आजादी के बाद की भारतीय केंद्रीय राजनीति में राजनीतिक दलों के उद्दभव एवं उनके प्रभावों को दो काल-खण्डों में विभाजित करके ज्यादा बेहतर समझा जा सकता है !राजनीति का वो भी एक दौर था जब कांग्रेस सत्ता में थी और सदन में विपक्ष के नाम पर महज गिने-चुने कुछ नाम दिखते थे जबकि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियां उस दौर के बिलकुल विपरीत नजर आती हैं ! आज 203 लोकसभा सीट जीत कर देश की सबसे बड़े राजनीतिक पार्टी के रूप में सत्ता में बैठी कांग्रेस को मात्र 18 लोकसभा सीट जीतने वाली डीएमके द्वारा आँखे क्या दिखाई जाती हैं कि केन्द्र सरकार के तीन-तीन शीर्षस्थ मंत्रियों को डीएमके प्रमुख की मान-मनौवल करने उनके दरवाजे तक जाना पड़ जाता है ! हालाकि डीएमके द्वारा समर्थन वापस लिए जाने के ऐलान से सरकार के संख्या बल पर कोई ऐसा संकट नहीं आ रहा है जिससे उसका बहुमत प्रभावित हो रहा हो,क्योंकि सरकार को यू.पी की दो बडे राजनीतिक दलों का बाहर से समर्थन प्राप्त है ! इसलिए डीएमके प्रमुख के मान-मनौवल के लिए तीन-तीन मंत्रियों के जाने को सरकार बचाने की चिंता के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए ! इस पुरे मान-मनौवल के राजनीतिक मायने बहुत दूरगामी हैं ! कांग्रेस सहित सभी दलों को इस बात का बखूबी अंदाजा है कि केन्द्र की राजनीति में सत्ता के समीकरण अब क्षेत्रीय दलों एवं उन दलों के क्षत्रपों की भूमिका के बिना किसी भी राष्ट्रीय दल के बनते नहीं दिख रहे ! भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का व्यापक प्रभाव कायम हुए अभी दो दशक ही हुए हैं लेकिन इन दो दशकों में ही क्षेत्रीय दलों के क्षत्रपों एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने दिल्ली की राजनीति को काफी प्रभावित किया है ! नब्बे के दशक के अंतिम दौर में अटल बिहारी वाजपेयी के नतृत्व में 24 छोटे-बड़े दलों को जोड़कर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बनाया गया एवं सत्ता का समीकरण तैयार किया गया ! एनडीए के गठन को केन्द्र की राजनीति में क्षेत्रीय दलों के हस्तक्षेप की शुरुआती कड़ी के रूप में देखा जा सकता है ! हालाकि ऐसा नहीं कहा जा सकता है नब्बे के दशक से पहले क्षेत्रीय दलों का कोई अस्तित्व ही नहीं था या उनकी किसी राज्य में सरकार नहीं थी ! उस दौर में पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार बन चुकी थी एवं दक्षिण के राज्यों में भी क्षेत्रीय राजनीतिक दल उभर कर सामने आने लगे थे ! मगर इस बात से भी गुरेज नहीं होनी चाहिए कि नब्बे के दशक अथवा एनडीए के गठन से पहले केंद्रीय राजनीति में इन दलों का हस्तक्षेप बहुत प्रभावी नहीं था ! वर्तमान राजनीति के प्रभावी क्षेत्रीय दलों पर अगर नजर डाले तो एन.सी.पी और तृणमूल कांग्रेस जैसे क्षेत्रीय दल तो ऐसे हैं जो नब्बे के दशक के अंतिम दौर में कांग्रेस से ही अलग होकर बने और आज केन्द्र की राजनीति का अहम हिस्सा साबित हो रहे हैं ! एनडीए का गठन एक तरह का ऐसा राजनैतिक बदलाव था जिसमे राज्यों की राजनीति में सिमटे लोक जनशक्ति पार्टी जैसे तमाम क्षेत्रीय दलों के क्षत्रप भी एनडीए का हिस्सा बनकर केन्द्र की सियासत करते नजर आये ! नब्बे के दशक में ही उत्तरप्रदेश के दो बड़े राजनीतिक दल संगठनात्मक रूप से सशक्त होकर उभरे और वर्तमान राजनीति में दोनों ही यू.पी.ए सरकार के खेवनहार बने हुए हैं ! क्षेत्रीय दलों के केंद्रीय हस्तक्षेप एवं राजनीतिक उत्थान के नजरिये से नब्बे का दशक बहुत महत्वपूर्ण रहा है ! हालाकि गठबंधन के नजरिये से अगर देखा जाय तो नरसिम्हा राव सरकार में भी कुछ दलों का वाह्य समर्थन कांग्रेस द्वारा लिया गया था ! लेकिन केंद्रीय राजनीति में घटकों का कोई पहला संगठनात्मक ढांचा पहली बार एनडीए के तौर पर ही सामने आया !नए राजनीतिक दलों के अस्तित्व में आने के नजरिये से नब्बे का दशक भारतीय दलीय प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण काल कहा जा सकता है ! उसी दौर में कांग्रेस में टूट पैदा हुई और ममता बनर्जी एवं शरद पवार जैसे नेता अलग होकर अपना राजनीतिक दल बनाये और आज वर्तमान की केंद्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए हैं ! वर्तमान केंद्रीय राजनीति में इन तमाम क्षेत्रीय दलों का प्रभाव समय-समय पर दिखता भी रहता है ! आजाद भारत में दलीय व्यवस्था के आधार पर विभाजित दो काल-खंडों के बीच का बड़ा फर्क यही है कि पहला काल-खण्ड एकदलीय राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह एवं आंदोलनों का रहा है जबकि दूसरे कालखंड में बहुदलीय राजनीति व्यवस्था सशक्त रूप से केंद्रीय राजनीति में अपना हस्तक्षेप कर रही है !
भारतीय राजनीति में पिछले दो दशकों में तेजी से विकसित हुए क्षेत्रीय दलों के प्रभाव के कारणों का जायजा लिया जाय तो कई कारण नजर आते हैं ! कहीं ना कहीं आपातकाल के कारण देश की जनता के मन में सत्ता के विकेन्द्रीकरण की समझ विकसित हुई ! सत्ता के केन्द्रीयकरण से असंतुष्ट जनता के बीच तत्कालीन कांग्रेस सरकार की मनमानी रास नहीं आई और परिणामत: क्षेत्रीय दलों के प्रति जनता ने भरोसा दिखाना शुरू किया ! इस संदर्भ में अगर यू.पी एवं बिहार में क्षेत्रीय दलों के प्रादुर्भाव को ही देखें तो यू.पी में दलित बहुजन का मुद्दा लेकर दलित वोटर्स का ध्रुवीकरण करने के लिए कांशीराम आगे आये तो वहीँ यादव-पिछड़ा-मुस्लिम वोटर्स के एजेंडे पर मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी का जन्म हुआ ! यू.पी में नवगठित इन दोनों राजनीतिक दलों ने कांग्रेस के वोटबैंक में ही सेंध लगाईं और समय पडने पर राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में कांग्रेस के खिलाफ लामबंद भी हुए ! वहीँ बिहार में लालू प्रसाद यादव ने मुस्लिम-यादव समीकरण तैयार कर कांग्रेस और वामपंथ की जमीं खिसका दिया ! राज्यों के स्थानीय मुद्दों पर स्थानीय सियासत करने एवं जातिगत आधार पर एजेंडा तय करने का यह फार्मूला क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के विकास की वजह बना ! कभी कांग्रेस के धुर समर्थक रहे दलित और मुस्लिम आजकल यू.पी में कांग्रेस से बहुत दूर हो चुके हैं ! कमोबेश यही हालात राष्ट्रीय दलों का बिहार में भी है क्योंकि बिहार में नितीश के साथ गठबंधन के कारण ही भाजपा ठीक स्थिति में नजर आती है !
क्षेत्रीय क्षत्रपों को केंद्रीय राजनीति में अपनी हैसियत का अंदाजा बखूबी है तभी तो बिहार से आकर नितीश कुमार दिल्ली में अधिकार रैली करते हैं और यह कहते हैं कि जो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देगा दिल्ली उसी की होगी ! नितीश के इस बयान को केवल कांग्रेस नहीं बल्कि भाजपा पर भी चलाये गए निशाने के तौर पर देखा जाना चाहिए ! नितीश ने अपनी क्षमता का आकलन करते हुए ही कहा कि देश की दोनों राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों में किसी को सरकार बनाने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होगी ! वहीँ दिल्ली तख़्त को अक्सर घुडकी देते रहने वाले मुलायम सिंह यादव का केंद्रीय राजनीति में हस्तक्षेप तो अक्सर दिखता रहता है ! वहीँ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का केंद्रीय राजनीति में हस्तक्षेप तो कई अहम राष्ट्रीय मुद्दों को प्रभावित करता रहा है ! बेशक ममता बनर्जी अभी यू.पी.ए से बाहर हैं लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा एवं कांग्रेस दोनों राजनीतिक गठबंधनो की नजर उनपर भी बनी हुई है ! केंद्रीय राजनीति में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का प्रभाव अब इतना बढ़ चुका है कि अक्सर तीसरे मोर्चे तक की बात सरकार बनाने के लिए उठती रहती हैं ! आजादी के अंतिम तीन दशकों की राजनीति में क्षेत्रीय मुद्दों एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के साथ-साथ क्षेत्रीय क्षत्रपों की ताकत भी बढ़ी है ! इसका सबसे बड़ा उदाहरण यू.पी विधानसभा चुनाव में देखने को मिल चुका है जहाँ राष्ट्रीय दलों के प्रमुख क्षत्रप के रूप में बेनी प्रसाद वर्मा,सलमान खुर्शीद योगी आदित्यनाथ सहित कई क्षत्रपों की मुश्किलें बढ़ी हैं ! वर्तमान भारतीय राजनीतिक परिवेश को देखते हुए इतना कहा ही जा सकता है कि आजाद भारत के अंतिम तीन दशकों का दौर बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था के विकास वाला रहा है !
शिवानन्द द्विवेदी सहर

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