बुधवार, 12 जून 2013

अंकों की चकाचौंध में शिक्षा का बाजार : दैनिक जागरण एवं ट्रिब्यून में प्रकशित लेख




परीक्षा में प्राप्त अंक बनाम विद्द्यार्थी की योग्यता की बहस जब-जब चली है हमेशा इसी निष्कर्ष पर पहुंचा गया है कि अंकों का योग्यता से कोई विशेष लेना-देना नहीं होता ! सबसे अव्वल दर्जे के अंक के आधार पर इस बात की कतई गारंटी नहीं दी जा सकती कि इन अंकों के साथ उतीर्ण बच्चा व्यावहारिकता में उतना ही योग्य भी होगा ! आज जब देश के दो महत्वपूर्ण माध्यमिक शिक्षा परिषदों के दसवीं एवं बारहवीं के परीक्षा परिणाम घोषित हो चुके हैं तो इन परिणामों को देखते हुए हमारी माध्यमिक शिक्षा एवं परीक्षा प्रणाली से जुड़े कई सवाल भी खड़े होते हैं,जिनपर गहनता से विचार किया जाना जरूरी है ! सबसे पहले अगर केंद्रीय बोर्ड द्वारा घोषित परीक्षा परिणामों को नजीर के तौर पर देखें तो ग्रेडिंग सिस्टम के कारण इस बार सीबीएसई द्वारा घोषित दसवी के परीक्षा परिणामों में लगभग सभी बच्चे पास हुए हैं जबकि सिर्फ वही बच्चा उतीर्ण नहीं हो पाया है जो किसी कारण वश परीक्षा में नहीं बैठ पाया हो  !केंद्रीय बोर्ड द्वारा घोषित  बारहवीं के परीक्षा परिणाम भी कमोबेश ऐसे ही रहें हैं जिसमे 82% से ज्यादा बच्चे उतीर्ण हुए हैं ! वहीँ दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश बोर्ड द्वारा घोषित परीक्षा परिणामों पर नजर डालें तो स्थिति दो कदम आगे ही नजर आती है  ! उत्तर प्रदेश बोर्ड द्वारा घोषित परिणामों में दसवीं एवं बारहवीं में सफलता का ग्राफ क्रमश: 86.63% एवं 92.68% तक पहुचता नजर आ रहा है !  इन परीक्षा परिणामों को देखकर यहाँ बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या वाकई सेकेंडरी एजुकेशन के ये केंद्रीय एवं राज्य स्तरीय बोर्ड  इस स्तर की शिक्षा दे पा रहे हैं  कि सभी लगभग सौ प्रतिशत बच्चे इतने अव्वल दर्जे के अंकों के साथ उतीर्ण हों सके, या इन सबके पीछे का मकसद महज परीक्षा की औपचारिकताएं करा कर बच्चों के हाथों में  सफलता का प्रमाण-पत्र थमा देना है ! लड़कियां रहीं अव्वल,फलां विद्द्यालय का अमुक बच्चा रहा अव्वल जैसे हेडलाइन वाली खबरों के साथ परिणामों के दूसरे दिन अखबारों में प्रकाशित होने वाली तस्वीरें कुछ समय के लिए सुकुन तो देती हैं ! मगर साथ ही यह सवाल भी छोड़ जाती हैं कि अखबारों में हँसते-मुस्कराते इन मासूम चेहरों के साथ कहीं हमारा शिक्षा तंत्र कोई छलावा तो नहीं कर रहा ? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे शिक्षा तंत्र द्वारा अपने नौनिहालों को समुचित शिक्षा नहीं दे पाने और उन्हें एक योग्य एवं जवाबदेह नागरिक नहीं बना पाने की अपनी नाकामयाबी को छुपाने के लिए अंकों को मानक बनाकर सफल बच्चों की भीड़ पैदा की जा रही हो  ? हालाकि इस मामले में उत्तर-प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद जैसे राज्यों के शिक्षा बोर्ड के हालात कुछ साल पहले तक बेहतर थे मगर अंकों की मारामारी की ऐसी होड़ चली कि वो भी अब इसी ढर्रे पर चलते नजर आ रहे हैं ! आज के छ:-सात साल पहले उत्तर-प्रदेश बोर्ड का परीक्षा परिणाम मात्र 25% से 40% के बीच रहता था, लेकिन केंद्रीय बोर्ड को टक्कर देने की होड़ में यूपी बोर्ड में भी अचानक से पिछले कुछ सालों में परीक्षा परिणामों में एक अनोखा त्वरित सुधार देखने को मिला है  परिणामत: अब परीक्षा परिणाम 90% के पार  तक पहुचने लगा है ! परीक्षा परिणामों में आये चौकाने वाले इन सुधारों का कतई यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि हमने शिक्षा व्यवस्था में कोई सुधार किया है बल्कि इसे शिक्षा के स्तर की बजाय परीक्षा के मूल्यांकन प्रणाली में हुए बदलावों के नजरिये से देखने की जरुरत है !
       इस बात को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता कि हाल ही में आये परीक्षा परिणामों का अगर सख्त तरीके से पुनर्मूल्यांकन कराया जाय तो भारी संख्या में चौकाने वाले परिणाम आयेंगे ! क्योंकि परीक्षा परिणामों से जुडा यह पूरा मामला उत्तर-पुस्तिकाओं के जांच एवं मूल्यांकन प्रणाली से जुडा हुआ है ! केंद्रीय बोर्ड की मूल्यांकन प्रणाली के पीछे का खेल पूरी तरह से शिक्षा के बाजारीकरण की उपज है ! अगर गौर किया जाय तो केंद्रीय बोर्ड की मान्यता के तहत संचालित बहुसंख्यक संस्थान निजी एवं गैर-सरकारी हैं ! केंद्रीय बोर्ड के तहत संचालित निजी संस्थानों द्वारा अपने विद्द्यालय के परीक्षा परिणामों को शिक्षा के इस बाजार में अपनी साख साबित करने के अचूक हथियार के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है ! अभिभावकों को लुभाने एवं अपने संस्थान  को शिक्षा का सर्वश्रेष्ठ मानक बताने के लिए तमाम निजी संस्थानों द्वारा नए दाखिले के लिए दिये गए विज्ञापनों में अपने पिछले वर्ष के परीक्षा परिणामों का आंकड़ा दिया जाना इस बात का द्दोतक है कि इन परिणामों का इस्तेमाल बाजार तैयार करने के लिए किया जाता है  ! विज्ञापन और बाजार की बुनियाद पर टिकी शिक्षा में इन परिणामों के मायने शिक्षा के स्तर से जुड़े ना होकर शिक्षा के बाजारवादी ताकतों द्वारा इस्तेमाल  मुनाफे की एक सोची-समझी तरकीब से जुड़े हैं ! परीक्षा प्रणाली को सहज कर अधिक से अधिक अंक बांटने की यह अंदरूनी साजिश केंद्रीय बोर्ड में आज से नहीं बल्कि कई साल पहले से चली आ रही है क्योंकि केंद्रीय बोर्ड की बुनियाद ही निजी संस्थानों पर टिकी है ! वहीँ दूसरी तरफ अगर उत्तर प्रदेश बोर्ड में पिछले कुछ सालों में हुए परीक्षा परिणामों में आश्चर्यजनक सुधारों पर नजर डालें तो वहाँ राजनीतिक रूप से शिक्षा के साथ खिलवाड़ किये जाने की गंध आती नजर आएगी ! नब्बे के दशक में जब कल्याण सिंह उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री थे उस दौर में  परीक्षा के दौरान सख्ती एवं सख्त मूल्यांकन नीति लागू होने के कारण उत्तरप्रदेश बोर्ड के दसवी एवं बारहवीं का परीक्षा परिणाम 10% से भी कम रहा था ! लेकिन परीक्षा एवं मूल्यांकन को लेकर अन्य सरकारों खासकर मुलायम सरकार की नीतियां बेहद लचर और शिक्षा व्यवस्था के लिए घातक रही हैं ! सच्चाई यही है कि  उत्तर प्रदेश में शिक्षा और परीक्षा दोनों ही काली कमाई का जरिया बन चुके  है ! बोर्ड से मान्यता लेकर नक़ल का जो ढाँचा उत्तर प्रदेश बोर्ड में खड़ा हुआ है वो शायद ही कहीं और देखने को मिले ! यकीन करना मुश्किल होगा मगर इस सच्चाई को नाकारा नहीं जा सकता कि पैसे के बूते बोर्ड से मान्यता लेकर चल रहे तमाम संस्थानों द्वारा अंकों की गारंटी देकर ऊँची कीमतों पर छात्रों का दाखिला लिया जाता है और परीक्षा के समय जमकर नक़ल और धांधलेबाजी की जाती है ! उत्तरप्रदेश बोर्ड द्वारा दसवीं में प्रयोगात्मक परीक्षा के नाम पर 30  अंकों की जिम्मेदारी विद्द्यालय प्रशासन के हाथों दिया जाना भी शिक्षकों की कमाई में इजाफा ही करता नजर आ रहा है ! कुल मिलाकर यही कहा जाना उचित होगा कि यूपी बोर्ड में अंक बेचे जा रहे हैं, जितनी कीमत उतने अंक !
            अपने-अपने फायदे के कारणों से अंको की तिजोरी खोलकर बैठे इन  बोर्डस अथवा शिक्षण संस्थानों से भला किसका नुकसान हो रहा ये बताने की जरुरत नहीं है ! क्या परीक्षा की औपचारिकता करके बड़े-बड़े अंक बांटने मात्र से शिक्षा का स्तर सुधार सकता है या ये अंक हमारे नौनिहालों की योग्यता में वृद्धि कर सकते हैं ? वर्तमान की मूल्यांकन एवं परीक्षा प्रणाली की नीतियों को देखकर तो सिर्फ यही प्रतीत होता है कि अंको की चकाचौध में शिक्षा की चोरबाजारी खूब फल-फुल रही है मगर उसपर ध्यान किसी का नहीं जा रहा ! अभिभावक से लेकर विद्द्यार्थी तक सभी अंकों के गुमान में बाजार की भेंट चढ़ते नजर आ रहे हैं ! अगर जल्द ही परीक्षा नीति,मूल्यांकन प्रणाली, मान्यता आवंटन की शर्तों आदि में व्यापक एवं सख्त सुधार नहीं किये गए तो भारतीय शिक्षा व्ययवस्था की स्थिति भगवान भरोसे ही कही जायेगी ! 
 ट्रिब्यून 

बोर्ड परीक्षा परिणामों के निहितार्थ : राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित लेख


  • शिवानन्द  द्विवेदी सहर

परीक्षा में प्राप्त अंक बनाम विद्द्यार्थी की योग्यता की बहस जब-जब चली है हमेशा इसी निष्कर्ष पर पहुंचा गया है कि अंकों का योग्यता से कोई विशेष लेना-देना नहीं होता ! सबसे अव्वल दर्जे के अंक के आधार पर इस बात की कतई गारंटी नहीं दी जा सकती कि इन अंकों के साथ उतीर्ण बच्चा व्यावहारिकता में उतना ही योग्य भी होगा ! आज जब देश के दो महत्वपूर्ण माध्यमिक शिक्षा परिषदों के दसवीं एवं बारहवीं के परीक्षा परिणाम घोषित हो चुके हैं तो इन परिणामों को देखते हुए हमारी माध्यमिक शिक्षा एवं परीक्षा प्रणाली से जुड़े कई सवाल भी खड़े होते हैं,जिनपर गहनता से विचार किया जाना जरूरी है ! सबसे पहले अगर केंद्रीय बोर्ड द्वारा घोषित परीक्षा परिणामों को नजीर के तौर पर देखें तो ग्रेडिंग सिस्टम के कारण इस बार सीबीएसई द्वारा घोषित दसवी के परीक्षा परिणामों में लगभग सभी बच्चे पास हुए हैं जबकि सिर्फ वही बच्चा उतीर्ण नहीं हो पाया है जो किसी कारण वश परीक्षा में नहीं बैठ पाया हो  !केंद्रीय बोर्ड द्वारा घोषित  बारहवीं के परीक्षा परिणाम भी कमोबेश ऐसे ही रहें हैं जिसमे 82% से ज्यादा बच्चे उतीर्ण हुए हैं ! वहीँ दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश बोर्ड द्वारा घोषित परीक्षा परिणामों पर नजर डालें तो स्थिति दो कदम आगे ही नजर आती है  ! उत्तर प्रदेश बोर्ड द्वारा घोषित परिणामों में दसवीं एवं बारहवीं में सफलता का ग्राफ क्रमश: 86.63% एवं 92.68% तक पहुचता नजर आ रहा है !  इन परीक्षा परिणामों को देखकर यहाँ बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या वाकई सेकेंडरी एजुकेशन के ये केंद्रीय एवं राज्य स्तरीय बोर्ड  इस स्तर की शिक्षा दे पा रहे हैं  कि सभी लगभग सौ प्रतिशत बच्चे इतने अव्वल दर्जे के अंकों के साथ उतीर्ण हों सके, या इन सबके पीछे का मकसद महज परीक्षा की औपचारिकताएं करा कर बच्चों के हाथों में  सफलता का प्रमाण-पत्र थमा देना है ! लड़कियां रहीं अव्वल,फलां विद्द्यालय का अमुक बच्चा रहा अव्वल जैसे हेडलाइन वाली खबरों के साथ परिणामों के दूसरे दिन अखबारों में प्रकाशित होने वाली तस्वीरें कुछ समय के लिए सुकुन तो देती हैं ! मगर साथ ही यह सवाल भी छोड़ जाती हैं कि अखबारों में हँसते-मुस्कराते इन मासूम चेहरों के साथ कहीं हमारा शिक्षा तंत्र कोई छलावा तो नहीं कर रहा ? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे शिक्षा तंत्र द्वारा अपने नौनिहालों को समुचित शिक्षा नहीं दे पाने और उन्हें एक योग्य एवं जवाबदेह नागरिक नहीं बना पाने की अपनी नाकामयाबी को छुपाने के लिए अंकों को मानक बनाकर सफल बच्चों की भीड़ पैदा की जा रही हो  ? हालाकि इस मामले में उत्तर-प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद जैसे राज्यों के शिक्षा बोर्ड के हालात कुछ साल पहले तक बेहतर थे मगर अंकों की मारामारी की ऐसी होड़ चली कि वो भी अब इसी ढर्रे पर चलते नजर आ रहे हैं ! आज के छ:-सात साल पहले उत्तर-प्रदेश बोर्ड का परीक्षा परिणाम मात्र 25% से 40% के बीच रहता था, लेकिन केंद्रीय बोर्ड को टक्कर देने की होड़ में यूपी बोर्ड में भी अचानक से पिछले कुछ सालों में परीक्षा परिणामों में एक अनोखा त्वरित सुधार देखने को मिला है  परिणामत: अब परीक्षा परिणाम 90% के पार  तक पहुचने लगा है ! परीक्षा परिणामों में आये चौकाने वाले इन सुधारों का कतई यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि हमने शिक्षा व्यवस्था में कोई सुधार किया है बल्कि इसे शिक्षा के स्तर की बजाय परीक्षा के मूल्यांकन प्रणाली में हुए बदलावों के नजरिये से देखने की जरुरत है !
       इस बात को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता कि हाल ही में आये परीक्षा परिणामों का अगर सख्त तरीके से पुनर्मूल्यांकन कराया जाय तो भारी संख्या में चौकाने वाले परिणाम आयेंगे ! क्योंकि परीक्षा परिणामों से जुडा यह पूरा मामला उत्तर-पुस्तिकाओं के जांच एवं मूल्यांकन प्रणाली से जुडा हुआ है ! केंद्रीय बोर्ड की मूल्यांकन प्रणाली के पीछे का खेल पूरी तरह से शिक्षा के बाजारीकरण की उपज है ! अगर गौर किया जाय तो केंद्रीय बोर्ड की मान्यता के तहत संचालित बहुसंख्यक संस्थान निजी एवं गैर-सरकारी हैं ! केंद्रीय बोर्ड के तहत संचालित निजी संस्थानों द्वारा अपने विद्द्यालय के परीक्षा परिणामों को शिक्षा के इस बाजार में अपनी साख साबित करने के अचूक हथियार के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है ! अभिभावकों को लुभाने एवं अपने संस्थान  को शिक्षा का सर्वश्रेष्ठ मानक बताने के लिए तमाम निजी संस्थानों द्वारा नए दाखिले के लिए दिये गए विज्ञापनों में अपने पिछले वर्ष के परीक्षा परिणामों का आंकड़ा दिया जाना इस बात का द्दोतक है कि इन परिणामों का इस्तेमाल बाजार तैयार करने के लिए किया जाता है  ! विज्ञापन और बाजार की बुनियाद पर टिकी शिक्षा में इन परिणामों के मायने शिक्षा के स्तर से जुड़े ना होकर शिक्षा के बाजारवादी ताकतों द्वारा इस्तेमाल  मुनाफे की एक सोची-समझी तरकीब से जुड़े हैं ! परीक्षा प्रणाली को सहज कर अधिक से अधिक अंक बांटने की यह अंदरूनी साजिश केंद्रीय बोर्ड में आज से नहीं बल्कि कई साल पहले से चली आ रही है क्योंकि केंद्रीय बोर्ड की बुनियाद ही निजी संस्थानों पर टिकी है ! वहीँ दूसरी तरफ अगर उत्तर प्रदेश बोर्ड में पिछले कुछ सालों में हुए परीक्षा परिणामों में आश्चर्यजनक सुधारों पर नजर डालें तो वहाँ राजनीतिक रूप से शिक्षा के साथ खिलवाड़ किये जाने की गंध आती नजर आएगी ! नब्बे के दशक में जब कल्याण सिंह उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री थे उस दौर में  परीक्षा के दौरान सख्ती एवं सख्त मूल्यांकन नीति लागू होने के कारण उत्तरप्रदेश बोर्ड के दसवी एवं बारहवीं का परीक्षा परिणाम 10% से भी कम रहा था ! लेकिन परीक्षा एवं मूल्यांकन को लेकर अन्य सरकारों खासकर मुलायम सरकार की नीतियां बेहद लचर और शिक्षा व्यवस्था के लिए घातक रही हैं ! सच्चाई यही है कि  उत्तर प्रदेश में शिक्षा और परीक्षा दोनों ही काली कमाई का जरिया बन चुके  है ! बोर्ड से मान्यता लेकर नक़ल का जो ढाँचा उत्तर प्रदेश बोर्ड में खड़ा हुआ है वो शायद ही कहीं और देखने को मिले ! यकीन करना मुश्किल होगा मगर इस सच्चाई को नाकारा नहीं जा सकता कि पैसे के बूते बोर्ड से मान्यता लेकर चल रहे तमाम संस्थानों द्वारा अंकों की गारंटी देकर ऊँची कीमतों पर छात्रों का दाखिला लिया जाता है और परीक्षा के समय जमकर नक़ल और धांधलेबाजी की जाती है ! उत्तरप्रदेश बोर्ड द्वारा दसवीं में प्रयोगात्मक परीक्षा के नाम पर 30  अंकों की जिम्मेदारी विद्द्यालय प्रशासन के हाथों दिया जाना भी शिक्षकों की कमाई में इजाफा ही करता नजर आ रहा है ! कुल मिलाकर यही कहा जाना उचित होगा कि यूपी बोर्ड में अंक बेचे जा रहे हैं, जितनी कीमत उतने अंक !
            अपने-अपने फायदे के कारणों से अंको की तिजोरी खोलकर बैठे इन  बोर्डस अथवा शिक्षण संस्थानों से भला किसका नुकसान हो रहा ये बताने की जरुरत नहीं है ! क्या परीक्षा की औपचारिकता करके बड़े-बड़े अंक बांटने मात्र से शिक्षा का स्तर सुधार सकता है या ये अंक हमारे नौनिहालों की योग्यता में वृद्धि कर सकते हैं ? वर्तमान की मूल्यांकन एवं परीक्षा प्रणाली की नीतियों को देखकर तो सिर्फ यही प्रतीत होता है कि अंको की चकाचौध में शिक्षा की चोरबाजारी खूब फल-फुल रही है मगर उसपर ध्यान किसी का नहीं जा रहा ! अभिभावक से लेकर विद्द्यार्थी तक सभी अंकों के गुमान में बाजार की भेंट चढ़ते नजर आ रहे हैं ! अगर जल्द ही परीक्षा नीति,मूल्यांकन प्रणाली, मान्यता आवंटन की शर्तों आदि में व्यापक एवं सख्त सुधार नहीं किये गए तो भारतीय शिक्षा व्ययवस्था की स्थिति भगवान भरोसे ही कही जायेगी !


पारदर्शिता से परहेज क्यों : जनसंदेश टाइम्स में प्रकाशित लेख



  • शिवानन्द द्विवेदी सहर

दलीय व्यवस्था में सुधार की दिशा में पहल करते हुए जब केंद्रीय सुचना आयोग ने देश के प्रमुख राजनीतिक दलों को सुचना के अधिकार क़ानून के दायरे में रखे जाने की बात की तो देश का कोई भी स्थापित राजनीतिक दल इस निर्णय को मानने को तैयार नहीं दिख रहा ! अक्सर बिना वजह एक दूसरे पर छींटा-कशी करते रहने वाले ये राजनीतिक दल आज केंद्रीय सुचना आयोग के इस निर्णय पर लामबंद होकर एक सुर में इस निर्णय का विरोध करते नजर आ रहे हैं ! देश के वित्तमंत्री चिदंबरम ने इस निर्णय को अतार्किक बताया तो वहीँ प्रधानमत्री कार्यालय के मंत्री नारायण सामी ने इस निर्णय के खिलाफ कोर्ट जाने की हिमायत कर डाली ! आयोग के इस निर्देश के विरोध में बीजेपी सहित वाम दल भी पीछे नहीं दिख रहे बल्कि उन्हें भी इसमें उनके लोकतान्त्रिक अधिकारों पर खतरा नजर आ रहा है और वो भी इसे लोकतंत्र पर चोट बताते नजर आ रहे हैं  ! केंद्रीय सुचना आयोग द्वारा दिये गए फैसले को अगर एक नजर देखें तो उस फैसले में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे गलत अथवा लोकतांत्रिक मान्यताओं के विरुद्द कहा जाय ! अपने फैसले में कुछ बिंदुओं का हवाला देते हुए केंद्रीय सुचना आयोग ने सिर्फ यही कहा है कि देश की उन राजनीतिक पार्टियों जिन्हें सरकारी मदद अथवा छूट  मिलती है, द्वारा प्राप्त किये गए चंदे एवं खर्च सहित अन्य कुछ आंकड़ों का ब्यौरा सुचना के अधिकार के तहत आएगा ! फिलहाल केंद्रीय सुचना आयोग द्वारा देश के सात प्रमुख राजनीतिक दलों को सुचना के अधिकार के तहत अपना ब्यौरा उपलब्ध कराने की बात की गयी है ! आयोग के इस निर्णय और राजनीतिक दलों के एक सुर में विरोध के बीच बड़ा सवाल ये है कि आखिर हमारे राजनीतिक दल ऐसे कानूनों से इतना डरते क्यों हैं जिनसे उनके पारदर्शिता की जांच की जा सकती हो ? अगर आजादी के बाद की भारतीय संसदीय राजनीति का इतिहास उठाकर देखा जाय तो यह खोज पाना बड़ा मुश्किल साबित होगा कि  अंतिम बार कब ऐसा कोई कानून बना जिसमे राजनीतिक दलों के ऊपर शिकंजा कसने एवं उनकी जांच करने की बात की गयी हो ! आज हाथ में हाथ मिलाये खड़े भाजपा,कांग्रेस,भाकपा सहित तमाम राजनीतिक दलों द्वारा इस निर्णय को अलोकतांत्रिक बताना बेहद बेबुनियाद और उनके मन में छिपे डर के सिवा कुछ भी नहीं है ! यह बात किसी से छुपी नहीं है कि चनाव जीतने से लेकर चुनाव के बाद सत्ता प्रबंधन तक के लिए  खरीद-फरोख्त एवं धन प्रबंधन के कितने भ्रष्टाचार इन राजनीतिक दलों द्वारा किये जाते है ! राजनीतिक दल चलाने के लिए कारपोरेट से चंदा उगाही कर रहे इन राजनीतिक दलों को केंद्रीय सुचना आयोग का यह निर्णय उनके स्वच्छन्द विचरण में खलल जैसा लग रहा है ! चाहे लोकपाल क़ानून हो या राजनीतिक दलों को सुचना के अधिकार के तहत लाने की बात,इन राजनीतिक दलों को भला यह कैसे स्वीकार्य हो सकता है कि कोई क़ानून उनके द्वारा उन्मुक्त ढंग से किये जा रहे इस लुट-तंत्र में हस्तक्षेप करे ! बड़ी सीधी-सपाट सी बात है कि अगर वाकई आपको लगता है कि आप अपना काम सही ढंग से कर रहे हैं तो फिर आप अपनी पारदर्शिता को दिखाने परहेज क्यों कर रहे ?
      भारत एक बहुदलीय लोकतांत्रिक प्रणाली वाला देश है जहाँ समय के साथ-साथ राजनीतिक दलों का उद्दभव एवं विकास होता रहा है ! समय के साथ विकसित हुए भारतीय लोकतंत्र के दलीय व्यवस्था में बहुदलीय प्रणाली स्थापित होती गयी और तमाम दल अपने-अपने क्षेत्रों एवं राज्यों में मजबूत होते गए ! भारत में बढते राजनीतिक दलों की संख्या के साथ-साथ दलीय व्यवस्था के स्वरुप के बिगड़ने की गुंजाइशें भी बढ़ी हैं ! ऐसा देखा गया है कि चुनाव आते ही राजनीतिक दलों द्वारा धन का खजाना खोल कर पैसा पानी की तरह बहाया जाता है जिसका कोई भी ब्यौरा किसी के पास उपलब्ध नहीं होता है ! लिहाजा दलीय व्यवस्था की  शुचिता का सवाल भी समय-समय पर उठाना लाजिमी है और उठता भी रहा है ! दलीय व्यवस्था में सुधारों पर विमर्श आदि तो अक्सर होते रहे हैं ! केंद्रीय सुचना आयोग(सीईसी) द्वारा जारी इस निर्देश को राजनीति के बिगड़ते स्वरुप में दलीय सुधार की शुरुआती कवायद के रूप में देखा जाना चाहिए ! हालाकि अभी केंद्रीय सुचना आयोग ने महज सात राजनीतिक दलों को सुचना के अधिकार के दायरे में रखा है लेकिन इस अहम शुरुआत के बाद त इसमें जरुरत और समय के साथ और भी दल शामिल किये जा सकते हैं  ! इसमें कोई दो राय नहीं भारतीय लोकतंत्र  में राष्ट्रीय स्तर के बड़े जनाधार वाले राजनीतिक दलों की संख्या बेशक गिनी-चुनी है लेकिन आम चुनावों को प्रभावित करने वाले दल बहुत सारे हैं ! ऐसे में अगर इन तमाम राजनीतिक दलों अथवा कम से कम बड़े राजनीतिक दलों को सुचना के अधिकार के दायरे में लाने की शुरुआत हुई है तो निश्चित तौर पर दलीय व्यवस्था में सुधार की दिशा में इसके कुछ अच्छे परिणाम देखने को मिलेंगे ! केंद्रीय सुचना आयोग द्वारा जारी इस फैसले के लागू होने के बाद आम जनता को यह अधिकार होगा कि वो सुचना के अधिकार के दायरे में आने वाले राजनीतिक दलों से कुल आय-व्यय का ब्यौरा,कार्यक्रमों का खर्च,चंदा वसूली का ब्यौरा एवं चुनावों में प्रत्याशियों के चयन के तय मानकों का ब्यौरा राजनीतिक दलों से मांग सके ! हालाकि इनमे से तमाम ब्योरे राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव आयोग को दिये जाते रहे हैं लेकिन सुचना के अधिकार के तहत आने के बाद ये सारी जानकारियां अब आम जनता को भी उपलब्ध करानी होगी !
      केंद्रीय सुचना आयोग द्वारा जारी यह निर्देश कितना जरूरी है इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि सारे राजनीतिक दल इससे डरे हुए और हताश दिख रहे हैं ! निश्चित तौर पर राजनीतिक दलों की यह लामबंदी इस बात की तरफ इशारा करती है कि आयोग द्वारा दिया गया यह निर्देश राजनीतिक दलों के अंदरूनी भ्रष्टाचार को उजागर कराने वाला साबित हो सकता है जिसकी वजह से ये सारे राजनीतिक दल एक सुर में इसका विरोध करते नजर आ रहे हैं ! इस मामले में अंदरूनी सच्चाई यही है कि चाहें बीजेपी हो या कांग्रेस या मजदूरों की बात करने वाले वामदल ही क्यों ना हो,सभी के सभी राजनीतिक दल भारतीय राजनीति के दलीय व्यवस्था के अंदर जड़ें जमा चुके भ्रष्टाचार की मलाई खा रहे हैं ! भारतीय लोकतंत्र को दीमक की तरह खा रही इस बेलगाम दलीय व्यवस्था पर अगर सख्ती से नकेल नहीं कसी गयी तो वह दिन दूर नहीं जब भारत में लोकतंत्र के नाम पर केवल दलीय सत्ता  का आवरण मात्र शेष बचेगा जिसमे बारी-बारी से सभी दल अपने हिस्से का भ्रष्टाचार करते रहेंगे ! जिस क़ानून का विरोध सभी दल एक सुर में एक साथ मिलकर कर रहे हों,इतना तो मान लिया जाना चाहिए कि वो क़ानून बहुत काम का है !




मंगलवार, 4 जून 2013

कुंठा के तेज़ाब से झुलसती जिंदगी : नई दुनिया नेशनल में मेरा यह लेख





महिलाओं के ऊपर बढ़ रहे एक के बाद एक तेज़ाब हमलो ने एक बार फिर हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है ? दिसम्बर में हुए दामिनी प्रकरण के बाद से ही महिलाओं के सम्मान एवं उनकी सुरक्षा की मांग को देखते हुए सरकार द्वारा कड़े क़ानून की हिमायत की गयी और कुछ कानूनी बदलावों को अमली जामा भी पहनाया गया ! बावजूद इन सबके समाज में बढ़ रहीं इन असामाजिक एवं घृणित घटनाओं में कोई कमी नहीं आती दिख रही है ! विगत दिनों हुए तेज़ाब हमले के दंश को झेल रही प्रीटी राठी ने आखिरकार मुम्बई के एक अस्पताल में दम तोड़ दिया है ! प्रीती कोई अकेली लड़की नहीं है जो हैवानियत के इस कुरूप नजर आते कृत्य का शिकार हुई है बल्कि प्रीती जैसी ना जाने कितनी मासूम और निर्दोष बेटियां हैं जो आये दिन वहशियों के तेज़ाब हमले की शिकार बनती रही हैं और हमारा समाज मूक खड़ा इस तमाशे का तमाशबीन बना हुआ है ! आज सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर तेज़ाब के इस दंश से जान गंवा रहीं बेटियों को सुरक्षा दे पाने में हम क्यों कामयाब नहीं हो पा रहे हैं ? महिलाओं की सुरक्षा के लिए खतरनाक हो चुके तेज़ाब हमले की वारदातों पर हमारी असंवेदनशीलता का सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि अभी तक राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के  पास कुल हो रहे ऐसे वारदातों के पुख्ता आंकड़े तक नहीं है ! दरअसल, तेज़ाब हमलो के आंकड़ों की अनुपलब्धता का सबसे बड़ा कारण यही है कि ऐसे मामलों में अलग क़ानून ना होने की वजह से इस मामलों को अलग तरीके से दर्ज नहीं किया जाता है ! लिहाजा,सबसे बड़ा सवाल ये खडा होता है कि महिलाओं के ऊपर बढ़ रहे इन तेज़ाब हमलों को हमारा क़ानून किस नजर से देखता है ? एक अनुमानित आंकड़े में ऐसा अंदेशा जताया गया है कि प्रत्येक साल लगभग दो सौ के आस-पास महिलाएं तेज़ाब हमले के वहशियों का शिकार होती हैं और उनमे से अधिकांशत: दम तोड़ देती है ! ऐसे में महिलाओं को निशाना बनाकर किये जा रहे इस हमले को आम अपराध अथवा हमले के श्रेणी में रखा जाना कहीं से भी उचित नहीं प्रतीत होता ! बेशक हमारे कानून में महिलाओं पर हो रहे इन हमलों को अलग श्रेणी में ना रखा गया हो लेकिन इस बात को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता कि इस तरह के हमलों को यौन  हिंसा के अपराधों के नजरिये से भी देखा जाना चाहिए ! चुकिं, ज्यादातर मामलों में ऐसा देखा गया है कि महिलाओं पर तेज़ाब फेकने वाला व्यक्ति यौन कुंठा से ग्रसित होता है और परिणामत: ऐसी वारदात को अंजाम देता है ! अत: महिलाओं के लिए अभिशाप बन चुके इस कुकृत्य को यौन हिंसा के अपराधों से अलग रखकर नहीं देखा जाना चाहिए ! मगर सबसे बड़ी खेद की बात यह है कि इस दिशा में कानूनी स्तर पर स्थिति ढाक के तीन पात जैसी बनी हुई है ! जिससे अपराधियों का मनोबल बढ़ा हुआ है ! एक तरफ जहाँ महिलाओं के लिए देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद में निर्धारित भूमिका तय करने की बात की जा रही है वहीँ दूसरी तरफ महिलाएं अपने घरों,सडकों पर ही महफूज नहीं है और समाज का एक तबका उसे महज एक साधन मात्र के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है ! आये दिन हो रही बलात्कार और तेज़ाब दुष्कर्म  की सरेआम घटनाओं पर हमें ना सिर्फ कानूनी तौर पर बल्कि सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक तौर पर और अधिक सजग एवं विकसित होने की जरुरत है ! आज हमें उन कारणों को तलाशने पर ज्यादा बल देना होगा जो समाज को गलत दिशा में ले जाने के लिए उत्तरदायी हैं ! क़ानून इस समस्या के समाधान के लिए लिए प्रथम जरुरत है जिसके बाद ही किसी अन्य उपाय पर विचार किया जा सकता है ! कानूनी रूप से इन मामलों में अपराधियों की सज़ा, पीड़िता के लिए उपचार,मुआवजा, क्षतिपूर्ति और पुनर्वास आदि के प्रति सचेष्ट होकर नीतियां निर्धारित करने की जरुरत हैं और साथ ही इसे यौन हिंसा के आपराधिक श्रेणी में रखे जाने पर काम करना होगा ! हमें इस बात को स्वीकार करना ही होगा कि यह एक तरह की यौन हिंसा का ही स्वरुप है जो बदले एवं कुंठा की भावना के चलते समाज में बढ़ता जा रहा है ! इसमें कोई दो राय नहीं कि तेज़ाब हमले के मामलो में हमारी सरकारों द्वारा अभी गंभीरता नहीं बरती गयी है !
      आये दिन बढ़ रही महिलाओं पर इस तेजाबी हिंसा की घटनाओं को समाज के मुख्य धारा का विषय मानते हुए आज इसके नियंत्रण के हर संभव उपायों को अमल में लाये जाने की जरुरत है ! एक संतुलित न्यायिक,प्रशासनिक एवं सामाजिक जवाबदेही के तहत इस बात को समझने की जरुरत है कि तमाम उपायों को व्यव्हार में कैसे लाया जाय ? ऐसे मामले में अगर अपराधी को जेल तक की सजा देने से मामला बनता नहीं दिख रहा तो उन दंड नीतियों पर भी अमल किया जाना चाहिए जिससे बलात्कारी के अंदर सामाजिक प्रायश्चित एवं ग्लानि का भाव उत्पन्न हो और वो समाज के सामने अपने किये पर प्रायश्चित करे ! साथ ही साथ तमाम तमाम मनोवैज्ञानिक पद्धतियों के माध्यम से इन घटनाओं के प्रति समाज में जागरूकता लाने की जरुरत पर बल दिये की बात की जाती रही है, जिन्हें अमल में लाये जाने की जरुरत है ! बढते तेज़ाब हमलों  के वारदातों पर सजग होकर केवल क़ानून एवं प्रशासन पर निर्भर होने के बजाय इस समस्या के प्रति समाज को खुद गंभीर होने एवं अपनी जावबदेही तय करने की जरुरत पर भी बल देना होगा ! अच्छे और साफ़-सुथरे समाज के निर्माण के लिए यह जरूरी होता है कि वो अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति सबसे पहले खुद जिम्मेदार बने ! समाज का आम नागरिक जब तक इस घृणित अपराध से खुद को जोड़ कर नहीं देखेगा तब तक ये घटनाएं  महज कानूनी मसला बनकर फाइलों और न्यायालयों में हिलोरें मारती रहेंगी,और ऐसे अपराधियों  का हौसला बुलंद होता रहेगा ! अत: महिलाओं की अस्मिता एवं समाज के लिए कलंक बन चुके  इस विषय पर समाज,क़ानून,प्रशासन सबको एक साथ सजग होने की जरुरत है ना कि सब अपनी ढपली अपना राग बजाएं !

शिवानन्द  द्विवेदी सहर