सोमवार, 19 अगस्त 2013

ख्याति का खजाना :बिंदिया मैगज़ीन में प्रकशित व्यंग्य


बचपन में स्कुल के मास्टर जी द्वारा पूछा हुआ एक सवाल गाँव के ही रमई काका से पूछ बैठा था ! काका रस कितने तरह का होता है ? मैंने तो यूँ ही तफरी में पूछा था, मगर काका सवाल को सीरियस ले लिए और बोल बैठे ‘दुई तरह का, एक चीनी का और दूसरा गुड़ का” ! अब मसि कागद छुयो नहीं कलम गह्यो नहीं हाथ वाले रमई काका को भला क्या पता था कि हिन्दी के मास्टर जी के लिए रस नौ तरह के होते है ! रमई काका के दो और हिन्दी वाले मास्टर जी के नौ मिलाकर कुल ग्यारह रस पढ़ने के बाद लगा कि चलो अब यह अध्याय बंद हुआ और इस रस-कुचन से निजात मिल गयी ! ग्यारह रसों का ज्ञान लेने के बाद अगर आप कविता भी लिखना चाहते हों तो प्रथम शर्त ये है कि आप खुद को लेखक या लेखिका होने जैसा महसुस भी करें तभी आप पहली कविता लिख सकते हैं ! साहित्य में महसुस करने का अनोखा चलन है ! लिखने से ज्यादा महसुस करना जरूरी है, अब ये महसुस करना भी ना जाने क्या बला है ! हालाकि इस बारे में मैंने किसी ख्यातिप्राप्त महोदय से पूछने का कोई जोखिम नहीं लिया, क्या पता वो कह दे कि यही तो  साहित्य का महसुस-रस है ! खामोखा एक रस का और झंझट लेना पड़ जाता  ! चुकि ख्यातिप्राप्त महोदयों से कुछ पूछने का बड़ा रिस्क ये है कि वो जो बताते हैं वही मनवाते भी है, यह सोचकर मै ख्यातिप्राप्तों से कुछ नहीं पूछता !  बात आ ही गयी है तो जरा इस “ख्यातिप्राप्त” के रहस्यों को भी टटोलता ही चलूँ ! सच कह रहा हूँ यह शब्द जितना साहित्यजगत में उछल-कूद करता नजर आता है शायद ही कहीं और दिखता हो ! पता नहीं साहित्य में इस ख्याति का खजाना कहाँ छुपा हुआ है जिसका कोई ओह-टोह ही नहीं मिलता ! यह ख्याति आती कहाँ से है और कई लोग इसे प्राप्त कैसे कर लेते हैं,ये आज भी अबूझ पहेली है ! बात इतनी ही होती तो अपन इस ख्यातिप्राप्त के पचड़े में नहीं पड़ते लेकिन आश्चर्य तो ये होता है कि इस ख्याति को प्राप्त करने के बाद ख्यातिप्राप्त लोग इसे आगे भी अपने नाम का रसघोल बनाकर बांटने का धंधा बढ़ा देते हैं ! कभी-कभी मन करता है कि कह दूँ कि आपको ख्याति प्राप्त हो गयी ना, अब आप संतोष धरिये और मुझे उस ख्याति के खजाने का पता बता दीजिए जहाँ से मै भी थोड़ी ख्याति ला सकूँ ! सारी ख्याति का खजाना खुद लूट लेंगे क्या ? वो भी बिना टैक्स दिये ? साहित्य में इतना कालाधन क्यों बना रहे हैं आप ? खैर, ये ख्याति तो आज भी मेरे लिए रहस्य है, कभी और इसपर रिसर्च करूँगा ! फिलहाल बात रस की हो रही थी और ख्यातिप्राप्त पर आ गयी ! हालाकि ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो मेरे जैसे नौ और दो ग्यारह रस पढकर साहित्य में उतरने के बाद ख्यातिप्राप्त लोगों के पचडों में पड़ने की बजाय गद्य विधा का नौ दो ग्यारह रस पढ़ते हुए बाहर निकल लेते हैं ! रस साहित्य में घुसे तो ठीक लेकिन गलती से भी साहित्यकार के अंदर घुस गया तो मामला उमर का लिहाज भी नहीं रखने देता है ! साहित्यकारों को रस से दूरी बनानी चाहिए, खासकरके उन साहित्यकारों को जो श्रृंगार रस के स्थायी भाव पर काम करते  हैं ! हाल ही की बात है एक युवा लेखिका ने अपने द्वारा शोध-ग्रंथ पर किये गए पाठ पर किसी ख्यातिप्राप्त साहित्यकार से टिप्पणी लिखने को कहा तो उन्होंने उस लेखिका के सौंदर्य का वर्णन ही लिख दिया था ! लेखिका नाराज होकर इसे अपने ब्लॉग पर चेंप दीं, हालाकि इसमें नाराज भी क्या होना ? यही तो श्रृंगार का साहित्यकार रस है जो साहित्य की बजाय साहित्यकार में ही घुस कर बैठ गया है ! अगर मै वहाँ होता तो उक्त साहित्यकार महोदय से उनकी आत्मकथा लिखने का निवेदन किया होता ! क्या पता हिन्दी साहित्य को भी एक अभिज्ञान शाकुंतलम मिल जाता ! वो ठहरी नई लेखिका, नहीं समझ पाई ! वैसे कोई भी नई लेखिका इस बात को कहाँ समझ पाती है कि ख्यातिप्राप्त लोग चौसठ   कलाओं के माहिर हैं ! अगर आप अभीतक गद्य विधा वाले नौ दो ग्यारह रस का महत्व नहीं समझ पाए हैं और अभी भी काव्य विधा वाले रस की लाइन में लगे हैं तो देर किस बात की, शोर्टकट देखिये और मार दीजिए एक छलांग रस के इस विशाल बाजार में जहाँ एक से बढ़कर एक रस बेचने वाले ख्यातिप्राप्त दुकानदार अपनी ख्यातिलब्ध दूकान लगाये बैठे हैं ! उसी में से कोई एक दूकान पकड़ लीजिए और लगा लीजिए मोल-भाव,दाम-काम फिर मिला लिजिये उनके रस का घोल अपनी रचना की बोतल में और गटक जाइए बिना रुके एक घूंट में, फिर क्या ....लो जी बन गए आप भी साहित्यकार ! 
 

सम्मान,सियासत और भोजपुरी : जन्संदेश टाइम्स में प्रकाशित लेख



  • शिवानन्द द्विवेदी सहर
बीस करोंड़ से ज्यादा लोगों द्वारा बोली एवं समझी जाने वाली भाषा भोजपुरी को लेकर अभी भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि भोजपुरी एक स्वतंत्र भाषा है अथवा हिन्दी बोली है ! हालाकि इस विमर्श पर तबतक विराम लगता नहीं दिख रहा जबतक भोजपुरी को संविधान की आठवी अनुसूची में जगह ना मिल जाए ! भोजपुरी भाषा बन पाए अथवा नहीं, इसमें रोजगार की संभावना  हो अथवा नहीं, इस भाषा में पढ़ाई हो अथवा नहीं, लेकिन दो ऐसी बाते हैं इस भाषा में जिसके कारण यह भाषा हमेशा चर्चा में रहती है ! भोजपुरी अपने सैकड़ों साल पुरानी संपदा के कारण बेशक आज चर्चा में ना हो लेकिन अपने सम्मान समारोहों एवं सियासत की वजह से खूब चर्चा में रहती है ! अगर पिछला रिकोर्ड उठा कर देखा जाय तो भोजपुरी के नाम पर पिछले कुछ सालों में जितने सम्मान थोक की मात्रा में लिए और दिये गए हैं,उतने सम्मान कहीं और नहीं दिये गए होंगे ! हाल ही के एक वाकये में बिहार भोजपुरी एकादमी की तरफ से सम्मान देने का चलन शुरू किया गया जिसमे भोजपुरी गायक भरत शर्मा व्यास एवं मनोज तिवारी सहित कई कथित एवं स्वघोषित भोजपुरी के गणमान्य लोग एकादमी द्वारा सम्मानित किये गए ! उसी समारोह में भोजपुरी एकादमी के ब्रांड एम्बेसडर के तौर पर मालिनी अवस्थी के नाम की घोषणा हुई ! सम्मान समारोह के दो दिन बाद भरत शर्मा और मनोज तिवारी ने एकादमी के सम्मान को वापस करते हुए यह कहा कि भोजपुरी में योग्य लोगों के रहने के बावजूद अवधि गायिका मालिनी अवस्थी को ब्रांड एम्बेसडर क्यों बनाया गया ! सम्मान वापस करने और आरोप-प्रत्यारोप के बीच कई बातें सामने आईं और एकादमी अध्यक्ष से लगाए सम्मान लेने और देने वालों का अंदरूनी चरित्र खुलकर सामने आ गया ! यह स्थिति  तब है जब बिहार सरकार की तरफ से यह साफ़ किया जा चुका है कि ये सारे सम्मान और घोषणाएं गैर-सरकारी हैं और इनका किसी भी सरकारी संस्था से कोई लेना-देना नहीं है ! अब बड़ा सवाल ये उठता है कि भोजपुरी वालों को सम्मान और पुरस्कार का लेन-देन इतना प्रिय क्यों है ? वो सम्मानित होने को इतना आतुर क्यों रहते हैं ? इन सबसे इतर अगर बात भोजपुरी की दिन-दशा की करें तो फिलहाल भोजपुरी की स्थिति ना इधर की है ना उधर की, लेकिन भोजपुरी के नाम पर अपनी साख बनाने वाले लोग खूब फल-फुल रहे हैं ! इस पुरे मामले को अगर बारीकी से देखें तो सवाल सब पर उठते हैं और कोई पाक साफ़ नहीं नजर आता ! सबसे पहले बात अगर बिहार भोजपुरी अकादमी की करें तो सवाल ये है कि भोजपुरी एकादमी को अगर बिहार सरकार द्वारा इस आयोजन अथवा सम्मान घोषणा की स्वीकृति नहीं दी गयीं थी तो ये सारी घोषणाएं किसके अधिकार क्षेत्र से की गयीं ? दूसरा सवाल ये है कि भोजपुरी के क्षेत्र में दिये गए इन सम्मानों को लेकर पैमाना क्या रखा गया एवं उसको तय करने वाले लोग कौन थे ? एक सवाल ये भी है कि कहीं सम्मान देने और लेने के नाम पर धन-उगाही का धंधा तो नहीं किया जा रहा है ?
     एकादमी के द्वारा किये गए कार्यों के बाद उठने वाले ये सवाल फ़िज़ूल नहीं हैं बल्कि ये निहायत गंभीर सवाल हैं ! चुकि बिना सरकार की अनुमति अथवा स्वीकृति के अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर बिहार भोजपुरी एकादमी अध्यक्ष द्वारा निजी स्तर पर इस कार्यक्रम का आयोजन कराया गया अत: पूरी उम्मीद है कि सम्मानों की घोषणाओं का पैमाना भी वही अथवा उन्ही के लोग तय किये होंगे ! आज जब मामला सार्वजनिक हो गया है तो इस बात का जवाब भोजपुरी एकादमी के अध्यक्ष के पास भी नहीं होगा की उस समारोह में जिन लोगों को सम्मानित किया गया वो लोग भोजपुरी के लिए क्या खास किये हैं ! हालाकि इन सवालों के जवाब में सिवाय बचाव और कुतर्क के कुछ मिलता नहीं दिख रहा ! अब अगर बात ब्रांड एम्बेसडर को लेकर उठे विवाद कि की जाय तो बेशक यह पद गायिका मालिनी अवस्थी को मिला है लेकिन उन्हें भी इस पद को लेकर इतराने की जरूरत नहीं हैं ! मालिनी अवस्थी को गैर आधिकारिक तौर पर केवल एक व्यक्ति विशेष द्वारा भोजपुरी एकादमी का ब्रांड एम्बेसडर बनाया गया है ना कि भोजपुरी का ब्रांड एम्बेसडर ! दरअसल, भोजपुरी में ब्रांड एम्बेसडर बनाए जाने का कोई औचित्य ही नहीं है और सही मायने में देखा जाय यह पद ही औचित्यविहीन है ! जिस भाषा का ही वजूद सरकारी स्तर पर शून्य हो उस भाषा के नाम पर संस्था चलाकर सम्मान आदि देना कहीं से भी न्याय संगत और तर्कपूर्ण नहीं लगता है !
आज जब मालिनी अवस्थी के ब्रांड एम्बेसडर बनाये जाने पर भरत शर्मा व्यास और भोजपुरी गायक मनोज तिवारी एकादमी पर सवाल उठा रहे हैं तो एक सवाल उनपर भी उठता है कि आखिर वो सम्मान लेने के मामले में खुद इतने लालायित क्यों रहते हैं ! गौरतलब बात है कि एकादमी का सम्मान वापस करने वाले लोग  ठीक चार दिन बाद दिल्ली में एक सम्मान समारोह भोजपुरी के नाम पर ही सम्मान लेते देखे गए ! वो भी उस मंच से जिसका भोजपुरी की अस्मिता से कोई लेना देना नहीं !
     अब जब भोजपुरी में हालात ऐसे हों तो किसे गलत और किसे सही कहा जाय, इसकी पहचान बहुत ही मुश्किल है ! गिरगिट की नस्ल में घूम रहे ये स्वघोषित भोजपुरिया प्रचारक लोग कब,कहाँ और किस करवट अपना पाला बदले इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता ! हमें समझना होगा कि भोजपुरी परम्परा में रामनाथ पाण्डेय,महेंद्र मिसिर,पाण्डे कपिल जी, विवेकी राय, अर्जुन सिंह अशांत जैसे भोजपुरी साहित्यकारों जिन्होंने कम ही सही मगर भोजपुरी दर्शन को अपनी लेखनी में उकेरने का काम किया है , आज उन्हें हाशिए पर लाया जा चुका है ! लेकिन सम्मान लेने और देने के नाम पर ऐसे-ऐसे लोगों का नाम लिया जाता है जिनको ढंग से भोजपुरी बोलने तक नहीं आती है ! भोजपुरी में अश्लीलता के विरोध के नाम पर जो लोग आज झंडा उठाये नजर आते हैं, कमोबेश वही लोग भोजपुरी में अश्लीलता फैलाने वालों के साथ मंच साझा करते एवं सम्मान लेते-देते हुए आसानी से देखे जा सकते हैं !
          आज जब भाषाओं पर किये गए एक सर्वे में यह रिपोर्ट आई है कि पिछले साठ सालों में सैकड़ों भाषाएँ मृतप्राय हो चुकी हैं ऐसे में भोजपुरी को लेकर चिंता लाजिमी है ! कहीं ऐसा ना हो कि भोजपुरी के ये ठेकेदार अपनी अंदरूनी राजनीति चमकाने के लिए अपना स्तर इसी तरह गिराते रहे और आठवीं अनुसूची में भोजपुरी को शामिल कराने के नाम पर राजनीति करते रहे तो भोजपुरी की दशा भी वही हो जो बाक़ी अन्य विलुप्त होती भाषाओं की हुई है ! सरकार तो पहले से ही भोजपुरी को हाशिए पर ला चुकी है अब भोजपुरी को ज्यादा खतरा अपने सम्मान वाहकों और अंदरूनी राजनीति करने वालों से है ! ऐसे में आम भोजपुरिया लोगों को चाहिए कि वो ऐसी हर अकादमी और ऐसे हर व्यक्ति को खारिज करें जो सम्मान परम्परा का वाहक हो !!

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

अभिव्यक्ति पर निगरानी : दैनिक जागरण नेशनल में यह लेख

  • शिवानन्द द्विवेदी सहर
राजनितिक कार्यों एवं आन्दोलनों में सोशल मीडिया के बढते प्रभाव एवं इसके सशक्तीकरण को भांपते हुए आखिरकार केन्द्र सरकार इसके प्रति गंभीर होती नजर आ रही है ! इस बात से कतई नाकारा नहीं जा सकता कि पिछले तीन-चार साल के इस कम समय में सोशल मीडिया आम जनमानस के अभिव्यक्ति का सबसे तेज और सबसे सशक्त माध्यम बनकर उभरा है ! जनमानस के अभिव्यक्ति के सबसे त्वरित मंच के रूप में उभरे सोशल मीडिया का प्रभाव पिछले दो सालों के आंदोलनो में केन्द्र सरकार देख भी चुकी है ! हालाकि शुरुआती दौर में तो केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा सोशल मीडिया को बहुत हल्के में लिया गया एवं कई बार तो इस आधुनिक मंच पर लगाम कसने की सीधी पहल तक की गयी ! ऐसा मौका कई बार आया जब केन्द्र सरकार की तरफ से इस बात की पहल की गयी कि फेसबुक,ट्विटर आदि जैसे नये मीडिया मंचों पर लगाम कसी जाय ! लेकिन अभिव्यक्ति पर अंकुश का मामला होने के कारण सरकार को खास सफलता मिलती नहीं दिखी ! हालाकि गाहे-बेगाहे ऐसा कई बार देखा गया है कि फेसबुक आदि पर लिखने अथवा टिप्पणी आदि करने के लिए लोगों को गिरफ्तार आदि किया गया हो ! उदाहरण के तौर पर हाल ही में दलित विचारधारा के साहित्यकार कँवल भारती कि गिरफ्तारी को देखा जा सकता है ! कँवल भारती की गिरफ्तारी यह साबित करती है कि आज सोशल मीडिया हमारी सरकारों एवं प्रशासन को किस तरह से प्रभावित कर रही है ! सोशल मीडिया के प्रभावों को देखते हुए अब केन्द्र सरकार इस बात को समझ चुकी है कि इस मीडिया पर सीधा एवं पूरी तरह से लगाम लगाना कतई संभव नहीं है ! अत: केन्द्र सरकार द्वारा सोशल मीडिया में अपनी पकड़ और निगरानी मजबूत करने के लिए एक नया रास्ता अख्तियार किया गया है ! सोशल मीडिया पर निगरानी एवं सरकार के प्रति सोशल मीडिया पर चल रही सक्रियता आदि पर सरकारी नजर रखने के अलावा अपने कार्यों को लोगों तक पहुचाने के लिए 22.5 करोंड़ रुपये के बजट वाले न्यू मीडिया विंग को मंजूरी दे दी है ! मूल तौर पर न्यू मीडिया विंग की जिम्मेदारी सोशल मीडिया के मंचों से  सरकार के कार्यों को जनता तक पहुचाने के अलावा सरकार को लेकर आम जनता की सक्रियता पर नजर रखने की है ! न्यू मीडिया विंग की मंजूरी के बहाने केन्द्र सरकार अपने कई हित साधने की कोशिश करती नजर आ रही है ! इसे कहीं ना कहीं केन्द्र सरकार द्वारा आगामी लोकसभा चुनावों को देखते हुए सोशल मीडिया के मंचों का उपयोग अपने प्रचार-प्रसार के लिए किये जाने की पहल के रूप में देखा जाना चाहिए ! अगर आपको याद हो तो कुछ ही महीने पहले सोशल मीडिया पर सक्रियता के नाम पर कांग्रेस की तरफ से लगभग सौ करोंड़ खर्चने की बात सामने आई थी ! यानी, एक बात साफ़ है कि सोशल मीडिया मंचों पर भाजपा से पिछडती कांग्रेस को यह बात समझ में आ चुकी है कि आगामी लोकसभा चुनाव को  कमोबेश सोशल मीडिया जरुर प्रभावित करेगी ! एक आंकड़े के मुताबिक़ कुल 167 लोकसभा सीटों पर सोशल मीडिया की भूमिका निर्णायक होने के कयास लगाये लगाये जा रहे हैं ! ऐसे में न्यू मीडिया विंग की मंजूरी को लोकसभा चुनाव के लिहाज से एक चुनावी हथकंडे के तौर देखना कहीं से भी गलत नहीं प्रतीत हो रहा ! दूसरी तरफ इस बात को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता कि न्यू मीडिया विंग की मंजूरी देकर सरकार अप्रत्यक्ष तौर पर सोशल मीडिया पर अपनी निगरानी का तंत्र बिठाना चाहती है ! सरकार के खिलाफ चल रही मुहिमो आदि पर नजर रखने आदि के लिहाज से यह विंग काम करता नजर आ सकता है ! सही मायनों में सोशल मीडिया के मामले में भाजपा से पिछडी कांग्रेस अब सरकारी स्तर पर पूरी तैयारी के साथ आती दिख रही है ! इस विंग के माध्यम से वर्तमान सत्तापक्ष द्वारा एक तीर से कई निशान साधने का काम किया जा रहा है ! अभिव्यक्ति पर लगाम कसने में विफल रही केन्द्र सरकार अब अभिव्यक्ति की आजादी में हस्तक्षेप करने का यह दूसरा रास्ता अख्तियार करती नजर आ रही है ! वाकई इस लिहाज से कहा जाना गलत नहीं होगा कि अब अभिव्यक्ति के इस नए माध्यम का इस्तेमाल दोतरफ़ा राजनितिक पैतरों की पैतरेबाजी के लिए भी होना तय है ! आगामी लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आएगा इस न्यू मीडया विंग का प्रभाव दिखना भी शुरू हो जाएगा !      
 

शनिवार, 10 अगस्त 2013

पंथ निरपेक्ष लेखन के पर्याय प्रेमचंद : राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित मेरा लेख




  • शिवानन्द द्विवेदी सहर
(फेसबुक से लेकर जनसत्ता तक प्रेमचंद पर उठे विमर्श के बाद लिखा गया मेरा अपना विचार)
 

राष्ट्रीय सहारा से
विगत 31 जुलाई को हिंदी साहित्य इतिहास के सबसे बड़े कथाकार प्रेमचंद के जन्मदिवस पर हंस पत्रिका की तरफ से प्रतिबन्ध और अभिव्यक्ति विषय पर संघोष्ठी का आयोजन था ! आयोजन में बतौर मुख्य वक्ता माओवादी विचारधारा के वामपंथी लेखक वरवरा राव एवं अरुंधती राय के अलावा लेखक एवं साहित्यकार अशोक वाजपेयी सहित दक्षिणपंथी धारा के गोविंदाचार्य भी आमंत्रित थे ! वक्ताओं के लिहाज से देखें तो आयोजक के रूप में हंस के संपादक राजेन्द्र यादव ने शायद इस बार के आयोजन में प्रेमचंद को याद करने के बहाने उस विमर्श को भी टटोलने का प्रयास किया जिसमे प्रेमचंद को अपने पंथ का साबित करने की होड़ ना जाने किस-किस पंथ के लोगों में मची हुई है ! ये सच है कि साहित्य इतिहास के ख्यातिलब्ध विभूतियों पर अपना वैचारिक अधिपत्य साबित करने का कु-चलन वर्तमान में तेजी से विकसित हुआ है एवं इस कुरीति के दंश ने महान पंथनिरपेक्ष कथाकार प्रेमचंद को भी नहीं बख्सा है ! अलग-अलग पंथ के विद्द्वानों द्वारा यह साबित करने का हर संभव प्रयास किया जाता रहा है कि  प्रेमचंद का वैचारिक झुकाव उनके अपने पंथ की तरफ था ! प्रेमचंद को लेकर वामपंथ बनाम दक्षिणपंथ की बहस तो बहुत पहले से चलती आ रही है ! बेशक इस बहस का निष्कर्ष अब तक कुछ नहीं निकला हो लेकिन दोनों ही पंथ के लोग प्रेमचंद के कृतियों से अपने हिस्से की सामग्री ढूढ कर यह साबित करते रहे हैं कि प्रेमचंद उनके अपने पंथ के लेखक थे और उनपर सिर्फ उनका ही अधिकार है ! प्रेमचंद को लेकर वामपंथी धड़ा उन्हें धुर वामपंथी मानता है जबकि दक्षिण झुकाव वाले बुद्धिजीवी उन्हें धुर राष्ट्रवादी  लेखक  मानते हैं ! वर्तमान बुद्धिजीवियों के विचारों से इतर अगर प्रेमचंद को तलाशने के लिए साहित्य के इतिहास के पन्नों को पलटे तो स्थिति कुछ और ही नजर आती है ! इतिहास के पृष्ठ कुछ यूँ बयां करते हैं कि मानो प्रेमचंद ना तो वामपंथी थे और ना ही दक्षिण से ही उनका कोई सरोकार था ! वो निहायत पंथनिरपेक्ष लेखक थे और निरपेक्ष लेखन करते रहे ! प्रेमचंद के बारे में लिखते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं कि अगर आप उत्तर भारत की समस्त जनता के आचार-व्यवहार, भाषा-भाव, रहन-सहन, आशा-आकांक्षा, दुःख-सुख और सूझ-बूझ को जानना चाहते हैं तो प्रेमचंद से  उत्तम परिचायक आपको नहीं मिल सकता ! सही अर्थों में अगर बिना किसी आग्रह से ग्रसित हुए देखा जाय तो प्रेमचंद सामाजिक सरोकारों के लेखक नजर आते हैं, जिनपर किसी पंथ की बजाय तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों का प्रभाव ज्यादा था ! प्रेमचंद के कहानियों एवं उपन्यासों में शोषित वर्ग की पीड़ा को बखूबी दिखाया गया है ! चुकि प्रेमचंद की लगभग हर कृति शोषित वर्ग को शोषक सत्ता के खिलाफ आंदोलित करती नजर आती है जिसके आधार पर तमाम बुद्धिजीवी उन्हें वामपंथी धारा का लेखक करार देते हैं ! लेकिन महज इस आधार पर प्रेमचंद को वामपंथी करार देना कतई उचित नहीं है ! प्रेमचंद के बारे में अगर ठीक से देखा जाय तो वे कई पहलुओं पर महात्मा गाँधी के अहिंसक विचारों के समर्थक नजर आते हैं  तो कई जगह उनकी लेखनी में राष्ट्रप्रेम के भी दर्शन होते हैं ! प्रेमचंद द्वारा राष्ट्र को खारिज करके किसी वर्गसंघर्ष की हिमायत की गयी  हों ऐसा उनकी कृतियों में नहीं मिलता है ! गाँधी के अहिंसावाद का दर्शन उनके लगभग हर उपन्यास में देखने को मिल सकता है ! कर्मभूमि उपन्यास तो पूरी तरह से गाँधी सिद्दांतों को पुष्ट करती कालजयी कृति है !  अपने उपन्यासों एवं कथानकों के माध्यम से प्रेमचंद ने ना सिर्फ तत्कालीन भारत के निम्न शोषित वर्ग की दशा को दिखाया है बल्कि गुलाम भारत के जमीदारों एवं सरकारी मुलाजिमो की मजबूरियों  को भी पूरी इमानदारी के साथ चित्रित किया है ! प्रेमचंद के उपन्यास प्रेमाश्रम पर नजर डालें तो इस उपन्यास के माध्यम से प्रेमचंद ना सिर्फ मजदुर वर्ग के एकजुट  होने की बात करते हैं बल्कि कथाभाव से स्पष्ट होता है कि वो समूचे भारतीय समाज जिसमे निम्न और उच्च दोनों वर्ग आते हैं,को एकजुट होकर अंग्रेजी हुकुमत के दमन के खिलाफ आंदोलित करते हैं ! चाहें मजदुर वर्ग के प्रति चिंता हो अथवा तत्कालीन भारतीय समाज में स्त्रियों की दशा का चित्रण हो, प्रेमचंद के उपन्यासों एवं कहानियों में इनका बखूबी दर्शन संभव है ! प्रेमचंद द्वारा की गयी कृति  प्रतिज्ञा तत्कालीन भारतीय समाज में फैले विधवा विवाह निषेध की कुप्रथा के जड़ों पर सीधा चोट करती है ! निश्चित तौर पर प्रेमचंद की लेखनी में स्त्री संघर्षों पर भी काफी प्रकाश डाला गया है !       
     दरअसल शोषित समाज पर ज्यादा लिखने की वजह से वामपंथी आग्रह से ग्रसित बुद्धिजीवियों को ऐसा लगता है कि प्रेमचंद वामपंथी लेखक थे ! बेशक प्रेमचंद पर मार्क्स के विचारों अथवा रूस की क्रान्ति का अंशत: प्रभाव रहा हो लेकिन केवल इसी आधार पर उन्हें वाम विचारों का लेखक घोषित करना कुतर्क के सिवाय कुछ भी नहीं है ! मार्क्स ने विश्व के मजदूरों को एकजुट कर सरहदों को पाटने का ऐलान किया था लेकिन इसके ठीक उलट प्रेमचंद का मजदुर अपनी सरहद को बचाने की लड़ाई लड़ता नजर आता है ! प्रेमचंद का मजदुर कहीं ना कहीं मार्क्स उस मजदुर को सिरे से खारिज करता है जो सरहदों को तोड़ कर अंतर्राष्ट्रवाद की पहल में संघर्षरत है ! मार्क्स और प्रेमचंद के इसी विरोधाभाष के कारण  राष्ट्रवादी बुद्धिजीवी कहीं ना कहीं उनमे राष्ट्रवाद की संभावनाएं तलाश लेते हैं और उन्हें राष्ट्रवादी बताते नजर आते है ! अगर बारीकी से देखें तो प्रेमचंद की कृतियों में कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक खुद अपने पात्रों के साथ वैचारिक संघर्ष कर रहा हो ! प्रेमचंद की कृतियों का कोई एक पात्र अगर हिंसा की हिमायत करता है तो दूसरा पात्र उसे गलत ठहराते हुए उसे हिंसा से रोकता है ! यह दूसरा पात्र ही प्रेमचंद की मूल विचारधारा का परिचायक है ! बहुआयामी नजरिये से अगर बिना किसी आग्रह से ग्रसित हुए निष्पक्ष तरीके से प्रेमचंद का मूल्यांकन करें तो प्रेमचंद ना तो धुर वामपंथी नजर आते हैं ना ही धुर राष्टवादी ही दिखते है ! प्रेमचंद की लेखनी में बहु विचारों के दर्शन आसानी से उपलब्ध हैं ! बतौर लेखक प्रेमचंद अगर  तमाम अलग-अलग विचारधाराओं को सहजता से स्वीकार लेते हैं तो वहीँ दूसरी तरफ उन्ही विचारधाराओं के जड़ पड़ गए सिद्धांतों को बेहिचक खारिज भी करते नजर आते हैं ! सही मायनों में देखा जाय तो प्रेमचंद ना तो वामपंथी थे ना ही धुर राष्ट्रवादी ही थे और ना ही किसी एक आग्रह से ग्रसित ही थे ! प्रेमचंद का शुरू से ही गांधीवाद के प्रति रुझान रहा और उनकी लेखनी देश के लिए समाज को एकजुट करने वाली रही है ! प्रेमचन्द की लेखनी के यही तेवर उनको एक पंथ निरपेक्ष लेखक के रूप में स्थापित करते हैं !