- शिवानन्द द्विवेदी सहर
ऐसे समय में जब उत्तरप्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार
मुज्जफरनगर मामले में पूरी तरह घिरी हुई है और उसके समाजवादी विचारधारा की शुचिता पर सवाल उठ रहे हैं,ऐसे में लोहिया और जनेश्वर मिश्र के पथ पर आजीवन चलने वाले तेज तर्रार समाजवादी नेता मोहन सिंह का जाना सपा के लिए अपूरणीय छति की तरह है ! समाजवादी पार्टी को पिछले तीन सालों में हुई पारंपरिक समाजवादियों के रूप में यह तीसरी छति है ! यों तो परिवाद के आरोपों से हमेशा दो-चार होती रहने वाली समाजवादी पार्टी में मोहन सिंह उन नेताओं में से एक थे जो सभी परिस्थितियों में अपने राजनितिक आदर्शों और समाजवाद की बुनियादी शर्तों के साथ जीवन यापन किये ! साठ के दशक में जब कांग्रेस विरोधी आंदोलन की बुनियाद रखी गयी थी और समाजवादी लेखक मधु लिमये सरीखे लोगों द्वारा इलाहाबाद में आंदोलन को समर्थन दिया जा रहा था, उस दौरान मोहन सिंह भी उस आंदोलन से जुड़ गए ! अपनी राजनैतिक कुशलता के कारण ही सन 1968-69 में वो इलाहाबाद विश्वविद्द्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष भी चुने गये थे ! आज जब उत्तरप्रदेश की समाजवादी पार्टी सरकार के समक्ष तमाम विपरीत परिस्थितियां हैं और लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती भी शुरू है, ऐसे में समाजवादी पार्टी के सबसे लंबे समय तक सचेतक के रूप में काम करने वाले मोहन सिंह की कमी ना सिर्फ खलेगी बल्कि उसका असर चुनावों में भी दिखेगा ! मोहन सिंह काफी समय से देवरिया सदर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ते और चुने जाते रहे हैं, जहाँ उनका सीधा मुकाबला भाजपा से होता रहा है ! हालाकि पिछली बार यह समीकरण टूट गया था और देवरिया सीट बसपा के खाते में चली गयी थी,लिहाजा उन्हें राज्यसभा में बैठना पड़ा था ! ओजस्वी वक्ता और कद्द्वारा नेता के रूप में ख्यातिलब्ध मोहन सिंह के राजनैतिक आदर्श भी बेहद साफ़-सुथरे रहे हैं और वो कभी भी ना तो खुद को समाजवादी पार्टी के ऊपर खड़ा करने की कोशिश किये और ना ही कभी अपने राजनैतिक मूल्यों के साथ समझौता करते ही देखे गए हैं ! अभी एक साल ही हुए जब डीपी यादव मामले में अखिलेश कि खिलाफत करने के कारण उन्हें पार्टी के प्रवक्ता पद से हटा दिया गया था उस दौरान भी वो कद्दावर नेता चुप रहा था ! हालाकि मोहन सिंह के जाने से अगर सबसे ज्यादा प्रभावित कोई जगह है तो वो है देवरिया लोकसभा सीट ! मोहन सिंह के अत्यंत करीबी बताते हैं हैं कि मोहन सिंह अपनी राजनितिक विरासत अपनी बेटी कनकलता को सौपना चाहते थे और इसकी शुरुआत पिछले साल कई कार्यक्रमों में हो भी चुकी थी ! शायद मोहन सिंह की ऐसी इच्छा रही हो कि उनकी पुत्री कनकलता को उनके लोकसभा सीट देवरिया से आगामी लोकसभा चुनाव में टिकट दिया जाय लेकिन ऐसा हो नहीं सका ! कारण जो भी हों लेकिन देवरिया लोकसभा सीट से कनकलता को टिकट ना मिलने के बावजूद मोहन सिंह कभी इस मामले को सार्वजनिक नहीं किये जबकि इसी समाजवादी पार्टी में खून के रिश्तों में ही पिता,पुत्र और बहु तीनो राजनीति में घुसाए गए हैं ! फिलहाल मोहन सिंह के आकस्मिक मृत्यु के बाद देवरिया के समीकरण थोड़े बदलते से दिख रहे हैं और अपने राज्यसभा के अधूरे कार्यकाल में ही परलोक सिधार गए मोहन सिंह की पारंपरिक सीट पर सहानुभूति के आधार पर शायद कोई बड़ा फेरबदल देखा जाय ! मोहन सिंह के निधन की खबर आते ही देवरिया शहर में ना सिर्फ शोक की लहर दौडी बल्कि राजनितिक कयासबाजियां भी तेज हो गयीं ! चुकी, देवारियां लोकसभा सीट पर बसपा ने ब्राह्मण कार्ड खेलकर कमलेश शुक्ल को अपना उमीदवार घोषित किया है एवं सपा ने पूर्व आईएएस रामेन्द्र त्रिपाठी को उम्मीदवार घोषित किया है ! भाजपा ने अपने पत्ते अभी नहीं खोले हैं लेकिन देवरिया सीट के लिए पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सूर्यप्रताप शाही और पूर्व सांसद श्री प्रकाश मणि त्रिपाठी के बीच रस्साकसी की अंदरूनी ख़बरें देवारियां की सडकों पर आम हैं ! अगर वर्तमान स्थिति के आधार पर आगमी चुनाव का आकलन करें तो रामेन्द्र त्रिपाठी की स्थिति बेहद नाजुक है और वो यहाँ से तीसरे नम्बर पर रह सकते हैं जबकि सीधी लड़ाई भाजपा और बसपा के बीच होनी है ! अब जब मोहन सिंह जो कि देवरिया से सपा के प्रत्याशी हुआ करते थे उनके निधन की सहानुभूति के तौर पर उनकी अंतिम इच्छा पूरी करते हुए रामेन्द्र त्रिपाठी का टिकट काट दिया जाता है और कनकलता को टिकट दिया जाता है तो समीकरण पूरी तरह से पलट जायेंगे ! हालाकि अंदरूनी तौर पर ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि रामेन्द्र त्रिपाठी को बैठना पड़ेगा क्योंकि पिछली बार गँवा चुकी इस लोकसभा सीट को पुन: मोहन सिंह के विरासत के रूप में उनकी पुत्री को देने से समाजवादी पार्टी को भी परहेज नहीं होगी ! मोहन सिंह की व्यक्तिगत और पारिवारिक दोनों छवियाँ बेहद साफ़-सुथरी रही हैं अत: सपा मौके की नजाकत को देखते हुए कनकलता को टिकट दे सकती है !
फिलहाल भविष्य में जो भी लेकिन मोहन सिंह के आकस्मिक निधन से देश की समजवादी विचारधारा को एक बड़ा नुकसान हुआ है जिसकी भारपाई वाकई संभव नहीं है ! मोहन सिंह उस दौर में समाजवादी पार्टी के साथ जुड़े जब समाजवादी पार्टी की बुनियाद रखी जा रही थी और अखिलेश सरीखे समाजवादी नेता तब बहुत छोटे-छोटे बच्चे होंगे ! लेकिन समाजवाद के नाम पर परिवारवाद का ऐसा दुष्चक्र पैदा हुआ कि समाजवाद का झंडा उठाने वाले कैडर नेता हाशिए पर चले गए और अखिलेश सरीखे नए और अनुभव हीन चेहरे सत्ता पर आसीन हो गए ! छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्र और समाजवादी बी के तिवारी की कतार को बढाने वाले मोहन सिंह के निधन ने फिलहाल इस कतार को विराम दे दिया है और उत्तप्रदेश की समाजवादी पार्टी में अब कोई समाजवादी बचा है ऐसा नहीं कहा जा सकता ! अगर वाकई समाजवाद अपनी शुचिता के साथ कायम होता तो मुख्यमंत्री जैसे पदों पर मोहन सिंह और जनेश्वर मिश्र जैसे लोग एक बार जरुर पहुचे होते ! जिस राज्य में कई बार समाजवादी पार्टी की सरकार बनी हो और वहाँ एक बार भी कोई पारंपरिक समाजवादी मुख्यमंत्री ना बन पाया हो तो इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा ! मुलायम सिंह बेशक समाजवादी राजनीति के प्रणेता रहे हों लेकिन अब वो किसी भी नजरिये से समजवादी नहीं रहे और परिवारवाद से ग्रसित एक कुटिल राजनेता बन चुके हैं ! मोहन सिंह जैसे नेता वाकई सच्चे समाजवादी थे और उनका जाना किसी राजनितिक दल और किसी लोकसभा सीट से ज्यादा एक विचारधारा और एक आंदोलन की छति है जिसको कभी पूरा नहीं किया जा सकता !
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