मंगलवार, 16 जुलाई 2013

दवाओं के बढते बाजार पर नकेल जरुरी : डी एन ए में प्रकाशित मेरा लेख


  •   शिवानन्द द्विवेदी सहर
एक संभावित आंकड़े के अनुसार भारत के 90% लोगों को जीवन में कभी ना कभी दवाओं का सेवन करना पड़ता है एवं 45 वर्ष से अधिक उम्र के अधिकाँश लोग नियमित दवाओं के सेवन को मजबूर हैं ! इन आंकड़ों के आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि दवाइयों के बाजार का सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग भारत में ही  निवास कर रहा है ! भारत में ना तो बीमारों की कमी है और ना ही बीमारियों का ही अभाव है ! स्वास्थ्य के बदहाली से जूझ रहे देश को अगर स्वस्थ रहने के लिए सबसे ज्यादा किसी चीज की दरकार है तो वो हैं दवाइयां ! किसी भी व्यक्ति द्वारा स्वास्थ्य पर किये गए खर्च के मामले में चिकित्सालय एवं चिकत्सक दूसरी वरीयता पर आ चुके हैं,  क्योंकि एक सरकारी आंकड़े के अनुसार  मरीज द्वारा इलाज पर किये गए कुल खर्च का 72% हिस्सा केवल दवाइयों पर जाता है ! ऐसे में दवाइयों के कारोबार को  एक बड़े स्तर का उद्द्योग कहना गलत नहीं होगा  ! वैसे तो स्वास्थ्य जैसे विषय से जुड़ी जरुरतों को व्यापार के तराजू पर तौल कर देखना ही बड़ा आश्चर्यजनक लगता है लेकिन जिस तरह से दवाओं का बाजार भारत में खड़ा हुआ है, निश्चित तौर चौकाने वाला है ! भारत में दवाओं का वर्तमान बाजार लगभग सत्तर हजार करोंड़ के आस-पास का है जिसमे मात्र चार सौ करोंड़ के बाजार पर सरकारी कंपनियों का हिस्सा है ! इस हिसाब से अगर देखें तो भारतीय दवा बाजार के कुल कारोबार में सरकार द्वारा संचालित दवा कंपनियों की हिस्सेदारी 0.7% से भी कम है ! सरकारी दवा कंपनियों की इस खानापूर्ति मात्र की हिस्सेदारी निश्चित तौर पर हतप्रभ करने वाली  हैं ! ये आंकड़े इस बात की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त हैं कि भारतीय दवा बाजार पूरी तरह से निजी कंपनियों के अधीन हो चुका है और दवा बनाने से लेकर मूल्य निर्धारण तक में उन निजी कंपनियों का वर्चस्व कायम है ! हालाकि  दवाओं के मूल्य निर्धारण को लेकर पिछले साल लागू की गयी नई दवा नीति 2012 के तहत 348 दवाओं के मूल्य निर्धारण में सरकारी नियंत्रण की बात बेशक की गयी है ! लेकिन इस नीति के तहत मूल्य निर्धारण किये जाने का बारीकी से अध्ययन करने पर अर्थगणित की सुई  कुछ और ही दिखाती  नजर आती  है ! नई दवा नीति के तहत तय मूल्य निर्धारण के प्रावधान के मुताबिक़ किसी भी दवा उत्पाद में 1% से ज्यादा शेयर रखने वाली ब्रांडेड दवा कंपनियों द्वारा अलग-अलग निर्धारित किये गए मूल्यों के कुल औसत को ही सरकार द्वारा  दवा की अधिकतम  कीमत मान लिया जायेगा ! सरकार द्वारा तय किये गए इस नीति के मसौदे में ऐसा कुछ भी नहीं दिखता जिससे कि यह मान लिया जाय कि इससे  दवाओं के कीमतों में नियंत्रण होगा या दवाएं सस्ते दरों पर उपलब्ध हो सकेगी  ! हालाकि दवा नियामक नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी द्वारा पहले से चलते आ रहे तय फार्मूले के अनुसार लागत के आधार पर दवाओं के मूल्य निर्धारण प्रक्रिया को ना अपनाकर बाजारवादी मुनाफे के अनुकूल तैयार की गयी नई दवा मूल्य निर्धारण नीति को एक दिखावे मात्र का खोखला क़ानून ही कहा जा सकता है ! इस पुरे नीति में यहाँ सवाल ये  उठता है कि जिस देश में दवाओं का बाजार सत्तर हजार करोंड़ का है वहाँ सरकार अपना हाथ दवाओं के बाजार से खींचती क्यों नजर आ रही है ? जबकि सरकार को यह बखूबी पता है कि निजी दवा कंपनियों द्वारा दवाओं में भारी मुनाफा कमाया जा रहा है ! नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी के मानकों को ख़ारिज कर मनमाने ढंग से दवाओं की कीमतों का निर्धारण कर रहीं दवा कम्पनियाँ अपनी कुल लागत से लगभग पाँच सौ प्रतिशत से भी ज्यादा का  मुनाफा कमा रहीं हैं !कारपोरेट मंत्रालय की लागत लेख शाखा ने अपने अध्यन में यह खुलासा  किया कि ग्लेक्सोस्मिथलाइन की कालपोल एवं फाईजर की कोरेक्स कफ सीरप सहित अन्य तमाम दवाओं को उनके लागत मूल्य से 1100% ज्यादा के मुनाफे पर बाजार में बेचा जा रहा है ! कंपनियों द्वारा तय किये गए इन कीमतों को मुनाफा कहने की बजाय खुली लूट कहा जाना ज्यादा यथार्थ के करीब नजर आता है ! इन आंकड़ों से पता चलता है कि  नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी  के नियामकों को लागू करने का विरोध हमेशा से निजी कंपनियों द्वारा क्यों  किया जाता रहा है ! इस बावत ये आंकड़े भी कम चौकाने वाले नहीं हैं कि अभी तक निजी दवा कंपनियों के खिलाफ दवाओं में तय सीमाओं से ज्यादा ओवार्चार्जिंग करने के लगभग 900  मामले दर्ज किये गएँ हैं जिनमे हजारों करोंड का जुर्माना कंपनियों के ऊपर अदालतों द्वारा लगाया गया है ! प्राप्त आंकड़ों के अनुसार अभी तक मात्र 250 करोंड़ के आस-पास जुर्माने की वसूली हो पाई है जबकि कम्पनियां अभी भी बाजार में जमी हुईं हैं ! अपने मुनाफे के हिसाब से नियामक तैयार किये जाने की वकालत कर रहीं दवा कम्पनियाँ पूर्णतया बाजारवादी मानसिकता से ग्रसित हैं एवं स्वास्थ्य जैसे विषय को भी बाजार के चौराहों पर खुलेआम बेचने से इनको कोई परहेज नहीं है !
            दवाओं के बाजारीकरण और आम जनता के स्वास्थ्य का सौदा कर रहीं इन कंपनियों का हौसला बुलंद होता जा रहा है और सरकार भी अंदरूनी तौर पर इन कंपनियों के साथ खड़ी नजर आ रही है ! दवा जैसी बुनियादी जरुरत को सरकारी नियंत्रण से इस कदर मुक्त कर बाजारों के हवाले छोड़ दिया जाना बेहद चिंताजनक है ! मनमाने ढंग से मुनाफे का खेल खेल रहीं इन कंपनियों के प्रकोप से बीमार होता जा रहा देश भला स्वस्थ कैसे बन सकता !  व्यक्ति के जीवन से जुड़ी दवाओं को बाजार के नजरिये से देखने की बजाय जनता के सुविधा और सेवा के नजरिये से देखा जाना चाहिए ! वर्तमान हालातों में तो सिर्फ यही लगता है कि  समाज के स्वस्थ्यीकरण के नाम पर अर्थशास्त्र का ऐसा जाल बिछाया जा चुका है कि उसमे फंसा हर व्यक्ति सिर्फ बीमार ही रह सकता है ! 

शनिवार, 13 जुलाई 2013

साहित्य का ध्येय सामाजिक सरोकार : प्रो. रामदेव शुक्ल का साक्षात्कार राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित




प्रख्यात कथाकार,आलोचक एवं दीनदयाल उपाध्याय विश्विद्द्यालय गोरखपुर के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. रामदेव शुक्ल से शिवानन्द द्विवेदी की हुई बात-चीत का कुछ अंश:

सवाल : नमस्कार ! एक प्रसिद्ध कथाकार एवं उपन्यासकार के तौर पर साहित्य जगत में आपकी ख्याति रही है ! गद्य लेखन की उपन्यास विधा को लेकर जब साहित्यकारों के बीच मतैक्य नहीं है ऐसे में लेखन की इस विधा पर  आपका व्यक्तिगत नजरिया क्या है ?
प्रो. शुक्ल : जी नमस्कार,गद्य लेखन के क्षेत्र में उपन्यास विधा समाज के साथ सबसे करीब से जुड़ी हुई विधा है ! उपन्यास को समाज का आइना कहा जाना गलत नहीं होगा ! उपन्यास वो विधा है जो अपने दौर के सामाजिक परिस्थितियों का सजीव चित्रण कर पाने में साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा सर्वाधिक सफल रही है ! अगर एक पंक्ति में कहा जाय तो विभिन्न कालखंडों की सामाजिक परिस्थितियों के तमाम पहलुओं को कथानक का रूप देते हुए उसे  विस्तार से कागज़ पर उकेरना ही उपन्यास है ! गद्य लेखन के उपन्यास विधा के माध्यम से ही लेखक द्वारा अपने दौर के तत्कालीन समाज का सबसे उत्कृष्ठ एवं व्यापक चित्रण संभव है !
सवाल : वैसे तो आपने संकल्पा,अगला कदम,बेघर बादशाह जैसे दर्जनों चर्चित उपन्यास लिखें हैं लेकिन आपके द्वारा लिखा गया उपन्यास ग्राम-देवता सर्वाधिक चर्चा में रहा है ! ग्राम-देवता पर आप क्या टिप्पणी करना चाहेंगे ?
प्रो. शुक्ल : ग्राम-देवता उपन्यास साठ-सत्तर के दशक के दौरान भारत के गावों में   व्याप्त सामाजिक विषमता,छुआ-छूत एवं भेद-भाव की कथानक के माध्यम से प्रस्तुति मात्र है ! इस उपन्यास के माध्यम से तत्कालीन दौर में अभिजात्य वर्ग द्वारा शोषित समुदाय पर किये जाने वाले अत्याचारों को पात्रों के माध्यम से कथानक के रूप में दर्शाने का प्रयास किया गया है ! दरसल,ग्राम-देवता एक व्यंगात्मक प्रहार है उस अभिजात्य वर्ग के पाखंडी समाज पर जो सभी तरह के गलत कर्म करने के बावजूद अपनी शुद्धता एवं सर्वोच्चता साबित करने का पाखंड रचते हैं !  इस उपन्यास के प्रकाशन के बाद साहित्य जगत द्वारा दी प्रतिक्रियाओं में कहा गया कि प्रेमचंद की कहानियां जहाँ खतम होती है ग्राम-देवता वहीँ से शुरू होता है ! चुकि इस उपन्यास के कथा-वृतांत,पात्रों के चरित्र एवं भाषा आदि में पूर्वी संस्कृति का व्यापक हस्तक्षेप नजर आता है, अत: इसके भोजपुरी अनुवाद की मांग भी साहित्य जगत में विद्द्या निवास मिश्र जैसे प्रख्यात साहित्यकारों द्वारा की गयी थी ! परिणामत: आगे चलकर कुछ नए खंडों के साथ ग्राम-देवता भोजपुरी में भी प्रकाशित हुआ !
सवाल : नाटककार प्रसाद,कबीर का सच,घनानंद का श्रृंगार काव्य,नाटककार लक्ष्मीनारायण मिश्र एवं निराला के उपन्यास सहित दर्जनों आलोचना साहित्य लिखने के बाद आपकी पहचान वर्तमान साहित्य जगत में कुशल कथाकार के अलावा एक समृद्ध आलोचक के रूप में भी स्थापित हुई ! बतौर आलोचक आप वर्तमान साहित्यिक धारा में आलोचना विधा की स्थिति एवं वर्तमान आलोचकों द्वारा किये जा रहे आलोचना-कर्म के प्रति क्या दृष्टिकोण रखते हैं ?
प्रो. शुक्ल : साहित्य लेखन में आलोचना अथवा समालोचना का उद्देश्य सृजक द्वारा सृजित मूल सामग्री के तमाम सकारात्मक-नकारात्मक पहलुओं को दर्शाते हुए उसकी विस्तृत विवेचना करना होता है ! अगर देखा जाय तो हिंदी साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में आलोचना विधा की स्थिति लगातार कमजोर होती गयी है और आलोचना-कर्म में अनुशासन का छ्य होता गया है ! साहित्य में आलोचना के अनुशासन की समझ लागातार कम होती जा रही है ! वर्तमान साहित्य सृजन के संदर्भ में यह कहना गलत नहीं होगा कि हिन्दी साहित्य की तमाम विधाओं में सबसे विपन्न स्थिति में आलोचना-कर्म ही है ! आचार्य रामचंद्र शुक्ल की श्रृंखला को चलाने वाले आलोचक ना के बराबर है और उस स्तर की आलोचना के दर्शन तो साहित्य के वर्तमान कालखंड में लगभग असंभव ही कहे जा सकते हैं !

सवाल : आप खुद एक बड़े आलोचक हैं ऐसे में आलोचना विधा पर आपकी यह टिप्पणी क्या नामवर सिंह सरीखे साहित्य जगत के प्रख्यात आलोचकों के लिए प्रश्नचिन्ह नहीं है ? 
प्रो. शुक्ल : शिवानन्द जी, ऐसा बिलकुल नहीं है ! नामवर सिंह अथवा कोई भी साहित्यकार एवं आलोचक ना तो हिंदी साहित्य के इतिहास का प्रथम आलोचक है और ना ही अंतिम आलोचक होगा ! मेरा सीधा तात्पर्य ये था कि आज का स्थापित आलोचक ही अगर किसी खास विचारधारा के आग्रह से ग्रसित होकर साहित्यिक समालोचना करने लगे तो उसके द्वारा किया गया आलोचना कर्म उसके विचारों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता ! साहित्य जगत में यह कोई नई बात नहीं कि मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित एक ख्यातिलब्ध आलोचक के लिए मार्क्सवादी लेखन को लेकर आलोचना का नजरिया अलग है जबकि अन्य कृतियों को लेकर आलोचना का नजरिया अलग ! जब किसी आलोचक के अंदर किसी वाद का पूर्वाग्रह घर कर जाता है तो वो आलोचना के अनुशासन को कायम नहीं रख पाता ! हलाकि इस मामले में कई आलोचक हुए हैं जो अपनी विचारधारा को अपने अलोचना-कर्म में आड़े नहीं आने दिये ! उदाहरण के तौर पर अगर आप लीजिए तो राम बिलास शर्मा सरीखे लेखक नजीर के तौर पर हैं जो कि आजीवन मार्क्सवादी होते हुए भी आलोचना-कर्म के मामले में मार्क्सवाद की सीमाओं को तोड़कर आलोचना का अनुशासन कायम करने की मिसाल प्रस्तुत करते हैं !

सवाल : गद्य साहित्य की कहानी विधा में भी आपका व्यापक हस्तक्षेप रहा है और आपने मनदर्पण,विकल्प,गिद्धलोक सहित सैकड़ों चर्चित कहानियां एवं कई कहानी संग्रह लिखा हैं ! आपके नजरिये से कहानी क्या है ?
प्रो. शुक्ल : जी, अगर मै अपने लिए कहानी को परिभाषित करूँ तो कहानी मेरी छणिक आक्रोश के अभिव्यक्ति का माध्यम रही हैं ! साहित्य की इस विधा का सर्वाधिक प्रयोग मैंने समाज कि विषमताओं एवं शिक्षा आदि के बिगड़ते स्वरुप पर अपने मन में समय-समय पर उत्पन्न हुए  आक्रोश भाव को अभिव्यक्त करने के लिए किया है ! चाहें शिक्षकों द्वारा विद्द्यार्थियों के शोषण पर आधारित कहानी गिद्धलोक हो अथवा स्त्री-पुरुष संबंधो पर आधारित कहानी मन-दर्पण हो, ये सभी किसी विशेष घटनाक्रम को लेकर मेरे मन में उठे असंतोष एवं अकुलाहट की अभिव्यक्ति हैं !

सवाल : सृजन-कर्म में भाषा की शुचिता पर आपकी राय ?
प्रो. शुक्ल : कभी भी किसी अन्य भाषा के आने से मूल भाषा की शुचिता पर असर नहीं पड़ता है बल्कि वो भाषा और संपन्न ही होती है ! बशर्ते यहाँ भी भाषा में शब्दों के प्रयोग में अनुशासन के दायरों को ना तोडा जाय तो !

सवाल : कोई अन्य कृति जो अभी लिखी जानी शेष हो आपके द्वारा ?
प्रो. शुक्ल : बिलकुल, भोजपुरी के साहित्यकार मोती बी.ए पर आधारित छ: खण्डों की पुस्तक पर अभी लेखन कार्य चल रहा है, संभवत: जल्द आये !

सवाल : अंतिम सवाल, आपके अनुसार साहित्य में रचना-कर्म का वास्तविक उद्देश्य क्या होना चाहिए ?
प्रो. शुक्ल : साहित्य एवं रचना-कर्म का वास्तविक उद्देश्य समाज को आइना दिखाना होता है ! किसी भी साहित्यिक सृजन में अगर सामाजिक सरोकारों का सम्पूर्ण समावेश ना हो तो उस सृजन को कागज़ पर स्याही पोतने से ज्यादा कुछ भी नहीं कहा जाएगा !


गुरुवार, 11 जुलाई 2013

आशियाने से महरूम बेघरों का दर्द : नई दुनिया एवं आई नेक्स्ट(इंदौर) में प्रकाशित लेख

  • शिवानन्द द्विवेदी सहर

रोटी कपड़ा और मकान,ये तीनो चीजें एक आम आदमी के जीवन की बुनियादी जरूरतों के रूप में हमेशा से शुमार होती  आ रही   है ! एक आम आदमी की प्राथमिक जरूरतों को इसी फलसफा से परिभाषित करने की प्राचीन परंपरा आदिकाल से रही है ! आज आजादी के सात दशक और ग्यारह पंचवर्षीय योजनाओ के पड़ाव को पार करने के बावजूद यह यक्ष प्रश्न अनुत्तरित सा लगता है कि क्या वाकई हमारा तंत्र  आज हर भारतवासी की इन मूल जरूरतों को पूरा कर पाने में सक्षम हो पाया है ? सवालों के सुर तब और तल्ख़ हो जाते हैं  जब हमें  देश की राजधानी दिल्ली के फुटपाथों पर ठण्ड की ठिठुरन ,गर्मी की तपिश और बादलों से बरसती बूदों के बीच आशियाने से महरूम कराहते लोगों की सिसकियाँ सुनाई दे जाती हैं ! आज इस सच को कतई नकारा नही जा सकता कि लाख सरकारी योजनाओ और दावों के बावजूद हम फुटपाथ पर जीवन बसर कर रहे लोगों को सर छुपाने भर का आशियाना दे पाने में पूरी तरह नाकामयाब साबित हो रहे हैं ! २००१ की जनगणना  में आई रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में बेघरों की जनसँख्या 1.94 मिलियन बताई गयी जिसमे लागातार इजाफा होने का भी अंदेशा तत्कालीन दौर में ही जताया गया था जिसकी पुष्टि आर्थिक जनगणना के बाद हो जायेगी ! कुल बेघरो में लगभग 1.16 मिलियन लोग ग्रामीण इलाको में जीवन बसर कर रहे थे जबकि लगभग .77 मिलियन लोग शहरी क्षेत्रो में बदहाल जीवन बसर करने को मजबूर थे ! हालाकि जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में बेघरो की संख्या में भी तबसे लेकर आज तक समानांतर वृद्धि को नकारा नहीं जा सकता ! ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्तमान में लगभग ३ मिलियन से ज्यादा लोग जहाँ-तहाँ बदहाली का जीवन जीने को मजबूर हो रहे हैं ! बेघरी का दंश झेल रहे बदहाल लोगो से तमाम तरह की सामाजिक असुरक्षा की संभावना एवं उनके कुपोषण आदि पर गौर करते हुए उनके सामाजिक आवासीय एवं सामाजिक जरूरतों के सन्दर्भ में दाखिल रिट याचिका पर चिंता व्यक्त करते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने तत्कालीन राज्य सरकारों को इस सन्दर्भ में कदम उठाने के तमाम निर्देश दिए ! सन २००२ में दाखिल याचिका पर निर्देश देते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने कहा कि बेघरी एक गंभीर समस्या है और इसके तमाम सामाजिक दुष्परिणाम है ! सर्वोच्च न्यायलय ने अपने निर्देश में कहा कि सभी राज्यों का यह दायित्व है कि वे बेघर और लाचार एवं बदहाली का जीवन जी रहे लोगों के रहने, खाने एवं शौचालय आदि की व्यवस्था स्थायी तौर पर करें ! हाल ही में अपने पुराने निर्देश को लगभग एक दशक बाद दोहराते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने पुन: 9 जनवरी 2012 को यह निर्देश दिया कि हर व्यक्ति को उचित जीवन जीने का अधिकार है एवं राज्य का दायित्व है कि वो हर व्यक्ति को अनुच्छेद 21 के तहत व्यवस्थित जीवन उपलब्ध कराये ! अपने निर्देशों की लंबी फेहरिश्त जारी करते हुए सर्वोच्च न्यायलय द्वारा बेघरी की समस्या से निजात दिलाने के लिए तमाम तथ्यों का उल्लेख किया गया,जो शायद आज भी कागजो और आंकड़ों के दायरे में सीमित होकर सरकारी फाईलों में दम तोड़ रहे हैं ! बुनियादी तौर पर इस बात का जिक्र सर्वोच्च न्यायलय द्वारा जारी उस निर्देश में किया गया है कि एक लाख तक की आबादी वाले इलाके में सौ लोगो को आश्रय देने योग्य एक और पचास लोगो को आश्रय देने योग्य दो सुविधा संपन्न आश्रय उपलब्ध करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है ! हालाकि बारहवी पंचवर्षीय योजना में इसमे तमाम अन्य सुधारों को जोडने की बात की गयी है ,जिनका दायरा अभी आंकड़ों से ज्यादा कुछ नही है ! बेघर लोगो की सामाजिक समानता की भावना को देखते हुए इस बात का भी जिक्र किया गया कि बेघरो को सरकार द्वारा तमाम आवासीय योजनाओ से लाभान्वित करने एवं उनके सामाजिक जरूरतों को एक सामान्य एवं व्यवस्थित नागरिक की तरह पूरा करने का प्रयास किया जाना चाहिए !
            सर्वोच्च न्यायलय के निर्देशों से अलग अगर सरकार द्वारा संचालित तमाम आवासीय योजनाओ की बात करें तो वर्त्तमान में इंदिरा आवास योजना,राजीव गांधी आवास योजना,सामाजिक आवास योजना सहित राज्य सरकारों की अपनी-अपनी आवासीय योजनाओ की कोई कमी नही है ! कागजो के ग्राफ में आवासीय योजनाओ का अम्बार आज इस बात को सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर आंकडो के ग्राफ में रोज नई नई उचाईयां छूती इन योजनाओ का बेघरो के गगनचुम्बी ग्राफ पर असर क्यों नही पड़ रहा ? आखिर वो कौन से कारण हैं कि तमाम योजनाओ और सर्वोच्च न्यायलय के निर्देशों के बावजूद हम बेघरी के इस समस्या को ध्वस्त कर पाने में पिछले सात दशकों से नाकाम साबित हो रहे है ?देश की राजधानी दिल्ली जहाँ से हर योजना को मूर्त रूप दिया जाता है,वही के फुटपाथ बेघरो की दुर्दशा का मातम मनाते क्यों नजर आते हैं ? आज सच्चाई यही है कि  दिल्ली सहित भारत के सभी महानगरों में बेघर लोगो कि बढती संख्या कहीं न कहीं देश की प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है !
            बेलगाम हो रही बेघरो की जनसँख्या और लागातार नाकाम हो रही तंत्र की योजनाओ के बीच आज इस बात पर गंभीर होने कि जरुरत है और इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि आखिर वो चूक कहा हो रही है कि तमाम प्रयास और खर्चीली योजनाओ के बावजूद फुटपाथ पर कराह रहे बदहाल  जीवन को महफूज ठिकाना मयस्सर नही हो पा रहा ? निश्चित तौर पर अगर हम इस नाकामी के कारणों की तह को खंगालने का प्रयास करेंगे तो कहीं न कहीं हमें योजनाओ के क्रियानवयन नीतियों एवं हमारे कार्यपालको की लापरवाही देखने को मिलेगी ! इसमे कोई दो राय नहीं कि सर्वोच्च न्यायलय के निर्देशों को कागजी जामा पहने के अलावा सतही स्तर पर रहनुमाओं द्वारा कुछ विशेष नहीं किया गया और ना ही इसे एक गंभीर समस्या के रूप में देखा गया,जबकि बेघरी की समस्या को राष्ट्रीय समस्याओं की मुख्य धारा में शामिल कर इसके निदान  में कदम उठाने की जरुरत थी ! कागजी पुलिंदो और लालफीताशाही के मकडजाल में कराह रहे इन फुटपाथों के प्रति अभी भी ना तो कोई ठोस पहल किसी सरकार द्वारा दिख रही है और ना ही इसे समस्या के तौर पर देखा जा रहा है,जबकि बेघरी किसी भी राष्ट्र के प्रतिष्ठा से समबन्धित एक आम नागरिक की समस्या है ! आज जरुरत इस बात पर बल देने की है कि हम इस दिशा में गंभीर और ठोस कदम उठाए और उसे लागू करने की त्वरित नीतिया तैयार करें ! अगर समय रहते बेघरी की इस विकराल रूप धरती इस समस्या से निजात नही पाया गया तो इसके भावी परिणाम राष्ट्र के सामाजिक.आर्थिक एवं अन्तराष्ट्रीय किसी भी पर्प्रेक्ष्य में ठीक नहीं होंगे ! संवैधानिक दृष्टिकोण से भी यह नागरिक अधिकारों से जुडा  विषय है और संविधान की गरिमा को महत्त्व देते हुए आज इसके समाधान के प्रति सजग होना ही पडेगा ! हमें इस बात का ख्याल रखना ही होग कि फुटपाथ सिर्फ फुटपाथ बने रहे हैं न कि किसी बदकिस्मत का आशियाना बने !