(प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री प्रेम जनमेजय
से शिवानन्द द्विवेदी की हुई बात-चीत पर आधारित विमर्श)
सामाजिक सरोकारों से जुड़े साहित्य सृजन में
समस्या की जड़ को सबसे करीब से छूने के लिए

अभिव्यक्ति के शब्दों को व्यंग्य की
कसौटी पर ही कसना पड़ता है. व्यंग्य का मानवीय सभ्यता के विकास से साथ अनोखा समन्वय
है. ऐतिहासिक तौर पर अगर देखा जाय व्यंग्य का विकास सभ्य समाज के विकास के
समानांतर एक सामाजिक जरुरत के तौर पर होता गया. सही अर्थों में कहा जाय तो जब समाज
का सांस्कृतिक विकास हुआ और वो हिंसा के आचरण से बाहर निकलकर खुद को सभ्यता में
आचरण में ढालने का प्रयास करने लगा तब उसे अपने विरोध और आक्रमण को अभिव्यक्त करने
के लिए व्यंग्य रूपी अचूक हथियार प्राप्त हुआ. व्यंग्य कोई अलग किस्म की
लेखनी नहीं है और ना ही व्यंग्यकार को ही
साहित्य की मुख्यधारा से अलग खड़ा करके उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए. व्यंग्य भी
एक साहित्यिक सृजन की कला है और व्यंग्यकार भी एक मुक्कमल साहित्यकार है. व्यंग्य
का मूल उद्देश्य समस्या के मूल पर चोट करना होता है. व्यंग्य में व्याख्या की बजाय
बेवाकी एवं स्पष्टता की अधिक दरकार होती है.व्यंग्य स्पष्टता की मांग करता है.
व्यंग्य के शब्द-शब्द चावल के चमकते दाने की तरह अलग-अलग नजर आने चाहिए. जितने
सीधे-सपाट लहजे में दबी हुई समस्या के मूल पर अपनी टिप्पणी करके उस समस्या को
मुखरता से सामने ला दिया जाय, व्यंग्य उतना ही उत्कृष्ट कहा जा सकता है. व्यंग्य
रचने का ध्येय ही समस्या पर चोट करना होता है. व्यंग्य को लेकर एक वर्तमान में बड़ी
समस्या यह है कि इसे हास्य की कसौटी पर कस कर देखा जाने लगा है जबकि व्यंग्य का
हास्य से कोई सरोकार नहीं है. इसमें कोई दो राय नहीं कि व्यंग्य को लेकर उत्पन्न
इस भ्रमस्थिति ने साहित्य के इस विलक्षण विधा का जितना नुकसान किया है शायद और
किसी भी कारक ने इसका उतना नुकसान नहीं किया होगा. स्पष्ट करना अनिवार्य है की
व्यंग्य रचना अथवा रचना में व्यंग्य को कभी भी हास्य की कोई दरकार नहीं होती है.
व्यंग्य एक निहायत गंभीरता पूर्वक लिखी गयी साहित्य की सहज सामग्री है. हास्य को
जबरन शामिल करने के नाम पर किया गया प्रयास व्यंग्य के मूल स्वरुप को ही खराब कर देता
हैं. यह समझ विकसित करने की जरुरत है कि कोई भी व्यंग्य कभी भी हास्य की मांग नहीं
करता और ना ही उसे इसकी जरुरत ही होती है. जब हम व्यंग्य कर पाने में असफल होने
लगते हैं तो हमें जबरन हास्य को लाना पड़ता है जो कि व्यंग्य के मूल स्वरुप के ही खिलाफ
है.व्यंग्य में गुदगुदाहट से ज्यादा बेचैनी की उपस्थिति होनी चाहिए जिसको पढ़ने के
बाद पाठक की समस्या के प्रति बेचैनी वाली आंतरिक गुद-गुदाहट उत्पन्न हो जाय.
हरिशंकर परसाई सरीखे व्यंग्य लेखकों को अगर आप पढ़ें तो आपको कहीं भी ऐसा नहीं
प्रतीत होगा कि वो जबरन हास्य लाने का प्रयास करते नजर आये हों. वर्तमान समाज में
उपजे भ्रष्टाचार को व्यंग्य से उकेरते हुए परसाई अकाल उत्सव में एक जगह लिखते हैं
“
साधो बादल
दिखते हैं तो खुशी से मोर नाचते हैं। मगर कहीं बादल न दिखें तो मनुष्य के
रूप में बहुत-से मोर नाचते हैं। अफसर, ठेकेदार, दुकानदार, नेता
ये सब खुश
होते हैं कि अब पडेग़ा अकाल और खुलेंगे राहत कार्य और खूब पैसा खाया जायेगा।'” दरअसल, सही मायने में देखा जाय साहित्य
की व्यंग्य विधा अभी खुद से ही संघर्षरत अपने यौवनकाल से गुजर रही है जहाँ उसके
दिग्भ्रमित होने की गुंजाइश अत्यधिक बनी हुई है . व्यंग्य रचना की कसौटी पर दुसरी
शर्त यह भी है कि व्यंग्य कभी वंचित पर चोट नहीं करता. व्यंग्य लिखने में इस बात
का खास ख्याल रखा जाना चाहिए कि आपके व्यंग्य-बाण किसी वंचित को चोटिल न करते हों.
क्योंकि, जैसे ही आपका व्यंग्य किसी वंचित पर प्रहार करता है व्यंग्य की प्रासंगिकता ही मर जाती है.
साहित्य के लगभग हर विधाओं में अपनी सशक्त
उपस्थिति दर्ज कराने के बावजूद यह विमर्श अभी तक कायम है कि व्यंग्य नाम की कोई
विधा है भी या नहीं. विधा के नजरिये से देखा जाय तो प्रख्यात लेखक श्री लाल शुक्ल
की अमर कृति राग दरबारी व्यंग्य रचना होने के बावजूद उपन्यास विधा का साहित्य है.
पूरी कृति ही व्यंग्य के मूल पर आधारित होने के बावजूद यह महज रचना में व्यंग्य
वाली कृति बन पाती है लेकिन व्यंग्य कृति नहीं हो पाती है. खुद श्रीलाल शुक्ल भी
उसे व्यंग्य रचना की बजाय उपन्यास कृति का दर्जा देते हैं. दरअसल, यह दो
शब्दावलियों का विमर्श है जिसमे एक शब्दावली है “व्यंग्य-रचना” और दुसरी है “रचना
में व्यंग्य”. रचना में व्यंग्य के नजरिये से तो साहित्य के हर विधा में व्यंग्य अपनी
सशक्त उपस्थिति दर्ज कराता नजर आता है लेकिन मूल व्यंग्य रचना के नजरिये से स्थिति
संतोषजनक नहीं नजर आती. व्यंग्य के तरकशों से निकले तीरों का इस्तेमाल तो कबीर और
सूर से लगाए समकालीन कहानीकार,उपन्यासकार और कवि सब करते आये हैं लेकिन इससे
व्यंग्य की मूल विधा की साहित्यिक संपदा को बहुत श्रेय मिलता नहीं दिखा है.
निश्चित रूप से स्वतंत्र विधा के तौर पर व्यंग्य का चिन्हित न हो पाना एक चिंताजनक
प्रश्न है. समकालीन साहित्यिक समाज में भी केदारनाथ सिंह,नामवर सिंह सहित तमाम कवि
और लेखकों की कृतियों में व्यंग्य का बेमिसाल पुट मिलने के बावजूद खुद उस कृति के
रचनाकार द्वारा ही उसे व्यंग्य कृति मानने से इनकार किया जाता रहा है. कहीं ना
कहीं इसके पीछे बड़ी वजह व्यंग्य की गंभीरता का छ्य होना है. हम व्यंग्य को त्वरित
टिप्पणी समझ कर अगर लिखने लगेंगे तो व्यंग्य की मूल विधा को ही इस छति की भारपाई
करनी पड़ेगी.
व्यंग्य
के मामले में दुसरी बड़ी चुनौती ये है कि या तो व्यंग्य को बेहतर लेखक नहीं मिले या
व्यंग्य को गंभीर आलोचक नहीं मिले. यह सत्य है कि आलोचना का अंकुश साहित्य की
विधाओं को लचीलेपन से उत्कृष्ठता की तरफ ले जाता है. आलोचना के अभाव में रचना अथवा
विधा के भटक जाने का खतरा हमेशा बना रहता है. वजह चाहें जो भी रही हो लेकिन यह
शत-प्रतिशत सत्य है कि व्यंग्य को अभी उस स्तर की आलोचना का धरातल नहीं मिल पाया
है जिस स्तर की अलोचना का धरातल कहानी,कविता,उपन्यास आदि को मिला है. अब यह अलग
विमर्श है कि आलोचना के पटल तक व्यंग्य रचनाओं के ना पहुच पाने की वजह व्यंग्य
लेखक हैं या व्यंग्य रचनाओं में ही अभी वो आकर्षण नहीं आ सका है कि आलोचक का ध्यान
खींच सके अथवा आलोचक खुद ही इससे बचते हुए निकलना चाहते है ? हालाकि इस दिशा में
तमाम प्रयास किये जा रहे हैं जिससे व्यंग्य को आलोचना के पटल तक ले जाकर उसे
आलोचना की दो-धारी तलवार के हवाले किया जाय और व्यंग्य को और परिमार्जित स्वरुप मिल
सके. व्यंग्य-यात्रा पत्रिका के माध्यम से हरिशंकर परसाई आदि पर विशेष अंक निकाल
कर व्यंग्य को नया आयाम देने की लागातर कोशिश की जा रही है. इससे पहले की व्यंग्य
की बुनियाद हास्य और ओछेपन की सतह तक पहुचे उसे आलोचना के धरातल पर ले जाना ही
व्यंग्य साहित्य के लिए बड़ी चुनौती है.