शुक्रवार, 1 मार्च 2013

पिछले बजट के क्या हासिल : दैनिक जागरण में प्रकाशित लेख


देश के कुल आय-व्यय का लेखा जोखा प्रस्तुत किए जाने वाले इस सालाना बजट को परंपराओं में भले ही आम बजट कहा जाता रहा है, लेकिन हमेशा से इस बजट ने देश की आम जनता को निराश ही किया है। 28 फरवरी को पेश किए गए इस आम बजट में सरकार द्वारा आम जनता के हितों में की गई घोषणाओं की व्यावहारिकता को तो अभी देखना बाकी है, लेकिन सवाल यह भी है कि पिछले साल सरकार द्वारा पेश किए गए आम बजट के निर्धारित लक्ष्यों को कहां तक प्राप्त किया जा सका है। भारतीय संसदीय व्यवस्था में जितनी बहस वर्तमान में पेश हुए बजट को लेकर होती है, उतनी बहस पिछले बजट की समीक्षा एवं उसकी उपलब्धियों या खामियों को लेकर नहीं होती। हर साल फरवरी-मार्च महीने में आम जनता, किसान, मजदूर, छोटे-बड़े व्यापारियों सहित तमाम नौकरी पेशे वाले लोग बजट की राह ताकते हैं कि शायद इस बार उनके ऊपर भी उनकी चुनी सरकार मेहरबान हो जाए और उन्हें कुछ राहत मिले। इसी आस और विश्वास की उधेड़-बुन में वे भूल जाते हैं कि पिछली बार के बजट में इसी सरकार ने उनके लिए क्या दिया था, कितना दिया था और उनको कितना मिला। इस बात से तो कतई इन्कार नहीं किया जा सकता कि आम जनता के लिए सिरदर्द बन चुकी महंगाई के कारण तमाम क्षेत्रों में आए भारी असंतुलन को दूर कर पाने में अब तक के सारे बजट बौने साबित हुए हैं। पहली पंचवर्षीय योजना से लेकर अब तक की बारहवीं पंचवर्षीय योजना तक हर एक योजना में कृषि को महत्वपूर्ण जगह दी गई और हर साल कृषि बजट में इजाफा किया गया। इसके बावजूद कृषि का स्तर सुधरने की बजाय लगातार अपने अवसान की तरफ जाता दिख रहा है। कृषि के क्षेत्र में पिछले वर्ष के बजट में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत 9,270 करोड़, द्वितीय हरित क्रांति के नाम पर एक हजार करोड़, कृषि ऋण के नाम पर 5,75,000 करोड़, सिचाई योजना के नाम पर तुलनात्मक वृद्धि के साथ 14,270 करोड़ रुपये का बजट पेश किया गया था। लेकिन बजट के कागजों में लुटाया गया यह धन आज तक किसानों की किसानी को चमकदार बना पाने में कामयाब नहीं हो पाया है। फिर इस बार इस बजट से कैसे उम्मीद करें!

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