मंगलवार, 4 जून 2013

कुंठा के तेज़ाब से झुलसती जिंदगी : नई दुनिया नेशनल में मेरा यह लेख





महिलाओं के ऊपर बढ़ रहे एक के बाद एक तेज़ाब हमलो ने एक बार फिर हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है ? दिसम्बर में हुए दामिनी प्रकरण के बाद से ही महिलाओं के सम्मान एवं उनकी सुरक्षा की मांग को देखते हुए सरकार द्वारा कड़े क़ानून की हिमायत की गयी और कुछ कानूनी बदलावों को अमली जामा भी पहनाया गया ! बावजूद इन सबके समाज में बढ़ रहीं इन असामाजिक एवं घृणित घटनाओं में कोई कमी नहीं आती दिख रही है ! विगत दिनों हुए तेज़ाब हमले के दंश को झेल रही प्रीटी राठी ने आखिरकार मुम्बई के एक अस्पताल में दम तोड़ दिया है ! प्रीती कोई अकेली लड़की नहीं है जो हैवानियत के इस कुरूप नजर आते कृत्य का शिकार हुई है बल्कि प्रीती जैसी ना जाने कितनी मासूम और निर्दोष बेटियां हैं जो आये दिन वहशियों के तेज़ाब हमले की शिकार बनती रही हैं और हमारा समाज मूक खड़ा इस तमाशे का तमाशबीन बना हुआ है ! आज सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर तेज़ाब के इस दंश से जान गंवा रहीं बेटियों को सुरक्षा दे पाने में हम क्यों कामयाब नहीं हो पा रहे हैं ? महिलाओं की सुरक्षा के लिए खतरनाक हो चुके तेज़ाब हमले की वारदातों पर हमारी असंवेदनशीलता का सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि अभी तक राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के  पास कुल हो रहे ऐसे वारदातों के पुख्ता आंकड़े तक नहीं है ! दरअसल, तेज़ाब हमलो के आंकड़ों की अनुपलब्धता का सबसे बड़ा कारण यही है कि ऐसे मामलों में अलग क़ानून ना होने की वजह से इस मामलों को अलग तरीके से दर्ज नहीं किया जाता है ! लिहाजा,सबसे बड़ा सवाल ये खडा होता है कि महिलाओं के ऊपर बढ़ रहे इन तेज़ाब हमलों को हमारा क़ानून किस नजर से देखता है ? एक अनुमानित आंकड़े में ऐसा अंदेशा जताया गया है कि प्रत्येक साल लगभग दो सौ के आस-पास महिलाएं तेज़ाब हमले के वहशियों का शिकार होती हैं और उनमे से अधिकांशत: दम तोड़ देती है ! ऐसे में महिलाओं को निशाना बनाकर किये जा रहे इस हमले को आम अपराध अथवा हमले के श्रेणी में रखा जाना कहीं से भी उचित नहीं प्रतीत होता ! बेशक हमारे कानून में महिलाओं पर हो रहे इन हमलों को अलग श्रेणी में ना रखा गया हो लेकिन इस बात को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता कि इस तरह के हमलों को यौन  हिंसा के अपराधों के नजरिये से भी देखा जाना चाहिए ! चुकिं, ज्यादातर मामलों में ऐसा देखा गया है कि महिलाओं पर तेज़ाब फेकने वाला व्यक्ति यौन कुंठा से ग्रसित होता है और परिणामत: ऐसी वारदात को अंजाम देता है ! अत: महिलाओं के लिए अभिशाप बन चुके इस कुकृत्य को यौन हिंसा के अपराधों से अलग रखकर नहीं देखा जाना चाहिए ! मगर सबसे बड़ी खेद की बात यह है कि इस दिशा में कानूनी स्तर पर स्थिति ढाक के तीन पात जैसी बनी हुई है ! जिससे अपराधियों का मनोबल बढ़ा हुआ है ! एक तरफ जहाँ महिलाओं के लिए देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद में निर्धारित भूमिका तय करने की बात की जा रही है वहीँ दूसरी तरफ महिलाएं अपने घरों,सडकों पर ही महफूज नहीं है और समाज का एक तबका उसे महज एक साधन मात्र के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है ! आये दिन हो रही बलात्कार और तेज़ाब दुष्कर्म  की सरेआम घटनाओं पर हमें ना सिर्फ कानूनी तौर पर बल्कि सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक तौर पर और अधिक सजग एवं विकसित होने की जरुरत है ! आज हमें उन कारणों को तलाशने पर ज्यादा बल देना होगा जो समाज को गलत दिशा में ले जाने के लिए उत्तरदायी हैं ! क़ानून इस समस्या के समाधान के लिए लिए प्रथम जरुरत है जिसके बाद ही किसी अन्य उपाय पर विचार किया जा सकता है ! कानूनी रूप से इन मामलों में अपराधियों की सज़ा, पीड़िता के लिए उपचार,मुआवजा, क्षतिपूर्ति और पुनर्वास आदि के प्रति सचेष्ट होकर नीतियां निर्धारित करने की जरुरत हैं और साथ ही इसे यौन हिंसा के आपराधिक श्रेणी में रखे जाने पर काम करना होगा ! हमें इस बात को स्वीकार करना ही होगा कि यह एक तरह की यौन हिंसा का ही स्वरुप है जो बदले एवं कुंठा की भावना के चलते समाज में बढ़ता जा रहा है ! इसमें कोई दो राय नहीं कि तेज़ाब हमले के मामलो में हमारी सरकारों द्वारा अभी गंभीरता नहीं बरती गयी है !
      आये दिन बढ़ रही महिलाओं पर इस तेजाबी हिंसा की घटनाओं को समाज के मुख्य धारा का विषय मानते हुए आज इसके नियंत्रण के हर संभव उपायों को अमल में लाये जाने की जरुरत है ! एक संतुलित न्यायिक,प्रशासनिक एवं सामाजिक जवाबदेही के तहत इस बात को समझने की जरुरत है कि तमाम उपायों को व्यव्हार में कैसे लाया जाय ? ऐसे मामले में अगर अपराधी को जेल तक की सजा देने से मामला बनता नहीं दिख रहा तो उन दंड नीतियों पर भी अमल किया जाना चाहिए जिससे बलात्कारी के अंदर सामाजिक प्रायश्चित एवं ग्लानि का भाव उत्पन्न हो और वो समाज के सामने अपने किये पर प्रायश्चित करे ! साथ ही साथ तमाम तमाम मनोवैज्ञानिक पद्धतियों के माध्यम से इन घटनाओं के प्रति समाज में जागरूकता लाने की जरुरत पर बल दिये की बात की जाती रही है, जिन्हें अमल में लाये जाने की जरुरत है ! बढते तेज़ाब हमलों  के वारदातों पर सजग होकर केवल क़ानून एवं प्रशासन पर निर्भर होने के बजाय इस समस्या के प्रति समाज को खुद गंभीर होने एवं अपनी जावबदेही तय करने की जरुरत पर भी बल देना होगा ! अच्छे और साफ़-सुथरे समाज के निर्माण के लिए यह जरूरी होता है कि वो अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति सबसे पहले खुद जिम्मेदार बने ! समाज का आम नागरिक जब तक इस घृणित अपराध से खुद को जोड़ कर नहीं देखेगा तब तक ये घटनाएं  महज कानूनी मसला बनकर फाइलों और न्यायालयों में हिलोरें मारती रहेंगी,और ऐसे अपराधियों  का हौसला बुलंद होता रहेगा ! अत: महिलाओं की अस्मिता एवं समाज के लिए कलंक बन चुके  इस विषय पर समाज,क़ानून,प्रशासन सबको एक साथ सजग होने की जरुरत है ना कि सब अपनी ढपली अपना राग बजाएं !

शिवानन्द  द्विवेदी सहर 




2 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे मिला मानदेय
    एक कॉलम यह भी बनायें
    और उसमें अपने चैक व नकद
    मिलने राशि का विवरण देकर
    अन्‍य साथी रचनाकारों के ईर्ष्‍या
    के बरतन बनें।

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  2. हा हा हा हा ! इस बात का ख्याल रखा जाएगा !

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