- शिवानन्द द्विवेदी सहर
चिंतन हुआ है तो वह गांधी और गांधीवाद है. सत्य और अहिंसा के प्रतिमान बन चुके गांधी और उनके दर्शन की प्रासंगिकता न सिर्फ भारत बल्कि अफ्रीका सहित दुनिया के तमाम देशों में आज भी कायम है. गांधी के सत्य-अहिंसा के नैतिक मूल्यों पर तो न जाने कितनी बहसें होती रही हैं, न जाने कितना कुछ लिखा जा चुका है मगर सामयिक संदर्भ में उनके व्यक्तित्व का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष भी बहुत विचारणीय है. वह पक्ष है पत्रकारिता संबधी उनके सरोकार. अहिंसा के पथ-प्रदर्शक, सत्यनिष्ठ समाज सुधारक और महात्मा के रूप में विश्व विख्यात गांधी सबसे पहले कुशल पत्रकार थे. उनकी पत्रकारिता की बारीकियों को समझने का प्रयास किया जाए तो वह व्यावहारिक पत्रकारिता के स्तंभों में अग्रणी नजर आते हैं.गांधी की पत्रकारिता भी उनके गांधीवादी सिद्धांतों के मानकों पर ही आधारित है. उनकी पत्रकारिता में उनके संघर्ष का बड़ा व्याहारिक दृष्टिकोण नजर आता है. जिस आमजन, हरिजन एवं सामाजिक समानता के प्रति गांधी का रुझान उनके जीवन संघर्ष में दिखता है, बिल्कुल वैसा ही रुझान उनकी पत्रकारिता में भी देखा जा सकता है. गांधी का मानना था कि पत्रकारिता की बुनियाद सत्यवादिता के मूल चरित्र में निहित होती है. असत्य की तरफ उन्मुख होकर विशुद्ध व वास्तविक पत्रकारिता के उद्देश्यों को कभी प्राप्त नहीं किया जा सकता है. गांधी का यह दृष्टिकोण इस बात की पुष्टि करता है कि उनकी पत्रकारिता और व्यावहारिक जीवन के सिद्धांतों में किसी भी तरह का दोहरापन नहीं है. निश्चित तौर पर अपने सिद्धांतों एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में किये गए कार्यों के बीच का सामंजस्य ही गांधी को पत्रकारिता के महान मार्गदशर्क के रूप में स्थापित करता है.
पत्रकारिता में गांधी के योगदान की ऐतिहासिकता पर नजर डालें तो उनकी पत्रकारिता की शुरु आत ही विरोध की निडर अभिव्यक्ति के तौर पर हुई थी. जब गांधी अफ्रीका में वकालत कर रहे थे, उसी दौरान वहां की एक अदालत ने उन्हें कोर्ट परिसर में पगड़ी पहनने से मना कर दिया था. अपने साथ हुए इस दोहरेपन का विरोध करते हुए गांधी ने डरबन के एक स्थानीय संपादक को चिट्ठी लिखकर अपना विरोध जाहिर किया, जिसको उस अखबार द्वारा बाकायदा प्रकाशित भी किया गया. अखबार को लिखे उस पत्र को गांधी की पत्रकारिता का पहला कदम माना जा सकता है हालाकि तत्कालीन दौर में गांधी को भारत में भी कोई नहीं जानता था.पत्रकारिता के प्रति गांधी की निष्ठा और विश्वास का ही परिणाम रहा कि अफ्रीका प्रवास के दौरान उन्होंने ‘इन्डियन ओपिनियन’ के जरिए अपने विचारों और सिद्धांतों का प्रतिपादन करते हुए देशवासियों के हित में आवाज उठायी. यह गांधी की सत्यनिष्ठ और निर्भीक पत्रकारिता का असर ही था कि अफ्रीका जैसे देश में रंगभेद जैसी विषम परिस्थितियों के बावजूद पांच अलग-अलग भारतीय भाषाओं में इस अखबार का प्रकाशन होता रहा. इसके प्रकाशन के साथ-साथ गांधी के निर्भीक स्वर अन्य अखबारों के सम्पादकीय पृष्ठों में भी गूंजने लगे थे. यह वह दौर था जब मोहनदास करमचंद गांधी ‘पत्रकार गांधी’ के रूप में ख्याति अर्जित करने लगे थे. महात्मा गांधी ने ‘इंडियन ओपिनियन’ के माध्यम से अफ्रीका में रह रहे भारतीय मूल के लोगों की समस्याओं को शिद्दत से उठाया. उनकी पत्रकारिता के स्वर इतने निर्भीक रहे कि उनके लेखों से विचलित अफ्रीकी प्रशासन ने 1906 में उन्हें जोहांसबर्ग में एक जेल में बंद कर दिया. लेकिन पत्रकारिता में निर्भीकता का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करते हुए गांधी ने जेल से ही संपादन कार्य जारी रखा. पत्रकारिता की पारदर्शिता कायम रखने का यह कठिन किन्तु बड़ा फैसला गांधी ही ले सकते थे कि संपादक रहते हुए उन्होंने कभी अखबार के लिए किसी से विज्ञापन की मांग नहीं की. उनके सम्पादकीय लेखों का असर उन दिनों की अफ्रीकी सरकारों पर भी खूब रहा. यही नहीं, भारत में अंग्रेजी हुकूमत पर भी उनके लेखों का व्यापक असर दिखने लगा था. गांधी की प्रखर लेखनी का लोहा मानते हुए एक अंग्रेजी लेखक ने यहां तक कहा है कि गांधी के संपादकीय लेखों के वाक्य ‘थाट फॉर द डे के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकते हैं.
गांधी की पत्रकारिता के मार्ग में भाषाई दायरे कभी अवरोधक नहीं बने. वह समय और अवसर के अनुकूल हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी में लेखन करते थे. गांधी की नजर में पत्रकारिता का उद्देश्य जनजागरण था. वह जनमानस की समस्याओं को मुख्यधारा की पत्रकारिता में रखने के प्रबल पक्षधर थे. भारत आने के बाद गुलामी की परिस्थितियों से रूबरू गांधी ने सत्य,अहिंसा के समानान्तर पत्रकारिता एवं लेखन को भी अपना हथियार बनाया. उन्होंने स्व-संपादन में ‘यंग इंडिया’ का प्रकाशन शुरू किया जो जनमासन के बीच बहुत लोकप्रिय था. बाद में इसका गुजराती संस्करण ‘नवजीवन’ के नाम से शुरू किया गया. समाज के निचले तबके के प्रति गांधी की चिंता उनकी पत्रकारिता में खुलकर सामने आती है. दलित-शोषित समाज की आवाज उठाने के उद्देश्य से उन्होंने समय-समय पर ‘हरिजन’ में विचारोत्तेजक लेख लिखे, जिसका तत्कालीन समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ा.
गांधी की पत्रकारिता के उस काल से लेकर आज की पत्रकारिता के बीच बदलावों का एक बड़ा दौर रहा है. सुविधाओं व संसाधनों के दृष्टि से आज की पत्रकारिता काफी हद तक सहज एवं सुलभ हो गयी है. आज बेशक पत्रकारिता तकनीक संपन्न हो गयी है लेकिन वर्तमान पत्रकारिता के स्वरूप पर सवाल भी कुछ कम नहीं उठ रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल तो यही उठता है कि आज की तेज रफ्तार जिंदगी में पत्रकारिता ने कहीं गांधीवादी पत्रकारिता के उन आदर्श मूल्यों को तो हाशिए पर नहीं ला दिया है जिसके बिना ‘पत्रकारिता’ शब्द ही अर्थहीन नजर आता है. आज पत्रकारिता को लेकर जिस तरह के सवाल आये दिन उठते रहते हैं, ऐसे में क्या यहां भी गांधी प्रासंगिक नहीं हो जाते हैं? कहीं यह सच तो नहीं कि हमने अपनी सहूलियत और निजी हितों को ऊपर रखकर गांधी की पत्रकारिता के उन मूल्यों को सामने ही नहीं आने दिया, जिनका सामने आना वर्तमान पत्रकारिता के बिगड़ते स्वरूप के लिए सबसे जरूरी जान पड़ता है. गांधी द्वारा पत्रकारिता के क्षेत्र में जो आदर्श स्थापित किये गए, वह अपने आप में पत्रकारिता के स्थापित और प्रामाणिक सिद्धांत कहे जा सकते हैं. भारतीय ही नही, विश्व के पत्रकारिता जगत को चाहिए कि वह गांधी को महज महात्मा तक सीमिति न कर ‘पत्रकार गांधी’ के मूल्यों, आदर्शों व सिद्धांतों को भी पढ़ें-समझें और आत्मसात करें. यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का कल्याणकारी पक्ष है.

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