शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

खोखला और बेकार है ये राईट टू रिजेक्ट : जानिये कैसे ?

  • शिवानन्द द्विवेदी सहर
साभार गूगल
एक उक्ति में कहा गया है कि बन्दुक जैसी दिखने वाली हर चीज़ गोली चलाने के काम नहीं आती बल्कि कई बार बच्चों का मन बहलाने वाला खिलौना भी हो सकती है ! आज माननीय सर्वोच्च न्यायलय के निर्देश के बाद इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन में “इनमे से कोई नहीं” के बटन को राईट टू रिजेक्ट का विकल्प बता कर जिस तरह से जनता के बीच रखा जा रहा है,ऐसे में यह उक्ति काफी प्रासंगिक हो जाती है ! आपको याद हो तो राईट टू रिजेक्ट वही क़ानून है जिसकी मांग अन्ना हजारे से लगाये तमाम सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा हमारे चुने हुए प्रतिनधियों से की जाती रही है लेकिन हमारे रहनुमाओं को ऐसा क़ानून लाने में तकलीफ महसुस होती है ! न्यापालिका के निर्देश के बाद यह नया विकल्प वोटिंग मशीनों में आना लगभग तय है और आगामी पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों में इस प्रयोग को आजमाया भी जाएगा ! ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि क्या वाकई इस तरह का प्रतीकात्मक और महज दिखावटी रिजेक्ट बटन हमारी लोकतांत्रिक चुनाव प्रणाली को मजबूत कर पाने में सहायक होगा ? बड़ा सवाल ये भी है कि जब इस विकल्प में मतदाता के द्वारा चुने गए रिजेक्ट का कोई परिणामी अर्थ ही नहीं है तो भला इसे रिजेक्ट किस आधार पर कहा जा रहा है ?
इस नए विकल्प के वर्तमान प्रारूप को देखकर तो यही लगता है कि  ईमानदार और स्वच्छ प्रतिनिधियों की इच्छा रखने वाला बहुमत इस विकल्प का प्रयोग करके हाशिए पर जा सकता है जबकि दागियों और भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के पक्ष में पड़ा अल्पमत देश की दशा और दिशा निर्धारित करेगा ! किसी को वोट नहीं देने अथवा सबको खारिज करने वाले इस विकल्प की सबसे बड़ी खामी यही है कि इसे मतगणना में ही पर्याप्त महत्व नहीं मिला है ! मतगणना के पश्चात अगर सबसे बड़ा मत इस विकल्प को भी मिला हो तब भी इसका कोई महत्व नहीं स्वीकार किया गया है ! हार और जीत के फासलों को यह कहीं से भी प्रभावित कर पाने सक्षम नहीं है ! अत: यह कहना गलत नहीं होगा कि दिखावटी और प्रतीकात्मक रिजेक्ट का यह विकल्प महज मतदाताओं के मतों को एक निष्क्रिय पिटारे में बंद कर उस पर मिट्टी डालने से ज्यादा कुछ भी नहीं है ! उदाहरण के लिहाज से भी अगर देखा जाय तो किसी विधानसभा क्षेत्र में दो दागियों के बीच अगर वहाँ कि बहुसंख्यक जनता किसी एक को भी नहीं चुनना चाहती हो और इस नए-नवेले रिजेक्ट विकल्प पर अपना मत जाहिर करती हो तो भी चुना उन्ही में से कोई एक जाएगा ! यानी निष्कर्ष साफ़ है कि बहुमत की कोई गणना नहीं और अल्पमत चुनकर विधानसभा और लोकसभा तक प्रतिनधित्व करेंगे ! ऐसे में लोकतंत्र में भागीदारी को तकनीकी रूप से अगर समझने की कोशिश की जाय तो इस विकल्प का प्रयोग किया हुआ वोटर पुरे चुनाव का सबसे ठगा हुआ,निष्क्रिय और हाशिए के वोटर से ज्यादा कुछ भी नहीं नजर आता है जिसके मतधिकार को एक बटन मात्र से कुंद कर दिया गया है ! अगर बारीकी से देखें तो इस नए विकल्प के प्रयोग के कारण  दागियों,भ्रष्टों, अपराधियों की बजाय मतदाता की लोकतंत्र निर्माण में भूमिका ही खारिज होती नजर आ रही है ! 
ऐसा नहीं है कि इस किस्म का रिजेक्ट विकल्प पहले नहीं था अथवा मत प्रयोग के प्रति अनिच्छा जाहिर करने वालों के लिए कोई और विकल्प नहीं दिया गया था ! पहले से ही इसके लिए हमारे संविधान में फ़ार्म 17-ए का विकल्प मौजूद है जिसके तहत कोई मतदाता चाहे तो अपने मतप्रयोग ना करने की इच्छा जाहिर कर सकता है ! लेकिन अब इसे खुले तौर पर बटन के रूप में उपस्थित कर देना लोकतान्त्रिक शुचिता के पैमाने पर जल्दीबाजी में लिया गया एक गलत फैसला प्रतीत होता है ! एक ऐसा देश जहाँ कि आम जनता अभी अपने मूल अधिकारों तक को ठीक से नहीं जानती और समझती उसे इस विकल्प को लेकर  लोकतांत्रिक खामियों की समझ आएगी, ऐसा बिलकुल नहीं समझा जाना चाहिए ! हमें नहीं भूलना चाहिए कि ये वही जनता है जो अपने द्वारा चुने हुए उसी प्रतिनधि को सही और जवाबदेह मानती है जिसकी सिफारिश से उसका राशन कार्ड बन जाए,किरासन तेल मिल जाए, बिना लाइसेंस वाली गाड़ी का चालान ना हो ! ऐसे में यह डर गैर-वाजिब नहीं है कि भ्रष्ट तंत्र और लूट-खसोट वाली सत्ताओं से नाराज जनता इस विकल्प को वास्तविक तौर पर “राईट टू रिजेक्ट” ना समझ बैठे ! अगर ऐसा हुआ तो यह हमारे आगामी चुनावों के बाद इस देश के लोकतंत्र के हित में नहीं होगा !
इसमें कोई दो राय नहीं कि इस देश की जनता को राईट टू रिजेक्ट का अधिकार कानूनी और संवैधानिक तौर पर मिलना चाहिए जिससे वो अपने मत-प्रयोग को लेकर ज्यादा स्वतंत्र हो ! मगर इसका ये भी अर्थ नहीं कि किसी भी तरह के मत खारिज करने वाले विकल्प को लेकर हम आश्वस्त हों लें ! इस विकल्प को लाने से पहले कई अन्य पहलुओं पर विचार करने एवं उन्हें इस प्रावधान का हिस्सा बनाने के बाद इसे संवैधानिक रूप से सदन से पारित करके लाने की जरुरत है ! इस नए विकल्प में प्रावधान होना चाहिए कि रिजेक्ट बटन के मतों की भी गणना हो और अगर इस मतों की संख्या अन्य सभी उम्मीदवारों को प्राप्त मतों से ज्यादा हो तो तत्काल उस चुनाव में सभी प्रत्याशियों की हार घोषित कर पुन: चुनाव कराये जाय ! साथ ही यह भी प्रावधान किया जाना चाहिए कि जो प्रत्याशी इस नियम के अंतर्गत चुनाव हार चुका हो वो अगले पांच साल तक उस लोकसभा अथवा विधानसभा क्षेत्र में चुनाव नहीं लड़ सके ! बेशक ऐसा क़ानून लाने और उसे लागू करने में तमाम शुरुआती अडचने आ सकती हैं लेकिन उन अडचनों का हवाला देकर हम इस महत्वपूर्ण क़ानून के जरुरत और महत्व से मुख नहीं मोड़ सकते ! इतने प्रावधानों से युक्त अगर कोई राईट टू रिजेक्ट आता है तो वो वाकई हमारे लोकतंत्र के लिए बहुत ही कारगर साबित होगा ! लेकिन इसके उलट वर्तमान में जो रिजेक्ट प्रावधान लाया जा रहा है वो जनता कि मतशक्ति को कमजोर कर दागियों को पनाह देगा ! यही वजह है कि दागियों को बचाने को लेकर बहुत उत्साहित दिख रहे राजनितिक दल इस मसले पर चुप्पी साधे हुए हैं ! सरकार के खिलाफ पड़ने वाले एंटी इन्कम्बैंसी वोट अगर इस वर्तमान रिजेक्ट की भेंट चढ़ गए और एक भारी संख्या में उदासीन मतदाता  अपना वोट अगर इस तरह से जाया कर आया तो यह सरकार के ही हितों में होगा ! अत: एक बात स्पष्ट तौर पर निकल कर सामने आ रही है कि राईट टू रिजेक्ट की शक्ल में जनता को परोसा जा रहा ये रिजेक्ट बटन बिलकुल भी राईट टू रिजेक्ट नहीं है ! यह महज वही बन्दुक है जो गोली नहीं चलाती लेकिन बच्चों का मन बहला सकती है !

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