जागरण में प्रकाशित लेख
भारतीय लोकतंत्र के संघीय ढांचे की सबसे बड़ी खामी यही है कि यहां जब भी किसी पेचीदा या गंभीर मसले पर अपनी जवाबदेही तय करने का वक्त आता है तो अक्सर केंद्र और राज्य की सरकारें एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाती नजर आती हैं। वहीं एक विभाग दूसरे विभाग पर गलतियों-खामियों का ठीकरा फोड़ता दिख जाता है। इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर हुआ हादसा बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन उससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तब पैदा हो गई, जब इस पूरे हादसे पर रेल मंत्रालय और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच जवाबदेही को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। एक ट्रेन के तयशुदा प्लेटफॉर्म से अचानक दूसरे प्लेटफॉर्म पर भेज दिए जाने से हुई भागमभाग में यह हादसा हो गया। हालांकि इस मामले में रेलवे विभाग को इस बात का जवाब देना चाहिए कि क्या उन्हें नहीं पता था कि स्टेशन पर बेतहाशा भीड़ है तो अचानक ट्रेन का प्लेटफॉर्म बदलने से भीड़ को काबू करना मुश्किल हो सकता है? इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण बात और क्या होगी कि हादसे के बाद जब 36 से ज्यादा श्रद्धालु अपनी जान गंवा चुके थे और सैकड़ों लोग घायलावस्था में बेसुध पड़े थे, उसी दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री इस हादसे का ठीकरा रेल विभाग पर फोड़ते नजर आ रहे थे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने इस हादसे पर रेलवे की लापरवाहियों को जिम्मेदार ठहराया तो वहीं रेलमंत्री पवन बंसल ने जवाब में एक लापरवाही भरा बयान देते हुए कहा कि भीड़ संभालने की जिम्मेदारी रेलवे की नहीं होती। इस पूरे हादसे के दौरान एंबुलेंस की मुस्तैदी समय पर नहीं गई थी, चिकित्सकों की टीम को स्टेशन पर नहीं बुलाया गया था, लेकिन पुलिस विभाग ने लाठियां भांज कर भीड़ को काबू करने का नायाब हथकंडा जरूर अपनाया। हादसे प्रायोजित नहीं होते हैं, लेकिन हादसे के बाद हमारी सरकार और प्रशासन द्वारा जिस तरह से निपटा गया है, वह बेहद निराशाजनक और लापरवाही भरे रवैये के सिवाय कुछ भी नहीं नजर आता। इस पूरे हादसे ने हमारे तंत्र की लापरवाही और खामियों को तो उजागर किया ही है, कई और सवाल भी खड़े किए हैं। हादसे के इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसे हादसों को लेकर हमारे पास ऐसी कोई ठोस नीति क्यों नहीं है, जिसके आधार पर ऐसे हादसों के लिए जवाबदेही तय की जा सके? ऐसा कतई नहीं है कि उत्तर प्रदेश सरकार या रेलवे को नहीं पता था कि महाकुंभ के दौरान इलाहाबाद में भारी भीड़ उमड़ेगी? ऐसे में भीड़ को देखते हुए प्रदेश प्रशासन एवं रेलवे द्वारा पहले से ही भीड़ प्रबंधन को लेकर अपसी समन्वय क्यों नहीं बनाया गया था? बेशक, मुआवजे और आरोप-प्रत्यारोप के सियासी हथकंडों को अपनाकर प्रदेश सरकार और रेल मंत्रालय अपनी जवाबदेही से कतरा रहे हों, लेकिन ऐसा कर लेने मात्र से उनकी नाकामियों पर पर्दा नहीं पड़ जाता। इस पूरे हादसे के लिए कहीं न कहीं दोनों ही सामान रूप से जिम्मेदार नजर आते हैं। संयुक्त रूप से दोनों की सबसे बड़ी नाकामी यह है कि इतनी बड़ी भीड़ को संभालने के लिए रेलवे और उत्तर प्रदेश सरकार ने संयुक्त नीतियां तैयार नहीं की और इस भारी भीड़ को बस राम भरोसे छोड़ दिया। आपसी समन्वय का अभाव ही था कि हादसे के बाद त्वरित रूप से ठोस कदम उठाने के बजाय आपसी खींचतान की स्थिति उत्पन्न हो गई। दोनों सरकारों को यह पता होना चाहिए कि एक ऐसा आयोजन जहां करोड़ों की संख्या में लोग देश के कोने-कोने से जुटते हैं, वहां प्रबंधन की जिम्मेदारी किसी एक की नहीं हो सकती। हादसे के तीन दिन बीतने के बाद भी अब तक न तो रेलवे द्वारा ही और न ही प्रदेश प्रशासन द्वारा ही घटना के लिए जिम्मेदार दोषियों की पहचान की जा सकी है। बस खानापूर्ति के लिए जांच के आदेश दे दिए हैं। अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग बजाते चल रहे अलग-अलग विभागों के बीच आपसी समन्वय का अभाव और सरकारों द्वारा अपनी तय जवाबदेही से मुकरना ही ऐसे हादसों की बड़ी वजह है। जब सरकारें ही अपनी जवाबदेही एक-दूसरे पर थोपेंगी तो भला उस विभाग के कर्मचारी या अधिकारी अपनी जवाबदेही कैसे तय करेंगे। ऐसे मामलों के प्रति सियासत से ऊपर उठकर नीतियां तैयार करने और उन पर पूरी जवाबदेही के साथ अमल करने की जरूरत है। कोई जांच या कोई मुआवजा उन लोगों को वापस नहीं ला सकता, जो हमेशा के लिए अपनों को छोड़ गए हैं।

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