शुक्रवार, 24 मई 2013

खोखले दावों के चार साल : दैनिक जागरण में प्रकाशित लेख




संप्रग-२ सरकार की चौथी वर्षगाँठ मनाते हुए संप्रग सरकार ने पिछले चार साल की उपलब्धियों का जो रिपोर्ट कार्ड जारी किया है उसमे सरकार द्वारा अपनी पीठ थपथपाने की कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी गयी है ! विदेश-नीति से लेकर सामाजिक समावेश एवं मानव विकास आदि के मसलों को सरकार द्वारा जम कर प्रचारित किया गया है जबकि महंगाई,गरीबी आदि मसलों पर सरकार की यह रिपोर्ट कन्नी काटती नजर आ रही है ! आंकड़ों की दुनिया से बाहर आकर अगर सरकार द्वारा जारी इस रिपोर्ट का मूल्यांकन वास्तविकता की कसौटी की जाय तो कई ऐसे बिंदु हैं जिसको सरकार द्वारा नजरंदाज किया गया है एवं तमाम बिंदु ऐसे भी नजर आयेंगे जिनमे सरकार द्वारा किये गये दावे झूठे साबित होंगे !  सतही  सच्चाई तो यही है कि इस रिपोर्ट में महज हवा-हवाई आंकड़ो को तरजीह देती नजर आ रही सरकार की उपलब्धियों की लंबी फेहरिश्त, वास्तविकता के धरातल पर चारों खाने चित्त नजर आती है ! सरकार द्वारा जारी इस रिपोर्ट कार्ड में एक दो नहीं बल्कि कई ऐसे दावे हैं जिनका वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं है ! वास्तविकता के आंकड़े तो यही कहते हैं कि इस देश की बहुसंख्यक आम जनता महंगाई से त्रस्त है ! जबकि इसके उलट सरकार का रिपोर्ट कार्ड कहता है कि महंगाई अपने तीन साल के न्यूनतम स्तर पर है ! महंगाई पर काबू ना कर पाने पाने की अपनी नाकामियों को स्वीकारने की बजाय सरकार का यह कहना कि महंगाई अपने अपने तीन साल के न्यूनतम स्तर पर है,एक बेहद अविश्वसनीय एवं हास्यपद बयान लगता है ! क्या सरकार को तीन साल पहले की  पेट्रोल ,डीजल एवं एल.पी.जी  की कीमतें नहीं पता हैं या सबको जानते हुए भी सरकार द्वारा अपनी नाकामियों पर परदा डालने के लिए यह झूठी रिपोर्ट जारी की गयी है ? महंगाई का मसला तो महज एक नजीर मात्र है ! इसके अलावा भी तमाम ऐसे बिंदु हैं जिनपर सरकार द्वारा सच्चाई पर परदा डालने का काम किया गया है ! अपने रिपोर्ट में जिस मनरेगा और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का हवाला देते हुए सरकार द्वारा इसे अपनी उपलब्धियों की फेहरिश्त में रखा गया है उस पर सरकार की अलग-अलग एजेंसियों द्वारा ही अक्सर सवाल उठाये जाते रहें हैं ! सरकार के पास वास्तविक  उपलब्धियों की कितनी कमी है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रिपोर्ट कार्ड के जरिये खाद्य सुरक्षा विधेयक जो महज सदन में पेश हुआ हैं अभी पारित भी नहीं हुआ, को सरकार अपनी प्रमुख उपलब्धि के रूप में गिनाती नजर आ रही है  ! वाकई अगर ये विधेयक सदन में पास हो जाता तो इसे सरकार की निजी उपलब्धि कहा जा सकता था क्योंकि इस  विधेयकों को लेकर सर्वाधिक गतिरोध की स्थिति रही है ! मगर सदन में किसी विधेयक को महज पेश कर देना भला कौन सी उपलब्धि है जिसको अपनी रिपोर्ट कार्ड में इतनी प्रमुखता से जगह दी जाय,यह बात समझ से परे है ! ज्ञात रहे कि सन २००९ से ही प्रस्तावित  भूमि अधिग्रहण बिल अभी तक सरकार द्वारा सदन पटल पर भी नहीं लाया जा सका है जबकि अपनी कामयाबी की फेहरिश्त में सरकार इसे भी अग्रिम कतार में रखी है ! इन सबके अलावा कृषि एवं शिक्षा आदि के क्षेत्र में अपनी रिपोर्ट के कागजों पर  कामयाबी का झंडा खुद ही फहरा रही संप्रग सरकार के दावे इस मामले में भी खोखले साबित हो रहे हैं ! कृषि सुधारों के नाम पर सरकार कितना कुछ कर पाने में कामयाब हुई है इसका प्रमाण इसी बात से मिलता है कि पिछले चार वर्षों में कृषि के क्षेत्र में निवेश का स्तर लागातार गिरा है और मानसून निर्भरता का कोई विकल्प नहीं तलाशा जा सका है ! सरकार की कामयाबी वाली इस स्वघोषित रिपोर्ट में जिस शिक्षा के अधिकार क़ानून को अपनी उपलब्धि बताई गयी है उस क़ानून को शिक्षकों की भारी कमी एवं सरकारी शिक्षण संस्थानों से होता अभिभावकों का मोहभंग, मुह चिढाते नजर आ रहे हैं ! कुपोषण के सवाल पर हजारों करोंड़ का बजट चमकाने वाली सरकार को यह बात जरुर पता होनी चाहिए कि आज भी इस देश में एनीमिया जैसी बीमारी से मरने वाली महिलाओं की संख्या लाखों में है ! तमाम मसलों पर खोखले दावों के साथ अपनी कामयाबी की रिपोर्ट जारी करने वाली सरकार कई मसलों पर चुप्पी साधती भी नजर आई है ! भ्रष्टाचार के मसले पर इस रिपोर्ट कार्ड में सरकार पगडंडी के रास्ते ही चलती नजर आ रही है ! लोकपाल विधेयक का मसला इस रिपोर्ट में हाशिए का विषय है जिसपर सरकार एक पंक्ति में सिर्फ इतना कह पाती है कि इसे भी पारित कराना हमारा उद्देश्य है !
            इसमे कोई दो राय नहीं खोखले दावों के साथ तिल को ताड़ बनाकर जारी किये गए इस रिपोर्ट कार्ड के जरिये सरकार का मंसूबा अपना चुनावी हित साधने से ज्यादा कुछ भी नहीं है ! इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कोई भी सरकार अपने रिपोर्ट कार्ड में कभी अपनी नाकामियों का जिक्र नहीं करती बल्कि अपनी नाकामियों को भी साकारात्मक ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास करती है ! लिहाजा,संप्रग सरकार द्वारा जारी इस रिपोर्ट में वाकई उन अहम बिंदुओं पर ज्यादा कुछ नहीं बताया गया है जो जनता के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं ! जनता से प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े मसलों पर कुछ बोलने की बजाय सरकार द्वारा विदेश-नीति एवं सामाजिक समावेश आदि पर अपना पक्ष ज्यादा मजबूत नजर आता है ! चुकि, इन चार सालोन के कार्यकाल में जनहित से बुनियादी तौर पर जुड़े तमाम मसलों पर सरकार ज्यादातर नाकाम ही रही है चाहें वो गरीबी उन्मूलन हो या भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन अथवा महंगाई एवं आतंकवाद ही क्यों ना हो ! सरकार के नजरिये से ये वो विषय हैं जहाँ जाकर उसको जवाब देना आसान नहीं होगा और वो घिर सकती है ! अत: सरकार द्वारा इन मसलों को उपरी तौर पर छूते हुए उन मसलों पर ज्यादा जोर देने की कोशिश की गयी है जिनकी समझ जनता को बहुत नहीं है अथवा जो सीधे तौर पर जनता से जुड़े नहीं हैं ! मगर अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए सरकार द्वारा किसी भी गलत तथ्य को रखा जाना यह साबित करता है कि यह सरकार बेहद लापरवाह,झूठी एवं अपनी जवाबदेही से भागने वाली सरकार है ! आर्थिक सुधारों का हवाला देकर अक्सर महंगाई की मार देती रही सरकार अगर अपने रिपोर्ट कार्ड में अगर वाजिब कारणों एवं तर्कों को रखते हुए यह बता देती कि वाकई वो महंगाई पर नियंत्रण पाने एवं गरीबी उन्मूलन के लक्ष्यों में पूरी तरह से कामयाब नहीं हो पाई है तो सरकार द्वारा जारी इस रिपोर्ट कार्ड की शुचिता पर सवाल नहीं उठ रहे होते ! सच्चाई और वास्तविकता से परे इस रिपोर्ट कार्ड के तमाम दावे खोखले एवं बेबुनियाद हैं ! देश की आम जनता आज भी महंगाई से त्रस्त है,गरीबी आपदा की तरह आज भी कायम हैं,निजीकरण के कारण शिक्षा महँगी होती जा रही है तो वहीँ इसके उलट संप्रग सरकार इन समस्याओं को अपने ढंग से परिभाषित करके इन्हें समस्या ही नहीं मानती है ! मनमोहन सिंह की सफलता के नाम जारी इस रिपोर्ट को बनाने वाले लोगों को यह जरुर समझना चाहिए कि देश की प्रगति रिपोर्ट पर लिखे आंकड़ों से नहीं वास्तविकता की बुनियाद पर टिकी होती है ! ऐसी निराधार रिपोर्ट के बूते जन-सरोकारी एव जन-हितैषी होने की प्रमाणिकता नहीं दी जा सकती है ! क्योंकि, रिपोर्ट जारी होने के बाद उसकी समीक्षा और उसका मूल्यांकन भी किया जाता है और इस रिपोर्ट के मूल्यांकन में यह सरकार और इसके दावे बेहद खोखले साबित हो रहे हैं ! 

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