गुरुवार, 21 मार्च 2013

पानी को लेकर इतनी लापरवाही क्यों : नई दुनिया राष्ट्रीय में मेरा सम्पादकीय लेख



22 मार्च-13


समूची दुनिया में प्राणीमात्र की तमाम मूलभूत जरुरतों में जल की अनिवार्यता सबसे महत्वपूर्ण  मानी गयी है ! शायद इसीलिए जल को जीवन से सीधे तौर पर जोड़ कर देखा जाता रहा है ! समूचे ब्रह्माण्ड में वैज्ञानिकों द्वारा जहाँ भी जीवन की संभावनाओं को तलाशने का प्रयास किया जाता है वहाँ सबसे पहले जल और ऑक्सीजन के अस्तित्व को खोजने की बात की जाती  रही  है ! जीवन के लिए धरती को सबसे अनुकूल माने जाने के पीछे की महत्वपूर्ण वजह यह है कि यहाँ जल की कोई कमी नहीं है और पूरी दुनिया का लगभग तीन हिस्सा जल ही जल है ! भौगोलिक दृष्टिकोण से बेशक धरती पर जल का अपार भण्डार है मगर इसका कतई ये मतलब नहीं है कि समूचे जलीय हिस्से को जीवनोपयोगी मान लिया जाय !तमाम परीक्षणों में यह स्वीकार किया गया है कि धरती पर मौजूद लगभग डेढ़ घन किमी जल का मात्र २.७ प्रतिशत जल ही स्वच्छ एवं उपयोगी है और इतने ही जल का उपयोग मानव जीवन से जुड़ी तमाम प्राथमिक जरूरतों की पूर्ति के लिए किया जा सकता है ! जीवनोपयोगी जल की मात्रा सीमित होने के कारण जल संरक्षण को लेकर हमेशा से चिंता जताई जाती रही है !चुकि मानव को जल का सबसे बड़ा उपभोक्ता माना गया है अत: बेलगाम होती विश्व की जनसँख्या का जल की मात्रा पर पडने वाला प्रभाव एवं जनसँख्या के अनुपात में असंतुलित होती जल आपूर्ति,को लेकर भी हमेशा से तमाम भू-शास्त्रियों द्वारा चिंता जताई जाती रही है ! भू-जलस्तर में गिरावट एवं जल-प्रदूषण के साथ-साथ जल की मात्रा में लागातार हो रही कमी आदि को लेकर जिस तरह का अंदेशा पिछले दिनों तमाम भू-वैज्ञानिकों एवं संगठनो द्वारा जताया गया वो कहीं ना कहीं पर्यावरण एवं जीवन के लिए चिंता का विषय है ! भारत के संदर्भ में अगर जल संकट के वर्तमान दृश्यों को आंकड़ों के ग्राफ पर समझने का प्रयास करें तो स्थिति बड़ी ही दयनीय और चिंताजनक नजर आती है ! वर्तमान में देश का कोई भी विकास खण्ड भूजल के दृष्टिकोण से पूर्णतया सुरक्षित नहीं है और लगभग दो लाख से ज्यादा गाँवों में भूजल के स्तर में लागातार गिरावट को देखा गया है ! आजादी के समय यह आंकड़ा महज कुछ हज़ारों में था लेकिन आज यह लाखों में पहुचने लगा है ! पिछले दो दशकों में लगभग ढाई सौ से ज्यादा जिलों में भू-जलस्तर में चार से छ: मीटर की गिरावट हुई है जो गांवों और पिछड़े इलाको के लिए अत्यंत ही चिंता जनक है ! देश के कई हिस्सों में पानी की समस्या इस तरह की है कि वहाँ पानी बेचने की वजह से जलस्तर २० से ३० मीटर तक गिर चुका है !गिरते जलस्तर के परिप्रेक्ष्य में अगर भारत की राजधानी सहित अन्य महानगरों की स्थिति देखे तो  मामला अत्यंत ही चिंता जनक नजर आता है  ! नॅशनल जियोफिसिकल रिसर्च इंस्टिटयुट द्वारा जारी एक रिपोर्ट में ऐसा बताया गया कि दिल्ली,चेन्नई,मुम्बई में भू-जलस्तर लागातार तेजी से गिर रहा है जबकि हैदराबाद की स्थिति और भी नाजुक होती जा रही  है !  भारत में बढ़ती जनसंख्या और जल उपलब्धता के बीच लागातार बढ़ रहे असंतुलन को समझने के लिए ये आंकड़े ही पर्याप्त हैं जिसमे बताया गया है कि जल की उपलब्धता जो पचास के दशक में ५००० घन मीटर प्रति व्यक्ति थी आज १६३२ घन मीटर प्रति व्यक्ति पर आ गयी है ! प्रति व्यक्ति जल के अनुपात में हुई ये गिरावट इस बात की पुष्टि करती है कि हम किस रफ़्तार से जल का क्षय कर रहे हैं !
      जल की कमी के साथ साथ दूसरा बड़ा संकट जल-प्रदुषण का है ! जल-प्रदूषण का आलम यह है कि दुनिया के हर छठे व्यक्ति को स्वच्छ पानी तक मयस्सर नहीं है और उसे दैनिक जीवन में प्रदूषित जल का उपयोग करना पड़ रहा है ! एक आंकड़े में बताया गया है कि दुनिया के आधे बीमार लोग जल जनित बीमारियों के शिकार हैं ! अकेले भारत की लगभग ८०% बीमारियों के लिए प्रदूषित जल को वजह माना जाता  है ! प्रदूषित होते इस जल संकट का कुप्रभाव  मानवों के साथ-साथ जीव-जंतुओं एवं नदियों पर भी व्यापक रूप से पड़ा है ! प्रदूषित जल संकट का ही परिणाम है कि सैकड़ों नदिया बुरी तरह से प्रदूषित होकर समाप्त होने की कागार पर हैं एवं तमाम बीमारियों की वजह बनती जा रही हैं ! मछलियों एवं जलीय जंतुओं की तमाम प्रजातियां तो प्रदूषण के दंश का शिकार होकर समाप्त हो चुकी हैं और कुछ समाप्त होने की कगार पर हैं !जल प्रदूषण के बढते कुप्रभाव ने ना सिर्फ पर्यावरण में जैविक क्षय की स्थिति उत्पन्न की है बल्कि पर्यावरण की धरोहरों को क्षति पहुचाने का काम किया है !यमुना जैसी नदियों में बढ़ता प्रदूषण कहीं ना कहीं पर्यावरणीय धरोहरों के लिए खतरे की घंटी होने के साथ-साथ तटीय शहरी इलाको में बीमारियों का कारण बनती जा रही  हैं !        
जल संरक्षण के बुनियादी तौर-तरीकों का अभाव एवं जनसंख्या के अनुपात में  जल की मात्रा में लागातार हो रही कमी से लेकर जल-प्रदूषण और भू-जलस्तर में गिरावट के प्रति हम जिस तरह से लापरवाह होते जा रहे है वो भविष्य में समूची दुनिया के लिए घातक साबित हो सकता है ! सवाल ये है कि जल जैसी प्राथमिक जरुरत को लेकर हम इतने संवेदनहीन क्यों होते जा रहे हैं ? जिस पानी से हमारा पर्यावरण और हम सभी संचालित है उस पानी को लेकर आखिर हमारे इस बेपानी होते रवैये की वजह क्या है ? दिन-प्रतिदिन विकराल रूप धरते जा रहे इस जल संकट से निजात पाने के लिए हमें कई बिंदुओं पर ठोस उपाय करने की जरुरत है ! सबसे पहले तो हमें जल को संरक्षित करने के उपायों पर बल देना होगा ! हालाकि घनी होती देश की आबादी जल संरक्षण में सबसे बड़ी बाधक साबित हो रही है बावजूद इसके हमें वृक्षारोपण एवं भू-जल के अनुपात नलकूपों के संतुलित निर्माण का रास्ता अख्तियार करने की जरुरत है ! भू-जल की उपलब्धता की अपेक्षा नलकूपों एवं ट्यूबेल की बढ़ती  संख्या भी भू-जल स्तर में गिरावट की एक वजह है ! इस दिशा में हमारे असफल होने की बड़ी वजह यह भी है कि हम मृदा और पानी का दोहन रोकने में लागतार नाकामयाब हो रहे हैं और पानी के बाजार पर नियंत्रण करने को लेकर संवेदनशील नहीं हो रहे !ज्ञात हो कि अकेले भारत में पानी एक बहुत बड़ा कारोबार बनता जा रहा है ! अत: हमें जल दोहन पर नियंत्रण की नीति अपनाने की सख्त जरुरत है ! साथ ही जल स्वच्छता पर भी हमें जागरूक होने की जरुरत है ताकी जल-प्रदुषण पर लगाम कसा जा सके ! सरकार को सबसे पहले अद्द्योगिकीकरण के कारण प्रदूषित हो रहीं नदियों पर ठोस उपाय करने की जरूरत है जिससे कि नदियों के प्रदूषण में  कमी लाई जा सके ! जल की स्वच्छता एवं संरक्षण के प्रति सरकार के साथ-साथ समाज को भी गंभीर होकर अपनी जवाबदेही तय करने की जरुरत है ! जल जीवन से जुड़ा प्रमुख मसला है अत: इसे महज क़ानून और नीति निर्माण से नहीं बल्कि सामाजिक जवाबदेही के द्वारा ही संरक्षित एवं सुरक्षित किया जा सकता है ! हमें याद रखना होगा कि जल संरक्षण के प्रति हम अगर आज गंभीर नहीं हुए तो आगामी दस वर्षों में एक अरब से ज्यादा लोग पानी के अकाल की त्रासदी को झेलने को मजबूर होंगे जो कि ना किसी एक देश बल्कि समूची दुनिया के लिए बहुत बड़ा खतरा है और समूची दुनिया पानी के आगोश में समा जायेगी !

शिवानन्द  द्विवेदी सहर 

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