सोमवार, 4 मार्च 2013

मोदी को लेकर मुगालते में भाजपा : दैनिक जागरण में प्रकाशित (5 मार्च)



लोकसभा चुनाव जितना ही नजदीक आ रहा है, भाजपा का सियासी पारा उतना ऊपर उठता दिख रहा है। शायद यह पहली बार ही है कि राजनीतिक उद्देश्यों से नरेंद्र मोदी ने एक महीने के अंदर दूसरी बार दिल्ली का रुख किया गया हो। अगले लोकसभा चुनावों की रणनीतियों को तय करने लिए भाजपा द्वारा आयोजित राष्ट्रीय परिषद का महाअधिवेशन पूरी तरह से मोदी पर केंद्रित रहा और पार्टी अध्यक्ष से लेकर सभी बड़े नेता नमो नम: का जाप करते दिखे। कार्यक्रम के दौरान पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने जिस तरह से मोदी का महिमा मंडन किया, वह इस बात का संकेत है कि भाजपा भी बतौर प्रधानमंत्री मोदी की दावेदारी को लेकर अब काफी हद तक खुलकर बोलने लगी है। हालांकि इस कार्यक्रम के दौरान मंच से ऐसा कुछ भी नहीं बोला गया, जिससे इस बात की पुष्टि हो जाए कि नरेंद्र मोदी आगामी चुनाव में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। मगर पूरे कार्यक्रम के दौरान मोदी को कार्यकर्ताओं और पार्टी नेताओं द्वारा जो तवज्जो दी गई, उस आधार पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा के सबसे वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की भूमिका अब पार्टी संरक्षक की होगी, न कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की। आज मोदी भले ही भाजपा का सबसे चर्चित चेहरा बन चुके हैं, मगर ये मोदी समर्थकों के अंध उत्साह के अलावा कुछ भी नहीं है कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर मोदी को आगे खड़ा कर देने मात्र से भाजपा बहुमत में आ जाएगी या सरकार बना लेगी। मोदी के नाम पर अगर भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव लड़ती है तो उसके तमाम फायदे भी होंगे और तमाम नुकसान भी। हमें इस बात को समझना होगा कि लोकतंत्र में सरकार संख्या बल से बनती है, न कि नारेबाजी और हो-हल्ला मात्र से। संख्या बल जुटा पाने की क्षमता को नजरंदाज कर मोदी मंत्र का जाप करना सिवाय ख्याली पुलाव पकाने के कुछ भी नहीं है। कार्यकर्ताओं को यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि जिन मोदी का नाम लेकर वह मोदी की छवि का राष्ट्रीयकरण कर रहे हैं, उन्हीं मोदी को इसी गुजरात विधानसभा चुनाव में पिछली बार के मुकाबले एक सीट कम पर संतोष करना पड़ा है। मोदी को सारथी बनाकर रथ हांकने वाली भाजपा के समक्ष प्रमुख सवाल यह है कि मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनाए जाने मात्र से भाजपा कहां-कहां लाभ ले सकती है और कहां-कहां उसे नुकसान झेलना पड़ सकता है? इन सवालों के आधार पर मोदीमय होती जा रही भाजपा की चुनावी कसरत के निहितार्थ को समझने का प्रयास करें तो इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है कि औपचारिक रूप से मोदी का नाम आगे आते ही कांग्रेस मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण करने का प्रयास कर सकती है। अगर यह समीकरण यूपी जैसे राज्यों में बन गया तो भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। मोदी के आने से भाजपा के अंदरूनी समीकरण भी डगमगाने का खतरा है, जो सियासी नजरिये से चुनाव के ठीक पहले नाकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। पिछले डेढ़ दशक में केंद्रीय राजनीति में सत्ता तक पहंुचने में घटकों के सहयोग का व्यापक प्रभाव देखा जा रहा है और वर्तमान राजनीतिक समीकरण ऐसे बन चुके हैं कि बिना मजबूत घटकों के सहयोग से सरकार किसी की बनती नहीं दिख रही है। ऐसे में गठबंधन के नजरिये से मोदी का नाम भाजपा के लिए कितना माकूल है, इसका मूल्यांकन करना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है। वर्तमान सियासी परिस्थितियों में गठबंधन के नजरिये से कांग्रेस की स्थिति पहले से ही भाजपा से बेहतर है, जबकि मोदी के आने के बाद भाजपा को सबसे ज्यादा खतरा गठबंधन टूटने को लेकर है। केंद्रीय राजनीति में आज जब सत्ता तक पहंुचने के लिए गठबंधन को मजबूत करने पर बल दिए जाने की बात की जाती रही है, ऐसे में अगर भाजपा अपने गठबंधन में नए घटकों को नहीं जोड़ पाती है या वर्तमान गठबंधन को कायम नहीं रख पाती है तो उसके लिए सत्ता की राह दूर की कौड़ी साबित होगी। गुजरात में विकास पुरुष की छवि रखने वाले नरेंद्र मोदी अगर विकास के नाम पर गुजरात चुनाव में ही पिछली बार के मुकाबले बढ़त नहीं हासिल कर पाए तो उनसे विकास के नाम पर देश में भाजपा को बढ़त दिलाने की उम्मीद करना भरोसे का सियासी कार्ड प्रतीत नहीं होता। जहां तक मोदी के हिंदुत्व वाली छवि की बात है तो शायद भाजपा और मोदी दोनों के लिए ही यह मुद्दा बेशक सीटें बढ़ाने वाला हो जाए, लेकिन इस मुद्दे के आधार पर कोई भी ऐसा समीकरण नहीं दिख रहा, जो भाजपा को सत्ता के गलियारों तक ले जा सकता है।
शिवानन्द  द्विवेदी सहर 

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