- शिवानन्द द्विवेदी सहर
हाल ही में इलेक्ट्रोनिक्स के क्षेत्र में एक कदम बढाते हुए भारत सरकार की केबिनेट ने सेमीकंडक्टर की विनिर्माण सयंत्र को मंजूरी दे दी है ! लगभग 25,000 करोंड़ के इस निवेश में अगर यह प्रयोग
सफल रहा तो भारत भी इलेक्ट्रोनिक्स निर्माण करने वाले देशो की सूची में आ जाएगा ! अब तक दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रोनिक्स बाजार होने के बावजूद भारत की स्थिति निर्माण के क्षेत्र में शून्य बनी हुई थी ! इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले कुछ सालों में भारत में इलेक्ट्रोनिक्स का बाजार गुणात्मक स्तर पर तेजी से बढ़ा है और लागातार इसमें बढोत्तरी ही होती जा रही है ! भारत में इस समय तकनीक और संसाधनों की क्रान्ति अपने चरम पर है और इलेक्ट्रोनिक उत्पादों की मांग लागातार बढ़ती जा रही है ! भारत में इलेक्ट्रोनिक्स उपकरणों की बढ़ती मांग और लागातर तेजी से फैलते जा रहे इस बाजार का सही अंदाजा संसद में पेश की गयी पिछले दो सालों की सम्बंधित रिपोर्ट से ही लगाया जा सकता है ! वर्ष 2010-11 में हुए इलेक्ट्रोनिक्स उपकरणों के कुल आयात का ब्यौरा प्रस्तुत करते हुए तत्कालीन केबिनेट राज्य मंत्री मिलिंद देवड़ा ने बताया था कि इस वित्तीय वर्ष में कुल एक लाख इक्कीस हजार करोंड़ का कुल इलेक्ट्रोनिक उपकरणों का आयात हुआ है ! जबकि उसके ठीक एक साल बाद लोकसभा में पेश रिपोर्ट में यह आंकड़ा 30 फीसद के उछाल के साथ लगभग एक लाख सत्तावन हजार करोंड़ तक पहुच गया ! इन आंकड़ों को ठीक से समझने के बाद एक बात तो साफ़ तौर पर नजर आती है कि अब इलेक्ट्रोनिक्स का बाजार इतना बड़ा तो हो ही चुका है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर प्रभावित कर सके ! इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि सुचना एवं प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में तेजी से विकसित हो रहा इलेक्ट्रोनिक्स बाजार भारत के लिए कई स्तरों पर विकास एवं बेहतरी की संभावना ले कर आया है ! लेकिन समानांतर रूप से इस बात पर भी व्यापक बहस जरूरी है कि बड़े स्तर पर फ़ैल चुके इस बाजार को लेकर हमारी नीतियां कितनी मजबूत और कारगर साबित हो रही हैं ! इस पुरे मसले में अगर देखा जाय तो हमारी अर्थव्यवस्था पर इस बाजार क्या ज्यादा प्रभाव भारी मात्रा में होने वाले आयात की वजह से पड़ता नजर आ रहा है ! दरअसल लाखों करोंड़ के इस आयात की सबसे बड़ी वजह ये है कि अभी तक भारत इन उत्पादों के उत्पादन की दिशा में बुनियादी स्तर पर भी कोई काम कर पाने में सफल नहीं रहा है ! जिस देश में इलेक्ट्रोनिक्स का बाजार इतना बड़ा हो वहाँ इलेक्ट्रोनिक्स उत्पादों के उत्पादन का बिलकुल ना होना आश्चर्यचकित करने वाली बात है ! इस सच्चाई को कतई खारिज नहीं किया जा सकता कि इलेक्ट्रोनिक उत्पादों के आयात के मामले में भारत जितना आगे जा चुका है उनके मैन्युफैक्चारिंग मामले में उतना ही पीछे खिसकता गया है ! भारत आज भी इस मामले में इतना अपरिपक्व है कि वो एक ट्रांजिस्टर लेवल के मामूली कंपोनेंट की मैन्युफैक्चारिंग तक नहीं कर सकता, शेष आईसी-चिप आदि का तो सवाल ही नहीं उठता ! आज भी इलेक्ट्रोनिक कम्पोनेंट्स के मामले में हम चाइना और कोरिया जैसे देशों पर निर्भर हैं ! लिहाजा, इलेक्ट्रोनिक्स की दिशा में देश का लाखों करोंड़ मात्र आयात के नाम पर विदेशों में जा रहा है !
हालाकि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि भारत में इन कम्पोनेंट्स के मैन्युफैक्चारिंग को लेकर आज के पहले सरकारी स्तर पर कोई पहल बिलकुल नहीं हुई है ! इस दिशा में इलेक्ट्रोनिक्स उद्द्योग को बढ़ावा देने एवं मैन्युफैक्चारिंग तकनीक को विकसित करने के नजरिये से ही सरकार द्वारा सबसे पहले एससीएल मोहाली इलेक्ट्रोनिक्स प्रयोगशाला की स्थापना की गयी थी ! इस प्रयोगशाला की स्थापना का उद्देश्य यही था कि शुरुआती दिनों में अनुसंधान कार्य होगा एवं आगे चलकर इसे ही मैन्युफैक्चारिंग हब के रूप में विकसित कर लिया जाएगा ! लेकिन फिलहाल ऐसा हुआ नहीं और मामला हीलाहवाली की भेंट चढ़ गया ! शुरुआती दिनों में सरकार द्वारा इस मामले को गंभीरता से ना लिए जाने की वजह से वैज्ञानिक स्तर के तमाम लोग जो मोहाली लैब से शुरुआत में जुड़े, आगे चलकर इस मुहीम को छोड़ दिये और निजी कंपनियों के साथ जुड़ गए ! फिलहाल भारत में कुल दो प्रयोगशालाएं चल रहीं हैं जो इलेक्ट्रोनिक अनुसंधान की दिशा में काम कर रहीं हैं, मगर मैन्युफैक्चारिंग के मामले में कहीं भी कोई पहल अभी ना के बराबर है ! इसी क्रम में हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इलेक्ट्रोनिक्स पुर्जों के मैन्युफैक्चारिंग को लेकर सरकार द्वारा हैदराबाद में एक सेमीकंडक्टर हब लगाने के लिए फैबसिटी के नाम से कोई योजना शुरू की गयी थी, जिसका उद्देश्य तमाम इलेक्ट्रोनिक्स सेमीकंडक्टर निर्माता कंपनियों की मदद से इलेक्ट्रोनिक्स उद्द्योग लगाना था ! लेकिन राजस्व एवं वित्तीय कारणों से इस पूरी योजना को ठप करना पड़ा ! परिणामत: एक बार और इस दिशा में निराशा ही हाथ लगी ! अगर कारणों की तहों को पलट कर देखें तो इस पुरे उद्द्योग की स्थापना करने एवं उत्पादन शुरू करने में जो सबसे बड़ी रुकावट आ रही थी वो थी वित्तीय अभाव अथवा फंड की कमी ! दरअसल वर्तमान परिस्थितियों में भारत सरकार द्वारा इस दिशा में प्रस्तावित बजट का बहुत बड़ा हिस्सा आयात एवं रिसर्च आदि में ही खर्च होता है ! बहरहाल इलेक्ट्रोनिक्स की दिशा मैन्युफैक्चारिंग इंडस्ट्री के ना होने के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को दोहरी मार का सामना करना पड़ रहा है ! डॉलर के मुकाबले लागातर गिर रहे रुपये की कीमत का बड़े स्तर पर प्रभाव इलेक्ट्रोनिक्स के बाजार एवं आयात पर भी पड़ रहा है और इसका अप्रत्यक्ष वित्तीय नुकसान सरकार को ही उठाना पड़ता है !
फिलहाल ठंढे बस्ते में जा चुके हैदराबाद के फैब सिटी प्रोजेक्ट के बाद अब सरकार ने भारत में सेमीकंडक्टर के मैन्युफैक्चारिंग उद्योग स्थापित करने की दिशा में पुन: एक जरूरी पहल की है ! अगर सरकार अपने लक्ष्य में 2020 तक भी कामयाब हो जाती है तो निश्चित तौर पर यह सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री के अलावा इलेक्ट्रोनिक्स बाजार की दिशा में बड़ा और परिवर्तनकारी कदम होगा ! इस प्रोजेक्ट की सफलता से न सिर्फ इलेक्ट्रोनिक्स निर्माण के क्षेत्र में मजबूती मिलेगी वरन भारत में रोजगार को भी बल मिलेगा ! लाखों करोंड़ के आयात का बोझ झेल रहे देश को महज इलेक्ट्रोनिक्स का बड़ा बाजार होने की बजाय बड़ा उत्पादक भी बनना होगा ! वरना आयात के भरोसे यह पूरा खेल देश की अर्थव्यवस्था पर प्रहार करता रहेगा ! हम इलेक्ट्रोनिक्स का बाजार तो बहुत बड़ा खड़ा किये हैं लेकिन उत्पादक छोटे स्तर के भी नहीं बन पाए हैं ! इलेक्ट्रोनिक्स की दिशा में बाजार और उत्पादन के बीच का यह असंतुलन बेहद घातक और नुकसानदेय है ! जितनी जल्दी संभव हो इससे निजात पाना जरूरी है !

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