शुक्रवार, 10 मई 2013

इलाज की बजाय नया मर्ज देती दवाएं : नई दुनिया और आई नेक्स्ट में प्रकाशित मेरा यह लेख



 10-मई-13


दुनिया में कई चीजे मनुष्य के लिए अनचाही मगर अनिवार्य हो जाती हैं ! दवाओं का इस्तेमाल भी इसी अनचाही जरूरत का एक हिस्सा है ! किसी रोग से ग्रस्त व्यक्ति द्वारा उस रोग से निजात पाने के लिए उपयुक्त दवाओं का सेवन तो करना ही पड़ता है! मगर यदि मरीज द्वारा ली जा रही दवा ही तमाम तरह की स्वास्थ्य सम्बन्धी शारीरिक समस्याएं पैदा करने लगे तो इसे क्या कहा जाय ? तमाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रयासों के बावजूद भी अबतक एचआईबी-एड्स को लेकर सहजता से उपलब्ध कोई पुख्ता एवं अचूक समाधान नहीं निकाला जा सका है ! एड्स को आज भी एक लाइलाज बीमारी मानने की धारणा समाज में कायम है ! लेकिन इस संदर्भ में एड्स को लेकर जो दूसरा आश्चर्यजनक पहलू सामने आया है वो अत्यधिक चिंता का विषय है ! एक रिपोर्ट के मुताबिक़ एड्स के रोकथाम अथवा इलाज के नाम पर सरकार द्वारा जो मुफ्त दवा दी जा रही है उसके तमाम नाकारात्मक असर हो रहे हैं एवं वो अन्य तमाम तरह की बीमारियों को पैदा करने का काम कर रही है ! कई सालों से सरकार द्वारा एड्स पर  नियंत्रण के नाम पर मुफ्त बाटी जा रही ये दवा अपने साथ बीमारियों का जखीरा लिए एड्स पीडितों तक पहुच रही है जिससे मरीजों को दोहरी मार का सामना करना पड़ रहा है !हीला-हवाली का यह हाल तब है जब तमाम परीक्षण करने के बाद स्टावूडाइन नाम की मुफ्त बाटी जा रही इस दवा को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा चार साल पहले ही सख्त आपत्ति जताई जा चुकी है ! डब्लू एच ओ की आपत्ति के बावजूद एड्स पीडितों को यह दवा धड़ल्ले से दी जा रही है जबकि इससे बेहतर एवं सुरक्षित दूसरी दवाओं का इजाद किया जा चुका है ! अपने नाकारात्मक असर के लिए कुख्यात इस दवा को लेकर डब्लू एच ओ के अलावा देश के संसद की स्वास्थ्य मामलों से जुड़ी स्थायी समिति के द्वारा भी आपत्ति जताए जाने के बावजूद अबतक हमारी सरकार के कान पर जू नहीं रेंग रहा ! एड्स निवारण अथवा रोकथाम से सम्बंधित उपलब्ध अन्य वैकल्पिक दवाओं का प्रयोग दुनिया के सभी देशों में तो किया जा रहा है मगर भारत अभी भी इस मामले में जड़ बना वहीँ का वहीँ खड़ा है ! ऐसा अंदेशा जताया गया है कि हजारों की संख्या में मरीज इस दवा के दुष्प्रभाव को झेल रहे हैं ! हालाकि इस मामले में सबसे बड़ी खामी ये भी है कि दवाओं के नाकारात्मक असर से प्रभावित मरीजों के पुख्ता आंकड़े उपलब्ध नहीं हो पाते हैं जिससे कि यह पता चल सके  कि किस दवा के प्रयोग से कितने लोग किस स्तर पर प्रभावित हुए हैं ! आंकड़ों की अनुपलब्धता के कारण ही  अँधेरे में पड़े इस मामले पर दवाओं का बाजार कायम रहता है एवं सरकार भी चुप्पी साधे बैठी रहती है !
           इसी तरह के अन्य दवाओं के प्रयोग सम्बन्धी अन्य  पहलुओं को अगर देखा जाय तो दवाओं के नाकारत्मक प्रभावों वाले लगभग सभी मामलों पर हमारी सरकार की तरफ से कोई सुगबुगाहट के स्वर नहीं सुनाई देते  ! इस बावत अगर कुछ अन्य तथ्यों की तरफ जायें तो यह पता चलेगा कि नए रसायनों से बनी दवाओं का प्रयोग जिस स्तर पर भारत में किया जा रहा है शायद ही किसी अन्य देश किया जा रहा हो ! चाहें वो दवाओं का परीक्षण का मामला हो या दवाओं के बाजार से जुड़ा विषय हो कहीं ना कहीं ऐसा प्रतीत होता है कि मरीजों को उपयुक्त दवा देने की बजाय उनपर जबरन दवाएं थोपी जा रहीं हैं ! क्लिनिकल ट्रायल से जुड़े एक सरकारी विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार सन 2005 से लेकर अबतक भारत में 475 उन नए रसायनों को आजमाने का काम भारत में रहने वाले हजारों की संख्या में मरीजों पर बिना किसी ठोस एवं कारगर नीति- के किया जा चुका है जिन रसायनों का प्रयोग दुनिया में पहले कभी नहीं किया गया है ! गौर करना होगा कि लगभग साठ हजार लोगों पर आजमाए गए  475 नए रसायनों में से मात्र 17 दवाओं को ही अब तक मानव स्वास्थ्य के लिए कारगर माना गया है एवं बाजार में उतारने की स्वीकृति मिल पाई है !बड़े स्तर पर चल रहे इस रासायनिक प्रयोग ने ना जाने कितनो का जान लिया है और ना जाने कितनी नयी बीमारियाँ पैदा की हैं,इसका कोई पुख्ता आंकड़ा किसी के पास नहीं है ! दवाओं के इस प्रयोग के खतरनाक होने का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुल 475 नए रसायनों में से मात्र 17 रसायन ही मानव शरीर के अनुकूल पाए गए हैं ! दवाओं के प्रयोग एवं स्वास्थ्य के मसले को लेकर बेहद असंवेदनशील होती हमारी सरकार को समझना चाहिए कि जिन दवाओं को वो बाजार में बिना रोक-टोक के उतार रही है उन दवाओं से मरीजों पर कहीं नाकारात्मक असर तो नहीं पड़ रहा या वो दवाइयां किसी नए रोग की वजह तो नहीं बन रहीं !
           इसमें कोई दो राय नहीं कि एड्स ना सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया के स्वास्थ्य तंत्र के लिए एक चुनौती की तरह है ! इसको लाइलाज बीमारी की कतार से निकालने की कवायदें पूरी दुनिया में चल रहीं हैं ! इस संबंध में अगर देखा जाय तो  एड्स को लेकर जिस तरह के अंतर्राष्ट्रीय अभियान अथवा प्रयास किये गए हैं वैसे प्रयास शायद ही किसी अन्य बीमारी को लेकर किये गए हों ! इन सबके बावजूद इस बात का ख्याल रखा जाना बेहद जरूरी है कि एड्स के रोकथाम के नाम पर नई बीमारियों को बढ़ावा ना मिले ! कोई ऐसा दवा जो बेशक एड्स के लिए कारगर साबित हो रही हो मगर अन्य बीमारियों की वजह बन रही हो अथवा मरीज के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल रही हो,का प्रयोग बिना समय गवाएं बंद किया जाना चाहिए ! ऐसी दवाओं का सरकारी स्तर पर परीक्षण कराने के बाद ही बाजार में उतारा जाना चाहिए ! स्वास्थ्य के मसले पर अगर देखा जाय तो हम ना तो नीतिगत रूप से ही अभी परिपक्व हो पाए हैं ना ही कानूनी तौर पर ही मजबूत हो पाए हैं ! दुनिया के अन्य देशों के साथ अगर तुलनात्मक रूप से देखा जाय तो हम ना तो दवाओं के बाजार को लेकर अभी बहुत ठोस एवं दूरगामी नीति बना पाए हैं ना ही दवाओं के परीक्षण एवं प्रयोग को लेकर ही बहुत सशक्त हो पाए हैं ! हमारे तंत्र को  इस दिशा में कहीं ना कहीं बड़े स्तर पर स्वास्थ्य सम्बन्धी सुधारों को अमली जामा पहनाने की जरुरत है ! हमारी नीतिगत असफलता का परिणाम ही है कि मरीजों के स्वास्थ्य पर गलत असर डालने वाली दवाओं को प्रतिबंधित कर उन दवा निर्माता कंपनियों पर नकेल कसने की बजाय हमारी सरकार उन दवाओं को मुफ्त में बांट रही है ! इस संदर्भ में स्वास्थ्य पर काम करने वाले कई संगठनो का दावा है कि यहाँ मामला सरकार एवं कंपनियों के मिलीभगत का है एवं दोनों ही स्वास्थ्य को लेकर बेहद लापरवाह हैं ! इन संगठनो का कहना इसलिए भी सही लगता है क्योंकि स्वास्थ्य से जुड़े कई मसलों पर अक्सर माननीय सर्वोच्च न्यायालय को स्वत: संज्ञान लेना पड़ता है जबकि ये काम सरकारों का है ! हमें इस बात का ख्याल रखना होगा कि दवाओं का दायरा दवाओं तक सीमित हो ना कि दवाएं ही मरीज के लिए जहर बन जायें !

शिवानन्द द्विवेदी सहर 

  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें