! अपने फैसले में कुछ बिंदुओं का हवाला देते हुए केंद्रीय सुचना आयोग ने सिर्फ यही कहा है कि देश की उन राजनीतिक पार्टियों जिन्हें सरकारी मदद अथवा छूट मिलती है, द्वारा प्राप्त किये गए चंदे एवं खर्च सहित अन्य कुछ आंकड़ों का ब्यौरा सुचना के अधिकार के तहत आएगा ! फिलहाल केंद्रीय सुचना आयोग द्वारा देश के सात प्रमुख राजनीतिक दलों को सुचना के अधिकार के तहत अपना ब्यौरा उपलब्ध कराने की बात की गयी है ! आयोग के इस निर्णय और राजनीतिक दलों के एक सुर में विरोध के बीच बड़ा सवाल ये है कि आखिर हमारे राजनीतिक दल ऐसे कानूनों से इतना डरते क्यों हैं जिनसे उनके पारदर्शिता की जांच की जा सकती हो ? अगर आजादी के बाद की भारतीय संसदीय राजनीति का इतिहास उठाकर देखा जाय तो यह खोज पाना बड़ा मुश्किल साबित होगा कि अंतिम बार कब ऐसा कोई कानून बना जिसमे राजनीतिक दलों के ऊपर शिकंजा कसने एवं उनकी जांच करने की बात की गयी हो ! आज हाथ में हाथ मिलाये खड़े भाजपा,कांग्रेस,भाकपा सहित तमाम राजनीतिक दलों द्वारा इस निर्णय को अलोकतांत्रिक बताना बेहद बेबुनियाद और उनके मन में छिपे डर के सिवा कुछ भी नहीं है ! यह बात किसी से छुपी नहीं है कि चनाव जीतने से लेकर चुनाव के बाद सत्ता प्रबंधन तक के लिए खरीद-फरोख्त एवं धन प्रबंधन के कितने भ्रष्टाचार इन राजनीतिक दलों द्वारा किये जाते है ! राजनीतिक दल चलाने के लिए कारपोरेट से चंदा उगाही कर रहे इन राजनीतिक दलों को केंद्रीय सुचना आयोग का यह निर्णय उनके स्वच्छन्द विचरण में खलल जैसा लग रहा है ! चाहे लोकपाल क़ानून हो या राजनीतिक दलों को सुचना के अधिकार के तहत लाने की बात,इन राजनीतिक दलों को भला यह कैसे स्वीकार्य हो सकता है कि कोई क़ानून उनके द्वारा उन्मुक्त ढंग से किये जा रहे इस लुट-तंत्र में हस्तक्षेप करे ! बड़ी सीधी-सपाट सी बात है कि अगर वाकई आपको लगता है कि आप अपना काम सही ढंग से कर रहे हैं तो फिर आप अपनी पारदर्शिता को दिखाने परहेज क्यों कर रहे ?
भारत एक बहुदलीय लोकतांत्रिक प्रणाली वाला देश है जहाँ समय के साथ-साथ राजनीतिक दलों का उद्दभव एवं विकास होता रहा है ! समय के साथ विकसित हुए भारतीय लोकतंत्र के दलीय व्यवस्था में बहुदलीय प्रणाली स्थापित होती गयी और तमाम दल अपने-अपने क्षेत्रों एवं राज्यों में मजबूत होते गए ! भारत में बढते राजनीतिक दलों की संख्या के साथ-साथ दलीय व्यवस्था के स्वरुप के बिगड़ने की गुंजाइशें भी बढ़ी हैं ! ऐसा देखा गया है कि चुनाव आते ही राजनीतिक दलों द्वारा धन का खजाना खोल कर पैसा पानी की तरह बहाया जाता है जिसका कोई भी ब्यौरा किसी के पास उपलब्ध नहीं होता है ! लिहाजा दलीय व्यवस्था की शुचिता का सवाल भी समय-समय पर उठाना लाजिमी है और उठता भी रहा है ! दलीय व्यवस्था में सुधारों पर विमर्श आदि तो अक्सर होते रहे हैं ! केंद्रीय सुचना आयोग(सीईसी) द्वारा जारी इस निर्देश को राजनीति के बिगड़ते स्वरुप में दलीय सुधार की शुरुआती कवायद के रूप में देखा जाना चाहिए ! हालाकि अभी केंद्रीय सुचना आयोग ने महज सात राजनीतिक दलों को सुचना के अधिकार के दायरे में रखा है लेकिन इस अहम शुरुआत के बाद त इसमें जरुरत और समय के साथ और भी दल शामिल किये जा सकते हैं ! इसमें कोई दो राय नहीं भारतीय लोकतंत्र में राष्ट्रीय स्तर के बड़े जनाधार वाले राजनीतिक दलों की संख्या बेशक गिनी-चुनी है लेकिन आम चुनावों को प्रभावित करने वाले दल बहुत सारे हैं ! ऐसे में अगर इन तमाम राजनीतिक दलों अथवा कम से कम बड़े राजनीतिक दलों को सुचना के अधिकार के दायरे में लाने की शुरुआत हुई है तो निश्चित तौर पर दलीय व्यवस्था में सुधार की दिशा में इसके कुछ अच्छे परिणाम देखने को मिलेंगे ! केंद्रीय सुचना आयोग द्वारा जारी इस फैसले के लागू होने के बाद आम जनता को यह अधिकार होगा कि वो सुचना के अधिकार के दायरे में आने वाले राजनीतिक दलों से कुल आय-व्यय का ब्यौरा,कार्यक्रमों का खर्च,चंदा वसूली का ब्यौरा एवं चुनावों में प्रत्याशियों के चयन के तय मानकों का ब्यौरा राजनीतिक दलों से मांग सके ! हालाकि इनमे से तमाम ब्योरे राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव आयोग को दिये जाते रहे हैं लेकिन सुचना के अधिकार के तहत आने के बाद ये सारी जानकारियां अब आम जनता को भी उपलब्ध करानी होगी !
केंद्रीय सुचना आयोग द्वारा जारी यह निर्देश कितना जरूरी है इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि सारे राजनीतिक दल इससे डरे हुए और हताश दिख रहे हैं ! निश्चित तौर पर राजनीतिक दलों की यह लामबंदी इस बात की तरफ इशारा करती है कि आयोग द्वारा दिया गया यह निर्देश राजनीतिक दलों के अंदरूनी भ्रष्टाचार को उजागर कराने वाला साबित हो सकता है जिसकी वजह से ये सारे राजनीतिक दल एक सुर में इसका विरोध करते नजर आ रहे हैं ! इस मामले में अंदरूनी सच्चाई यही है कि चाहें बीजेपी हो या कांग्रेस या मजदूरों की बात करने वाले वामदल ही क्यों ना हो,सभी के सभी राजनीतिक दल भारतीय राजनीति के दलीय व्यवस्था के अंदर जड़ें जमा चुके भ्रष्टाचार की मलाई खा रहे हैं ! भारतीय लोकतंत्र को दीमक की तरह खा रही इस बेलगाम दलीय व्यवस्था पर अगर सख्ती से नकेल नहीं कसी गयी तो वह दिन दूर नहीं जब भारत में लोकतंत्र के नाम पर केवल दलीय सत्ता का आवरण मात्र शेष बचेगा जिसमे बारी-बारी से सभी दल अपने हिस्से का भ्रष्टाचार करते रहेंगे ! जिस क़ानून का विरोध सभी दल एक सुर में एक साथ मिलकर कर रहे हों,इतना तो मान लिया जाना चाहिए कि वो क़ानून बहुत काम का है !

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