शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

भारत बंद के निहितार्थ : दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित लेख



राष्ट्र की कीमत पर ना हो विरोध

यू.पी.ए सरकार की मजदुर विरोधी नीतियों के खिलाफ देश के लगभग दो दर्जन व्यापारिक संगठनो द्वारा शुरू की गयी दो दिवसीय हड़ताल में प्रदर्शनकारियों द्वारा  उत्तरप्रदेश एवं हरियाणा राज्यों में कई जगहों पर हिंसक उत्पात मचाना सरकार के खिलाफ एक सफल भारत बंद की धार को कुंद करने वाला कृत्य रहा ! इसमें कोई दो राय नहीं कि इस मुल्क में आंदोलन एवं प्रदर्शन की आजादी सबको है और सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ जनता को सडक पर आना भी चाहिए ! मगर संविधान द्वारा प्राप्त विरोध की आजादी के दायरों एवं उसकी शुचिता की समझ रखे बिना ही अगर जनता भीड़ के रूप में सडकों पर उतरने लगे तो विरोध-प्रदर्शन के मूल उद्देश्यों को प्राप्त करने की बजाय विरोध-प्रदर्शन एक दिशाहीन पथ की तरफ  भटक  जाता है और इसका सबसे ज्यादा नुकसान उस विरोध-प्रदर्शन के निहिति लक्ष्यों को ही झेलना पड़ता है ! व्यापारिक संगठनों के आह्वान पर हुए दो दिवसीय भारत बंद का पहला ही दिन हिंसा कि भेंट चढ़ जाना  प्रदर्शनकारियों की इसी अपरिपक्वता एवं समझहीनता की मिसाल प्रस्तुत करता है ! इस तरह के आंदोलन या प्रदर्शन करने वाले लोग अक्सर इस बात का बिलकुल ख्याल नहीं रखते कि जिस प्रकार सरकार की अपनी गलत या सही नीतियां होती हैं जिनका वो विरोध करने जा रहे हैं, ठीक उसी प्रकार आंदोलनों एवं प्रदर्शनों की भी कुछ नीतियां होती हैं ! संविधान के मानकों से इतर जाकर कोई भी आंदोलन या विरोध-प्रदर्शन अपने उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर सकता है ! प्रदर्शन के नाम पर मचाये गए इस भारी उत्पात के बाद लोकतांत्रिक नजरिये से दो बातें गौर करने वाली हैं जिनको इस आंदोलन के संबंध में बारीकी से समझने की जरुरत है ! पहली बात ये है कि अगर किसी भी संगठन द्वारा आंदोलन का आह्वान किया जाता है तो यह जरुर देखा जाना चाहिए कि उस आंदोलन से किस स्तर पर आम लोग या उस संगठन के लोग जुड़ रहे हैं ! अगर भारी संख्या स्वत: लोगों का समर्थन आंदोलन को नहीं मिल पाया इसका सीधा अर्थ यह है कि या तो संगठनों द्वारा अपनी बात को लोगों तक पहुचाया नहीं जा सका है यह लोग उस  विरोध में कोई रूचि नहीं दिखा रहे हैं ! ट्रेड यूनियन द्वारा घोषित इस हड़ताल को इस नजरिये से भी असफल माना जा सकता है कि इनके पूर्व आह्वान के बावजूद बड़ी संख्या में मजदुर वर्ग अपनी कंपनी में पहुँचे और लगभग  सारी छोटी बड़ी दुकाने खुली रहीं ! आम जन के समर्थन के अभाव में संगठनो के कार्यकर्ताओं के बूते खड़े किये गए बड़े स्तर के इस बंद प्रदर्शन ने अपनी सफलता दिखाने के अंधउत्साह में  पुरे मामले को हिंसा का रूप दे दिया ! किसी भी सरकार के नीति के खिलाफ प्रदर्शन में जनाधार दो पक्षों में बटा होता है ! एक पक्ष  के रूप में सरकार खुद होती है जो  जनता के बीच से चुनकर आई है और दूसरा जनधार उसका  होता है जो विरोध कर रहा होता है ! समझने वाली बात ये है कि आखिर हिंसा और जबरदस्ती के बूते अगर आप जनाधार दिखाने की कोशिश करते हैं तो यह बेहद अलोकतांत्रिक आंदोलन कहलायेगा जिसका लोकतंत्र के सिद्धांतों में कोई स्थान नहीं है ! दिल्ली से सटे नोएडा में कमोबेश यही स्थिति रही ! प्रदर्शन के आह्वान के बावजूद नोएडा के विशेष आर्थिक जोन की हजारों कंपनियों के उत्पादन सेवा में कर्मचारियों का असहयोग नहीं होना इस बात की पुष्टि करता है कि आम मजदुर वर्ग का स्वत: जनसमर्थन इस भारत बंद को नहीं था वरना लोगों द्वारा कम से कम बंद के समर्थन में दफ्तर के कार्यों को बायकाट तो जरुर किया गया होता ! ना दुकाने बंद रहीं ना कंपनियां बंद रहीं ना निजी ट्रांसपोर्ट बंद रहे और ना ही आम मजदुर वर्ग ही इस भारत बंद से जुड़ा ! अंतत: प्रदर्शन का जनाधार कमजोर पड़ने लगा और इस स्थिति में प्रदर्शन का हिंसक होना स्वाभाविक था ! लोकतान्त्रिक मूल्यों के आधार पर प्रदर्शनों को भी  बिना परिभाषित किये नहीं छोड़ा जा सकता और विरोध-प्रदर्शनों के जनाधार का भी मूल्यांकन किया जाना चाहिए ! जनाधार के मूल्यांकन की बुनियाद पर  अगर उत्तरप्रदेश आदि राज्यों में इस भारत बंद का असर देखें तो यह बेहद असफल विरोध कहा जा सकता है ! इस बावत गौर करने वाली बात ये भी है कि कलकत्ता आदि के अलावा जहाँ-जहाँ भी इस भारत बंद  को जनता का स्वस्फूर्त  समर्थन मिला है वहाँ से  किसी भी तरह की  हिंसात्मक वारदात की खबरें नहीं आई है !  
      अगर इस भारत बंद के हासिल के नाम पर देखें तो निश्चित तौर पर यह प्रदर्शन  सरकार के लिए चिंता का सबब जरुर बना मगर इसका ये कतई अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि इसके उद्देश्यों में को बड़ी कामयाबी हासिल हुई है ! इस पुरे प्रदर्शन को संगठनात्मक समर्थन तो व्यापक मिला मगर आम समर्थन का अभाव रहा ! बैंकों के एक बड़े यूनियन द्वारा इस विरोध प्रदर्शन को समर्थन दिये जाने की वजह से बेशक बैंकिंग सेवाएं ठप रहीं और आर्थिक रूप से इसका काफी प्रभाव पड़ा लेकिन ठप हुए बैंकिंग सेवाओं के प्रभावों को आंदोलन की सफलता के निहितार्थ में देखना कतई प्रासंगिक नहीं प्रतीत होता ! हमें नहीं भूलना चाहिए कि इस बंद से हुए लगभग अनुमानित 26 हजार करोंड़ के नुकसान की भरपाई भी आज नहीं तो कल इसी मजदुर वर्ग को करनी पड़ेगी ! ऐसे में बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या हिंसा और उत्पात के बूते अपनी शक्ति प्रदर्शन को अपना लोकतांत्रिक अधिकार समझना लोकतंत्र के नजरिये से ठीक कदम कहा जा सकता है ? सवाल ये भी है कि हिंसात्मक प्रदर्शन के दौरान हुई छतिपूर्ति की जिम्मेदारी क्या उन ग्यारह व्यापारिक संगठनो द्वारा ली जायेगी जो इस प्रदर्शन को अत्यंत अभूतपूर्व एवं सफल मान रहे हैं ? मजदूरवर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे इन संगठनो को क्या इस बात का भान नहीं है कि इस पुरे फसाद के बाद जिस समुदाय को सबसे ज्यादा परेशानी उठानी पड़ी वो मध्यम तबके से आने वाला मजदुर  वर्ग ही है ! हिंसा और फसाद के रास्ते बिना किसी नीतिनिर्धारण के यूँ ही भारत बंद जैसे नुकसानदायक विरोध प्रदर्शन रख देने मात्र से भला क्या हासिल हुआ इसका कोई जवाब ना तो उन संगठनो के पास ही है और ना ही किसी और के पास ! काम-काज ठप कर हड़ताल कर देने को विरोध का प्राथमिक  हथियार नहीं माना जा सकता है और गौर करना होगा कि विरोध प्रदर्शन के  हडताली हथकंडों पर  अदालतें भी सख्त ही रहीं हैं ! अगर वाकई इन संगठनो के कार्यकर्ताओं अथवा विभागीय कर्मचारियों को लग रहा है कि उनके साथ हो रही ज्यादती चरम पर है और हड़ताल के सिवा कोई चारा नहीं है तो उन्हें अनिश्चितकालीन बंद पर जाना चाहिए बजाय  कि दो दिवसीय और  एक दिवसीय बंद की सियासत का हिस्सा बनने के  ! संगठनात्मक रूप से जब भी कोई बंद या प्रदर्शन बुलाया जाता है तो वो राजनीति से प्रेरित होता है और ट्रेड यूनियन के इस हड़ताल को भी सियासत से परे नहीं रखा जा सकता !  किसी भी विरोध प्रदर्शन का हिंसात्मक होना ना तो प्रदर्शन और ना ही लोकतंत्र के लिए ही बेहतर कहा जा सकता  है ! हिंसात्मक आंदोलन महज उत्पातियों को पनाह देने के अवसर के तौर पर इस्तेमाल होते रहे  हैं और प्रदर्शन में जितनी ज्यादा हिंसा होगी सरकार पर जवाबदेही का दबाव उतना ही कम होगा ! अत: किसी भी विरोध प्रदर्शन की सबसे बड़ी मजबूती यह है कि वो कितना नियंत्रित एवं लक्ष्योंमुख है और सरकार पर अपना असर छोड़ पाने में कितना  कामयाब रहा है ! कम से इस बंद के बाद इतना तो कहा ही जा सकता है कि यू.पी एवं हरियाणा जैसे राज्यों में हड़ताल का असर कम और हिंसा का असर ज्यादा रहा जो कि सरकार को सुकुन देने वाला है ! क्योंकि, बंद का असर सरकार पर दबाव बनाता है जबकि हिंसा का दबाव महज पुलिस-प्रशासन पर होता है ! 
शिवानन्द  द्विवेदी सहर 

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