गुरुवार, 27 मार्च 2014

  •  राम कुमार
एक नहीं, दो नहीं, लगभग आधा सैकड़ा शिव मंदिर। एक ही जगह पर, एक ही परिसर में। आठवीं शताब्दी की कारीगरी का उत्कृष्ट नमूना। आसपास बिखरे पड़े तमाम अवशेष। पुरातत्व विभाग और सरकार ईमानदारी से प्रयास करते रहेंगे तो निश्चित ही चारों तरफ बिखरे पड़े इन्हीं अवशेषों में से और मंदिर जी उठेंगे। जैसे फीनिक्स पक्षी के बारे में कहा जाता है कि वह अपनी ही राख से फिर जी उठता है। मुरैना जिले के बटेश्वर में अवशेषों के बीच खड़े मंदिरों को देखकर तो यही उम्मीद मजबूत होती कि भविष्य में यहां विशालतम मंदिर
समूह होगा। पुरातत्वविद मानते हैं कि कभी यहां ३०० से ४०० मंदिर हुआ करते थे। इनमें ज्यादातर शिव मंदिर हैं। कुछेक विष्णु मंदिर भी हैं। श्रंखलाबद्ध खड़े करीब आधा सैकड़ा मंदिरों का समूह ही जब प्रखरता के साथ अपनी विरासत की कहानी बयान करता है तो सोचिए ३००-४०० मंदिरों का समूह कैसे भारतीय संस्कृति, सभ्यता और विरासत का परचम लहराएगा।
एक नहीं, दो नहीं, लगभग आधा सैकड़ा शिव मंदिर। एक ही जगह पर, एक ही परिसर में। आठवीं शताब्दी की कारीगरी का उत्कृष्ट नमूना। आसपास बिखरे पड़े तमाम अवशेष। पुरातत्व विभाग और सरकार ईमानदारी से प्रयास करते रहेंगे तो निश्चित ही चारों तरफ बिखरे पड़े इन्हीं अवशेषों में से और मंदिर जी उठेंगे। जैसे फीनिक्स पक्षी के बारे में कहा जाता है कि वह अपनी ही राख से फिर जी उठता है। मुरैना जिले के बटेश्वर में अवशेषों के बीच खड़े मंदिरों को देखकर तो यही उम्मीद मजबूत होती कि भविष्य में यहां
विशालतम मंदिर समूह होगा। पुरातत्वविद मानते हैं कि कभी यहां ३०० से ४०० मंदिर हुआ करते थे। इनमें ज्यादातर शिव मंदिर हैं। कुछेक विष्णु मंदिर भी हैं। श्रंखलाबद्ध खड़े करीब आधा सैकड़ा मंदिरों का समूह ही जब प्रखरता के साथ अपनी विरासत की कहानी बयान करता है तो सोचिए ३००-४०० मंदिरों का समूह कैसे भारतीय संस्कृति, सभ्यता और विरासत का परचम लहराएगा।

रविवार, 8 दिसंबर 2013

व्यंग्य विधा के साहित्यिक सरोकार : राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित लेख

  • शिवानन्द द्विवेदी सहर 

(प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री प्रेम जनमेजय से शिवानन्द द्विवेदी की हुई बात-चीत पर आधारित विमर्श)

सामाजिक सरोकारों से जुड़े साहित्य सृजन में समस्या की जड़ को सबसे करीब से छूने के लिए
अभिव्यक्ति के शब्दों को व्यंग्य की कसौटी पर ही कसना पड़ता है. व्यंग्य का मानवीय सभ्यता के विकास से साथ अनोखा समन्वय है. ऐतिहासिक तौर पर अगर देखा जाय व्यंग्य का विकास सभ्य समाज के विकास के समानांतर एक सामाजिक जरुरत के तौर पर होता गया. सही अर्थों में कहा जाय तो जब समाज का सांस्कृतिक विकास हुआ और वो हिंसा के आचरण से बाहर निकलकर खुद को सभ्यता में आचरण में ढालने का प्रयास करने लगा तब उसे अपने विरोध और आक्रमण को अभिव्यक्त करने के लिए व्यंग्य रूपी अचूक हथियार प्राप्त हुआ. व्यंग्य कोई अलग किस्म की लेखनी  नहीं है और ना ही व्यंग्यकार को ही साहित्य की मुख्यधारा से अलग खड़ा करके उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए. व्यंग्य भी एक साहित्यिक सृजन की कला है और व्यंग्यकार भी एक मुक्कमल साहित्यकार है. व्यंग्य का मूल उद्देश्य समस्या के मूल पर चोट करना होता है. व्यंग्य में व्याख्या की बजाय बेवाकी एवं स्पष्टता की अधिक दरकार होती है.व्यंग्य स्पष्टता की मांग करता है. व्यंग्य के शब्द-शब्द चावल के चमकते दाने की तरह अलग-अलग नजर आने चाहिए. जितने सीधे-सपाट लहजे में दबी हुई समस्या के मूल पर अपनी टिप्पणी करके उस समस्या को मुखरता से सामने ला दिया जाय, व्यंग्य उतना ही उत्कृष्ट कहा जा सकता है. व्यंग्य रचने का ध्येय ही समस्या पर चोट करना होता है. व्यंग्य को लेकर एक वर्तमान में बड़ी समस्या यह है कि इसे हास्य की कसौटी पर कस कर देखा जाने लगा है जबकि व्यंग्य का हास्य से कोई सरोकार नहीं है. इसमें कोई दो राय नहीं कि व्यंग्य को लेकर उत्पन्न इस भ्रमस्थिति ने साहित्य के इस विलक्षण विधा का जितना नुकसान किया है शायद और किसी भी कारक ने इसका उतना नुकसान नहीं किया होगा. स्पष्ट करना अनिवार्य है की व्यंग्य रचना अथवा रचना में व्यंग्य को कभी भी हास्य की कोई दरकार नहीं होती है. व्यंग्य एक निहायत गंभीरता पूर्वक लिखी गयी साहित्य की सहज सामग्री है. हास्य को जबरन शामिल करने के नाम पर किया गया प्रयास व्यंग्य के मूल स्वरुप को ही खराब कर देता हैं. यह समझ विकसित करने की जरुरत है कि कोई भी व्यंग्य कभी भी हास्य की मांग नहीं करता और ना ही उसे इसकी जरुरत ही होती है. जब हम व्यंग्य कर पाने में असफल होने लगते हैं तो हमें जबरन हास्य को लाना पड़ता है जो कि व्यंग्य के मूल स्वरुप के ही खिलाफ है.व्यंग्य में गुदगुदाहट से ज्यादा बेचैनी की उपस्थिति होनी चाहिए जिसको पढ़ने के बाद पाठक की समस्या के प्रति बेचैनी वाली आंतरिक गुद-गुदाहट उत्पन्न हो जाय. हरिशंकर परसाई सरीखे व्यंग्य लेखकों को अगर आप पढ़ें तो आपको कहीं भी ऐसा नहीं प्रतीत होगा कि वो जबरन हास्य लाने का प्रयास करते नजर आये हों. वर्तमान समाज में उपजे भ्रष्टाचार को व्यंग्य से उकेरते हुए परसाई अकाल उत्सव में एक जगह लिखते हैं “साधो बादल दिखते हैं तो खुशी से मोर नाचते हैं। मगर कहीं बादल न दिखें तो मनुष्य के रूप में बहुत-से मोर नाचते हैं। अफसर, ठेकेदार, दुकानदार, नेता ये सब खुश होते हैं कि अब पडेग़ा अकाल और खुलेंगे राहत कार्य और खूब पैसा खाया जायेगा।'” दरअसल, सही मायने में देखा जाय साहित्य की व्यंग्य विधा अभी खुद से ही संघर्षरत अपने यौवनकाल से गुजर रही है जहाँ उसके दिग्भ्रमित होने की गुंजाइश अत्यधिक बनी हुई है . व्यंग्य रचना की कसौटी पर दुसरी शर्त यह भी है कि व्यंग्य कभी वंचित पर चोट नहीं करता. व्यंग्य लिखने में इस बात का खास ख्याल रखा जाना चाहिए कि आपके व्यंग्य-बाण किसी वंचित को चोटिल न करते हों. क्योंकि, जैसे ही आपका व्यंग्य किसी वंचित पर प्रहार करता है व्यंग्य की  प्रासंगिकता ही मर जाती है.
साहित्य के लगभग हर विधाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराने के बावजूद यह विमर्श अभी तक कायम है कि व्यंग्य नाम की कोई विधा है भी या नहीं. विधा के नजरिये से देखा जाय तो प्रख्यात लेखक श्री लाल शुक्ल की अमर कृति राग दरबारी व्यंग्य रचना होने के बावजूद उपन्यास विधा का साहित्य है. पूरी कृति ही व्यंग्य के मूल पर आधारित होने के बावजूद यह महज रचना में व्यंग्य वाली कृति बन पाती है लेकिन व्यंग्य कृति नहीं हो पाती है. खुद श्रीलाल शुक्ल भी उसे व्यंग्य रचना की बजाय उपन्यास कृति का दर्जा देते हैं. दरअसल, यह दो शब्दावलियों का विमर्श है जिसमे एक शब्दावली है “व्यंग्य-रचना” और दुसरी है “रचना में व्यंग्य”. रचना में व्यंग्य के नजरिये से तो साहित्य के हर विधा में व्यंग्य अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराता नजर आता है लेकिन मूल व्यंग्य रचना के नजरिये से स्थिति संतोषजनक नहीं नजर आती. व्यंग्य के तरकशों से निकले तीरों का इस्तेमाल तो कबीर और सूर से लगाए समकालीन कहानीकार,उपन्यासकार और कवि सब करते आये हैं लेकिन इससे व्यंग्य की मूल विधा की साहित्यिक संपदा को बहुत श्रेय मिलता नहीं दिखा है. निश्चित रूप से स्वतंत्र विधा के तौर पर व्यंग्य का चिन्हित न हो पाना एक चिंताजनक प्रश्न है. समकालीन साहित्यिक समाज में भी केदारनाथ सिंह,नामवर सिंह सहित तमाम कवि और लेखकों की कृतियों में व्यंग्य का बेमिसाल पुट मिलने के बावजूद खुद उस कृति के रचनाकार द्वारा ही उसे व्यंग्य कृति मानने से इनकार किया जाता रहा है. कहीं ना कहीं इसके पीछे बड़ी वजह व्यंग्य की गंभीरता का छ्य होना है. हम व्यंग्य को त्वरित टिप्पणी समझ कर अगर लिखने लगेंगे तो व्यंग्य की मूल विधा को ही इस छति की भारपाई करनी पड़ेगी.

      व्यंग्य के मामले में दुसरी बड़ी चुनौती ये है कि या तो व्यंग्य को बेहतर लेखक नहीं मिले या व्यंग्य को गंभीर आलोचक नहीं मिले. यह सत्य है कि आलोचना का अंकुश साहित्य की विधाओं को लचीलेपन से उत्कृष्ठता की तरफ ले जाता है. आलोचना के अभाव में रचना अथवा विधा के भटक जाने का खतरा हमेशा बना रहता है. वजह चाहें जो भी रही हो लेकिन यह शत-प्रतिशत सत्य है कि व्यंग्य को अभी उस स्तर की आलोचना का धरातल नहीं मिल पाया है जिस स्तर की अलोचना का धरातल कहानी,कविता,उपन्यास आदि को मिला है. अब यह अलग विमर्श है कि आलोचना के पटल तक व्यंग्य रचनाओं के ना पहुच पाने की वजह व्यंग्य लेखक हैं या व्यंग्य रचनाओं में ही अभी वो आकर्षण नहीं आ सका है कि आलोचक का ध्यान खींच सके अथवा आलोचक खुद ही इससे बचते हुए निकलना चाहते है ? हालाकि इस दिशा में तमाम प्रयास किये जा रहे हैं जिससे व्यंग्य को आलोचना के पटल तक ले जाकर उसे आलोचना की दो-धारी तलवार के हवाले किया जाय और व्यंग्य को और परिमार्जित स्वरुप मिल सके. व्यंग्य-यात्रा पत्रिका के माध्यम से हरिशंकर परसाई आदि पर विशेष अंक निकाल कर व्यंग्य को नया आयाम देने की लागातर कोशिश की जा रही है. इससे पहले की व्यंग्य की बुनियाद हास्य और ओछेपन की सतह तक पहुचे उसे आलोचना के धरातल पर ले जाना ही व्यंग्य साहित्य के लिए बड़ी चुनौती है. 

मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

जेपी और जनसंघ : जनसत्ता में चंचल बीएचयु के लेख पर असहमति

जनसत्ता के दुनिया मेरे आगे कालम में 11 अक्तूबर के अंक छपे लेख के प्रतिवाद अथवा उस लेख के अधूरे हिस्सों को जिसे लेखक ने छुपा लिया है,को पूरा करने के लिए यह लेख लिखा गया है ! आप चंचल जी का लेख इस लिंक से पढ़िए फिर इस लेख को पढ़िए ! लिंक: http://epaper.jansatta.com/c/1763995

  • शिवानन्द द्विवेदी सहर
जनसत्ता 11 अक्टूबर के दुनिया मेरे आगे कॉलम “उन्हें जेपी कहते थे”,में चंचल जी
ने जेपी को तीन हिस्सों में समझने या समझाने का प्रयास किया है ! तीन हिस्सों में जेपी को जितना या जो कुछ भी बताने का प्रयास चंचल जी द्वारा किया गया है उससे पूरी तरह असहमत नहीं हुआ जा सकता है,क्योंकि वो जेपी के जीवन से जुड़े तथ्यों और घटनाओं का सिलसिलेवार वर्णन है ! मुझे लगता है कि जेपी को तीन हिस्सों में बताने में लेखक या तो जान बूझकर एक हिस्सा छोड़ दिये हैं या चौथे हिस्से का जिक्र करना उनकी नीयत में नहीं था ! मै भी वही बात कहना चाहता हूँ जो चंचल जी चाहते हैं लेकिन मै चार हिस्सों में कहना चाहता हूँ ! चुकि तीन हिस्से तो पहले ही कहे जा चुके है जिसमे जेपी का रूसी क्रान्ति से प्रभावित होना एवं फिर गाँधी के सानिध्य में आकर सत्य और अहिंसा की प्रवृति में घुल मिल जाना फिर समाजवाद का रुख करना,इत्यादि कई तथ्य हैं ! चौथा हिस्सा अगर इस पूरे जेपी वर्णन का लिखा जाय जिसके बिना जेपी मुक्कमल नहीं होते हैं तो निश्चित तौर पर उस चौथे हिस्से में जेपी और जनसंघ के बीच का एक वैचारिक गठबंधन नजर आएगा ! नजीर वही से देना सबसे मुनासिब होगा जिसमे इंदिरा गाँधी के यह कहने पर कि जेपी का यह पूरा आंदोलन संघ चला रहा है अत: यह एक फासिस्ट आंदोलन है, जेपी ने साफ़ तौर पर कहा था “अगर आरएसएस फासीवादी संगठन है तो जेपी भी फासीवादी हैं” ! जिस संघ को कांग्रेस ने अपने खिलाफ उठे जनाक्रोश को भटकाने के लिए फासीवादी कहा था उसी संघ की एक शिविर में जेपी 1959 में जा चुके थे ! जेपी परम्परागत संघी नहीं थे मगर वो संघ को कभी अछूत भी नहीं माने ! कांग्रेस के भ्रष्टाचार और तानाशाही हुकूमत वाले रवैये के खिलाफ उठे जनाक्रोश के बाद लगाईं गयी आपातकाल के बाद जब जेपी जेल से छूटे तो उन्होंने मुम्बई में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था “मैं आत्मसाक्ष्य के साथ कह सकता हूँ कि संघ और जनसंघ वालों के बारे में यह कहना कि वे फ़ासिस्ट लोग हैं, सांप्रदायिक हैं ऐसे सारे आरोप बेबुनियाद हैं. देश के हित में ली जाने वाली किसी भी कार्ययोजना में वे लोग किसी से पीछे नहीं हैं. उन लोगों पर ऐसे आरोप लगाना उन पर कीचड़ फेंकने के नीच प्रयास मात्र हैं. .
   अपनी ही बात को दोहराते हुए 3 नवंबर 1977 को पटना में संघ के लिए जेपी ने कहा था कि नए भारत के निर्माण की चुनौती को स्वीकार किये हुए इस क्रांतिकारी संगठन से मुझे बहुत कुछ आशा है. आपने उर्जा है,आपमें निष्ठा है और आप राष्ट्र के प्रति समर्पित हैं ! अब बड़ा सवाल है कि अगर वाकई घटनाओं के सिलसिलेवार वर्णन के आधार पर यदि जेपी को समझने का प्रयास किया जा रहा हो तो इतने महत्वपूर्ण और जेपी के जीवन के अंतिम दिनों के घटनाओं पर पर्दा डाल कर भला जेपी को कैसे समझा जा सकता है ? मेरा अपना तर्क है कि जेपी रूसी मार्क्सवाद से प्रभावित होकर शुरुआत किये और फिर उन्हें सत्य अहिंसा के गाँधी दर्शन का सानिध्य मिला ! समाजवाद ने जेपी को आजाद भारत के जनता से जोड़ा जो कि सरकार से असंतुष्ट हो रही थी ! लेकिन इस सच को कतई खारिज नहीं किया जा सकता कि अपने अंतिम समय में जेपी राष्ट्रवादी हो लिए थे और राष्ट्रवाद के मूल्यों पर ही जेपी ने इंदिरा गाँधी गद्दी छोड़ो  की बुनियाद पर “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” का नारा दिया !  सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन के दौर में भारतीय जनसंघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेताओं-कार्यकर्ताओं के समर्पण, ईमानदारी और निष्ठा को जेपी ने करीब से देखा परिणामत: अनेक कार्यकर्ताओं को महत्वपूर्ण दायित्व भी सौपे थे. संघ-परिवार से जुड़े ये कार्यकर्ता जेपी की अपेक्षाओं पर सदैव खरे उतरे. जेपी के नेतृत्व में चल रहे छात्र एवं युवा संघर्ष वाहिनीके राष्ट्रीय संयोजक एबीबीपी के नेता और दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के तत्कालीन अध्यक्ष  अरुण जेटली बनाए गए थे. दुसरी तरफ आपातकाल में सरकारी आतंक के खिलाफ जनजागरण हेतु बनी लोक संघर्ष समितिका महामंत्री जेपी ने संघ के प्रचारक और प्रसिद्ध जनसंघ नेता नाना जी देशमुख को बनाया था. जेपी साम्प्राद्यिकता के सदा खिलाफ रहे और उनको यह मानने में कभी गुरेज नहीं हुआ कि संघ अथवा जनसंघ एक राष्ट्रवादी संगठन है ना कि साम्प्रदायिक संगठन है ! अत: जेपी का जीवन बिना उनके जनसंघ के संबंधों के कभी पूरा नहीं हो सकता ! आज समय है कि हम बीच के तिराहे पर नहीं खड़े हो सकते बल्कि हमें जेपी को केन्द्र में रख कर ये तय करना ही होगा कि संघ फासीवादी है अथवा जेपी फासीवादी थे ? या इसके इतर ये सोचना होगा कि संघ और जेपी तो अपनी जगह सही हैं बल्कि हम ही बुनियादी तर्कों की सच्चाई पर पर्दा डाल कर तमाम कुतर्क गढ़ रहे है ! जेपी के जीवन का यह महत्वपूर्ण हिस्सा भी उस कॉलम में लिखा जाना चाहिए था जो जाने क्यों लेखक ने छुपा लिया  !

सोमवार, 14 अक्टूबर 2013

संस्कृतियों को सहेजते छोटे कस्बे

  • शिवानन्द द्विवेदी

प्राय: ऐसा होता है कि हम अपनी सांस्कृतिक विरासतों का मूल्यांकन बड़े शहरों में आयोजित होने वाले बड़े-बड़े कार्यक्रमों एवं प्रदर्शनियों के दायरों में सिमट कर ही कर लेते हैं ! चन्द ख्यातिलब्ध स्थलों एवं वहाँ होते रहने वाले आयोजनों को ही हमारे द्वारा अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं का उदाहरण बनाया जाता रहा है ! जबकि इसके इतर भी विविधताओं वाले इस देश में तमाम छोटे-छोटे कस्बे एवं गाँव और शहर हैं जिनकी सांस्कृतिक विरासतें तो अद्वितीय एवं अनोखी हैं मगर उन्हें अभी तक चिन्हित तक नहीं किया जा सका है और वो गुमनाम तौर पर अनवरत संचालित हो रहीं हैं ! ऐसे छोटे जगहों की छोटी-छोटी परम्पराओं,संस्कृतियों एवं स्थानीय लोगों के प्रयासों को महत्व दिया जाना भी जरूरी है ! उदाहरण के तौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला स्थित एक गाँव सजाँव को अगर करीब से जानने का प्रयास किया जाय तो वाकई ऐसा लगता है कि लगभग दस हजार जनसँख्या वाला विविध जातियों एवं संप्रदायों का यह गाँव अपनी सांस्कृतिक विविधताओं के लिए अवश्य प्रकाश में आना चाहिए ! आजादी के ठीक चार साल बाद इस गाँव के युवाओं के मन में यह डर समाया कि कहीं अंग्रेजी हुकुमत से आजाद होने के बावजूद हम अंग्रेजियत के गुलाम होकर न रह जायें और अपनी संस्कृति, अपना धार्मिक सरोकार और अपने सामाजिक मूल्य भी अंग्रेजियत के अनुरूप न ढाल लें ! वर्तमान की स्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि उनका डर गलत नहीं था ! गरीबी के उस दौर में जब लोगों के पास अपनी जरुरत के संसाधन तक नहीं थे, उन विपरीत परिस्थितियों  में भी उन्होंने अपने प्रिय खेल-कौशल कुश्ती और नाट्य कला को बचाने के लिए सार्वजनिक स्तर पर प्रत्येक साल दंगल प्रतियोगिता और रामलीला का स्वत: आयोजन करने का निर्णय लिया ! सन 1952 में जिस रामलीला को शुरू किया गया उसका उद्देश्य केवल धार्मिक नहीं था बल्कि उसका अपना एक सामाजिक महत्व था जिसकी वजह से वो आज भी खास है और आज भी कायम है ! उस रामलीला में हर जाति के गाँव के ही बड़े-बूढ़े और बच्चे अदाकारी करते हैं एवं गाँव का मुस्लिम समुदाय उस रामलीला में ढोल-नगाड़ों के साथ चार चाँद लगाता है ! सामाजिक सौहार्द का इससे बड़ा उदाहरण भला और क्या हो सकता है कि जब रामलीला में ढोल नगाड़े बजाने वाले मुस्लिम समुदाय के पर्व मोहर्रम पर ताजिया उठता है तो गाँव के बहुसंख्यक हिदू समाज के दरवाजे-दरवाजे पर वो ताजिया जाता है और हिंदू परिवारों  की महिलायें निकल कर ताजिये की पूजा करती हैं ! इन सबके अलावा खेल-कूद के पारंपरिक मूल्यों को समझते हुए यह गाँव मंडल स्तरीय कुश्ती प्रतियोगिता कई दशकों से आयोजित करता आ रहा है ! इसी कुश्ती प्रतियोगिता से निकले कई लोग राष्ट्रीय स्तर तक पहुचे हैं ! हालाकि अपने धरोहरों को सजोता यह गाँव कोई इकलौता नहीं है बल्कि ऐसे तमाम छोटे-छोटे कस्बे और गाँव हैं जिन्होंने अपने ढंग से अपनी संस्कृति को सहेजने का प्रयास किया है ! आज जब त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था के तहत हमारा शासन अंतिम व्यक्ति के सबसे करीब तक पहुच चुका है तो इसी व्यवस्था के तहत ऐसी संस्कृतियों को सहेजने वाले लोगों,गांवों को प्रोत्साहित करने में कोई दिक्क्त नहीं होनी चाहिए हैं ! दिल्ली की रामलीला और अन्य आयोजनों में बेशक प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जाते हों और इन आयोजनों को बखूबी चर्चा मिलती है लेकिन हमारे गांवों की संस्कृतियाँ तो आज भी गुमनाम ही चल रहीं हैं ! 

शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

खोखला और बेकार है ये राईट टू रिजेक्ट : जानिये कैसे ?

  • शिवानन्द द्विवेदी सहर
साभार गूगल
एक उक्ति में कहा गया है कि बन्दुक जैसी दिखने वाली हर चीज़ गोली चलाने के काम नहीं आती बल्कि कई बार बच्चों का मन बहलाने वाला खिलौना भी हो सकती है ! आज माननीय सर्वोच्च न्यायलय के निर्देश के बाद इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन में “इनमे से कोई नहीं” के बटन को राईट टू रिजेक्ट का विकल्प बता कर जिस तरह से जनता के बीच रखा जा रहा है,ऐसे में यह उक्ति काफी प्रासंगिक हो जाती है ! आपको याद हो तो राईट टू रिजेक्ट वही क़ानून है जिसकी मांग अन्ना हजारे से लगाये तमाम सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा हमारे चुने हुए प्रतिनधियों से की जाती रही है लेकिन हमारे रहनुमाओं को ऐसा क़ानून लाने में तकलीफ महसुस होती है ! न्यापालिका के निर्देश के बाद यह नया विकल्प वोटिंग मशीनों में आना लगभग तय है और आगामी पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों में इस प्रयोग को आजमाया भी जाएगा ! ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि क्या वाकई इस तरह का प्रतीकात्मक और महज दिखावटी रिजेक्ट बटन हमारी लोकतांत्रिक चुनाव प्रणाली को मजबूत कर पाने में सहायक होगा ? बड़ा सवाल ये भी है कि जब इस विकल्प में मतदाता के द्वारा चुने गए रिजेक्ट का कोई परिणामी अर्थ ही नहीं है तो भला इसे रिजेक्ट किस आधार पर कहा जा रहा है ?
इस नए विकल्प के वर्तमान प्रारूप को देखकर तो यही लगता है कि  ईमानदार और स्वच्छ प्रतिनिधियों की इच्छा रखने वाला बहुमत इस विकल्प का प्रयोग करके हाशिए पर जा सकता है जबकि दागियों और भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के पक्ष में पड़ा अल्पमत देश की दशा और दिशा निर्धारित करेगा ! किसी को वोट नहीं देने अथवा सबको खारिज करने वाले इस विकल्प की सबसे बड़ी खामी यही है कि इसे मतगणना में ही पर्याप्त महत्व नहीं मिला है ! मतगणना के पश्चात अगर सबसे बड़ा मत इस विकल्प को भी मिला हो तब भी इसका कोई महत्व नहीं स्वीकार किया गया है ! हार और जीत के फासलों को यह कहीं से भी प्रभावित कर पाने सक्षम नहीं है ! अत: यह कहना गलत नहीं होगा कि दिखावटी और प्रतीकात्मक रिजेक्ट का यह विकल्प महज मतदाताओं के मतों को एक निष्क्रिय पिटारे में बंद कर उस पर मिट्टी डालने से ज्यादा कुछ भी नहीं है ! उदाहरण के लिहाज से भी अगर देखा जाय तो किसी विधानसभा क्षेत्र में दो दागियों के बीच अगर वहाँ कि बहुसंख्यक जनता किसी एक को भी नहीं चुनना चाहती हो और इस नए-नवेले रिजेक्ट विकल्प पर अपना मत जाहिर करती हो तो भी चुना उन्ही में से कोई एक जाएगा ! यानी निष्कर्ष साफ़ है कि बहुमत की कोई गणना नहीं और अल्पमत चुनकर विधानसभा और लोकसभा तक प्रतिनधित्व करेंगे ! ऐसे में लोकतंत्र में भागीदारी को तकनीकी रूप से अगर समझने की कोशिश की जाय तो इस विकल्प का प्रयोग किया हुआ वोटर पुरे चुनाव का सबसे ठगा हुआ,निष्क्रिय और हाशिए के वोटर से ज्यादा कुछ भी नहीं नजर आता है जिसके मतधिकार को एक बटन मात्र से कुंद कर दिया गया है ! अगर बारीकी से देखें तो इस नए विकल्प के प्रयोग के कारण  दागियों,भ्रष्टों, अपराधियों की बजाय मतदाता की लोकतंत्र निर्माण में भूमिका ही खारिज होती नजर आ रही है ! 
ऐसा नहीं है कि इस किस्म का रिजेक्ट विकल्प पहले नहीं था अथवा मत प्रयोग के प्रति अनिच्छा जाहिर करने वालों के लिए कोई और विकल्प नहीं दिया गया था ! पहले से ही इसके लिए हमारे संविधान में फ़ार्म 17-ए का विकल्प मौजूद है जिसके तहत कोई मतदाता चाहे तो अपने मतप्रयोग ना करने की इच्छा जाहिर कर सकता है ! लेकिन अब इसे खुले तौर पर बटन के रूप में उपस्थित कर देना लोकतान्त्रिक शुचिता के पैमाने पर जल्दीबाजी में लिया गया एक गलत फैसला प्रतीत होता है ! एक ऐसा देश जहाँ कि आम जनता अभी अपने मूल अधिकारों तक को ठीक से नहीं जानती और समझती उसे इस विकल्प को लेकर  लोकतांत्रिक खामियों की समझ आएगी, ऐसा बिलकुल नहीं समझा जाना चाहिए ! हमें नहीं भूलना चाहिए कि ये वही जनता है जो अपने द्वारा चुने हुए उसी प्रतिनधि को सही और जवाबदेह मानती है जिसकी सिफारिश से उसका राशन कार्ड बन जाए,किरासन तेल मिल जाए, बिना लाइसेंस वाली गाड़ी का चालान ना हो ! ऐसे में यह डर गैर-वाजिब नहीं है कि भ्रष्ट तंत्र और लूट-खसोट वाली सत्ताओं से नाराज जनता इस विकल्प को वास्तविक तौर पर “राईट टू रिजेक्ट” ना समझ बैठे ! अगर ऐसा हुआ तो यह हमारे आगामी चुनावों के बाद इस देश के लोकतंत्र के हित में नहीं होगा !
इसमें कोई दो राय नहीं कि इस देश की जनता को राईट टू रिजेक्ट का अधिकार कानूनी और संवैधानिक तौर पर मिलना चाहिए जिससे वो अपने मत-प्रयोग को लेकर ज्यादा स्वतंत्र हो ! मगर इसका ये भी अर्थ नहीं कि किसी भी तरह के मत खारिज करने वाले विकल्प को लेकर हम आश्वस्त हों लें ! इस विकल्प को लाने से पहले कई अन्य पहलुओं पर विचार करने एवं उन्हें इस प्रावधान का हिस्सा बनाने के बाद इसे संवैधानिक रूप से सदन से पारित करके लाने की जरुरत है ! इस नए विकल्प में प्रावधान होना चाहिए कि रिजेक्ट बटन के मतों की भी गणना हो और अगर इस मतों की संख्या अन्य सभी उम्मीदवारों को प्राप्त मतों से ज्यादा हो तो तत्काल उस चुनाव में सभी प्रत्याशियों की हार घोषित कर पुन: चुनाव कराये जाय ! साथ ही यह भी प्रावधान किया जाना चाहिए कि जो प्रत्याशी इस नियम के अंतर्गत चुनाव हार चुका हो वो अगले पांच साल तक उस लोकसभा अथवा विधानसभा क्षेत्र में चुनाव नहीं लड़ सके ! बेशक ऐसा क़ानून लाने और उसे लागू करने में तमाम शुरुआती अडचने आ सकती हैं लेकिन उन अडचनों का हवाला देकर हम इस महत्वपूर्ण क़ानून के जरुरत और महत्व से मुख नहीं मोड़ सकते ! इतने प्रावधानों से युक्त अगर कोई राईट टू रिजेक्ट आता है तो वो वाकई हमारे लोकतंत्र के लिए बहुत ही कारगर साबित होगा ! लेकिन इसके उलट वर्तमान में जो रिजेक्ट प्रावधान लाया जा रहा है वो जनता कि मतशक्ति को कमजोर कर दागियों को पनाह देगा ! यही वजह है कि दागियों को बचाने को लेकर बहुत उत्साहित दिख रहे राजनितिक दल इस मसले पर चुप्पी साधे हुए हैं ! सरकार के खिलाफ पड़ने वाले एंटी इन्कम्बैंसी वोट अगर इस वर्तमान रिजेक्ट की भेंट चढ़ गए और एक भारी संख्या में उदासीन मतदाता  अपना वोट अगर इस तरह से जाया कर आया तो यह सरकार के ही हितों में होगा ! अत: एक बात स्पष्ट तौर पर निकल कर सामने आ रही है कि राईट टू रिजेक्ट की शक्ल में जनता को परोसा जा रहा ये रिजेक्ट बटन बिलकुल भी राईट टू रिजेक्ट नहीं है ! यह महज वही बन्दुक है जो गोली नहीं चलाती लेकिन बच्चों का मन बहला सकती है !

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

आत्मनिर्भरता की दिशा में एक कदम : दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित लेख



  • शिवानन्द द्विवेदी सहर  

हाल ही में इलेक्ट्रोनिक्स के क्षेत्र में एक कदम बढाते हुए भारत सरकार की केबिनेट ने सेमीकंडक्टर की विनिर्माण सयंत्र को मंजूरी दे दी है ! लगभग 25,000 करोंड़ के इस निवेश में अगर यह प्रयोग
सफल रहा तो भारत भी इलेक्ट्रोनिक्स निर्माण करने वाले देशो की सूची में आ जाएगा ! अब तक दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रोनिक्स बाजार होने के बावजूद भारत की स्थिति निर्माण के क्षेत्र में शून्य बनी हुई थी ! इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले कुछ सालों में भारत में इलेक्ट्रोनिक्स का बाजार गुणात्मक स्तर पर तेजी से बढ़ा है और लागातार इसमें बढोत्तरी ही होती जा रही है ! भारत में इस समय तकनीक और संसाधनों की क्रान्ति अपने चरम पर है और इलेक्ट्रोनिक उत्पादों की मांग लागातार बढ़ती जा रही है ! भारत में इलेक्ट्रोनिक्स उपकरणों की बढ़ती मांग और लागातर तेजी से फैलते जा रहे इस बाजार का सही अंदाजा संसद में पेश की गयी पिछले दो सालों की सम्बंधित रिपोर्ट से ही लगाया जा सकता है ! वर्ष 2010-11 में हुए इलेक्ट्रोनिक्स उपकरणों के कुल आयात का ब्यौरा प्रस्तुत करते हुए तत्कालीन केबिनेट राज्य मंत्री मिलिंद देवड़ा ने बताया था कि इस वित्तीय वर्ष में कुल एक लाख इक्कीस हजार करोंड़ का कुल इलेक्ट्रोनिक उपकरणों का आयात हुआ है ! जबकि उसके ठीक एक साल बाद लोकसभा में पेश रिपोर्ट में यह आंकड़ा 30 फीसद के उछाल के साथ लगभग एक लाख सत्तावन हजार करोंड़ तक पहुच गया ! इन आंकड़ों को ठीक से समझने के बाद एक बात तो साफ़ तौर पर नजर आती है कि अब इलेक्ट्रोनिक्स का बाजार इतना बड़ा तो हो ही चुका है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर प्रभावित कर सके !  इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि सुचना एवं प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में तेजी से विकसित हो रहा इलेक्ट्रोनिक्स बाजार भारत के लिए कई स्तरों पर विकास एवं बेहतरी की संभावना ले कर आया है ! लेकिन समानांतर रूप से इस बात पर भी व्यापक बहस जरूरी है कि बड़े स्तर पर फ़ैल चुके इस बाजार को लेकर हमारी नीतियां कितनी मजबूत और कारगर साबित हो रही हैं ! इस पुरे मसले में अगर देखा जाय तो हमारी अर्थव्यवस्था पर इस बाजार क्या ज्यादा प्रभाव भारी मात्रा में होने वाले आयात की वजह से पड़ता नजर आ रहा है ! दरअसल लाखों करोंड़ के इस आयात की सबसे बड़ी वजह ये है कि अभी तक भारत इन उत्पादों के उत्पादन की दिशा में बुनियादी स्तर पर भी कोई काम कर पाने में सफल नहीं रहा है ! जिस देश में इलेक्ट्रोनिक्स का बाजार इतना बड़ा हो वहाँ इलेक्ट्रोनिक्स उत्पादों के उत्पादन का बिलकुल ना होना आश्चर्यचकित करने वाली बात है ! इस सच्चाई को कतई खारिज नहीं किया जा सकता कि इलेक्ट्रोनिक उत्पादों के आयात के मामले में भारत जितना आगे जा चुका है उनके मैन्युफैक्चारिंग मामले में उतना ही पीछे खिसकता गया है ! भारत आज भी इस मामले में इतना अपरिपक्व है कि वो एक ट्रांजिस्टर लेवल के मामूली कंपोनेंट की मैन्युफैक्चारिंग तक नहीं कर सकता, शेष आईसी-चिप आदि का तो सवाल ही नहीं उठता ! आज भी इलेक्ट्रोनिक कम्पोनेंट्स के मामले में हम चाइना और कोरिया जैसे देशों पर निर्भर हैं ! लिहाजा, इलेक्ट्रोनिक्स की दिशा में देश का लाखों करोंड़ मात्र आयात के नाम पर विदेशों में जा रहा है !
            हालाकि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि भारत में इन कम्पोनेंट्स के मैन्युफैक्चारिंग को लेकर आज के पहले सरकारी स्तर पर कोई पहल बिलकुल नहीं हुई है ! इस दिशा में इलेक्ट्रोनिक्स उद्द्योग को बढ़ावा देने एवं मैन्युफैक्चारिंग तकनीक को विकसित करने के नजरिये से ही सरकार द्वारा सबसे पहले एससीएल मोहाली इलेक्ट्रोनिक्स प्रयोगशाला की स्थापना की गयी थी ! इस प्रयोगशाला की स्थापना का उद्देश्य यही था कि शुरुआती दिनों में अनुसंधान कार्य होगा एवं आगे चलकर इसे ही मैन्युफैक्चारिंग हब के रूप में विकसित कर लिया जाएगा ! लेकिन फिलहाल ऐसा हुआ नहीं और मामला हीलाहवाली की भेंट चढ़ गया ! शुरुआती दिनों में सरकार द्वारा इस मामले को गंभीरता से ना लिए जाने की वजह से वैज्ञानिक स्तर के तमाम लोग जो मोहाली लैब से शुरुआत में जुड़े, आगे चलकर इस मुहीम को छोड़ दिये और निजी कंपनियों के साथ जुड़ गए ! फिलहाल भारत में कुल दो प्रयोगशालाएं चल रहीं हैं जो इलेक्ट्रोनिक अनुसंधान की दिशा में काम कर रहीं हैं, मगर मैन्युफैक्चारिंग के मामले में कहीं भी कोई पहल अभी ना के बराबर है ! इसी क्रम में हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इलेक्ट्रोनिक्स पुर्जों के मैन्युफैक्चारिंग को लेकर सरकार द्वारा हैदराबाद में एक सेमीकंडक्टर हब लगाने के लिए फैबसिटी के नाम से कोई योजना शुरू की गयी थी, जिसका उद्देश्य तमाम इलेक्ट्रोनिक्स सेमीकंडक्टर निर्माता कंपनियों की मदद से इलेक्ट्रोनिक्स उद्द्योग लगाना था ! लेकिन राजस्व एवं वित्तीय कारणों से इस पूरी योजना को ठप करना पड़ा ! परिणामत: एक बार और इस दिशा में निराशा ही हाथ लगी ! अगर कारणों की तहों को पलट कर देखें तो इस पुरे उद्द्योग की स्थापना करने एवं उत्पादन शुरू करने में जो सबसे बड़ी रुकावट आ रही थी वो थी वित्तीय अभाव अथवा फंड की कमी ! दरअसल वर्तमान परिस्थितियों में भारत सरकार द्वारा इस दिशा में प्रस्तावित बजट का बहुत बड़ा हिस्सा आयात एवं रिसर्च आदि में ही खर्च होता है ! बहरहाल इलेक्ट्रोनिक्स की दिशा मैन्युफैक्चारिंग इंडस्ट्री के ना होने के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को दोहरी मार का सामना करना पड़ रहा है ! डॉलर के मुकाबले लागातर गिर रहे रुपये की कीमत का बड़े स्तर पर प्रभाव इलेक्ट्रोनिक्स के बाजार एवं आयात पर भी पड़ रहा है और इसका अप्रत्यक्ष वित्तीय नुकसान सरकार को ही उठाना पड़ता है !
      फिलहाल ठंढे बस्ते में जा चुके हैदराबाद के फैब सिटी प्रोजेक्ट के बाद अब सरकार ने भारत में सेमीकंडक्टर के मैन्युफैक्चारिंग उद्योग स्थापित करने की दिशा में पुन: एक जरूरी पहल की है ! अगर सरकार अपने लक्ष्य में 2020 तक भी कामयाब हो जाती है तो निश्चित तौर पर यह सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री के अलावा इलेक्ट्रोनिक्स बाजार की दिशा में बड़ा और परिवर्तनकारी कदम होगा ! इस प्रोजेक्ट की सफलता से न सिर्फ इलेक्ट्रोनिक्स निर्माण के क्षेत्र में मजबूती मिलेगी वरन भारत में रोजगार को भी बल मिलेगा ! लाखों करोंड़ के आयात का बोझ झेल रहे देश को महज इलेक्ट्रोनिक्स का बड़ा बाजार होने की बजाय बड़ा उत्पादक भी बनना होगा ! वरना आयात के भरोसे यह पूरा खेल देश की अर्थव्यवस्था पर प्रहार करता रहेगा ! हम इलेक्ट्रोनिक्स का बाजार तो बहुत बड़ा खड़ा किये हैं लेकिन उत्पादक छोटे स्तर के भी नहीं बन पाए हैं ! इलेक्ट्रोनिक्स की दिशा में बाजार और उत्पादन के बीच का यह असंतुलन बेहद घातक और नुकसानदेय है ! जितनी जल्दी संभव हो इससे निजात पाना जरूरी है !