मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

आयात के भरोसे भारत में इलेक्ट्रोनिक्स उद्द्योग :भारत सरकार की पत्रिका योजना में प्रकाशित लेख



  • शिवानन्द द्विवेदी सहर  

सुचना एवं प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में हुई क्रान्ति के बाद भारत इलेक्ट्रोनिक्स उपकरणों के सर्वाधिक
उपभोक्ताओं का वाला देश बन चुका है ! इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले कुछ सालों में भारत में इलेक्ट्रोनिक्स का बाजार गुणात्मक स्तर पर तेजी से बढ़ा है और लागातार इसमें बढोत्तरी ही होती जा रही है ! भारत में इस समय तकनीक और संसाधनों की क्रान्ति अपने चरम पर है और इलेक्ट्रोनिक उत्पादों की मांग लागातार बढ़ती जा रही है ! भारत में इलेक्ट्रोनिक्स उपकरणों की बढ़ती मांग और लागातर तेजी से बढते जा रहे इस बाजार का सही अंदाजा संसद में पेश की गयी पिछले दो सालों की सम्बंधित रिपोर्ट से ही लगाया जा सकता है ! वर्ष 2010-11 में हुए इलेक्ट्रोनिक्स उपकरणों के कुल आयात का ब्यौरा प्रस्तुत करते हुए तत्कालीन केबिनेट राज्य मंत्री मिलिंद देवड़ा ने बताया था कि इस वित्तीय वर्ष में कुल एक लाख इक्कीस हजार करोंड़ का कुल इलेक्ट्रोनिक उपकरणों का आयात हुआ है ! जबकि उसके ठीक एक साल बाद लोकसभा में पेश रिपोर्ट में यह आंकड़ा 30 फीसद के उछाल के साथ लगभग एक लाख सत्तावन हजार करोंड़ तक पहुच गया ! इन आंकड़ों को ठीक से समझने के बाद एक बात तो साफ़ तौर पर नजर आती है कि अब इलेक्ट्रोनिक्स का बाजार इतना बड़ा तो हो ही चुका है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर प्रभावित कर सके !  इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि सुचना एवं प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में तेजी से विकसित हो रहा इलेक्ट्रोनिक्स बाजार भारत के लिए कई स्तरों पर विकास एवं बेहतरी की संभावना ले कर आया है ! लेकिन समानांतर रूप से इस बात पर भी व्यापक बहस जरूरी है कि बड़े स्तर पर फ़ैल चुके इस बाजार को लेकर हमारी नीतियां कितनी मजबूत और कारगर साबित हो रही हैं ! इस पुरे मसले में अगर देखा जाय तो हमारी अर्थव्यवस्था पर इस बाजार क्या ज्यादा प्रभाव भारी मात्रा में होने वाले आयात की वजह से पड़ता नजर आ रहा है ! दरअसल लाखों करोंड़ के इस आयात की सबसे बड़ी वजह ये है कि अभी तक भारत इन उत्पादों के निर्माण की दिशा में बुनियादी स्तर पर भी कोई काम कर पाने में सफल नहीं रहा है ! जिस देश में इलेक्ट्रोनिक्स का बाजार इतना बड़ा हो वहाँ इलेक्ट्रोनिक्स उत्पादों के उत्पादन का बिलकुल ना होना आश्चर्यचकित करने वाली बात है ! इस सच्चाई को कतई खारिज नहीं किया जा सकता कि इलेक्ट्रोनिक उत्पादों के आयात के मामले में भारत जितना आगे जा चुका है उनके मैन्युफैक्चारिंग मामले में उतना ही पीछे खिसकता गया है ! एक ताजा आंकड़े के अनुसार भारत में इलेक्ट्रोनिक्स निर्माण का कुल उद्द्योग पुरे विश्व का मात्र 0.7% है,जो कि भारतीय सेमीकंडक्टर के मांग  के हिसाब से बहुत ही कम एवं निराशाजनक कहा जा सकता है ! भारत आज भी इस मामले में इतना परिपक्व नहीं हो पाया है कि वो एक ट्रांजिस्टर लेवल के मामूली कंपोनेंट की मैन्युफैक्चारिंग तक कर सके, शेष आईसी-चिप आदि का तो सवाल ही नहीं उठता ! आज भी इलेक्ट्रोनिक कम्पोनेंट्स के मामले में हम चाइना और कोरिया जैसे देशों पर निर्भर हैं ! लिहाजा, इलेक्ट्रोनिक्स की दिशा में देश का लाखों करोंड़ मात्र आयात के नाम पर विदेशों में जा रहा है ! आश्चर्य जनक तथ्य यह है कि बहुत कम समय में विकसित हुए इलेक्ट्रोनिक्स बाजार की वर्तमान स्थिति के आधार पर यह आकलन किया जा चुका है कि आगामी 2020 तक  भारत का इलेक्ट्रोनिक्स आयात भारत के कुल तेल आयात से बड़ा हो चुका होगा ! चुकि इलेक्ट्रोनिक्स निर्माता ना होने की वजह से भारत की इलेक्ट्रोनिक्स निर्यात की स्थिति नगण्य है जबकि पड़ोसी मुल्क चीन दुनिया के कुल इलेक्ट्रोनिक्स निर्यात का 30% निर्यात अकेले करता है !
            हालाकि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि इलेक्ट्रोनिक्स उदय के शुरुआती दिनों में भारत में इन कम्पोनेंट्स के मैन्युफैक्चारिंग को लेकर सरकारी स्तर पर कोई पहल बिलकुल नहीं हुई है ! इस दिशा में इलेक्ट्रोनिक्स उद्द्योग को बढ़ावा देने एवं मैन्युफैक्चारिंग तकनीक को विकसित करने के नजरिये से ही सरकार द्वारा सबसे पहले सन 1983 में सेमीकंडक्टर लैबरोटरी की स्थापना मोहाली  में की गयी थी ! इस प्रयोगशाला की स्थापना का उद्देश्य यही था कि शुरुआती दिनों में अनुसंधान कार्य होगा एवं आगे चलकर इसे ही मैन्युफैक्चारिंग हब के रूप में विकसित कर लिया जाएगा !  लेकिन फिलहाल ऐसा हुआ नहीं है और ना ही भविष्य में भी ऐसा होता दिख रहा है ! क्योंकि,बाद में आगे चलकर भारत सरकार द्वारा ही 1 मार्च 2005 को इस प्रयोगशाला को सुचना प्रौद्दोगिकी विभाग से हटाकर अंतरिक्ष अनुसंधान विभाग के अंतर्गत कर दिया गया एवं संस्था पंजीकरण अधिनियम के तहत इसका पंजीकरण करा दिया गया ! पंजीकरण के बाद इस संस्था के उद्देश्यों में  लिखित तौर यही बताया गया कि संस्था का मुख्य उद्देश्य माइक्रो-इलेक्ट्रोनिक्स के क्षेत्र
में अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देना है लेकिन सेमीकंडक्टर निर्माण को लेकर कुछ ठोस नहीं कहा गया ! इलेक्ट्रोनिक्स निर्माण उद्द्योग को सरकार द्वारा गंभीरता से ना लिए जाने की वजह से वैज्ञानिक स्तर के तमाम लोग जो मोहाली लैब से शुरुआत में जुड़े, आगे चलकर इस मुहीम को छोड़ दिये और निजी कंपनियों के साथ जुड़ गए ! कहीं ना कहीं इस पुरे मामले में इलेक्ट्रोनिक्स के उद्द्योग को बढ़ावा देने में सरकारी उदासीनता भी एक बड़ी वजह रही है !  फिलहाल भारत में कुल दो प्रयोगशालाएं चल रहीं हैं जो इलेक्ट्रोनिक अनुसंधान की दिशा में काम कर रहीं हैं, मगर मैन्युफैक्चारिंग के मामले में कहीं भी कोई पहल अभी ना के बराबर है ! इसी क्रम में हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इलेक्ट्रोनिक्स पुर्जों के मैन्युफैक्चारिंग को लेकर सरकार द्वारा हैदराबाद में एक सेमीकंडक्टर हब लगाने के लिए फैबसिटी के नाम से कोई योजना शुरू की गयी थी, जिसका उद्देश्य तमाम इलेक्ट्रोनिक्स सेमीकंडक्टर निर्माता कंपनियों की मदद से इलेक्ट्रोनिक्स उद्द्योग लगाना था ! लेकिन राजस्व एवं वित्तीय कारणों से इस पूरी योजना को ठप करना पड़ा ! परिणामत: एक बार और इस दिशा में निराशा ही हाथ लगी ! अगर कारणों की तहों को पलट कर देखें तो इस पुरे उद्द्योग की स्थापना करने एवं उत्पादन शुरू करने में जो सबसे बड़ी रुकावट आ रही है वो है वित्तीय अभाव अथवा फंड की कमी ! दरअसल वर्तमान परिस्थितियों में भारत सरकार द्वारा इस दिशा में प्रस्तावित बजट का बहुत बड़ा हिस्सा आयात एवं रिसर्च आदि में ही खर्च होता है, जबकि इस उद्योग की स्थापना के लिए हजारों एकड़ की जमीन के अलावा लगभग 400 बिलियन अमेरिकन डॉलर के निवेश की जरुरत है ! फिलहाल ठंढे बस्ते में जा चुके हैदराबाद के फैब सिटी प्रोजेक्ट के बाद अब सरकार ने भारत में सेमीकंडक्टर के मैन्युफैक्चारिंग उद्योग स्थापित करने का लक्ष्य 2020 तक का रखा है ! भारत सरकार की केबिनेट द्वारा हाल ही में इलेक्ट्रोनिक सिस्टम डिजाइन एंड मैन्युफैक्चारिंग(ESDM) को वित्तीय मदद देकर इस उद्द्योग को स्थापित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गयी है ! ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि अगर इस पुरे उद्द्योग को स्थापित करने में कामयाबी मिल जाती है तो भारत में कई तरह की संभावनाओं को बल मिलेगा ! इलेक्ट्रोनिक्स मैन्युफैक्चारिंग का बड़ा और महत्वपूर्ण फायदा यह है कि इससे भारत में रोजगार की असीम संभावनाओं के द्वार खुलेंगे ! अगर रोजगार के नजरिये से देखें तो भारत में रोजगार एक बड़ी समस्या की तरह है ! अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में श्रमिक उत्पादकता के अनुपात में रोजगार के अवसरों में भारी स्तर पर गिरावट हुई है ! सन 2004 से लेकर अबतक भारत में रोजगारों के अवसरों में 0.1% की मामूली बढोत्तरी दर्ज की गयी है जबकि बेरोजगारों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है ! ऐसे में इलेक्ट्रोनिक्स  मैन्युफैक्चारिंग उद्द्योग स्थापित होना एक परिवर्तनकारी कदम साबित हो सकता है ! इलेक्ट्रोनिक्स में रोजगार के लिहाज से देखें तो भारत में इलेक्ट्रोनिक्स मैन्युफैक्चारिंग लेवल पर रोजगार का दायरा बहुत छोटा और सीमित है ! अत: ज्यादातर इंजीनियर विदेशों की तरफ पलायन करने को मजबूर हैं एवं जो बाहर नहीं जा पा रहे वो भारत में व्यापक अवसर नहीं मिलने के कारण बेरोजगार की स्थिति में रहने को मजबूर हैं !    एक विदेशी कंपनी के साथ कई सालों से इलेक्ट्रोनिक्स इंडस्ट्री को करीब से देख रहे इलेक्ट्रोनिक्स प्रोफेसनल एम.टेक इन इलेक्ट्रोनिक्स शिवेश दुबे बताते हैं कि रोजगार के लिहाज से इस पुरे प्रोजेक्ट के स्थापित होने के बाद लगभग 2.8 करोंड़ लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तौर पर रोजगार का अवसर मिल सकता है एवं  भारत पर चीन जैसे प्रतिस्पर्धी देशों से होने वाले इलेक्ट्रोनिक्स आयात का बोझ कम होगा एवं भारत इलेक्ट्रोनिक्स निर्यात की दिशा में एक कदम आगे बढ़ सकता है ! अत: यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत अगर इलेक्ट्रोनिक्स कम्पोनेंट्स का निर्माता बन पाने में सफल होता है तो भारत में रोजगार को काफी बल मिलेगा !  हालाकि डॉलर के सामने मुह की खाती भारत की वर्तमान अर्थव्यवस्था, इस निवेश को अमली जामा पहने की स्थिति में हैं ऐसा बिलकुल नहीं लगता है ! लेकिन कारण जो भी हों लेकिन इस बात से तो किसी को गुरेज नहीं होनी चाहिए कि इलेक्ट्रोनिक्स की दिशा मैन्युफैक्चारिंग इंडस्ट्री के ना होने के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को दोहरी मार का सामना करना पड़ रहा है ! डॉलर के मुकाबले लागातर गिर रहे रुपये की कीमत का बड़े स्तर पर प्रभाव इलेक्ट्रोनिक्स के बाजार एवं आयात पर भी पड़ रहा है और इसका अप्रत्यक्ष वित्तीय नुकसान सरकार को ही उठाना पड़ता है !

      इस पुरे प्रोजेक्ट में सरकार का लक्ष्य 2020 तक 400 बिलियन अमेरिकन डॉलर के निवेश एवं टर्नओवर के साथ  इस पुरे उद्योग को भारत में स्थापित करने का है ! अगर सरकार अपने लक्ष्य में 2020 तक भी कामयाब हो जाती है तो निश्चित तौर पर यह सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री के अलावा इलेक्ट्रोनिक्स बाजार की दिशा में बड़ा और परिवर्तनकारी कदम होगा ! एकतरफ जहाँ हम इलेक्ट्रोनिक्स निर्माता होने के बाद आयात के इस जंजीर से मुक्त होकर दुनिया के तमाम विकसित एवं विकासशील देशों के साथ प्रतिस्पर्धा की कतार में खड़े होने की योग्यता हासिल कर पाने में सफल होंगे तो वहीँ रिसर्च एंड डेवलपमेंट की दिशा में और अधिक आत्मनिर्भर बनेंगे ! यह प्रोजेक्ट ना सिर्फ में भारत को इलेक्ट्रोनिक्स के क्षेत्र में विकसित करेगां बल्कि आर्थिक,सामाजिक,वैज्ञानिक,अंतरिक्ष अनुसंधान,रोजगार आदि की दिशा में व्यापक स्तर पर परिवर्तनकारी साबित होगा !  आज लाखों करोंड़ के आयात का बोझ झेल रहे देश को महज इलेक्ट्रोनिक्स का बड़ा बाजार होने की बजाय बड़ा उत्पादक भी बनना होगा ! अगर हम उत्पादक बनने की बजाय इसी तरह से  आयात के भरोसे चलते रहे  यह पूरा खेल देश की अर्थव्यवस्था पर प्रहार करता रहेगा और हमारी अर्थव्यस्था आदि में इसी तरह की विषम परिस्थितियां आती रहेंगी  ! प्राचीन काल में दुनिया को राह दिखाने वाले भारत को एक राह दुनिया से भी देखने की जरुरत है कि इलेक्ट्रोनिक्स को लेकर दुनिया की रफ़्तार क्या है और हम इतने कच्छप चाल से क्यों चल रहे हैं ? हम इलेक्ट्रोनिक्स का बाजार तो बहुत बड़ा खड़ा किये हैं लेकिन उत्पादक छोटे स्तर का भी नहीं बन पाए हैं ! हम जिस तरह से सॉफ्टवेयर उद्द्योग में तेजी से प्रगति कर रहे हैं उसी तरह से हार्डवेयर के क्षेत्र में भी आगे बढ़ना होगा,क्योंकि हार्डवेयर के मोर्चे पर बेहद लचर हैं ! इलेक्ट्रोनिक्स की दिशा में बाजार और उत्पादन के बीच का यह असंतुलन बेहद घातक और नुकसानदेय है ! जितनी जल्दी संभव हो इससे निजात पाना एवं आत्मनिर्भर होना जरूरी है !    

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