एक भाषा को बोलने वाला समाज जब किसी अन्य भाषा का अनुसरण करने वाले समाज के संपर्क में आता है तो दोनों के बीच पहला आदान- प्रदान भाषा का ही होता है। यानी अलग-अलग भाषाओं वाले समाजों के बीच सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक या अन्य किसी भी प्रकार के समन्वय को व्यवहार में लाने के लिए प्राथमिक तौर पर भाषाओं के बीच का समन्वय अनिवार्य होता है। भाषाओं के समन्वय में शब्दों के आदान-प्रदान की संभावना सर्वाधिक होती है क्योंकि किसी भी भाषा को समझने के लिए उसके शब्दों को समझना जरूरी है। भाषाई इतिहास को पलटें तो काफी हद तक यह बात सही प्रतीत होती है कि शब्दों के आदान-प्रदान के क्रम में वही भाषा भौगोलिक दृष्टि से ज्यादा व्यापक व समृद्ध बन पाई है जिसने अपने शब्दों का वर्चस्व बड़े भूभाग पर कायम रखने में सफलता हासिल की है। इस बात को सिरे से कतई खारिज नहीं किया जा सकता है कि समय और वैश्विक विकास के समानांतर भाषाओं के बीच का अंतर्सघर्ष भी दशकों पूर्व शुरू हो चुका है। साम्राज्यवाद के शुरु आती दौर में दुनिया की साम्राज्यवादी ताकतों ने यह बात मान ली थी कि किसी भी भू-भाग पर साम्राज्य विस्तार के लिए उनकी भाषाओं का विस्तार भी जरूरी है। हालांकि एक समाज के दूसरे समाज में जाने से भाषाओं एवं शब्दों का आदान-प्रदान स्वत: संचालित प्रक्रिया भी है जो भाषाई विकास की दृष्टि से ठीक भी कही जा सकती है क्योंकि शब्द आदान-प्रदान की स्वत: होने वाली प्रक्रिया में किसी भी भाषा के मूल शब्दों के गौण होने का खतरा नहीं रहता है, बेशक नए शब्द स्वीकार कर लिए जाएं। इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि भाषा की सम्पन्नता एवं समृद्धि के लिए अगर अनिवार्य हो जाए तो अन्य भाषाओं के शब्दों को स्वीकार किया जाना चाहिए, क्योंकि शब्दों के अभाव में भाषा विपन्न सी नजर आती है। भौगोलिक दृष्टि से भाषा के विस्तार के लिए भी शब्दों का संतुलित एवं अनुशासित आदान-प्रदान जरूरी है ताकि शब्दों की समृद्धि के साथ-साथ भाषा को भी व्यापक बनाया जा सके। हालांकि दो या दो से अधिक भाषाओं के बीच शब्दों के आदान-प्रदान की स्वत: चलने वाली प्रक्रिया को भाषाई साम्राज्यवाद ने काफी हद तक नुकसान पहुंचाया है। उदाहरण के लिए पश्चिमी व यूरोपीय साम्राज्यवाद के दौर में भाषाएं भी काफी प्रभावित हुईं। साम्राज्यवाद के स्वर्णिम दौर में साम्राज्यवादी राष्ट्र जहां भी गये, अपनी भाषा का प्रभाव अन्य भाषाओं को बोलने वाले समाज पर इस कदर छोड़ आये कि उसे महज भाषाई आदान-प्रदान कहना तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता। कहीं न कहीं उनकी भाषा ने समाज को प्रभावित किया, साथ ही उस समाज अथवा भू-भाग की मूल भाषा को भी अंशत: ही सही, लेकिन प्रभावित करने में सफलता पायी। भाषाई साम्राज्यवाद का असर जिस समाज अथवा भूभाग पर दिखा, उसकी पारंपरिक भाषा को प्रभावित करने अथवा उस भाषा में बेवजह घुसपैठ करने की कोशिश की गयी जो समय के साथ विकसित ही हो रही है। बेशक आज न वो साम्राज्यवाद है और न ही उन साम्राज्यवादी ताकतों का शासन लेकिन उनके द्वारा स्थापित भाषाई साम्राज्यवाद का प्रभाव या कुप्रभाव आज भी न सिर्फ देखने को मिल रहा है बल्कि त्वरित गति से विकसित भी हो रहा है। इस संदर्भ में यह आंकड़ा उल्लेखनीय है कि एक अनुमान के मुताबिक समूची दुनिया में लगभग पांच हजार के आस-पास बोली-भाषाएं चलन में रही हैं। लेकिन वर्तमान में इन पांच हजार भाषाओं में से लगभग तीन हजार से ज्यादा विलुप्त होने की कगार पर हैं या विलुप्त हो चुकी हैं। इसी आंकड़े का दूसरा पहलू यह भी है कि वर्तमान में पूरी दुनिया में लगभग पांच सौ भाषाएं ऐसी हैं जो विभिन्न भूभागों में सशक्त रूप से प्रयोग में लाई जा रही हैं और इनमे से लगभग दो सौ की अपनी लिपि न होने बावजूद वे काफी प्रचलित हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर के भाषाई मानकों के आधार पर भूभागीय दृष्टिकोण से बोली जाने वाली भाषाओं की संख्या भी लगातार कम होती जा रही है और कुछ गिनी- चुनी भाषाओं का ही बोल-बाला बढ़ता जा रहा है, जो तमाम भाषाओं के विकास की दृष्टि से ठीक नहीं कहा जा सकता। तीन हजार के आस-पास विलुप्त हो रही भाषाओं के संदर्भ में यह भी गौर करना जरूरी है कि विलुप्त हो रही इन भाषाओं को बोलने वाला समाज आज अन्य भाषाओं को स्वीकार कर चुका है, जबकि उस समाज की मूल पारंपरिक भाषा विलुप्त होने के कगार पर है। दुनिया में बढ़ते अंग्रेजी सहित कुछ अन्य अंतरराष्ट्रीय भाषाओं के वर्चस्व एवं उन भाषाओं द्वारा अन्य भाषाओं में की जा रही घुसपैठ के नजरिये से अगर हिन्दी को देखें तो आदान-प्रदान का भारी असंतुलन नजर आता है। शब्दों का एक संतुलित आदान-प्रदान किन्हीं दो भाषाओं के लिए स्वीकार्य हो सकता है। मगर यदि शब्दों के आदान-प्रदान में असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होने लगे तो यह उस भाषा के लिए नुकसानदायक सिद्ध हो सकता है जिस भाषा ने शब्दों का निर्यात, आयात के अनुपात में कम किया हो। दो भाषाओं के बीच शब्दों के आयात और निर्यात का संतुलन ही शब्द आदान-प्रदान कहलाता है, जबकि यदि इनके बीच असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होने लगे तो एक भाषा का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। आज हिन्दी में सहजता से प्रयुक्त हो रहे अंग्रेजी भाषा के शब्दों को देखा जाय तो तमाम शब्द ऐसे मिलेंगे जो मुख्यधारा की हिन्दी में तो शामिल हो चुके हैं लेकिन हिन्दी के विकास की दृष्टि से उनका कोई ठोस औचित्य नहीं नजर आता। उल्लेखनीय होगा कि हिन्दी में अन्य भाषा के शब्दों को मुख्यधारा के शब्द के तौर पर शब्दकोश में जगह देने या उनके प्रयोग करने से पहले भाषाई अनुशासन का पालन करना अनिवार्य होना चाहिए। इस बात का खास ख्याल रखा जाना चाहिए कि जिस शब्द को हम हिन्दी की मुख्यधारा के शब्द के रूप में स्वीकार कर रहे हैं, हिन्दी को उसकी जरूरत कितनी है और क्या उस शब्द के लिए हमारी भाषा में कोई पर्याय शेष नहीं बचा है? अंग्रेजी के शब्दों की धड़ल्ले से हिन्दी में हो रही घुसपैठ इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि, हम बड़ी सहजता से अंग्रेजी के शब्दों का अपने वाक्य संरचना में हिन्दीकरण कर दे रहे हैं जिस वजह से उस शब्द का हिन्दी भाषा में पर्यायवाची शब्द गौण होता जा रहा है ! उदाहरणार्थ, अगर हिन्दी के विद्यालय शब्द को देखें तो इसकी स्थिति ‘स्कूल’ शब्द के समक्ष नाजुक प्रतीत होती है। जिस तरह स्कूल शब्द को वाक्य संरचना में स्कूल या स्कूलों की तरह बनाकर हिन्दीकरण किया जा रहा है, इसे विद्यालय या पाठशाला जैसे हिन्दी के पारंपरिक शब्दों को विलुप्त करने की शुरुआती कवायद के रूप में देखा जा सकता है। मुख्यधारा की हिन्दी में विद्यालय शब्द की मौजूदगी में स्कूल शब्द का हिन्दीकारण होना शब्द आदान- प्रदान नहीं, बल्कि भाषाई घुसपैठ का नमूना मात्र है। इसमे दो राय नहीं कि जिस अनुपात में हम अंग्रेजी शब्दों को हिन्दी की मुख्यधारा में ला रहे हैं, उस अनुपात में हिन्दी के शब्द अंग्रेजी की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पा रहे हैं। अंग्रेजी अपने भाषाई अनुशासन के अंतर्गत ही शब्दों के आयात को स्वीकार करती है और सिर्फ उन्ही वाह्य भाषा के शब्दों को लेती है जिनके पर्याय अंग्रेजी में उपलब्ध नहीं है, जैसे ‘साड़ी।’ साड़ी जैसा परिधान क्योंकि उस समाज की परंपरा या संस्कृति का हिस्सा नहीं है इसलिए उसके लिए वहां उसका पर्यायवाची नहीं है लिहाजा जरूरत के मुताबिक उसे प्रयोग में लाना उसकी मजबूरी है। हिन्दी और अंग्रेजी के बीच के भाषाई आदान-प्रदान के असंतुलन को गंभीरता से लेने की जरूरत है। हमारे भाषाविदों व साहित्यकारों को शब्द चयन के प्रति अत्यधिक उदार होने की बजाय भाषा के प्रति अनुशासित होने की जरूरत है। सहजता व उदारता के अन्ध उत्साह में कहीं न कहीं हिन्दी की क्षति हो रही है और अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ रहा है। इस विषय पर खुली बहस की जरूरत है और हिन्दी में शब्दों के आदान-प्रदान में अनुशासन का दायरा निर्धारित करने की जरूरत है। विलुप्त हो रही भाषाओं से सबक लेते हुए हिन्दी को पुन: परिभाषित किये जाने और अनुशासन के दायरे में समेटने की जरूरत पर बल दिया जाना चाहिए। अगर हिन्दी अपने मूल स्वरूप और पारंपरिक शब्द खोती जाएगी तो कहीं अंतरराष्ट्रीय भाषा बनने की बजाय महज बोली में न सिमट जाए। शिवानंद द्विवेदी |
इस ब्लॉग को बनाने का उद्देश्य अपने(विशेष हालात में अन्यों की भी) प्रकाशित अप्रकाशित लेखों को जगह देना और सहेजना है ! आप का स्वागत है....
रविवार, 3 मार्च 2013
भाषाई साम्रज्यवाद के खतरे : राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित(3 मार्च -13)
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें