मंगलवार, 17 सितंबर 2013

अमेरिकी हार है सीरिया युद्ध का टलना : दैनिक जागरण नेशनल में प्रकाशित

  • शिवानन्द  द्विवेदी सहर
हाल ही में सीरिया द्वारा रासायनिक हथियारों का प्रयोग किये जाने को
मुद्दा बनाकर अमेरिका द्वारा सीरिया पर हमला करने का एलान किया गया जिसका अन्तराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक विरोध देखा गया । सीरिया पर हमले को लेकर अमेरिका द्वारा ये दलील दी जाती रही कि सीरिया द्वारा रासायनिक हथियारों का प्रयोग किया गया है जिसमे हजारों लोग मरे हैं और इससे विश्व में शान्ति का संकट पैदा हो सकता है । सीरिया मुद्दे पर अमेरिकी हस्तक्षेप का आलम यहाँ तक पहुच गया कि अमेरिका द्वारा कई युद्ध पोत और युद्ध सामग्री सीरिया सीमा की तरफ समुद्री मार्ग से भेज दी गयी । इस पुरे मसले पर अमेरिका द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका की भी परवाह न के बराबर ही की गयी । हालाकि इस मामले में सबसे पहले हस्तक्षेप करते हुए दुनिया की एक अन्य महाशक्ति रूस ने अमेरिका से अपील की कि उसे सीरिया पर हमले को लेकर इस कदर उग्र नहीं होना चाहिए । रूस के अलावा चीन और ब्रिटेन भी अमेरिका द्वारा सीरिया पर हमला करने के पक्ष में नहीं दिखे और अपना विरोध दर्ज कराये । दरअसल इस पुरे मामले को केवल रासायनिक हथियारों के प्रयोग पर अमेरिकी आपत्ति के लिहाज से देखना प्रासंगिक नहीं प्रतीत होता । अगर देखा जाय तो सोबियत संघ के विघटन के बाद एक ध्रुवीय विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति के रूप में उभरी अमेरिका की नीति सदैव से ही विश्व की आर्थिक एवं प्राकृतिक संपदाओं के श्रोतो पर अपने नियंत्रण को कायम करने की रही है । अमेरिका द्वारा इसी नीति के तहत मानवाधिकार एवं लोकतंत्र की स्थापना के नाम पर ईराक का युद्ध भी लड़ा गया था । दरअसल ईराक युद्ध में भी अमेरिका की नजर ईराक में अकूत मात्रा में उपलब्ध तेल पर थी ।अंतराष्ट्रीय सुरक्षा, मानवाधिकार एवं लोकतांत्रिक मूल्यों का हवाला देकर अमेरिका द्वारा हमेशा से ही अपनी शक्ति का दुरूपयोग किया जाता रहा है और अपनी तानाशाही दिखाई जाती रही है । बहरहाल इस पुरे मामले में युद्द की जिद पर अड़े अमेरिका पर रूस और चीन ने दबाव बनाते हुए इस बात की पुरजोर पहल की कि इस सीरिया के रासायनिक हथियारों के प्रयोग करने के मसले को युद्ध की बजाय अन्य विकल्पो से सुलझाया जाय । हालाकि अमेरिका को लेकर कमोबेश हर मसले पर रूस और चीन का स्पस्ट विरोध देखा जाता है । चीन और रूस द्वारा अमेरिका ले विरोध का सबसे बड़ा कारण ये है की क्षेत्रफल और शक्ति सम्पन्नता के लिहाज से दोनों अमेरिका के प्रतिस्पर्धी हैं । विघटन से पूर्व तो रूस की अंतर्राष्ट्रीय शक्ति क्षमता अमेरिका के समानांतर हुआ करती थी । सीरिया पर हमला करने के वास्तविक मंसूबों को बारीकी से समझते हुए रूस ने इस बात के लिए पुरजोर पहल की कि जैसे भी हो इस युद्ध को टाला जा सके । चूकी रूस यह बखूबी जानता है अमेरिका द्वारा जब भी कहीं हमला किया जाता है तो यह अमेरिका के लिए फायदेमंद साबित होता है । सीरिया पर अमेरिकी हमले को टालने के लिए प्रतिबद्ध रूस ने अन्तराष्ट्रीय पहल करते हुए सीरिया के राष्ट्रपति बल अशर असद  को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वो अपने रासायनिक हथियार अंतराष्ट्रीय समुदाय को सौप दे और रासायनिक हथियारों के निषेध संधि पर हस्ताक्षर करते हुए इस समुदाय की सदस्यता ग्रहण कर ले । गौरतलब है कि सीरिया अबतक उन सात देशों में था जो इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किये थे । अमेरिकी तानाशाही के मंसूबों पर पानी फेरते हुए रूस ने न सिर्फ दुनिया को एक युद्ध से निकाला है बल्कि अपनी अंतराष्ट्रीय समझदारी के तहत अमेरिकी नीतियों को खारिज भी कराया है । गौर करना होगा कि कई मामलों में देखा गया है कि जब किसी तरह की कोई असंतुलित करने वाली अंतराष्ट्रीय घटना होती है तो सबसे पहले युद्ध की जल्दी अमेरिका ही दिखाता है । लेकिन सीरिया के मसले में रुसी हस्तक्षेप ने अमेरिकी मंसूबों को अपनी कूटनीतिक पैतरों से धुल चटाने का काम किया है । सीरिया पर हमले को लेकर अपना खुला विरोध दर्ज करा रहे रुसी विदेश मंत्री सर्गेइ लावरोव ने अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी से मुलाक़ात में इस बात का दबाव बनाया कि अमेरिका युद्ध को लेकर इतना अधिक जल्दीबाजी न दिखाए । रुसी विदेश मंत्री द्वारा की गयी इस मुलाक़ात को अमेरिकी मनमानी पर नकेल कसने की कवायद के रूप में देखा जाना चाहिए । आज पुरे विश्व को यह समझने की जरूरत है कि अपने निजी हितों एवं वैश्विक सर्वोच्चता को कायम रखने के लिए अमेरिका किसी ना किसी बहाने उन देशों को निशाना बनाने का प्रयास करेगा जिनसे वो संसाधनों का मनमाना दोहन कर सके और अपनी सर्वोच्चता का झंडा बुलंद कर सके । हालाकि सीरिया को लेकर रूस का रुख इस बात का सुबूत है कि अब अमेरिकी तानाशाही को कुटनीतिक चुनौतियाँ मिलने लगी हैं और उसका यह मनमाना व्यवहार दुनिया को स्वीकार्य नहीं है । रूस की पहल पर टाले गए इस युद्ध को अमेरिकी तानाशाही की हार और विश्व शान्ति की स्थापना में रूस और सीरिया की जीत के तौर पर देखा जाना चाहिए । चुकि सीरिया के मामले में अमेरिका द्वारा सीरिया पर रासायनिक हथियारों के समर्पण का दबाव कभी नहीं बनाया गया बल्कि शुरू से ही अमेरिका का युद्धोन्मादी चेहरा सामने आता रहा । अमेरिका का गाहे-बगाहे  उभरता रहने वाला यही युद्धोन्मादी चेहरा इस बात की तस्दीक करता है कि अमेरिका शान्ति और शक्ति संतुलन की बजाय निजी हितों की लडाइयां लड़ता रहा है । आज सीरिया पर युद्ध का गहराता संकट अगर टल गया है तो इसे अमेरिकी मंसूबों की शिकस्त एवं सीरिया के जीत रूप में देखने की जरुरत है ।      

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