- शिवानन्द द्विवेदी
प्राय: ऐसा होता है कि हम अपनी सांस्कृतिक
विरासतों का मूल्यांकन बड़े शहरों में आयोजित होने वाले बड़े-बड़े कार्यक्रमों एवं
प्रदर्शनियों के दायरों में सिमट कर ही कर लेते हैं ! चन्द ख्यातिलब्ध स्थलों एवं
वहाँ होते रहने वाले आयोजनों को ही हमारे द्वारा अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं का
उदाहरण बनाया जाता रहा है ! जबकि इसके इतर भी विविधताओं वाले इस देश में तमाम
छोटे-छोटे कस्बे एवं गाँव और शहर हैं जिनकी सांस्कृतिक विरासतें तो अद्वितीय एवं
अनोखी हैं मगर उन्हें अभी तक चिन्हित तक नहीं किया जा सका है और वो गुमनाम तौर पर
अनवरत संचालित हो रहीं हैं ! ऐसे छोटे जगहों की छोटी-छोटी परम्पराओं,संस्कृतियों
एवं स्थानीय लोगों के प्रयासों को महत्व दिया जाना भी जरूरी है ! उदाहरण के तौर पर
पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला स्थित एक गाँव सजाँव को अगर करीब से जानने का
प्रयास किया जाय तो वाकई ऐसा लगता है कि लगभग दस हजार जनसँख्या वाला विविध जातियों
एवं संप्रदायों का यह गाँव अपनी सांस्कृतिक विविधताओं के लिए अवश्य प्रकाश में आना
चाहिए ! आजादी के ठीक चार साल बाद इस गाँव के युवाओं के मन में यह डर समाया कि
कहीं अंग्रेजी हुकुमत से आजाद होने के बावजूद हम अंग्रेजियत के गुलाम होकर न रह
जायें और अपनी संस्कृति, अपना धार्मिक सरोकार और अपने सामाजिक मूल्य भी अंग्रेजियत
के अनुरूप न ढाल लें ! वर्तमान की स्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि उनका डर गलत
नहीं था ! गरीबी के उस दौर में जब लोगों के पास अपनी जरुरत के संसाधन तक नहीं थे, उन
विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने
प्रिय खेल-कौशल कुश्ती और नाट्य कला को बचाने के लिए सार्वजनिक स्तर पर प्रत्येक
साल दंगल प्रतियोगिता और रामलीला का स्वत: आयोजन करने का निर्णय लिया ! सन 1952 में जिस रामलीला को
शुरू किया गया उसका उद्देश्य केवल धार्मिक नहीं था बल्कि उसका अपना एक सामाजिक
महत्व था जिसकी वजह से वो आज भी खास है और आज भी कायम है ! उस रामलीला में हर जाति
के गाँव के ही बड़े-बूढ़े और बच्चे अदाकारी करते हैं एवं गाँव का मुस्लिम समुदाय उस
रामलीला में ढोल-नगाड़ों के साथ चार चाँद लगाता है ! सामाजिक सौहार्द का इससे बड़ा
उदाहरण भला और क्या हो सकता है कि जब रामलीला में ढोल नगाड़े बजाने वाले मुस्लिम
समुदाय के पर्व मोहर्रम पर ताजिया उठता है तो गाँव के बहुसंख्यक हिदू समाज के
दरवाजे-दरवाजे पर वो ताजिया जाता है और हिंदू परिवारों की महिलायें निकल कर ताजिये की पूजा करती हैं !
इन सबके अलावा खेल-कूद के पारंपरिक मूल्यों को समझते हुए यह गाँव मंडल स्तरीय
कुश्ती प्रतियोगिता कई दशकों से आयोजित करता आ रहा है ! इसी कुश्ती प्रतियोगिता से
निकले कई लोग राष्ट्रीय स्तर तक पहुचे हैं ! हालाकि अपने धरोहरों को सजोता यह गाँव
कोई इकलौता नहीं है बल्कि ऐसे तमाम छोटे-छोटे कस्बे और गाँव हैं जिन्होंने अपने
ढंग से अपनी संस्कृति को सहेजने का प्रयास किया है ! आज जब त्रिस्तरीय पंचायती
व्यवस्था के तहत हमारा शासन अंतिम व्यक्ति के सबसे करीब तक पहुच चुका है तो इसी
व्यवस्था के तहत ऐसी संस्कृतियों को सहेजने वाले लोगों,गांवों को प्रोत्साहित करने
में कोई दिक्क्त नहीं होनी चाहिए हैं ! दिल्ली की रामलीला और अन्य आयोजनों में
बेशक प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जाते हों और इन आयोजनों को बखूबी चर्चा मिलती है
लेकिन हमारे गांवों की संस्कृतियाँ तो आज भी गुमनाम ही चल रहीं हैं !
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