15-मई-13
इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि संवैधानिक रूप से भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है,जिसका जिक्र भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ही किया गया है ! लिहाजा,इस बात को लेकर तो सौ प्रतिशत आश्वस्त हुआ जा सकता है कि संविधान की नजर में सभी धर्म सामान है और संविधान किसी भी धर्म को आम या खास नजर से नहीं देखता ! इन सबके बावजूद भारत एक ऐसा मुल्क है जहाँ संवैधानिक मान्यताओं के समानांतर कुछ सामाजिक,धार्मिक मान्यताएं भी चलती हैं जिनका संवैधानिक मान्यताओं के साथ परस्पर विरोधाभाष होता है ! हाल ही में देश की सर्वोच्च पंचायत के निचले सदन हुए एक वाकये के बाद एक बार फिर राष्ट्र बड़ा या धर्म की बहस ने जोर पकड़ लिया है ! दरअसल,उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से बसपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क द्वारा ठीक उस समय सदन का बायकाट किया गया जब सभी सांसद भारत के राष्ट्रगीत के लिए अपने स्थान पर खड़े हुए थे ! इस पुरे मामले के बाद विरोध और समर्थन के विमर्शों में जो मूल विषय निकल कर आ रहा है वो है कि क्या भारतीय संविधान हमें धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हमें इतनी आजादी देता है कि हम राष्ट्रीय मूल्यों एवं संसदीय परम्पराओं का अपमान करें ! राष्ट्र बनाम धर्म के नाम पर खड़े हुए इस विमर्श को कई कोणों से समझने की जरुरत है ! सबसे पहले अगर “वंदे मातरम” ना गाने के पीछे इस्लामिक तर्क को समझने कि कोशिश करें तो यही तथ्य बार-बार सामने रखा जाता है कि इस्लाम में सिवाय खुदा(अल्ला-ताला) के किसी अन्य का वंदन करने की आजादी नहीं है अथवा ऐसा करना इस्लाम के खिलाफ है ! अब भारतीय राष्ट्रगीत में राष्ट्र को माँ मानकर उसका वंदन किया गया है अत: इस्लामिक समुदाय के लोगों द्वारा यह तर्क दिया जाता रहा है कि यह इस्लाम की मान्यताओं के खिलाफ है ! हालाकि वंदे मातरम से परहेज करने के पीछे भाषाई कारण भी नजर आता है ! चुकि वंदे मातरम की भाषा संस्कृतनिष्ठ है और संस्कृत को हिन्दु धर्म से जोड़कर देखा जाता रहा है अत: वंदे मातरम के विरोधियों के विरोध का एक कारण यह भी हो सकता है ! अगर देखा जाय तो अतार्किक ही सही मगर भाषाई द्वेष का यह प्रश्न एकतरफा नहीं है बल्कि हिंदू धर्म के कट्टरपंथियों द्वारा भी उर्दू को इस्लाम की भाषा के तौर पर देखा जाता रहा है ! राष्ट्रीय प्रतीकों,चिन्हों आदि स्वीकारने अथवा अस्वीकारने के मसले पर भी मामला बिलकुल एकतरफा नहीं नजर आता बल्कि इसमें भी दो अलग-अलग धर्मों पर सवाल उठाये जा सकते हैं ! अगर आज बसपा सांसद बर्क अपने धार्मिक मान्यताओं का हवाला देकर संसद में वंदे मातरम गाने से परहेज किया हैं तो हमें इस बात को भी याद रखना होगा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सन 2005 तक भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को अपने तर्कों पर खारिज करता आया है और नागपुर स्थित अपने मुख्यालय पर अभी भी इसे फहराया नहीं है ! लेकिन यहाँ बर्क का मामला ज्यादा गंभीर है क्योकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने मुख्यालय पर नहीं फहरता जबकि शफीकुर्रहमान बर्क ने संसद में राष्ट्रगीत को खारिज किया है !
सवाल यह है कि क्या एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में किसी को भी इतनी धार्मिक आजादी दी जानी चाहिए कि वो अपने धार्मिक मान्यताओं के आधार पर संवैधानिक प्रणाली अथवा मान्यता को ही चुनौती देने लगे ! प्रश्न निहायत कठोर जरुर है मगर वंदे मातरम का अपमान करने वाले बसपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क से यह सवाल जरुर पूछा जाना चाहिए कि अगर वो वाकई इस्लाम अथवा इस्लामिक क़ानून के प्रति इतने आस्थावान है तो वो इस संवैधानिक संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में हिस्सा ही क्यों ले रहे हैं ! उन्हें इस बात का ज्ञान जरुर होना चाहिए कि इस्लाम में धर्मनिरपेक्षता शब्द को कहीं कोई जगह नहीं दी गयी है और इस्लाम में मान्यता ना रखने वालों को काफिर कहा गया है ! अत: एक ऐसे मुल्क जहाँ काफिर बहुसंख्यक हैं और संविधान सम्मत संसदीय लोकतंत्र है वहाँ उनके जैसे इस्लामिक मान्यता वाले को तो इस लोकतान्त्रिक प्रणाली की ही खिलाफत कर देनी चाहिए ! अगर शफीकुर्रहमान बर्क के इस्लामिक मान्यताओं के प्रति सोच का नजरिया इतना चयनित है तो इसे महज वोट की राजनीति का नाम दिया जा सकता है ना कि इस्लाम के प्रति आस्था के नजर से देखा जा सकता है ! रही बात उस एक मात्र अल्ला-ताला की वन्दगी की तो क्या शफीकुर्रहमान बर्क इस बात के प्रति आश्वस्त करेंगे कि वो जिस राजनीतिक दल से सांसद हैं वहाँ वो जय भीम के नारे नहीं लगाये होंगे या बहन जी के चरण चुम्बन नहीं किये होंगे ? क्या बसपा ने शफीकुर्रहमान बर्क को इस बात के प्रति आश्वस्त किया है कि अगर केन्द्र में उनकी सरकार बनी तो वन्देमातरम सहित तमाम इस्लाम विरोधी चीज़ों को भारतीय लोकतंत्र से हटा लिया जाएगा ? इसे शफीकुर्रहमान बर्क का दोहरा चरित्र नहीं तो और क्या कहेंगे कि एक संविधान सम्मत धर्मनिरपेक्ष संसदीय लोकतंत्र में जनता के बीच से चुनकर आने के बाद संसदीय सुविधाओं का लाभ लेने वाले शफीकुर्रहमान बर्क साहब को सिर्फ वंदे मातरम से ही धार्मिक आस्था को ठेस पहुचता है !
धर्म बड़ा या राष्ट्र के नाम पर चल रहे इस विमर्श में चाहे कोई हिन्दुवादी संगठन या व्यक्ति हो अथवा इस्लामिक कट्टरपंथी हो या किसी भी अन्य धर्म का अनुयायी हो, राष्ट्र से बड़ा ना तो वो खुद हो सकता है और ना ही उसका धर्म ही हो सकता है ! अगर कोई व्यक्ति अथवा समुदाय अपने धार्मिक मान्यताओं को राष्ट्र की मान्यताओं से ऊपर साबित करने की कोशिश करता है तो इसे राष्ट्र विरोध के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता है ! अगर भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है तो हमें धर्मनिरपेक्षता का सही अर्थ जरुर समझना होगा ! बेशक भारतीय संविधान सबको अपनी इच्छा का धर्म मानने की आजादी देता है मगर साथ ही एक बात और कहता है कि अन्य धर्मों का भी सम्मान करो ! मगर यहाँ तो स्थिति उलट ही नजर आती है, कोई समुदाय तिरंगे को खारिज करता आया है तो कोई राष्ट्रगीत की संसदीय परम्परा को ही नकार रहा है ! धर्म के प्रति आपकी मान्यता आपका निजी मसला है जिसे आप अपने तरीके से समझते और सुलझाते हैं जबकि राष्ट्रीय मान्यताओं को सामाजिक स्तर पर समझने की जरुरत है ! अपने निजी जीवन पद्धति में आप चाहे जिस धार्मिक मान्यता के हिसाब से जीवन यापन कर रहे हों लेकिन राष्ट्रीयता के मसले पर आपका नजरिया राष्ट्र की मान्यताओं के प्रति उन्मुख होना चाहिए ! संविधान सम्मत लोकतांत्रिक प्रणाली में ना तो किसी का शरियत क़ानून लागू किया जा सकता है और ना ही हिंदू वैदिक नियामक ही स्वीकार किये जा सकते हैं ! धर्मनिरपेक्ष भारतीय लोकतंत्र में आपके धर्म का वजूद आपके निजी जीवन तक सीमित है जबकि संसद भवन में खड़ा होने वाला कोई प्रतिनिधी उस दौरान निजी जीवन में नहीं जी रहा होता है ! शफीकुर्रहमान बर्क को इस बात को ठीक से समझना चाहिए कि संसद उनका घर अथवा मस्जिद नहीं बल्कि समूचे भारतवर्ष के नागरिकों द्वारा भेजे गए प्रतिनिधियों का सार्वजनिक मंच है और वहाँ अगर कोई अपना निजी धर्म थोपने की कोशिश करेगा तो इसे साम्प्रदायिकता का नाम दिया जाएगा ! संसद की मर्यादा में बट्टा लगाने वाले ऐसे दोहरे चरित्र के नेताओं पर संसद द्वारा प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए ! धर्म के नाम पर राष्ट्र का अपमान कतई स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए ! राष्ट्र हमेशा और हर धर्म से बड़ा है !!

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