- शिवानन्द द्विवेदी सहर
भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों की न्यूयार्क में होने मुलाक़ात से लगभग 72
घंटे पहले हुई जम्मू के कठुवा और साम्बा में पाकिस्तान सीमा से घुसे आतंकियों द्वारा हमला कर दिया गया जिसमे एक दर्जन सेना और पुलिस के जवान शहीद हुए ! इस हमले के बाद भारत में इस बात को लेकर सियासी बयानबाजियों और कयासों का दौर तेज हो गया था कि क्या ऐसी परिस्थिति में पाकिस्तान के साथ बात-चीत किया जाना चाहिए ? बयानों और विरोधों के बीच रही सही कसर दिल्ली की रैली में बोलते हुए नरेंद्र मोदी ने इस मुलाक़ात में प्रधानमंत्री की भूमिका पर सवाल उठाते हुए पूरी कर दी ! हालाकि तमाम विरोधों और बयानों के बावजूद न्यूयार्क से आई खबर के मुताबिक़ यह स्पष्ट हो गया था कि दोनों देशो के प्रधानमंत्री मिलेंगे और यह मुलाक़ात हुई भी ! आखिरकार तमाम वाह्य एवं आंतरिक विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलाक़ात की गयी ! दोनों देशो के राजनयिकों के बीच हुई इस मुलाक़ात के बाद ऐसा नहीं है कि सबकुछ ठीक हो गया है,बल्कि कई सवाल हैं जो अब भी कायम हैं ! सबसे बड़ा सवाल ये है कि भारतीय प्रधानमंत्री ने शरीफ से हुई बातचीत में किन निर्णायक बिंदुओं पर बातचीत की है ? क्या वाकई किन्ही ठोस एवं निर्णायक बिंदु पर मनमोहन सिंह ने नवाज शरीफ के साथ बात की है अथवा महज औपचारिकताओं के वही रटे-रटाए पुराने राग एक बार फिर अलाप आये हैं हमारे प्रधानमंत्री ? हालाकि बातचीत के बिंदुओं पर अगर गौर करें तो निर्णायक स्तर पर कोई बातचीत हुई है ऐसा कुछ भी नहीं प्रतीत हो रहा ! आज देश का अपने प्रधानमंत्री से वाजिब सवाल है कि आप नवाज शरीफ से जो बातचीत करके आये हैं,उसका हासिल क्या है ? हम बेशक एक शांतिवादी राष्ट्र हैं मगर एक शांतिप्रिय और उदार राष्ट्र होने का ये भी तो अर्थ नहीं होता कि विश्व समाज के मंच पर हम कोई कड़ा संदेश भी ना दे सके और केवल खुद पर हुए हमलों की कड़ी निंदा और चेतावनी देते हुए आगे बढते रहे ! जिस न्यूयार्क में बैठ कर प्रधानमंत्री यह मुलाक़ात कर रहे थे,उन्हें कुछ सीख और सबक तो वहीँ के राष्ट्रप्रमुख से लेनी चाहिए थी ! अगर आपको याद हो तो आज के तकरीबन दो साल पहले 9/11की दसवीं बरसी पर आयोजित श्रद्धांजली सभा में अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा का भाषण समूचे विश्व ने सुना ! आतंकवाद के परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति ओबामा के संवाद में कहीं ना कहीं आत्मविश्वास से ओत-प्रोत राष्ट्रवाद कि झलक दिखाई दे रही थी ! वह एक ऐसा संबोधन था जो राष्ट्रीय जनमानस को संतुष्ट करने और आतंकवाद के प्रति अपना दृष्टिकोण विश्व पटल पर स्पष्ट करने के लिए दिया गया था ! जिस स्पष्टवादिता से उस शक्तिशाली प्रशासक ने अपनी बात रखी थी और अपनी बातों पर कायम भी रहा, उस स्पष्टवादिता का भारतीय राजनयिकों में सदा से अभाव सा रहा है ! ओबामा द्वारा ग्राउंड जीरो से दिया गया वो भाषण अपने राष्ट्र के नागरिकों को आतंकवाद से महफूज रखने की गारंटी दे रहा था ! ग्राउंड जीरो से अपने राष्ट्र को संबोधित करते हुए बराक ओबामा का यह कहना कि हमने अपने हमलावर और शत्रु ओसामा बिन लादेन को मार गिराया है,कहीं ना कहीं वो अंतिम बयान था जो कोई राष्ट्र प्रमुख अपने राष्ट्र को संतुष्ट करने के लिए दे सकता था ! उस वक्त जब ओबामा यह बयां दे रहे थे तब अमेरिका के दोनों राजनीतिक दल रिपब्लिक और डेमोक्रेटिक एक दूसरे के कंधे से कंधा मिलाते नजर आ रहे थे जो कि भारतीय राजनीतिक परिस्थितियों में दिखना अब नामुमकिन के करीब प्रतीत होता है ! यही एकजुटता वो कड़ी है कि अमेरिका में 9/11 को दोहराया नहीं जा सका है !
इन सभी तथ्यों के बीच अगर आतंकवाद पर भारतीय रुख एवं भारत पर आतंकवाद के रुख की विवेचना करें तो तमाम तथ्य ऐसे परिलक्षित होंगे जो जो आतंकवाद के प्रति भारत के लचर एवं अदुरदर्शी रुख को स्पष्ट करते हैं ! प्राय: देखा जाता है कि ऐसी वारदातों के बाद जवाबी तौर पर हमारी कार्यवाही महज़ "कड़ी निंदा" ,भर्त्सना और चंद मुआवजों तक सिमित होकर रह जाती है ! कई बार तो हमारे राजनयिकों द्वारा दिए जाने वाले कुछ बयान तो राष्ट्रीय आत्मविश्वास की धज्जियां उड़ाने में उत्प्रेरक का काम करते रहे है ! ऐसी परिस्थितियों में जब हमारी राजनीति ही अलग-अलग कई विचारों में बटी हुई नजर आती है तो इसका साफ़ अर्थ यही है कि राजनितिक स्तर पर देश की सुरक्षा को लेकर हमारे पास कोई एकजुट होकर तैयार की गयी नीति नहीं है ! हमारे प्रधानमंत्री को यह समझना चाहिए कि यह निंदा करने और पाकिस्तान से मधुरता दिखाने का नहीं बल्कि ठोस निर्णय करने का वक्त है ! ऐसे हालातों को चंद बयानों और बैठकों से कतई नहीं पाटा जा सकता है ! ऐसे ना जाने कितने तथ्य ऐसे हैं जो पाकिस्तान सीमा से होने वाले आतंकी वारदातों के प्रति भारतीय राजनीतिक दृष्टिकोण के लचीलेपन एवं असंवेदनशीलता से पर्दा हटाते हैं ! हम आतंकवाद जैसी वैश्विक समस्या को भी राजनीतिक हथियार बनाने से बाज नहीं आ रहे ! जहां एक तरफ अपने एकमात्र आतंकवादी हमले से सबक लेते हुए अमेरिका अपने दुश्मन को मारकर अपनी जनता को प्रतिशोध का तौफा देता है वहीँ हम आतंकवादीयों को सरकारी खर्चे पर वकील मुहैया कराते हैं ! अब वक्त हाथ से निकलता जा रहा कि आतंकवाद के खिलाफ कोई कड़ा कदम उठाया जाय ! समझ में यह बात नहीं आती कि अगर उधर से हो रहे हमलों के कारण बातचीत प्रभावित नहीं हो सकती है तो इधर से की गयी जवाबी कार्यवाही से भला बातचीत कैसे प्रभावित हो जायेगी ? कम से कम हम समुचित और कड़ा जवाब तो पड़ोसी मुल्क को दें ! क्या विश्व समाज के मंच हम कूटनीतिक स्तर पर इतने विपन्न और पंगु हो चुके हैं कि अपनी बात को सख्ती के साथ चेतावनी के तौर पर रखने से भी परहेज करते हैं ? सच तो ये है कि हम आजतक आतंकवाद को लेकर को सर्वसम्मति से परिणाम की तरफ जाने वाला मार्ग ही नहीं तलाश पाए, और ना ही कोई निति निर्माण ही कर पाए जिसका नतीजा आज हमारे सामने है ! हम सिफ गिन रहे हैं और वो आतंक का नंगा तांडव एक के बाद एक करते जा रहे हैं ! आतंकवाद के मोर्चे पर लचर और पस्त दिख रही सरकार को अमेरिका से सबक और सीख लेनी चाहिए !

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