रविवार, 19 मई 2013

सांस्कृतिक विविधताओं में जनजातीय लोककलाएँ : जनसत्ता रविवारी में मेरा लेख



इतिहास के तमाम अचिन्हित पन्नों एवं भारतीय भूगोल की तमाम अनहद सीमाओं में  अपनी विविधताओं से परिपूर्ण संस्कृतियों एवं कलाओं की गुमनाम छाप छोड़ने वाली तमाम जनजातियां वर्तमान में मुख्यधारा के सांस्कृतिक मंचों के नेपथ्य में जाने के बावजूद विमर्शों में कायम हैं ! वर्तमान भारत के भूगोल और प्राचीन भारत के इतिहास के बीच यहाँ के मूल निवासियों को लेकर एक भ्रम की स्थिति आज भी सांस्कृतिक विमर्शों का हिस्सा बनी  हुई है ! हलाकि तमाम लेखकों एवं इतिहासकारों द्वारा इन जनजातियों को ही भारतवर्ष के मूल निवासी के तौर पर स्वीकार किया गया  है ! इन जनजातियों को आदिवासी कहे जाने के तर्क के रूप में तमाम इतिहासकार यही कहते हैं कि आदिकाल के मूल भारतीय भूभाग के निवासी होने के कारण बाहर से भारत आये तत्कालीन समाजों द्वारा इन्हें आदिवासी कहा गया होगा ! भारत के मध्यप्रदेश,उड़ीसा,बिहार,महाराष्ट्र,त्रिपुरा,मिजोरम,नागालैंड जैसे राज्यों में तो सांस्कृतिक रूप से इन जनजातियों का अलग ही महत्व है ! दक्षिण अफ्रीका के बाद सबसे ज्यादा जनजातियों वाले देश के रूप में भारत में मुख्यतया गोंड,संथाल,भील,लाहौल,साम्हौल, सहित तमाम अन्य छोटी-बड़ी जनजातियां अपने सांस्कृतिक विविधाताओं के साथ पाई जाती हैं ! आधुनिक बाजारवादी कलाओं से इतर इन जनजातियों की सांस्कृतिक विविधताओं के कला पक्षों पर अगर नजर डालें तो रचनाशीलता एवं कलात्मक अभिव्यक्ति का अनोखा संगम देखने को मिलता है ! मुख्यधारा के इस प्रगतिशील समाज से अलग विपन्न जीवन यापन कर रहीं ये जनजातियां कला एवं संस्कृति के पैमानों पर बेहद संपन्न नजर आती हैं ! अत: यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि कला के संस्कृति के मामले में ये समुदाय आधुनिक प्रगतिशील समाज की अपेक्षा पहले से ही ज्यादा विकसित रहा है ! सौदर्य और श्रृंगार की साज साज सज्जा से लेकर रण कौशल के युद्धाभ्यास तक एवं चित्रकारी और शिल्पकला से लेकर कढाई-बुनाई की घरेलु कलाओं तक, हर स्तर पर जनजातियों का यह समाज बेहद परिपक्व एवं संपन्न नजर आता है ! सांस्कृतिक रूप से अगर देखा जाय तो इनके अपने धार्मिक संस्कार हैं, त्यौहार हैं एवं सामाजिक मूल्यों का निर्वहन करने वाले लोकाचार हैं !मध्यप्रदेश में सबसे बड़ी संख्या में निवास करने वाली भील जनजाति अपनी तीरंदाजी कौशल के लिए ख़ासा मशहूर है ! जिस तीरंदाजी की कला को आज वैश्विक खेलों में स्थान दिया गया है वो तीरंदाजी की कला भील जनजाति के पास आज से हजारों साल पहले आ चुकी थी ! दरअसल भील शब्द की उत्पति ही द्रविण शब्द “बीलू” से हुई है जिसका हिन्दी अर्थ धनुष होता है ! इस आधार पर यह कहना गलत नहीं प्रतीत होता कि भील समुदाय अपनी तीरंदाजी कला के लिए सभी जनजातियों के बीच ख़ासा मशहूर रहा है ! तीरंदाजी के अलावा भील जनजाति के लोग पिथौरा कला,काष्ठ कला एवं बांस कला में भी माहिर होते हैं लेकिन  इस  समुदाय द्वारा पिथौरा कला में सर्वाधिक उल्लेखनीय योगदान दिया गया है !  इस समुदाय द्वारा मूलतया घरों की दीवारों पर दुधिया रंग में तमाम भित्ति चित्रों एवं कलाकृतियों को उकेरे जाने  और मिट्टी के घरों को इन्ही कलाकृतियों से सजाये जाने को ही पिथौरा कला कहा गया गया है ! दीवारों पर उकेरे गए भित्ति चित्र भील समाज के धार्मिक आस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं ! इन भित्ति चित्रों को बनाने के पीछे भील समुदाय की मंशा यही रहती थी कि इन्हें बनाने से इश्वर उनकी रक्षा करेंगे और उनके घरों में सौहार्द का वातावरण बना रहेगा !  बांस और नरकुल की से बानी घरेलु जरुरत की वस्तुओं को बनाने की कला में यह जनजाति काफी निपुण नजर आती है ! भील समाज द्वारा  बांस की पत्तियों की मदद से बनाये  गए डलिया,टोकनी जैसी घरेलु काम-काज की वस्तुओं का इस्तेमाल प्रगतिशील समाज द्वारा भी शौकिया तौर पर  खूब किया जाता है !  भील जनजाति की कलाओं में उनकी दैवीय आस्था के भी बखूबी दर्शन होते हैं ! भील जनजाति के ही राठवा समाज द्वारा पिथौरा को भगवान का दर्जा देकर पूजा जाता रहा है ! बेशक पिथौरा कला के प्रयोग के  पीछे भील जनजाति की धार्मिक आस्था एक वजह हो लेकिन कलात्मकता  के नजरिये से इन चित्रों में इस समुदाय के चित्रकारी की कला के ही दर्शन होते हैं ! पिथौरा की चित्रकारी में घोड़े-गाय आदि के चित्रों का प्रयोग बहुतायत देखने को मिलता है ! मध्यप्रदेश की ही एक दूसरी बड़ी संख्या वाली जनजाति गोंड भी अपनी अनोखी सांस्कृतिक कलाओं के लिए काफी मशहूर रही है ! चित्रकारी की कला में गोंड जनजाति के लोग सर्वाधिक निपुण थे और उनके द्वारा अलग तरह के चित्र उकेरे जाते है ! चित्रों के फीकापन में रंग भरना एवं अकलात्मक वस्तुओं को भी अपनी कलात्मकता से रंगीन कर दे देना इस जनजाति के चित्रकारों के चित्रकारी का सबसे नायाब कौशल है ! दैनिक जीवन से जुड़े तमाम घटनाक्रमों जिनमे ऋतुएं,जन्म,विवाह आदि संस्कारों को अपने द्विविमीय चित्रों के माध्यम से बखूबी प्रस्तुत करने एवं रंग-बिरंगी आकृतियों से घटनाओं का प्रस्तुतीकरण करने की कला में यह समुदाय शुरू से ही पारंगत रहा है ! भील एवं गोड जनजाति के अलावा झारखंड में निवास करने वाले संथाल जनजाति के लोगों का खास रुझान चित्रकला के साथ-साथ नृत्य कला में भी रहा है ! वैसे तो लगभग सभी जनजातियों की अपनी कोई ना कोई नृत्यकला रही है जिसका प्रदर्शन उनके द्वारा  भगोरिया इन्द्,गलबाबाजी,गाता,नवासी जैसे जनजातीय समाज के मौसमी त्योहारों पर धूम-धाम से किया जाता है ! परन्तु संथाल जनजाति का रुझान नृत्य एवं संगीत की कला में विशेष रहा है !  अपने पारंपरिक वेष-भूषा में सजे संथाली जनजाति के स्त्री-पुरुष के समुदायों द्वारा स्थानिय महोत्सवों में श्रृंखलाबद्ध होकर ताशे एवं नगाड़े पर नृत्य प्रस्तुत किया जाना बेहद आकर्षक वातावरण उत्पन्न करता है  ! संथाल जनजाति की पारम्परिक कला के रूप में  कोहबर कला का प्रचलन वर्तमान में काफी व्यापक स्तर पर बिहार सहित उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्रों में अन्य समाजों में भी होने लगा है ! कोहबर और सोहराय कलाओं के अलावा संथाल जनजाति के लोग  ज्यामितीय चित्रकारी एवं पाषाण भित्ति चित्रों के कलाकारी में में खासे पारंगत होते हैं ! पाषाणीय भूभागों में रहने का व्यापक प्रभाव उनके कलात्मक अभिव्यक्तियों में भी खुलकर प्रदर्शित होता है ! इन बड़ी जनजातियों के अलावा अन्य कई राज्यों एवं भूभागों की स्थानीय जनजातियों की अपनी लोक कलाएं जैसे चित्रकारी,नृत्य,हस्तकला,मिट्टी कला, काष्ठ कला, युद्ध कला,गीत-संगीत एवं वाद्य कला आदि भी खासी आकर्षक हैं ! तमाम जनजातियों द्वारा प्रस्तुत की  जाने वाली गोड़ी पैठाई, बारेला,कोरकू,कर्मा,झांझ पाटा,गेंडी नृत्य आदि नृत्य कलाएं अत्यंत मनोहारी होती हैं !नृत्य कला के अलावा इन जनजातियों के भेष-भूषा,साज-सज्जा,खान-पान एवं आभूषणों आदि में भी तमाम विविधताओं के दर्शन होते हैं !
          आज जब बाजारवाद के इस दौर में कलाओं का भी बाजार तैयार हो चुका  है और कलाओं की प्रस्तुतियाँ निवेश के तौर पर होने लगीं है ऐसे में इन जनजातीय कलाओं की प्रासंगिकता बढ़ जाती है ! बाजार की चकाचौंध से दूर अपनी परपराओं और सांस्कृतिक धरोहरों को जीवित रखी इन जनजातियों की लोक कलाओं में कला पक्ष का एक ईमानदार सच्चापन नजर आता है ! इन तमाम जनजातियों द्वारा स्वसृजित एवं स्वअर्जित की हुई कलाओं एवं संस्कृतियों में मौलिकता के दर्शन होते हैं और कहीं भी ऐसा कुछ नहीं लगता कि जैसे कुछ बनावटी या कृत्रिम हो ! जनजातियों के लोक कलाओं की यह सांस्कृतिक विरासत कोई एक दिन में खड़ी की हुई संरचना नहीं बल्कि ये तो आदिवासीयों द्वारा आदिकाल से अर्जित की हुई सम्पदा है जिसकी नक़ल करके आज दुनिया की ना जाने कितनी बाजारवादी कलाएं फल-फुल रहीं हैं ! सामाजिक और आर्थिक रूप से विपन्न यह समाज कला और संस्कृति के मामले में आधुनीक समाज की कला संस्कृति का मूल श्रोत नजर आता है ! तमाम भौगोलिक एवं सांस्कृतिक विविधताओं के बावजूद इन अलग-अलग जनजातियों में कला प्रेमी होने की अद्दभुत समानता इस बात को प्रमाणित करती है कि समाज को कला का पहला पाठ जनजातियों से ही मिला है ! अंतत: यह कहना उचित प्रतीत होता है कि कला की प्रथम खोज इन्ही आदिवासी जनजातीय समाजों द्वारा की गयी होगी ! 


बुधवार, 15 मई 2013

मजहब बड़ा या राष्ट्रीय प्रतीक : दैनिक जागरण नेशनल में प्रकाशित मेरा लेख



15-मई-13

इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि संवैधानिक रूप से भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है,जिसका जिक्र भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ही किया गया है ! लिहाजा,इस बात को लेकर तो सौ प्रतिशत आश्वस्त हुआ जा सकता है कि संविधान की नजर में सभी धर्म सामान है और संविधान किसी भी धर्म को आम या खास नजर से नहीं देखता ! इन सबके बावजूद भारत एक ऐसा मुल्क है जहाँ संवैधानिक मान्यताओं के समानांतर कुछ सामाजिक,धार्मिक मान्यताएं भी चलती हैं जिनका संवैधानिक मान्यताओं के साथ परस्पर विरोधाभाष होता है ! हाल ही में देश की सर्वोच्च पंचायत के निचले सदन हुए एक वाकये के बाद एक बार फिर राष्ट्र बड़ा या धर्म की बहस ने जोर पकड़ लिया है ! दरअसल,उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से बसपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क द्वारा ठीक उस समय सदन का बायकाट किया गया जब सभी सांसद भारत के राष्ट्रगीत के लिए अपने स्थान पर खड़े हुए थे ! इस पुरे मामले के बाद विरोध और समर्थन के विमर्शों में जो मूल विषय निकल कर आ रहा है वो है कि क्या भारतीय संविधान हमें धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हमें इतनी आजादी देता है कि हम राष्ट्रीय मूल्यों एवं संसदीय परम्पराओं का अपमान करें ! राष्ट्र बनाम धर्म के नाम पर खड़े हुए इस विमर्श को कई कोणों से समझने की जरुरत है ! सबसे पहले अगर “वंदे मातरम” ना गाने के पीछे इस्लामिक तर्क को समझने कि कोशिश करें तो यही तथ्य बार-बार सामने रखा जाता है कि इस्लाम में सिवाय खुदा(अल्ला-ताला) के किसी अन्य का वंदन करने की आजादी नहीं है अथवा ऐसा करना इस्लाम के खिलाफ है ! अब भारतीय राष्ट्रगीत में राष्ट्र को माँ मानकर उसका वंदन किया गया है अत: इस्लामिक समुदाय के लोगों द्वारा यह तर्क दिया जाता रहा है कि यह इस्लाम की मान्यताओं के खिलाफ है ! हालाकि वंदे मातरम से परहेज करने के पीछे भाषाई कारण भी नजर आता है ! चुकि वंदे मातरम की भाषा संस्कृतनिष्ठ है और संस्कृत को हिन्दु धर्म से जोड़कर देखा जाता रहा है अत: वंदे मातरम के विरोधियों के विरोध का एक  कारण यह भी हो सकता है ! अगर देखा जाय तो अतार्किक ही सही मगर भाषाई द्वेष का यह प्रश्न एकतरफा नहीं है बल्कि हिंदू धर्म के कट्टरपंथियों द्वारा भी उर्दू को इस्लाम की भाषा के तौर पर देखा जाता रहा है ! राष्ट्रीय प्रतीकों,चिन्हों आदि स्वीकारने अथवा अस्वीकारने के मसले पर भी मामला बिलकुल एकतरफा नहीं नजर आता बल्कि इसमें भी दो अलग-अलग धर्मों पर सवाल उठाये जा सकते हैं ! अगर आज बसपा सांसद बर्क अपने धार्मिक मान्यताओं का हवाला देकर संसद में वंदे मातरम गाने से परहेज किया  हैं तो हमें इस बात को भी याद रखना होगा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सन 2005 तक भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को अपने तर्कों पर खारिज करता आया है और नागपुर स्थित अपने मुख्यालय पर अभी भी इसे फहराया नहीं है ! लेकिन यहाँ बर्क का मामला ज्यादा गंभीर है क्योकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने मुख्यालय पर नहीं फहरता जबकि शफीकुर्रहमान बर्क ने संसद में राष्ट्रगीत को खारिज किया है !
      सवाल यह है कि क्या एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में किसी को भी इतनी धार्मिक आजादी दी जानी चाहिए कि वो अपने धार्मिक मान्यताओं के आधार पर संवैधानिक प्रणाली अथवा मान्यता को ही चुनौती देने लगे ! प्रश्न निहायत कठोर जरुर है मगर वंदे मातरम का अपमान करने वाले बसपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क से यह सवाल जरुर पूछा जाना चाहिए कि अगर वो वाकई इस्लाम अथवा इस्लामिक क़ानून के प्रति इतने आस्थावान है तो वो इस संवैधानिक संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में हिस्सा ही क्यों ले रहे हैं ! उन्हें इस बात का ज्ञान जरुर होना चाहिए कि इस्लाम में धर्मनिरपेक्षता शब्द को कहीं कोई जगह नहीं दी गयी है और इस्लाम में मान्यता ना रखने वालों को काफिर कहा गया है ! अत: एक ऐसे मुल्क जहाँ काफिर बहुसंख्यक हैं और संविधान सम्मत संसदीय लोकतंत्र है वहाँ उनके जैसे इस्लामिक मान्यता वाले को तो इस लोकतान्त्रिक प्रणाली की ही खिलाफत कर देनी चाहिए ! अगर शफीकुर्रहमान बर्क के इस्लामिक मान्यताओं के प्रति सोच का नजरिया इतना चयनित है तो इसे महज वोट की राजनीति का नाम दिया जा सकता है ना कि इस्लाम के प्रति आस्था के नजर से देखा जा सकता है ! रही बात उस एक मात्र अल्ला-ताला की वन्दगी की तो क्या शफीकुर्रहमान बर्क इस बात के प्रति आश्वस्त करेंगे कि वो जिस राजनीतिक दल से सांसद हैं वहाँ वो जय भीम के नारे नहीं लगाये  होंगे या बहन जी के चरण चुम्बन नहीं किये होंगे ? क्या बसपा ने शफीकुर्रहमान बर्क को इस बात के प्रति आश्वस्त किया है कि अगर केन्द्र में उनकी सरकार बनी तो वन्देमातरम सहित तमाम इस्लाम विरोधी चीज़ों को भारतीय लोकतंत्र से हटा लिया जाएगा ?  इसे शफीकुर्रहमान बर्क का दोहरा चरित्र नहीं तो और क्या कहेंगे कि एक संविधान सम्मत धर्मनिरपेक्ष संसदीय लोकतंत्र में जनता के बीच से चुनकर आने के बाद संसदीय सुविधाओं का लाभ लेने वाले शफीकुर्रहमान बर्क साहब को सिर्फ वंदे मातरम से ही धार्मिक आस्था को ठेस पहुचता है !
            धर्म बड़ा या राष्ट्र के नाम पर चल रहे इस विमर्श में चाहे कोई हिन्दुवादी संगठन या व्यक्ति हो अथवा इस्लामिक कट्टरपंथी हो या किसी भी अन्य धर्म का अनुयायी हो, राष्ट्र से बड़ा ना तो वो खुद हो सकता है और ना ही उसका धर्म ही हो सकता है ! अगर कोई व्यक्ति अथवा समुदाय अपने धार्मिक मान्यताओं को राष्ट्र की मान्यताओं से ऊपर साबित करने की कोशिश करता है तो इसे राष्ट्र विरोध के अलावा कुछ नहीं कहा जा  सकता है ! अगर भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है तो हमें धर्मनिरपेक्षता का सही अर्थ जरुर समझना होगा ! बेशक भारतीय संविधान सबको अपनी इच्छा का धर्म मानने की आजादी देता है मगर साथ ही एक बात और कहता है कि अन्य धर्मों का भी सम्मान करो ! मगर यहाँ तो स्थिति उलट ही नजर आती है, कोई समुदाय तिरंगे को खारिज करता आया है तो कोई राष्ट्रगीत की संसदीय परम्परा को ही नकार रहा है ! धर्म के प्रति आपकी मान्यता आपका निजी मसला है जिसे आप अपने तरीके से समझते और सुलझाते हैं जबकि राष्ट्रीय मान्यताओं को सामाजिक स्तर पर समझने की जरुरत है ! अपने निजी जीवन पद्धति में आप चाहे जिस धार्मिक मान्यता के हिसाब से जीवन यापन कर रहे हों लेकिन राष्ट्रीयता के मसले पर आपका नजरिया राष्ट्र की मान्यताओं के प्रति उन्मुख होना चाहिए ! संविधान सम्मत लोकतांत्रिक प्रणाली में ना तो किसी का शरियत क़ानून लागू किया जा सकता है और ना ही हिंदू वैदिक नियामक ही स्वीकार किये जा सकते हैं ! धर्मनिरपेक्ष भारतीय लोकतंत्र में आपके धर्म का वजूद आपके निजी जीवन तक सीमित है जबकि संसद भवन में खड़ा होने वाला कोई प्रतिनिधी उस दौरान निजी जीवन में नहीं जी रहा होता है ! शफीकुर्रहमान बर्क को इस बात को ठीक से समझना चाहिए कि संसद उनका घर अथवा मस्जिद नहीं बल्कि समूचे भारतवर्ष के नागरिकों द्वारा भेजे गए प्रतिनिधियों का सार्वजनिक मंच है और वहाँ अगर कोई अपना निजी धर्म थोपने की कोशिश करेगा तो इसे साम्प्रदायिकता का नाम दिया जाएगा ! संसद की मर्यादा में बट्टा लगाने वाले ऐसे दोहरे चरित्र के नेताओं पर संसद द्वारा प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए ! धर्म के नाम पर राष्ट्र का अपमान कतई स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए !  राष्ट्र हमेशा और हर धर्म से बड़ा है !!


शुक्रवार, 10 मई 2013

इलाज की बजाय नया मर्ज देती दवाएं : नई दुनिया और आई नेक्स्ट में प्रकाशित मेरा यह लेख



 10-मई-13


दुनिया में कई चीजे मनुष्य के लिए अनचाही मगर अनिवार्य हो जाती हैं ! दवाओं का इस्तेमाल भी इसी अनचाही जरूरत का एक हिस्सा है ! किसी रोग से ग्रस्त व्यक्ति द्वारा उस रोग से निजात पाने के लिए उपयुक्त दवाओं का सेवन तो करना ही पड़ता है! मगर यदि मरीज द्वारा ली जा रही दवा ही तमाम तरह की स्वास्थ्य सम्बन्धी शारीरिक समस्याएं पैदा करने लगे तो इसे क्या कहा जाय ? तमाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रयासों के बावजूद भी अबतक एचआईबी-एड्स को लेकर सहजता से उपलब्ध कोई पुख्ता एवं अचूक समाधान नहीं निकाला जा सका है ! एड्स को आज भी एक लाइलाज बीमारी मानने की धारणा समाज में कायम है ! लेकिन इस संदर्भ में एड्स को लेकर जो दूसरा आश्चर्यजनक पहलू सामने आया है वो अत्यधिक चिंता का विषय है ! एक रिपोर्ट के मुताबिक़ एड्स के रोकथाम अथवा इलाज के नाम पर सरकार द्वारा जो मुफ्त दवा दी जा रही है उसके तमाम नाकारात्मक असर हो रहे हैं एवं वो अन्य तमाम तरह की बीमारियों को पैदा करने का काम कर रही है ! कई सालों से सरकार द्वारा एड्स पर  नियंत्रण के नाम पर मुफ्त बाटी जा रही ये दवा अपने साथ बीमारियों का जखीरा लिए एड्स पीडितों तक पहुच रही है जिससे मरीजों को दोहरी मार का सामना करना पड़ रहा है !हीला-हवाली का यह हाल तब है जब तमाम परीक्षण करने के बाद स्टावूडाइन नाम की मुफ्त बाटी जा रही इस दवा को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा चार साल पहले ही सख्त आपत्ति जताई जा चुकी है ! डब्लू एच ओ की आपत्ति के बावजूद एड्स पीडितों को यह दवा धड़ल्ले से दी जा रही है जबकि इससे बेहतर एवं सुरक्षित दूसरी दवाओं का इजाद किया जा चुका है ! अपने नाकारात्मक असर के लिए कुख्यात इस दवा को लेकर डब्लू एच ओ के अलावा देश के संसद की स्वास्थ्य मामलों से जुड़ी स्थायी समिति के द्वारा भी आपत्ति जताए जाने के बावजूद अबतक हमारी सरकार के कान पर जू नहीं रेंग रहा ! एड्स निवारण अथवा रोकथाम से सम्बंधित उपलब्ध अन्य वैकल्पिक दवाओं का प्रयोग दुनिया के सभी देशों में तो किया जा रहा है मगर भारत अभी भी इस मामले में जड़ बना वहीँ का वहीँ खड़ा है ! ऐसा अंदेशा जताया गया है कि हजारों की संख्या में मरीज इस दवा के दुष्प्रभाव को झेल रहे हैं ! हालाकि इस मामले में सबसे बड़ी खामी ये भी है कि दवाओं के नाकारात्मक असर से प्रभावित मरीजों के पुख्ता आंकड़े उपलब्ध नहीं हो पाते हैं जिससे कि यह पता चल सके  कि किस दवा के प्रयोग से कितने लोग किस स्तर पर प्रभावित हुए हैं ! आंकड़ों की अनुपलब्धता के कारण ही  अँधेरे में पड़े इस मामले पर दवाओं का बाजार कायम रहता है एवं सरकार भी चुप्पी साधे बैठी रहती है !
           इसी तरह के अन्य दवाओं के प्रयोग सम्बन्धी अन्य  पहलुओं को अगर देखा जाय तो दवाओं के नाकारत्मक प्रभावों वाले लगभग सभी मामलों पर हमारी सरकार की तरफ से कोई सुगबुगाहट के स्वर नहीं सुनाई देते  ! इस बावत अगर कुछ अन्य तथ्यों की तरफ जायें तो यह पता चलेगा कि नए रसायनों से बनी दवाओं का प्रयोग जिस स्तर पर भारत में किया जा रहा है शायद ही किसी अन्य देश किया जा रहा हो ! चाहें वो दवाओं का परीक्षण का मामला हो या दवाओं के बाजार से जुड़ा विषय हो कहीं ना कहीं ऐसा प्रतीत होता है कि मरीजों को उपयुक्त दवा देने की बजाय उनपर जबरन दवाएं थोपी जा रहीं हैं ! क्लिनिकल ट्रायल से जुड़े एक सरकारी विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार सन 2005 से लेकर अबतक भारत में 475 उन नए रसायनों को आजमाने का काम भारत में रहने वाले हजारों की संख्या में मरीजों पर बिना किसी ठोस एवं कारगर नीति- के किया जा चुका है जिन रसायनों का प्रयोग दुनिया में पहले कभी नहीं किया गया है ! गौर करना होगा कि लगभग साठ हजार लोगों पर आजमाए गए  475 नए रसायनों में से मात्र 17 दवाओं को ही अब तक मानव स्वास्थ्य के लिए कारगर माना गया है एवं बाजार में उतारने की स्वीकृति मिल पाई है !बड़े स्तर पर चल रहे इस रासायनिक प्रयोग ने ना जाने कितनो का जान लिया है और ना जाने कितनी नयी बीमारियाँ पैदा की हैं,इसका कोई पुख्ता आंकड़ा किसी के पास नहीं है ! दवाओं के इस प्रयोग के खतरनाक होने का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुल 475 नए रसायनों में से मात्र 17 रसायन ही मानव शरीर के अनुकूल पाए गए हैं ! दवाओं के प्रयोग एवं स्वास्थ्य के मसले को लेकर बेहद असंवेदनशील होती हमारी सरकार को समझना चाहिए कि जिन दवाओं को वो बाजार में बिना रोक-टोक के उतार रही है उन दवाओं से मरीजों पर कहीं नाकारात्मक असर तो नहीं पड़ रहा या वो दवाइयां किसी नए रोग की वजह तो नहीं बन रहीं !
           इसमें कोई दो राय नहीं कि एड्स ना सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया के स्वास्थ्य तंत्र के लिए एक चुनौती की तरह है ! इसको लाइलाज बीमारी की कतार से निकालने की कवायदें पूरी दुनिया में चल रहीं हैं ! इस संबंध में अगर देखा जाय तो  एड्स को लेकर जिस तरह के अंतर्राष्ट्रीय अभियान अथवा प्रयास किये गए हैं वैसे प्रयास शायद ही किसी अन्य बीमारी को लेकर किये गए हों ! इन सबके बावजूद इस बात का ख्याल रखा जाना बेहद जरूरी है कि एड्स के रोकथाम के नाम पर नई बीमारियों को बढ़ावा ना मिले ! कोई ऐसा दवा जो बेशक एड्स के लिए कारगर साबित हो रही हो मगर अन्य बीमारियों की वजह बन रही हो अथवा मरीज के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल रही हो,का प्रयोग बिना समय गवाएं बंद किया जाना चाहिए ! ऐसी दवाओं का सरकारी स्तर पर परीक्षण कराने के बाद ही बाजार में उतारा जाना चाहिए ! स्वास्थ्य के मसले पर अगर देखा जाय तो हम ना तो नीतिगत रूप से ही अभी परिपक्व हो पाए हैं ना ही कानूनी तौर पर ही मजबूत हो पाए हैं ! दुनिया के अन्य देशों के साथ अगर तुलनात्मक रूप से देखा जाय तो हम ना तो दवाओं के बाजार को लेकर अभी बहुत ठोस एवं दूरगामी नीति बना पाए हैं ना ही दवाओं के परीक्षण एवं प्रयोग को लेकर ही बहुत सशक्त हो पाए हैं ! हमारे तंत्र को  इस दिशा में कहीं ना कहीं बड़े स्तर पर स्वास्थ्य सम्बन्धी सुधारों को अमली जामा पहनाने की जरुरत है ! हमारी नीतिगत असफलता का परिणाम ही है कि मरीजों के स्वास्थ्य पर गलत असर डालने वाली दवाओं को प्रतिबंधित कर उन दवा निर्माता कंपनियों पर नकेल कसने की बजाय हमारी सरकार उन दवाओं को मुफ्त में बांट रही है ! इस संदर्भ में स्वास्थ्य पर काम करने वाले कई संगठनो का दावा है कि यहाँ मामला सरकार एवं कंपनियों के मिलीभगत का है एवं दोनों ही स्वास्थ्य को लेकर बेहद लापरवाह हैं ! इन संगठनो का कहना इसलिए भी सही लगता है क्योंकि स्वास्थ्य से जुड़े कई मसलों पर अक्सर माननीय सर्वोच्च न्यायालय को स्वत: संज्ञान लेना पड़ता है जबकि ये काम सरकारों का है ! हमें इस बात का ख्याल रखना होगा कि दवाओं का दायरा दवाओं तक सीमित हो ना कि दवाएं ही मरीज के लिए जहर बन जायें !

शिवानन्द द्विवेदी सहर 

  

सोमवार, 6 मई 2013

कितना कारगर होगा खाद्य सुरक्षा विधेयक : दैनिक जागरण में मेरा यह लेख




पैसा  कहाँ से लायेगी सरकार (7-मई-13)

संप्रग सुप्रीमो सोनिया गाँधी के महत्वाकांक्षी योजना वाला खाद्य सुरक्षा विधेयक तमाम खीँच-तान के बीच आखिरकार लोकसभा में पेश कर ही दिया गया ! सोनिया गाँधी का महत्वाकांक्षी  विधेयक होने के कारण इस विधेयक को लेकर सरकार की साख दाँव पर लगी हुई है ! दरअसल, इस विधेयक के तहत जो प्रावधान रखे गए हैं उनको लेकर सरकार के ही कई सहयोगियों द्वारा आपत्ति जताए जाने के कारण यह विधेयक अभी तक सदन पटल पर नहीं रखा जा सका था ! सरकार की तरफ से इस विधेयक को लेकर आम सहमति बनाने की कोई कोशिश छोड़ी नहीं गयी ! लोकसभा में संख्याबल के हिसाब से अगर खाद्य सुरक्षा विधेयक के पास होने की गुंजाइशों का आकलन करें तो इस विधेयक के पास होने में कोई खास अडचन नहीं नजर आ रही !क्योंकि इस विधेयक पर सरकार द्वारा यूपीए की अंदरूनी असहमतियों को सुलझाने का हर संभव उपाय किये जाने के बाद ही इसे सदन के पटल पर रखा गया है ! विपक्ष के तमाम विरोधों के बावजूद यह विधेयक पास होता दिख रहा है ! अत: आज जब खाद्य सुरक्षा विधेयक के पास होने की संभावना ज्यादा बनती नजर आ रही है तो इस बात पर जरुर बहस होनी चाहिए कि क्या वाकई सोनिया गाँधी का यह महत्वाकाक्षी विधेयक अपने उद्देश्यों में शत-प्रतिशत कामयाब हो पायेगा या इसका भी हश्र मनरेगा की तरह ही होगा ! खाद्य सुरक्षा विधेयक में निहित प्रावधानों के तहत यह तय किया गया है कि गरीबी में जीवन यापन कर रहे प्रत्येक व्यक्ति को पाँच किलों अनाज सस्ते दर पर प्राप्त करने का अधिकार होगा ! हालाकि अन्त्योदय अन्न योजना के अंतर्गत आने वाल लगभग ढाई करोंड़ गरीब परिवारों को प्रत्येक महीने 35 किलोग्राम अनाज पाने की अहर्ता है ! खाद्य सुरक्षा विधेयक को अगर कानूनी जामा पहनाने में सरकार कामयाब हो जाती है तो सरकार के सामने कई चुनौतियाँ भी आयेंगी जिनपर अभी तक सरकार द्वारा कुछ विशेष योजना नहीं तैयार की गयी है ! खाद्य सुरक्षा विधेयक लागू होते ही छ: करोंड़ बारह लाख टन खाद्यान की जरुरत पडने  के अलावा  लगभग 20,000  करोंड़ रुपये का सब्सिडी बोझ पड़ना लगभग तय है ! लिहाजा सरकार के सामने बड़ी चुनौती यह है कि महंगे दर पर खाद्यान खरीदकर सस्ते दर पर उपलब्ध कराने के इस आर्थिक जोखिम की भारपाई कैसे की जायेगी ! इस बावत गौर करने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि पहले से ही आर्थिक सुधारों का हवाला देकर रसोई गैंस आदि से सब्सिडी हटाने वाली यूपीए सरकार किस आधार पर सब्सिडी के इस नए बोझ का जोखिम उठाने को तैयार दिख रही है  ! सरकार द्वारा प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक के तहत दी जाने वाली सस्ते अनाज की गारंटी को लेकर अनाज के उत्पादन एवं उसके रख-रखाव के लिए खाद्द्यान्नो के भंडारण आदि पर गंभीरता से विचार किये बिना अगर यह महत्वाकांक्षी विधेयक लाया जाता है तो इसके सफल होने की संभावना पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा होता नजर आ रहा है ! मौसम के बदलते मिजाज एवं अनाज उत्पादन में पड़ते इस अप्रत्यशित मौसम के प्रभावों से खाद्य सुरक्षा विधेयक को अलग रखकर नहीं देखा जा सकता है ! अगर किसी साल सुखा आदि पड़ जाय और अनाज उत्पादन में भारी कमी आ जाए जैसा कि हाल ही महाराष्ट्र में देखा गया है तो ऐसे में सरकार के सामने अनाज उपलब्ध कराने का बड़ा संकट उत्पन्न हो जाएगा ! ऐसे हालातों में हमारे वर्तमान खाद्यान्न भण्डारण के भरोसे सरकार द्वारा जरुरत के अनुरूप अनाज उपलब्ध कराया जा सकेगा ऐसा कहना ख्याली-पुलाव पकाने से ज्यादा कुछ भी नहीं है ! भारत में अनाज भण्डारण की स्थिति अत्यंत ही दयनीय है जिसपर केन्द्र एवं राज्य दोनों ही सरकारों द्वारा हीला-हवाली कई सालों से देखी जा रही है ! अत: एक बात तो साफ़ तौर पर कही जा सकती है कि खाद्यान्नों के उत्पादन एवं उनके रख-रखाव के साथ-साथ भण्डारण सम्बंधित अन्य बिंदुओं को समझे बिना इस बात के प्रति आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता है कि खाद्य सुरक्षा विधेयक अपने उद्देश्यों में कारगर हो सकता है ! 1970  में हुई हरित क्रान्ति के बाद अनाज उत्पादन के क्षेत्र में हुए व्यापक बदलावों को अगर आंकड़ों के ग्राफ पर समझने का प्रयास करें तो यह स्पष्ट होता है कि अनाज उत्पादन में साल दर साल हुई बढोत्तरी के अनुपात में उसके रख-रखाव एवं भंडारण के इंतजाम नहीं किये गए !परिणामत: लाखों टन अनाज प्रत्येक साल बारिश की भेंट चढ़ सड़ जाता है ! 
       सवाल यही है कि एक तरफ तो सरकार कई जरूरी वस्तुओं में सामान रूप से सब्सिडी हटा रही है तो वहीँ दूसरी तरफ सस्ता अनाज उपलब्ध कराने के नाम पर सब्सिडी का बोझ झेलने को तैयार दिख रही है ! सरकार की यह दोहरी नीति इस बात की द्दोतक है कि खाद्य सुरक्षा विधेयक के नाम पर सरकार की नीयत महज अपना आगामी चुनावी हित  साधने की है ! इसमें कोई दो राय नहीं है कि अगर सही नीति निर्माण और तमाम बिंदुओं पर विचार किये बिना यह विधेयक  क़ानून का रूप लेता है तो मनरेगा की तरह इसे  भी भ्रष्टाचार का बड़ा गढ़ बनते देर नहीं लगेगी ! इस विधेयक के कारण देश पर पडने वाले आर्थिक बोझ को हल्के में नहीं लिया जा सकता क्योंकि देश का आम नागरिक आर्थिक सुधारों के नाम पर बढ़ती महंगाई की मार पहले से ही झेल रहा है !  

शिवानन्द  द्विवेदी सहर