- शिवानन्द द्विवेदी सहर
राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक खुद ही आपसी आरोप-प्रत्यारोप और सियासी छीटाकसी की भेंट चढती नजर आई ! राष्ट्रीय एकता परिषद की इस बैठक की पहली दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यही है कि सदभाव कायम करने के इस अहम मसलेपर बुलाई गयी बैठक में कई राज्यों के मुख्यमंत्री और कई राजनीतिक दलों के प्रमुख शामिल होने तक से परहेज कर लिए ! परम्पराओं एवं नियामकों के अनुसार राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में पहले तक परिषद के सदस्यों एवं राजनीतिक दलों के प्रतिनिधी नेताओं के अलावा प्रत्येक राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल होते रहे हैं ! लेकिन इस बार हुई 16वी बैठक में मात्र सोलह राज्यों के मुख्यमंत्रियों का हिस्सा लेना एव शेष राज्यों के मुख्यमंत्रियों सहित कई दलों के आला नेताओं का इस बैठक से किनारा करना बेहद निराशाजनक कदम कहा जा सकता है ! सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात तो ये है कि मुज्जफरनगर मसले पर समाजवादी पार्टी सरकार पर आरोप-प्रत्यारोप गढ़ने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती के साथ-साथ प्रधानमंत्री पद के भाजपा घोषित उम्मीदवार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस बैठक से नदारद रहे ! हालाकि राष्ट्रीय एकता परिषद की इस बैठक को लेकर सवालों की सुई उनके ऊपर तो उठती ही है जो इस बैठक को दरकिनार कर दिये लेकिन बैठक में शामिल हुए प्रतिनिधियों पर भी कम सवाल नहीं उठते हैं ! समाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता के नाम पर बुलाई गयी यह बैठक सियासत के दरारों में विभाजित होती दिखी और आरोप-प्रत्यारोप की भेंट चढ़ गयी ! राष्ट्रीय एकता के नाम पर बुलाई गयी इस बैठक के हासिल के तौर पर ना तो कोई आम सहमति के साथ आगे बढ़ने का निर्णय नजर आया और ना ही ऐसीकोई नीतिगत चर्चा ही नजर आई जिसके आधार पर इस बैठक की सफलता को प्रमाणित किया सकता हो ! सियासत से ऊपर उठते हुए आम सहमति की बजाय सभी शामिल प्रतिनिधी अपनी ढपली अपना राग का जाप करते नजर आये ! इस बैठक में शामिल प्रधानमंत्री सहित अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा बैठक में रखीगयी बातों पर अगर गौर करें तो उनके द्वारा दिये गए सभी बयान सिवाय अपनी सियासी कवायदों के कुछ नहीं नजर आयेंगे ! सभा की शुरुआत करते हुए ही प्रधानमंत्री द्वारा भाजपा और सपा पर निशाना साधने को बैठक की उद्देश्यों के लिहाज से बेहद गलत शुरुआत कही जा सकती है ! सपा और भाजपा को निशाने परलेते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन द्वारा साम्प्रदायिक दंगो के प्रति केंद्र सरकार की जवाबदेही से साफ़ तौर पर किनारा करने को बेहद गैरजिम्मेदाराना बयानही कहा जाएगा जो कि इन नाजुक परिस्थितियों में एक देश के प्रधानमंत्री द्वारा उस समय तो नहीं ही दिया जाना चाहिए था जब राष्ट्रीय एकता की बैठक बुलाई गयी हो । गौरतलब है कि बैठक की शुरुआत में ही प्रधानमंत्री ने साफ़ तौर पर कहा कि साम्प्रदायिक दंगो के लिए राज्य जिम्मेदार है केंद्र नहीं । लिहाजा जब प्रधानमंत्री द्वारा सभा की सियासी शुरुआत कर दी गयी तो भला बाक़ी लोग कैसे चुप रहें ! भाजपा के इकलौते शामिल हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंहचौहान ने अपनी पार्टी के बयानों को ही दोहराते हुए पुरे दंगे को तुष्टिकरण से जोड़ दिया तो वहीँ अखिलेश यादव और नितीश कुमार ने धार्मिक उन्माद और साम्प्रदायिकता आदि का हवाला देकर भाजपा पर निशाना साधा ! इस पुरे बैठक में तकरीबन उतनी ही बातें बोली गयीं जितनी आम सभाओं या मीडिया में पहले से बोली जाती रही हैं ! ऐसे में बड़ा सवाल है कि फिर इस विशेष बैठक का औचित्य क्या था और यह बैठक क्यों होनी चाहिए थी ? दरअसल इस पुरे बैठक में सिवाय अपनी-अपनी सियासत पुख्ता करने के कुछ भी नही हुआ है !सही मायनों में अगर देखा जाय तो राष्ट्रीय एकता परिषद की इस बैठक में उन उपायों पर बात कीजानी चाहिए थी कि जिनके द्वारा दंगों के खिलाफ राजनितिक एवं प्रशासनिक एकजुटता कायम की जा सकती हो ! सरकारी स्तर पर बुलाई गयी इस बैठक में एक मुख्यमंत्री और एक प्रधानमंत्री की प्रथम जवाबदेही अपने राज्य अथवा देश के प्रति होनी चाहिए जहां कि जनता ने उसे अपना जनादेश सौपा है न कि अपने राजनीतिक दल के प्रति । हाँ इस बैठक में दंगों को लेकर अपनी जवाबदेही तय करने का नैतिक साहस भले किसी में न दिखा हो लेकिंन सोशल मीडिया पर दंगो का ठीकरा फोड़ने को लेकर एक अद्द्भुत राजनीतिक एका देखने को मिला । राष्ट्रीय एकता परिषद इस बैठक में सोशल मीडिया पर लगाम कसे जाने को लेकर क्या पक्ष औरक्या विपक्ष,सभी एकजुट नजर आये । पूरी बैठक में यही वो एकमात्र मुद्दा रहा जहां आपसी विरोधाभास नहीं देखा गया । बड़ा सवाल ये है कि जब भी कोई अप्रिय घटना होती है तो हमारे राजनितिक जमात द्वारा सोशल मीडिया को ही निशाना बनाकर ऐसे एकजुटता दिखाई जाती है मानो अमुक घटना के पीछे एक मात्र कारण सोशल मीडिया की व्यापकता ही हो । इस सन्दर्भ में इस बात को बेशक स्वीकारकिया जा सकता है कि सोशल मीडिया के माध्यम से अफवाह आदि को फैलाया जाता है मगर इसे इस स्तर पर भी नहीं स्वीकार किया जा सकता कि हमारी सरकार अपनी जवाबदेही को ताक़ पर रखकर सारा ठीकरा सोशल मीडिया पर फोड़ दें । फिलहाल इतना तो तय है कि अलग-अलग तरह के बहानो से सोशल मीडिया पर कवायदें तो चल ही रहीहैं ।खैर,जो भी हो फिलहाल दंगो पर भविष्य में नियंत्रण रखने एवं संघीय स्तर पर एकजुटता के दिशा में कोइ साकारात्मक परिणाम आते नहीं दिख रहे सिवाय आपसी नूराकुश्ती के ।इस तरह की बैठक की औपचारिकताओं से ना तो दंगो के दंश से छुटकारा मिलता दिख रहा है ना ही साम्प्रदायिक सदभाव की दिशा में ही कोई राजनितिक इच्छा शक्ति को ही बल मिलता दिख रहा है । सही बात तो ये है कि हमारे रहनुमाओं में साम्प्रदायिक सदभाव कायम करने की नीयत ही नहीं है और वोआज भी इसे राजनितिक एजेंडे के तौर पर हवा देकर अपने वोटबैंक दुरुस्त करने में लगे हुए हैं । अगर वाकई साम्प्रदायिक सदभाव और राष्ट्रीय एकता के प्रति समर्पण भाव होता तो कम से कम 12 राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा इस बैठक का बहिष्कार नही किया गया होता और मायावती सरीखे उत्तरप्रदेश के नेता संयुक्त प्रयासों के इस पहल से किनारा करते नहीं नजर आते । ये सच है कि प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा समर्थित दावेदार होने के नाते नरेन्द्र मोदी इस बैठक से किनारा किये लेकिन बेहतर होता कि अगर वो भी इस बैठक में आकरअपनी बात रखे होते । भला यह देश उस व्यक्ति को बतौर अपना प्रधानमंत्री कैसे स्वीकार करेगा जो सौहार्द के इस मसले पर मंच तक आने से परहेज कर रहा हो । नरेन्द्र मोदी नही आये ये उनका राजनितिक फैसला है लेकिन दस्तूर और मौका यही कहता है कि उन्हें आना चाहिए था । खैर जो भी हो इतना तो तय है कि एकता केनाम पर बुलाई गयी इस बैठक में सबसे ज्यादा सियासी विभेद देखने को मिला जो कि राष्ट्रीय एकता के लिए अच्छे संकते के तौर पर नहीं देखा जा सकता है ।

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