(3-मई-13)
किसी भी गंभीर मामले की जाँच करने के लिए बनाई गयी देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी ही अगर सत्तापक्ष के अधीनस्थ काम करने लगे तो जांच की शुचिता का सवाल उठना लाजिमी है ! भारत की सर्वोच्च जांच एजेंसी सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्विस्टीगेशन(सीबीआई) की स्वायत्ता का सवाल तो बहुत पहले से उठता आ रहा है ! साल भर पहले हुए अन्ना आंदोलन के दौरान टीम अन्ना द्वारा प्रस्तावित लोकपाल मसौदे में सीबीआई की स्वायत्ता को लेकर सदन में विपक्ष और सरकार के बीच काफी रार देखी जा चुकी है ! उस विशाल जनांदोलन के दौरान भी कभी सरकार की नीयत सीबीआई को सत्ता पक्ष के चंगुल से मुक्त करने की नहीं दिखी ! आज जब कोंल आवंटन में हुई गडबडी पर चल रही सीबीआई जांच में सरकारी हस्तक्षेप का मामला सामने आया है तो शासन के ही एक अंग माननीय सर्वोच्च न्यालालय ने खुद सीबीआई की अधीनस्थता पर सवाल खड़े कर दिया है ! सरकार के लिए न्यायपालिका की तरफ से इससे बड़ी फटकार शायद पिछले कुछ सालों में कभी नहीं मिली हो ! हालाकि ऐसा नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने कोई नई बात कही है कोई नया खुलासा हुआ है ! दरअसल इस पुरे मामले की गंभीरता यह है कि शासन के ही एक महत्वपूर्ण अंग ने लोकतांत्रिक शासन के दूसरे महत्पूर्ण अंग पर प्रत्यक्ष सवाल खड़ा किया है आर उसकी तीखी आलोचना की है ! अगर इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गयी तल्ख़ टिप्पणियों पर नजर डालें तो सीबीआई कि अधीनस्थता को लेकर चिंतित सर्वोच्च न्यायालय ने अपने बयान में स्वतंत्र जांच एजेंसी की मांग तक कर डाली है ! न्यायालय ने साफ़ तौर पर कहा है कि देश की जांच एजेंसी को किसी भी दखल से मुक्त करने की शीघ्र जरुरत है ! लिहाजा, सीबीआई के कार्यों में सरकारी हस्तक्षेपों पर अबतक टाल-मटोल करती आ रही सरकार अब इस मामले में पूरी तरह से घिरी नजर आ रही है ! न्यायालय के इस बयान ने ना सिर्फ सरकार की बची-खुची साख पर बट्टा लगाया है बल्कि सीबीआई की स्वायत्ता की मांग करने वालों को सरकार को घेरने का सुनहरा मौका भी दिया है !
दरअसल, कोल आवंटन से जुड़ा पूरा मामला प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है अत: इस बात पर संदेह नहीं किया जा सकता कि सरकार द्वारा इस मामले में प्रधानमंत्री को बचाने का प्रयास नहीं किया गया होगा ! सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा द्वारा दाखिल हलफनामे में जो बातें सामने आईं हैं उसमे सबसे गंभीर मामला सीबीआई द्वारा जांच की स्टेट्स रिपोर्ट को केन्द्र सरकार के क़ानून मंत्री सहित दो अधिकारियों के साथ साझा किये जाने का है ! यहाँ बड़ा सवाल ये है कि आखिर सीबीआई को इस बात का दबाव कहाँ से मिला कि उसे अपने अधिकार और कार्यक्षेत्र से बाहर जाकर जांच की स्टेट्स रिपोर्ट सरकार के मंत्री के साथ साझा करनी पड़ी ! इस बात को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता कि अगर सरकार द्वारा सीबीआई पर रिपोर्ट साझा करने का दबाव बनाया जा सकता है तो उसमे अपनी बचाव वाले हेर-फेर भी कराये जा सकते हैं ! अगर देखा जाय तो भारत में जांच एजेंसी के तौर पर काम कर रही सीबीआई का वर्तमान संरचनात्मक ढाँचा ही कुछ ऐसा है कि उसके निष्पक्ष एवं दबावमुक्त होने की गुंजाइशें ना के बराबर हो जाती हैं ! दरसअल डीपीएस एक्ट 1946 के तहत गठित की गयी इस जांच एजेंसी को गृहमंत्रालय के अंतर्गत रखकर केन्द्र सरकार के जांच एजेंसी के तौर पर बनाया गया था ! मगर सत्ता एवं सरकार पर समय के साथ तेजी से विकसित हुए दलगत प्रभावों से सीबीआई भी अछूती नहीं रही ! आज अगर यह कहा जाय तो गलत नहीं होगा कि सीबीआई सरकार की जांच एजेंसी ना होकर सत्ताधारी राजनीतिक दल की जांच एजेंसी के रूप में काम कर रही है ! सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब साफ़ हो गया है कि सीबीआई में व्यापक सुधारों की जरुरत है ! सीबीआई में किये जाने वाले सुधारों की पहल उसके नियुक्ति, तबादले एवं बर्खास्तगी आदि की वर्तमान प्रक्रिया से किये जाने की जरुरत है ! क्योंकि,सीबीआई पर सरकारी हस्तक्षेप का सबसे महत्वपूर्ण कारण यही है कि तबादले एवं नियुक्ति आदि पर पूरी तरह से सरकार का नियंत्रण है और इसी को हथियार बनाकर सरकार के लोग सीबीआई का इस्तेमाल अपने बचाव अथवा राजनैतिक हित में करते रहें हैं ! इस दिशा में सबसे पहली जरुरत इस बात की है कि सीबीआई में आला पदों पर होने वाली नियुक्तियों,तबादलों एवं प्रोन्नतियों आदि के नियामकों में व्यापक बदलाव कर शक्ति-विकेन्द्रीकरण की नीति अपनाई जाय !नियुक्ति आदि की प्रक्रियाओं में शक्ति-विकेन्द्रीकरण का सबसे बड़ा फायदा यह होगा सीबीआई ना तो किसी एक पक्ष अथवा संस्था के प्रति आस्थावान बनेगी और ना ही किसी केंद्रीय शक्ति द्वारा निजी हित में इस्तेमाल की जायेगी ! सीबीआई की स्वायत्ता को लेकर अन्ना टीम द्वारा दिये गए लोकपाल मसौदे से बहुत सारे बिंदु लिए जाने योग्य हैं जिसे पिछले साल सरकार ने पूरी तरह खारिज कर दिया था ! अब जब सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए सीबीआई को स्वतंत्र जांच एजेंसी बनाकर इसे सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की हिमायत की है तो सरकार को सीबीआई में किये जाने वाले सुधारों से सम्बंधित मसलों पर पुनर्विचार कर उन्हें अमली जामा पहनाने की जरुरत है ! मामले की गंभीरता को देखा जाय तो अब टाल-मटोल एवं तर्कों से काम नहीं चलने वाला,क्योंकि सीबीआई के जांच में सरकारी हस्तक्षेप के इस मसले पर केन्द्र सरकार पूरी तरह से एक्सपोज हो चुकी है ! सीबीआई में सुधार भारतीय संघीय ढाँचे के लिए भी बहुत जरूरी हैं ! अक्सर भारतीय राज्यों द्वारा विभिन्न मामलों में केन्द्र की सरकारों पर सीबीआई की धौंस पर दबाव बनाकर अपना राजनीतिक हित साधने का आरोप लगता रहा है ! यह आवाज राजनीतिक गलियारों में अक्सर उठती रही है कि अपने संख्याबल को साबित करने के लिए अक्सर केन्द्र सरकार द्वारा सीबीआई की घुडकी क्षेत्रीय दलों को दी जाती रही ! यू.पी में माया-मुलायम इस मामले में सबसे बड़ी नजीर के तौर पर देखे जा सकते हैं ! सीबीआई का इस तरह से होने वाला राजनीतिक हितों के लिए प्रयोग बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और इसका निराकरण भी सीबीआई को सत्ता के चंगुल से मुक्त करके ही किया जा सकता है !
इस मसले पर अगर विपक्ष द्वारा हो-हल्ला किया जाता है तो इसे बिलकुल भी गलत नहीं कहा जाएगा ! राजनीति में अवसर और जरुरत सबसे महत्वपूर्ण होता है ! आज सरकार की एक बड़ी नाकामी पर लगी न्यायालय की मुहर को अगर जनता के बीच ले जाने का रास्ता हो-हल्ला से होकर ही जाता है तो विपक्ष को यह करने का राजनैतिक अधिकार है और उसे इसे जनता के बीच ले जाना चाहिए चाहिए ! यह सिर्फ जांच की शुचिता से जुड़ा मसला नहीं है बल्कि इसे लोकतंत्र की समूची राजनीतिक शुचिता से जुड़ा विषय मानने की जरुरत है !
शिवानन्द द्विवेदी सहर

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें