कहाँ गुम हो रहे नौनिहाल
शिवानन्द द्विवेदी
जनसमस्याओं से बेपरवाह सरकारें जब मनमानी करने लगती हैं तो कई बार न्यायालय को सरकार के कार्यों में हस्तक्षेप करने को मजबूर होना होना पढ़ता है ! बच्चों पर काम करने वाली एक गैर सरकारी संस्था द्वारा भारी संख्या में लापता हो रहे बच्चों के संदर्भ में दाखिल एक याचिका की सुनवाई करते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायलय द्वारा केन्द्र एवं राज्य सरकारों को इस मामले में गंभीर कदम उठाने के साथ-साथ जल्द ही तय सीमा के अंदर प्रगति स्टेट्स रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया था ! तय सीमा बीत जाने के बावजूद सर्वोच्च न्यायलय के निर्देशों की अवहेलना करते हुए किसी भी राज्य की सरकार द्वारा इस मामले में गंभीरता नहीं दिखाई गयी ! यहाँ तक कि कई राज्यों के सरकारों के सचिव कोर्ट की नोटिस को ताक पर रखते हुए पेशी के दौरान हाजिर तक नहीं हुए ! परिणामत:, नौनिहालों के मसले पर हीला-हवाली का रुख अख्तियार कर रहीं सभी सरकारों के खिलाफ सख्त होते हुए सुप्रीम कोर्ट को यहाँ तक कहना पड़ा कि इस गंभीर समस्या के प्रति काम करने वाले लोगों के बीच आपसी समन्वय ही नहीं है और इसी वजह से वो अपनी जवाबदेही से कतराते नजर आ रहे हैं ! नौनिहालों के मामले में सर्वोच्च न्यायलय तक के निर्देशों की उपेक्षा कर रही सरकारों से देश के नौनिहालों के सुरक्षित भविष्य की अपेक्षा रखना आसमान में पौधे उगाने जैसा लगता है ! लापता बच्चों के मामले में जारी हुए तमाम आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि पिछले कुछ सालों में लापता हुए बच्चों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है ! पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर नजर डाले तो पिछले एक साल में लगभग साठ हजार की संख्या में सिर्फ उन लापता बच्चों का आंकड़ा उपलब्ध है जिनके गुमशुदगी का मामला थाने में प्राथिमिकी के तौर पर दर्ज किया गया है ! इसके अलावा हजारों कि संख्या में वो बच्चे भी हैं जो लापता तो हैं मगर ना तो आंकड़ों के ग्राफ में दिख रहे हैं और ना ही उनके मामलों का कोई पुलिस रिकॉर्ड ही मौजूद है ! इन्ही आंकड़ों में 2008 से 2010 के बीच लापता हुए बच्चों की संख्या लगभग 1 लाख 20 हजार के आस-पास बताई गयी है जबकि वास्तविक आंकड़े इससे बहुत ज्यादा होने की संभावना तमाम संस्थाओं द्वारा जताई जा चुकी है ! सरकारी फाइलों में दर्ज 2008 से 2010 के बीच के लापता बच्चों में से बेशक तमाम बच्चों का पता लगाया जा चुका है लेकिन फिर भी 45000 के आस-पास वो बच्चे हैं जिनके बारे में अभी तक पुलिस द्वारा कोई जानकारी नहीं जुटाई जा सकी है और उन बच्चों का नाम अभी भी लापता बच्चों की सूची में ही दर्ज हैं !
सरकार की बेपरवाही का दंश झेल रही बच्चों की गुमशुदगी की इस समस्या से उत्पन्न होने वाले परिणामों के प्रति अगर संजीदगी से सोचा जाय तो अनेक तरह के ऐसे सामाजिक समस्याओं के उत्पन्न होने का खतरा नजर आता है जो स्वस्थ एवं सुरक्षित समाज के नजरिये से बेहद चिंताजनक है !इस पुरे मामले में तमाम ऐसे सवाल हैं जो ना सिर्फ बच्चों कि जिंदगी मात्र से जुड़े हैं बल्कि इन सवालों के तमाम सामाजिक मायने और महत्व भी हैं ! यहाँ सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि आखिर भारी संख्या लापता हो रहे ये बच्चे जा कहाँ रहे हैं ? सवाल ये भी उठता है कि आखिर पिछले कुछ सालों से गुमशुदगी के मामलों में भारी इजाफा क्यों हो रहा है ? इन सवालों के साथ-साथ यह सवाल भी कायम है कि कहीं बच्चों की गुमशुदगी के पीछे तमाम तरह की बड़ी आपराधिक वारदातों को अंजाम तो नहीं दिया जा रहा ? इन सवालों के संदर्भ में इस बात की संभावना सबसे प्रबल है कि गुमशुदगी के अधिकतम मामले समाज के आपराधिक तत्वों द्वारा अंजाम दिये जाते हैं ! इस बात को कतई खारिज नहीं किया जा सकता कि समाज में आपाराधिक तत्वों का एक बड़ा नेटवर्क बच्चों को अलग-अलग गलत उद्देश्यों में निहित कार्यों के लिए गायब करने में सक्रिय है ! ऐसे आपराधिक तत्वों द्वारा जिन प्रमुख कार्यों में लापता किये गए बच्चों का इस्तेमाल किया जा रहा है उनमे बाल-तस्करी, दूर-दराज के क्षेत्रों में बाल-मजदूरी एवं साथ ही साथ अंगों की तस्करी सहित यौन शोषण आदि प्रमुख हैं ! इसके अलावा इन्ही लापता बच्चों को आपराधिक कार्यों के लिए प्रशिक्षित कर इनका दुरपयोग भी किये जाने की संभावना से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है ! लापता बच्चों के मामलों में फिरौती के लिए अपहृत बच्चों से ज्यादा उन बच्चों की तादाद है जिनकों अन्य उद्देश्यों से अगवा किया जाता रहा है ! फिरौती के लिए अपहृत बच्चों को या तो अपराधिक तत्वों द्वारा जान से मार दिया जाता है या फिरौती आदि मिल जाने पर सही सलामत छोड़ दिया जाता है ! हालाकि फिरौती के कई मामलों में पुलिस आदि की भूमिका सराहनीय भी होती है ! लेकिन बाल-तस्करी एवं अंग-व्यापार सहित यौन-शोषण के उद्देश्यों से अगवा किये गए बच्चों के मामलों में पुलिस प्रशासन नाकामयाब ही साबित हुआ है जबकि इन बच्चों के साथ तो और बुरा बर्ताव हो रहा है ! कहीं ना कहीं सरकारी नियंत्रण की लचरता से मनबढ़ हो रहे इन आपराधिक तत्वों का हौसला इतना बुलंद हो चुका है कि इनके मन में क़ानून और प्रशासन का बिलकुल भी खौफ नहीं है ! लापता बच्चों के मसले पर प्रशासन की लचरता का नतीजा ही है कि प्रत्येक साल लापता बच्चों का ग्राफ और ज्यादा ऊँचा होता जा रहा है !
लापता हो रहे बच्चों के कारण उत्पन्न होने वाले सामजिक दुष्परिणामो को अगर समझने का प्रयास करें तो इससे एक तरफ जहाँ आपराधिक प्रवृतियों को बढ़ावा मिलता नजर आ रहा है वहीँ देश के भावी कर्णधार कहे जाने वाले मासूमो का बचपन एवं भविष्य दोनों हाशिए पर जाते दिख रहे हैं ! सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि अपराधियों द्वारा लापता किये गए बच्चों को अगर मार दिया जा रहा है तो सामाजिक तौर इससे जघन्य अपराध भला और क्या हो सकता है ! वहीँ दूसरी चिंता इस बात की भी है कि जिन बच्चों को गलत कार्यों में धकेला जा रहा है और वो अपराधिक गतिविधियों में सक्रिय हो रहे हैं जिससे समाज में अपराध का बोलबाला कायम हो रहा ! समाज के भावी कर्णधारों को अगवा कर जिन उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है वो समाज एवं देश के वर्तमान एवं भविष्य दोनों के लिए खतरे का संकेत है ! कहीं ना कहीं प्रशासन की लचरता एवं इस गंभीर समस्या के प्रति सरकार की असंवेदनशीलता का नतीजा है कि ये आपरधिक गतिविधियां समाज में सक्रिय हो रहीं हैं ! बच्चों के भविष्य के साथ-साथ दाव पर समाज के भविष्य पर भी हमारी सरकार सिवाय टाल-मटोल करने के कुछ भी सकारत्मक करती अभी तक नजर नहीं आ रही है ! ना तो इसके लिए कोई नीतिगत निर्देश ही जारी किया गया है और ना ही इस पर ठोस कार्यवाही के लिए कभी कोई सीमा ही तय की गयी है ! आज अगर माननीय सर्वोच्च नायालय को एक याचिका के आधार पर सरकार को फटकार लगानी पड़ रही है तो इसका सीधा मतलब यही निकलता है कि इस मसले पर सरकार पंगु साबित हुई है ! सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर अमल करते हुए एवं माननीय न्यालय के गुस्से के निहितार्थ को समझते हुए सरकार को नींद जागकर कुछ ठोस कदम उठाने की जरुरत है ! लापता बच्चों के मसले पर त्वरित एवं सख्त कदम उठाकर समाज में पैठ बना चुके इन आपरधिक नेटवर्क को तोड़ने की जरुरत पर बल दिया जाना चाहिए ! समय रहते अगर इस नेटवर्क की तह तक पहुँच कर अगर इसे ध्वस्त नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में ना तो देश का नौनिहाल महफूज होगा ना ही समाज ही सही दिशा में अग्रसर हो पायेगा !

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