रविवार, 8 सितंबर 2013

कुछ पूछती तो कुछ बताती कवितायें : दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरी समीक्षा











  • शिवानन्द  द्विवेदी सहर
लन्दन में रह रहीं संस्मरण लेखिका शिखा वार्ष्णेय संस्मरण के अलावा कविताएं भी
लिखती हैं,ये बात मुझे तब पता चली जब उनकी कविता संग्रह “मन के प्रतिबिम्ब” मुझे पढ़ने को मिली ! कुल इक्यावन कविताओं वाले इस कविता संग्रह की हर कविता के पास अपनी भाव-संपदा,कथ्य-सम्पदा तो है ही साथ ही साहित्य की काव्य विधा के हर मानक पुष्ट होते नजर आते हैं ! वैसे यह पूरा काव्य संग्रह दो तरह की कविताओं में वर्गीकृत होता है ! इस काव्य संग्रह की कुछ कवितायें समाज से,खुद से और अनाम किसी से कुछ सवाल पूछती हुई आगे बढ़ती हैं तो कुछ ऐसी भी कवितायें भी हैं जो जवाब के रूप में बहुत कुछ बताती नजर आती हैं ! कविता संग्रह की तीसरी कविता “चीखते प्रश्न” की अगर बात की जाय तो वाकई यह कविता एक जीवंत सवाल की तरह समाज से टकराती नजर आती है ! बेहद सहज और सरल शब्दों में भारतीय महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी मांगती कविता “चीखते प्रश्न” निश्चित तौर पर इस कविता संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कविताओं में से एक है-

          कैसे कहूँ मै भारतीय हूं
              क्यों करूँ मै गुमान
आखिर किस बात का
जो इन्डियन शब्द निकलते ही
लग जाते हैं पीछे ...
वही न,
जहाँ रात तो छोड़ो
दिन में भी महिलाएं
नहीं निकल सकतीं घर से ?
एक लेखक अथवा एक कवि का पहला दायित्व ये होता है कि वो अपने सृजन के प्रति ईमानदार बने और अपने शब्दों और भावों के बीच सुन्दर और गैर-बनावटी समन्वय स्थापित करते हुए अपनी कृति को देशकाल और समाज के बने सांचों में कहीं ना कहीं फिट कर सके ! इसमें भी कोई संदेह नहीं कि कविता कभी भी कथन नहीं हो सकती अथवा कुछ कह देना मात्र ही कविता के मानकों को पुष्ट नहीं कर सकता ! सही अर्थों में देखा जाय तो कथ्य और भाव को जब किसी परिस्थिति से जोड़ लेने में कवि सफल जाता है तो कविता भी सफल हो जाती है ! मन के प्रतिबिम्ब कविता संग्रह में लेखिका ने अपनी कविता “प्रलय...बाकी है” के माध्यम से समाज के एक कुरूप चेहरे को बड़ी साफगोई से दिखा पाने में सफल होती हैं-
          तभी प्रकट हुई एक टोली
          वहशी,दानवों से वे भोगी
          इंसानों के इस दुनिया में
          पशुवत,कुंठित व मनोरोगी
          पल भर में बदल गया दृश्य
          क्षत-विक्षत पड़ी वो भोली !! (दामिनी प्रकरण पर)
मन के प्रतिबिम्ब कविता संग्रह की कवितायें ऐसी भी हैं जो सवाल और समाधान के बीच के टकरावों में समाधान के गुंजाइशों की एक किरण ना सिर्फ तलाश पाने में सफल होती हैं बल्कि समाज को संकेतों में ही उन गुंजाइशों से अवगत भी कराती हैं ! यह कहने में पाठक को कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि लेखिका द्वारा रचित कविता “यतीम” हमारे वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों के नजरिये से बेहद प्रासंगिक और यथार्थ के करीब प्रतीत होती है ! यतीम कविता का पहला चरण भारत के अनाथ बच्चों की दुर्दशा का सजीव और मार्मिक चित्रण करता है तो वही अपने प्रारब्ध तक जाते-जाते यह कविता इस समस्या के समाधान के कई साकारात्मक-नाकारात्मक पहलुओं को करीब से छुती नजर आती है –
          एक रात वहीँ
          कोई टोकरी में छोड़ गया था उसे,
          शायद अँधेरे में
          उसका रंग और मुस्कान
          नजर न आये हों उन्हें
          पर आज तो धुप है गहरी
          सब दिखेगा साफ़-साफ़
          यक़ीनन आज उसकी बारी है
          नए मम्मी पापा मिलने की....
भारतीय समाज और देशकाल से जुड़ी इन सभी कविताओं का लेखन लन्दन में रह रहीं लेखिका द्वारा होना भी सामाजिक जुडाव का एक अद्दभुत कौशल है ! इन कविताओं में ना तो किसी तरह का कोई बनावटीपन ही है और ना ही इनमें शाब्दिक जटिलता है ! ये कवितायेँ कुछ यूँ हैं मानो लिखी और प्रस्तुत नहीं की गयीं हों बल्कि परोसी गयी हों ! वाकई एक कविता पाठक से तभी जुड़ पाती है जब वो परोसी जाय ! इन तमाम कविताओं के अलावा भी तमाम कवितायें जैसे- मै तेरी परछाई हूँ,बर्फ के फाहे,गूंगा चाँद,मै बनाम हम, यही होता है रोज, इस पुरे कविता संग्रह की महत्वपूर्ण कवितायें हैं ! एक कविता “किस रूप में चाहूँ तुझे मै” में लेखिका श्रृंगार और विछोह के बीच मद्धम गति से चलने वाली उस नाव की नाविका बन जाती हैं जो किनारों को तलाशती तो है मगर किनारों का हर रूप उसे पसंद नहीं आता ! निश्चित तौर पर अपनी इक्यावन कविताओं के साथ यह कविता संग्रह “मन के प्रतिबिम्ब” एक सफल कृति है ! इस कविता संग्रह की सबसे बड़ी खासियत इसका भोलापन है ! जटिलताओं के दौर में उलझती आज की नई कविताओं के बीच कोई सीधी-साधी और भोली-भाली कविता मिल पाने अन्यत्र जितना मुश्किल है, यहाँ उतना ही आसान ! अपनी तमाम साकारात्मक पहलुओं को सहेजे यह कविता संग्रह खुद को स्वत: ही एक सफल किताब की शक्ल में तब्दील कर लेता है ! लेखिका की एक कविता से ही यह पूरा विश्लेषण पुष्ट होता नजर आता है अत: मै उसी कविता को यहाँ रखते हुए  शुभकामनाओं के साथ अपनी बात खतम करता हूँ-
          कभी देखो इन बादलों को
          जब काले होकर आसुओं से भर जाते हैं,
          तो बरस कर इस धरा को ढो जाते हैं
          कभी देखों इन पेड़ों को
          पतझड के बाद भी
          फिर फल-फुल से लड़ जाते हैं,
          कभी देखो इन नदियों को
          पर्वत से गिरकर भी,
          चलती रहती हैं !!.......................समाप्त     


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