रविवार, 10 मार्च 2013

दवा परीक्षण का अवैध धंधा : जनसत्ता में कवर पेज पर प्रकाशित मेरी फुल पेज स्टोरी



दवाओं के अवैध परीक्षण पर मेरी यह विस्तृत रिपोर्ट 10 मार्च-13 के जनसत्ता में रविवारी के कवर पेज प्रकाशित हुई है !



शिवानन्द द्विवेदी सहर

स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के निवारण के लिए दवाइयां जितनी आवश्यक होती हैं अगर दवाइयों का इस्तेमाल गलत ढंग से होने लगे तो उतनी ही जानलेवा भी साबित होती हैं ! 2005 से लेकर 2012 तक पिछले सात सालों में दवाइयों के परीक्षण को लेकर सरकारी हीला-हवाली एवं लोगों के सेहत से खिलवाड़ किये जाने सम्बन्धी जो पुख्ता आंकड़े प्राप्त हुए हैं वो ना सिर्फ चौकाने वाले हैं बल्कि स्वास्थ्य और सेहत को लेकर केन्द्र एवं राज्यों की सरकारों एवं सम्बंधित  विभागों के लापरवाहीं की पोल खोल रहे हैं ! स्वास्थ्य मामलों  पर काम करने वाली एक गैर सरकारी संस्था की पहल पर ड्रग्स नियंत्रक कार्यालय द्वारा उपलब्ध कराई गयी जानकारी के मुताबिक़ भारत में ड्रग्स ट्रायल क़ानून 2005 संशोधन लागू होने के बाद जनवरी 2005 से लेकर जून 2012 के बीच कुल 475 नए रासायनिक तत्वों से बनी दवाओं के परीक्षण की इजाजत दी गयी है  ! बताना जरूरी होगा कि नए दवाओं का परीक्षण सबसे ज्यादा जोखिम भरा परीक्षण होता है जिसके अत्यंत गंभीर परिणाम आने का डर रहता हैं ! इन 475 दवाओं के परिक्षण के लिए कुल 57,303 मरीजों के समूह को लिया गया जिनमे अबतक 39,022 मरीजों का परीक्षण काल पूरा हो चुका है जबकि 18,281 मरीज अभी भी अंडर क्लिनिकल ट्रायल हैं !475 दवाओं के परिक्षण और 39,022 मरीजों के इस्तेमाल के बाद मात्र 17 दवाओं को बाजार में उतारने की अनुमति प्राप्त हो पाई है जबकि शेष बहुत सारी दवाओं को मरीजों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक माना गया हैं ! पिछले पाँच सालों में चले इन दवाओं के परीक्षणों के दौरान कुल 2644 लोगों की मौत हुई जिनमे 80 लोगों के मौत की आधिकारिक पुष्टि दवाइयों के नाकारात्मक असर के कारण की गयी है ! हालाकि शेष लोगों की मौत किन वजहों से हुई है यह अभी सवालों के घेरे में हैं और इसके जांच की मांग स्वास्थ्य पर काम करने वाले तमाम संगठनों द्वारा की जा रही है ! इन संगठनो का दावा है कि अगर निष्पक्ष  जाँच किया जाय तो परीक्षण के दौरान मरे तमाम लोगों के मृत्यु की वजह के रूप में  दवाइयों का नाकारत्मक असर ही कारण के रूप आएगा जिसे दवा कंपनियों एवं डाक्टरों द्वारा छुपाया जा रहा है ! इन 475 दवाओं के परीक्षण के दौरान कुल 11975 लोग तमाम तरह की प्रतिकूल स्वास्थ्य समस्याओं के शिकार पाए गए जिनमे 506 लोगों के स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के पीछे परीक्षण के दौरान इस्तेमाल दवाओं को कारण बताया गया ! हलाकि यह भी जांच का विषय है क्योंकि जांच के बाद 506 के इस आंकड़े में भारी इजाफा भी होने की संभावना जताई जा रही है !ज्ञात हो कि इस मामले पर राज्यसभा में भी सवाल पूछे जा चुके हैं एवं स्वास्थ्य मामलों की संसदीय समिति की रिपोर्ट भी जारी की जा चुकी है जिसमे दवाओं के परीक्षण में हुई भारी स्तर पर लापरवाही  को देखा गया है !
            भारत में मरीजों पर दवाओं के परिक्षण के दौरान मृत्यु होने की दशा में अथवा  स्वास्थ्य क्षतिपूर्ति के संबंध में पीड़ित पक्ष को मुआवजा दिये जाने एवं  वीमा कराये जाने  सम्बन्धी  कोई ठोस क़ानून ना होने की वजह से अभी तक मात्र 40 मृतकों के परिजनों को दवा कंपनियों द्वारा मनमाने ढंग से औनी-पौनी राशि मुआवजे के तौर पर दी गयी  है ! औषधि एवं प्रसाधन क़ानून 1945  में संशोधन प्रस्ताव 2005 लाये जाने के बावजूद परिक्षण के दौरान सबसे ज्यादा खतरे के घेरे में रहने वाले मरीजों के मुआवजे एवं वीमा आदि के संबंध में कोई ख्याल नहीं रखा गया !जिन गिने-चुने मरीजों के नाम मुआवजे की राशि दी भी गयी तो उस राशि एवं उन्ही दवा कंपनियों द्वारा अन्य देशों में पीडितों को दी जाने वाली मुआवजा राशि में भारी दोहरापन का रवैया कंपनियों द्वारा बरता गया   ! 2011 में जिस कंपनी ने दवा परिक्षण के दौरान हुई एक स्त्री की मौत के मुआवजे के तौर पर नाइजीरिया में लगभग अस्सी लाख रुपये का  मुआवजा दिया उसी कंपनी ने भारत में हुई एक मौत पर मात्र ढाई लाख रुपये मुआवजे के तौर पर दिया ! मुआवजे कि राशि को लेकर ठोस कानूनी प्रावधान ना होने की वजह से दवा कम्पनियाँ अपने मनमाने कीमतों पर जिंदगियों का  सौदा करती  रही हैं ! कानूनी तौर पर लचर एवं दवा कंपनियों के अनुकूल प्रावधान होने की वजह से ही दवाओं के परिक्षण के नजरिये से विदेशी दवा कंपनियों द्वारा बड़ी संख्या में भारत का रुख किया जा रहा है !475  नए रसायनों के अलावा लगभग 1500 अन्य दवाओं का परिक्षण वैध एवं अवैध तरीके से देश के तमाम अस्पतालों एवं संस्थानों में किया जा रहा है ! स्वास्थ्य के खतरों से बेपरवाह स्वास्थ्य मंत्रालय भी अभी तक इस मसले पर चुप्पी ही साधे हुआ था ! फिलहाल सर्वोच्च न्यायलय के समय-समय पर किये जाते रहे हस्तक्षेप के बाद यह मामला स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिवों के हाथ पहुँच सका  है !हाल ही में सम्बंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए 30 जनवरी 2013 को माननीय सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर.एम लोढा एवं न्यायमूर्ति आर दवे की खंड्फीठ द्वारा दिये गए सख्त निर्देश में यह कहा गया है कि हर तरह के दवा परीक्षण स्वास्थ्य सचिवों की देख-रेख में ही किये जाए एवं मरीजों को इस बात से पहले ही अवगत कराया जाय कि उनके ऊपर उक्त दवाओं का परीक्षण किया जा रहा है ! मरीज को यह बताना अनिवार्य होगा कि उक्त दवा के परिक्षण से उसके स्वास्थ्य पर किस तरह के नाकारत्मक प्रभाव के पड़ने की संभावना है ! साथ ही मरीज का स्वास्थ्य वीमा लेना अनिवार्य होगा ! इस मसले पर सख्त होते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने इन नियमों का उलंघन करने वालों पर 5 से 10 साल की कैंद का प्रावधान रखा है  ! लेकिन सवाल ये है कि नियमों को ताक पर रख कर पिछले सात  सालों में जिन पचासों हजार मरीजों के साथ छलावा हुआ है उनकी भरपाई कैसे की जायेगी ?
            कम से कम आंकड़े तो यही बताते हैं कि दवाओं के परीक्षण को लेकर भारत एक बेहद खतरनाक प्रयोगशाला बनता जा रहा है जहाँ मानव शरीर का इस्तेमाल मशीनों की तरह किया जा रहा है !लोगों के स्वास्थ्य एवं जीवन से बेपरवाह इन दवा कंपनियों द्वारा चिकित्सकों की मिली-भगत से  आजतक ना जाने कितने उन  लोगों को अपना प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष शिकार बनाया होगा,इसका कोई आंकड़ा किसी के पास मौजूद नहीं है ! आंकड़ों से जुदा ना जाने कितने लोग ऐसे होंगे जो दवाओं के अवैध परीक्षण के कारण अपनी जान से हाथ धो बैठे होंगे और ना जाने कितने स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से आज भी ग्रसित जीवन जीने को मजबूर होंगे  ! तमाम आधिकारिक सूत्रों से प्राप्त दवाओं के परीक्षण सम्बन्धी इन आंकड़ों को अगर बारीकी से समझने की कोशिश की जाय तो तमाम तरह के सवाल उभर कर सामने आते है ! बड़ा सवाल ये है कि जिन दवाओं की कोई जरुरत नहीं है उन दवाओं के परीक्षण की इजाजत ही क्यों दी गयी और अगर कुछ जरूरी परीक्षण की इजाजत दी भी गयी तो उसके पुख्ता नियामक क्यों नहीं तय किये गए ? दवाओं के परीक्षण के दौरान इन सात सालों में लोगों को अँधेरे में रखकर उनके स्वास्थ्य एवं जीवन से जमकर खिलवाड़ किया गया हैं ! प्राप्त आंकड़ों को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि अगर इस पुरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाय तो तमाम लोग गैर-इरादतन हत्या,भ्रष्टाचार सहित अन्य कई मामलों में दोषी पाए जायेंगे ! इस पुरे मामले के हर पहलू पर गंभीर जांच होनी ही चाहिए !
क्या है दवा परिक्षण प्रक्रिया की खामियां
सामान्यतया ऐसे रसायन जिनका आविष्कार पहले कभी नहीं हुआ उन दवाओं का परीक्षण सबसे अधिक जोखिम भरा होता है ! ऐसी दवाओं के खतरों के कारण दुनिया के तमाम विकसित  देश इन दवाओं के  परीक्षण की इजाजत नहीं देते लेकिन भारत में ऐसी दवाओं का परीक्षण भी धड़ल्ले से हो रहा है ! इन दवाओं का परीक्षण मूलतया चार चरणों में किया जाता है ! प्रथम चरण में इन दवाओं के जहरीले ना होने का परीक्षण जानवरों पर किया जाता है उसके बाद द्वितीय चरण में कुछ मरीजों के ऊपर इन दवाओं का परीक्षण किया जाता है ! तीसरे चरण में इन दवाओं का परीक्षण बड़ी संख्या में लोगों पर किया जाता है फिर अंतिम चरण में इन दवाओं का परीक्षण हजारों की संख्या में लोगो पर किया जाता है !कानूनी लचरता के कारण प्रथम चरण से लेकर तीसरे चरण तक के परीक्षण भारत में अन्य देशों की तुलना में ज्यादा आसानी से संभव हो पाते है ! इन परीक्षणों के दौरान परीक्षकों द्वारा विविध प्रकार की जनजातियों एवं बीमारियों वाले भौगोलिक क्षेत्रों के मानकों को दरकिनार कर रखा जाना इन परीक्षणोंको और जोखिम भरा बनाते हैं ! विशेषज्ञों की राय में ऐसा बताया गया है कि जो दवा मंगोल जनजाति के मरीजों के लिए उपयुक्त साबित हुई है  कोई जरूरी नहीं है कि वही दवा द्रविण समुदाय के लोगों के लिए भी उपयुक्त होगी !आश्चर्यजनक ढंग से इंदौर के महात्मा गाँधी चिकित्सा महाविदद्यालय में शिशु रोग विशेषज्ञ द्वारा लगभग 2700लडकियों पर ह्यूमन पेपलिना वायरस की दवा को आजमाया गया जबकि इस प्रदेश में यह बीमारी अस्तित्व में ही नहीं है ! जिन बीमारियों का कोई अस्तित्व ही नहीं है या उनके अन्य उपचार उपलब्ध हैं वहाँ नए प्रयोगों को करना स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ नहीं तो और क्या है ?



परीक्षण में लापता बच्चों का इस्तेमाल
इसी मामले को अगर एक अन्य समस्या के साथ जोड़कर देखा जाय तो पिछले पाँच सालों में कई हजारों की संख्या में गरीब तबके के बच्चे अगवा किये गए हैं ! ऐसे बच्चों को अगवा कर अथवा बहला-फुसला कर इनके ऊपर दवाओं का अवैध तरीके से परीक्षण किये जाने की संभावना तमाम संगठनों द्वारा जताई जाती रही है ! गरीब तबके के अनपढ़ अथवा अशिक्षित बच्चों  को बहला-फुसला कर एवं थोड़े बहुत रुपयों का लालच देकर भी इस तरह के कार्यों को अंजाम दिया जाता  रहा है ! दवाइयों के परिक्षण में इन मासूमो का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जा रहा है,इस संभावना को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता ! लापता हो रहे बच्चों पर काम करने वाली एक गैर सरकारी संस्था ने ऐसा अंदेशा जताया है कि आधिकारिक  आंकड़ों के अलावा चल रहे  देश में  अन्य सक्रिय अवैध  दवाओं के परीक्षण केन्द्रों पर इन्ही मासूमो को मशीन की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है ! बच्चों के स्वास्थ्य के नजरिये से यह बेहद खतरनाक है !
अवैध कमाई कर रहे डाक्टर
बेशक दवाइयों के परिक्षण में जिंदगी को जाने-अंजाने दाँव पर लगा रहे मरीजों के हाथ कुछ आये ना आये लेकिन डाक्टर्स की जेबें लागातार मोटी हो रहीं हैं ! भारत में दवाइयों के परिक्षण का कुल कारोबार लगभग 2500 करोंड़ के आस-पास पहुँच चुका है ! आर्थिक अपराध ब्यूरो द्वारा दी गयी रिपोर्ट में जो बताया गया है वो सीधे तौर पर इस पुरे मामले में डाक्टरों की मिलीभगत की पुष्टि करता है ! रिपोर्ट में बताया गया गया है कि मध्यप्रदेश के इंदौर में अलग-अलग अस्पतालों में 3202 मरीजों पर दवाओं का परिक्षण बिना उनको इस परिक्षण से अवगत कराये पाँच चिकत्सकों द्वारा किया गया जिसके एवज में दवा कंपनियों द्वारा कुल 3 करोंड़ 57 लाख रुपये की धनराशि उन चिकत्सकों के निजी खातों में दी गयी ! बिना बताये किये गए इन परीक्षणों में कुल 81 मरीजों में से कुछ को दवाओं के दुष्प्रभावों के चलते जान से हाथ धोना पड़ा और कुछ स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रसित हैं ! हैरानी की बात ये है कि दवाओं के परिक्षण के नाम पर करोंडों की उगाही करते इस चिकित्सकों की जेबें तो कंपनियों द्वारा खूब गरम की जा रहीं हैं  लेकिन पीडितों को अभी तक मुआवजे के नाम पर कुछ भी नहीं मिल सका है ! जिन पाँच डाक्टरों ने इन मरीजों पर परिक्षण किया उनमे से एक चिकित्सक एथिक्स कमेटी के ज्वाइंट सेक्रेटरी रह चुके हैं और एक विभागाध्यक्ष के पद पर तैनात रहे हैं !इन चिकित्सकों पर अभी तक कोई कार्यवाई नहीं हो सकी है !
कब-कब हुईं कितनी मौतें
2007  में परीक्षण के दौरान 137 मरीज मरे
2008 में परीक्षण के दौरान 288 मरीज मरे
2009 में परीक्षण के दौरान 637 मरीज मरे
2010 में परीक्षण के दौरान 671 मरीज मरे
2011-12 में परीक्षण के दौरान 911 मरीज मरे 



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें