मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

बाल तस्करी के नेटवर्क को ध्वस्त कीजिये : अमर उजाला में प्रकाशित लेख



कहाँ गुम हो रहे नौनिहाल 

शिवानन्द द्विवेदी  

जनसमस्याओं से बेपरवाह सरकारें जब मनमानी करने लगती हैं तो कई बार न्यायालय को सरकार के कार्यों में हस्तक्षेप करने को मजबूर होना होना पढ़ता है ! बच्चों पर काम करने वाली एक गैर सरकारी संस्था द्वारा भारी संख्या में लापता हो रहे बच्चों के संदर्भ में दाखिल एक याचिका की सुनवाई करते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायलय द्वारा केन्द्र एवं राज्य सरकारों को इस मामले में गंभीर कदम उठाने के साथ-साथ जल्द ही तय सीमा के अंदर प्रगति स्टेट्स रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया था ! तय सीमा बीत जाने के बावजूद सर्वोच्च न्यायलय के निर्देशों की अवहेलना करते हुए किसी भी राज्य की सरकार द्वारा इस मामले में गंभीरता नहीं दिखाई गयी ! यहाँ तक कि कई राज्यों के सरकारों के सचिव कोर्ट की नोटिस को ताक पर रखते हुए पेशी के दौरान हाजिर तक नहीं हुए ! परिणामत:, नौनिहालों के मसले पर हीला-हवाली का रुख अख्तियार कर रहीं सभी सरकारों के खिलाफ सख्त होते हुए सुप्रीम कोर्ट को यहाँ तक कहना पड़ा कि इस गंभीर समस्या के प्रति काम करने वाले लोगों के बीच आपसी समन्वय ही  नहीं है और इसी वजह से वो अपनी जवाबदेही  से कतराते नजर आ रहे हैं ! नौनिहालों के मामले में सर्वोच्च न्यायलय तक के निर्देशों की उपेक्षा कर रही सरकारों से देश के नौनिहालों के सुरक्षित भविष्य की अपेक्षा रखना आसमान में पौधे उगाने जैसा लगता है  ! लापता बच्चों के मामले में जारी हुए तमाम आंकड़े  इस बात के गवाह हैं कि पिछले कुछ सालों में लापता  हुए बच्चों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है ! पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर नजर डाले तो पिछले एक साल में लगभग साठ हजार की संख्या में सिर्फ उन लापता बच्चों का आंकड़ा उपलब्ध है जिनके गुमशुदगी का मामला थाने में प्राथिमिकी के तौर पर दर्ज किया गया  है ! इसके अलावा हजारों कि संख्या में वो बच्चे भी हैं जो लापता तो हैं मगर ना तो आंकड़ों के ग्राफ में दिख रहे हैं और ना ही उनके मामलों का कोई पुलिस रिकॉर्ड ही मौजूद है ! इन्ही आंकड़ों में  2008 से 2010 के बीच लापता हुए बच्चों की संख्या लगभग 1 लाख 20 हजार के आस-पास बताई गयी है जबकि वास्तविक आंकड़े इससे बहुत ज्यादा होने की संभावना तमाम संस्थाओं द्वारा जताई जा चुकी  है  ! सरकारी फाइलों में दर्ज 2008 से 2010 के बीच के लापता बच्चों में से बेशक तमाम बच्चों का पता लगाया जा चुका है लेकिन फिर भी 45000 के आस-पास वो बच्चे हैं जिनके बारे में अभी तक पुलिस द्वारा कोई जानकारी नहीं जुटाई जा सकी है और उन बच्चों का नाम  अभी भी लापता बच्चों की सूची में ही दर्ज  हैं !
     सरकार की बेपरवाही का दंश झेल रही बच्चों की गुमशुदगी की इस समस्या से उत्पन्न होने वाले परिणामों के प्रति अगर संजीदगी से सोचा जाय तो अनेक तरह के ऐसे सामाजिक समस्याओं के उत्पन्न होने का खतरा नजर आता है जो स्वस्थ एवं सुरक्षित समाज के नजरिये से बेहद चिंताजनक है !इस पुरे मामले में तमाम ऐसे सवाल हैं जो ना सिर्फ बच्चों कि जिंदगी मात्र से जुड़े हैं बल्कि इन सवालों के तमाम सामाजिक मायने और महत्व भी हैं ! यहाँ सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि आखिर भारी संख्या लापता हो रहे ये बच्चे जा कहाँ रहे हैं ? सवाल ये भी उठता है कि आखिर पिछले कुछ सालों से  गुमशुदगी के मामलों में भारी इजाफा क्यों हो रहा  है ? इन सवालों के साथ-साथ यह सवाल भी कायम है कि कहीं बच्चों की गुमशुदगी के पीछे तमाम तरह की बड़ी आपराधिक वारदातों को अंजाम तो नहीं दिया जा रहा ? इन सवालों के संदर्भ में इस बात की संभावना सबसे प्रबल है कि गुमशुदगी के अधिकतम मामले समाज के आपराधिक तत्वों द्वारा अंजाम दिये जाते हैं ! इस बात को कतई खारिज नहीं किया जा सकता कि समाज में आपाराधिक तत्वों का एक बड़ा नेटवर्क बच्चों को अलग-अलग गलत उद्देश्यों में निहित कार्यों के लिए गायब करने में सक्रिय है ! ऐसे आपराधिक तत्वों द्वारा जिन प्रमुख कार्यों में लापता किये गए बच्चों का इस्तेमाल किया जा रहा है उनमे बाल-तस्करी, दूर-दराज के क्षेत्रों में बाल-मजदूरी एवं साथ ही साथ अंगों की तस्करी सहित यौन शोषण आदि प्रमुख हैं ! इसके अलावा इन्ही लापता बच्चों को आपराधिक कार्यों के लिए प्रशिक्षित कर इनका दुरपयोग भी किये जाने की संभावना से कतई इनकार नहीं किया जा सकता  है ! लापता बच्चों के मामलों में फिरौती के लिए अपहृत बच्चों से ज्यादा उन बच्चों की तादाद है जिनकों अन्य उद्देश्यों से अगवा  किया जाता रहा है ! फिरौती के लिए अपहृत बच्चों को या तो अपराधिक तत्वों द्वारा जान से मार दिया जाता है या फिरौती आदि मिल जाने पर सही सलामत छोड़ दिया जाता है ! हालाकि फिरौती के कई मामलों में पुलिस आदि की भूमिका सराहनीय भी होती है !  लेकिन बाल-तस्करी एवं अंग-व्यापार सहित यौन-शोषण के उद्देश्यों से अगवा किये गए बच्चों के मामलों में पुलिस प्रशासन नाकामयाब ही साबित हुआ है जबकि इन बच्चों के साथ तो और  बुरा बर्ताव हो रहा  है ! कहीं ना कहीं सरकारी नियंत्रण की लचरता से मनबढ़ हो रहे इन आपराधिक तत्वों का हौसला इतना बुलंद हो चुका है कि इनके मन में क़ानून और प्रशासन का बिलकुल भी खौफ नहीं है ! लापता बच्चों के मसले पर प्रशासन की लचरता का नतीजा ही है कि प्रत्येक साल लापता बच्चों का ग्राफ और ज्यादा ऊँचा होता जा रहा है !
          लापता हो रहे बच्चों के कारण उत्पन्न होने वाले सामजिक दुष्परिणामो को अगर समझने का प्रयास करें तो इससे एक तरफ जहाँ आपराधिक प्रवृतियों को बढ़ावा मिलता नजर आ रहा है वहीँ देश के भावी कर्णधार कहे जाने वाले मासूमो का बचपन एवं भविष्य दोनों हाशिए पर जाते दिख रहे हैं ! सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि अपराधियों द्वारा लापता किये गए  बच्चों को अगर मार दिया जा रहा है तो सामाजिक तौर इससे जघन्य अपराध भला और क्या हो सकता है ! वहीँ दूसरी चिंता इस बात की भी है कि जिन बच्चों को गलत कार्यों में धकेला जा रहा है और वो अपराधिक गतिविधियों में सक्रिय हो रहे हैं  जिससे  समाज में अपराध का बोलबाला कायम हो रहा  ! समाज के भावी कर्णधारों को अगवा कर जिन उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है वो समाज एवं देश के वर्तमान एवं भविष्य दोनों के लिए खतरे का संकेत है ! कहीं ना कहीं प्रशासन की लचरता एवं इस गंभीर समस्या के प्रति सरकार की असंवेदनशीलता का नतीजा है कि ये आपरधिक गतिविधियां समाज में सक्रिय हो रहीं हैं ! बच्चों के भविष्य के साथ-साथ दाव पर समाज के भविष्य पर भी हमारी सरकार सिवाय टाल-मटोल करने के कुछ भी सकारत्मक करती अभी तक नजर नहीं आ रही है ! ना तो इसके लिए कोई नीतिगत निर्देश ही जारी किया गया है और ना ही इस पर ठोस कार्यवाही के लिए कभी कोई सीमा ही तय की गयी है ! आज अगर माननीय सर्वोच्च नायालय को एक याचिका के आधार पर सरकार को फटकार लगानी पड़ रही है तो इसका सीधा मतलब यही निकलता है कि इस मसले पर सरकार पंगु साबित हुई है ! सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर अमल करते हुए एवं माननीय न्यालय के गुस्से के निहितार्थ को समझते हुए सरकार को नींद जागकर कुछ ठोस कदम उठाने की जरुरत है ! लापता बच्चों के मसले पर त्वरित एवं सख्त कदम उठाकर समाज में पैठ बना चुके इन आपरधिक नेटवर्क को तोड़ने की जरुरत पर बल दिया जाना चाहिए ! समय रहते अगर इस नेटवर्क की तह तक पहुँच कर अगर इसे ध्वस्त नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में ना तो देश का नौनिहाल महफूज होगा ना ही समाज ही सही दिशा में अग्रसर हो पायेगा !
      
      

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

भारत बंद के निहितार्थ : दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित लेख



राष्ट्र की कीमत पर ना हो विरोध

यू.पी.ए सरकार की मजदुर विरोधी नीतियों के खिलाफ देश के लगभग दो दर्जन व्यापारिक संगठनो द्वारा शुरू की गयी दो दिवसीय हड़ताल में प्रदर्शनकारियों द्वारा  उत्तरप्रदेश एवं हरियाणा राज्यों में कई जगहों पर हिंसक उत्पात मचाना सरकार के खिलाफ एक सफल भारत बंद की धार को कुंद करने वाला कृत्य रहा ! इसमें कोई दो राय नहीं कि इस मुल्क में आंदोलन एवं प्रदर्शन की आजादी सबको है और सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ जनता को सडक पर आना भी चाहिए ! मगर संविधान द्वारा प्राप्त विरोध की आजादी के दायरों एवं उसकी शुचिता की समझ रखे बिना ही अगर जनता भीड़ के रूप में सडकों पर उतरने लगे तो विरोध-प्रदर्शन के मूल उद्देश्यों को प्राप्त करने की बजाय विरोध-प्रदर्शन एक दिशाहीन पथ की तरफ  भटक  जाता है और इसका सबसे ज्यादा नुकसान उस विरोध-प्रदर्शन के निहिति लक्ष्यों को ही झेलना पड़ता है ! व्यापारिक संगठनों के आह्वान पर हुए दो दिवसीय भारत बंद का पहला ही दिन हिंसा कि भेंट चढ़ जाना  प्रदर्शनकारियों की इसी अपरिपक्वता एवं समझहीनता की मिसाल प्रस्तुत करता है ! इस तरह के आंदोलन या प्रदर्शन करने वाले लोग अक्सर इस बात का बिलकुल ख्याल नहीं रखते कि जिस प्रकार सरकार की अपनी गलत या सही नीतियां होती हैं जिनका वो विरोध करने जा रहे हैं, ठीक उसी प्रकार आंदोलनों एवं प्रदर्शनों की भी कुछ नीतियां होती हैं ! संविधान के मानकों से इतर जाकर कोई भी आंदोलन या विरोध-प्रदर्शन अपने उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर सकता है ! प्रदर्शन के नाम पर मचाये गए इस भारी उत्पात के बाद लोकतांत्रिक नजरिये से दो बातें गौर करने वाली हैं जिनको इस आंदोलन के संबंध में बारीकी से समझने की जरुरत है ! पहली बात ये है कि अगर किसी भी संगठन द्वारा आंदोलन का आह्वान किया जाता है तो यह जरुर देखा जाना चाहिए कि उस आंदोलन से किस स्तर पर आम लोग या उस संगठन के लोग जुड़ रहे हैं ! अगर भारी संख्या स्वत: लोगों का समर्थन आंदोलन को नहीं मिल पाया इसका सीधा अर्थ यह है कि या तो संगठनों द्वारा अपनी बात को लोगों तक पहुचाया नहीं जा सका है यह लोग उस  विरोध में कोई रूचि नहीं दिखा रहे हैं ! ट्रेड यूनियन द्वारा घोषित इस हड़ताल को इस नजरिये से भी असफल माना जा सकता है कि इनके पूर्व आह्वान के बावजूद बड़ी संख्या में मजदुर वर्ग अपनी कंपनी में पहुँचे और लगभग  सारी छोटी बड़ी दुकाने खुली रहीं ! आम जन के समर्थन के अभाव में संगठनो के कार्यकर्ताओं के बूते खड़े किये गए बड़े स्तर के इस बंद प्रदर्शन ने अपनी सफलता दिखाने के अंधउत्साह में  पुरे मामले को हिंसा का रूप दे दिया ! किसी भी सरकार के नीति के खिलाफ प्रदर्शन में जनाधार दो पक्षों में बटा होता है ! एक पक्ष  के रूप में सरकार खुद होती है जो  जनता के बीच से चुनकर आई है और दूसरा जनधार उसका  होता है जो विरोध कर रहा होता है ! समझने वाली बात ये है कि आखिर हिंसा और जबरदस्ती के बूते अगर आप जनाधार दिखाने की कोशिश करते हैं तो यह बेहद अलोकतांत्रिक आंदोलन कहलायेगा जिसका लोकतंत्र के सिद्धांतों में कोई स्थान नहीं है ! दिल्ली से सटे नोएडा में कमोबेश यही स्थिति रही ! प्रदर्शन के आह्वान के बावजूद नोएडा के विशेष आर्थिक जोन की हजारों कंपनियों के उत्पादन सेवा में कर्मचारियों का असहयोग नहीं होना इस बात की पुष्टि करता है कि आम मजदुर वर्ग का स्वत: जनसमर्थन इस भारत बंद को नहीं था वरना लोगों द्वारा कम से कम बंद के समर्थन में दफ्तर के कार्यों को बायकाट तो जरुर किया गया होता ! ना दुकाने बंद रहीं ना कंपनियां बंद रहीं ना निजी ट्रांसपोर्ट बंद रहे और ना ही आम मजदुर वर्ग ही इस भारत बंद से जुड़ा ! अंतत: प्रदर्शन का जनाधार कमजोर पड़ने लगा और इस स्थिति में प्रदर्शन का हिंसक होना स्वाभाविक था ! लोकतान्त्रिक मूल्यों के आधार पर प्रदर्शनों को भी  बिना परिभाषित किये नहीं छोड़ा जा सकता और विरोध-प्रदर्शनों के जनाधार का भी मूल्यांकन किया जाना चाहिए ! जनाधार के मूल्यांकन की बुनियाद पर  अगर उत्तरप्रदेश आदि राज्यों में इस भारत बंद का असर देखें तो यह बेहद असफल विरोध कहा जा सकता है ! इस बावत गौर करने वाली बात ये भी है कि कलकत्ता आदि के अलावा जहाँ-जहाँ भी इस भारत बंद  को जनता का स्वस्फूर्त  समर्थन मिला है वहाँ से  किसी भी तरह की  हिंसात्मक वारदात की खबरें नहीं आई है !  
      अगर इस भारत बंद के हासिल के नाम पर देखें तो निश्चित तौर पर यह प्रदर्शन  सरकार के लिए चिंता का सबब जरुर बना मगर इसका ये कतई अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि इसके उद्देश्यों में को बड़ी कामयाबी हासिल हुई है ! इस पुरे प्रदर्शन को संगठनात्मक समर्थन तो व्यापक मिला मगर आम समर्थन का अभाव रहा ! बैंकों के एक बड़े यूनियन द्वारा इस विरोध प्रदर्शन को समर्थन दिये जाने की वजह से बेशक बैंकिंग सेवाएं ठप रहीं और आर्थिक रूप से इसका काफी प्रभाव पड़ा लेकिन ठप हुए बैंकिंग सेवाओं के प्रभावों को आंदोलन की सफलता के निहितार्थ में देखना कतई प्रासंगिक नहीं प्रतीत होता ! हमें नहीं भूलना चाहिए कि इस बंद से हुए लगभग अनुमानित 26 हजार करोंड़ के नुकसान की भरपाई भी आज नहीं तो कल इसी मजदुर वर्ग को करनी पड़ेगी ! ऐसे में बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या हिंसा और उत्पात के बूते अपनी शक्ति प्रदर्शन को अपना लोकतांत्रिक अधिकार समझना लोकतंत्र के नजरिये से ठीक कदम कहा जा सकता है ? सवाल ये भी है कि हिंसात्मक प्रदर्शन के दौरान हुई छतिपूर्ति की जिम्मेदारी क्या उन ग्यारह व्यापारिक संगठनो द्वारा ली जायेगी जो इस प्रदर्शन को अत्यंत अभूतपूर्व एवं सफल मान रहे हैं ? मजदूरवर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे इन संगठनो को क्या इस बात का भान नहीं है कि इस पुरे फसाद के बाद जिस समुदाय को सबसे ज्यादा परेशानी उठानी पड़ी वो मध्यम तबके से आने वाला मजदुर  वर्ग ही है ! हिंसा और फसाद के रास्ते बिना किसी नीतिनिर्धारण के यूँ ही भारत बंद जैसे नुकसानदायक विरोध प्रदर्शन रख देने मात्र से भला क्या हासिल हुआ इसका कोई जवाब ना तो उन संगठनो के पास ही है और ना ही किसी और के पास ! काम-काज ठप कर हड़ताल कर देने को विरोध का प्राथमिक  हथियार नहीं माना जा सकता है और गौर करना होगा कि विरोध प्रदर्शन के  हडताली हथकंडों पर  अदालतें भी सख्त ही रहीं हैं ! अगर वाकई इन संगठनो के कार्यकर्ताओं अथवा विभागीय कर्मचारियों को लग रहा है कि उनके साथ हो रही ज्यादती चरम पर है और हड़ताल के सिवा कोई चारा नहीं है तो उन्हें अनिश्चितकालीन बंद पर जाना चाहिए बजाय  कि दो दिवसीय और  एक दिवसीय बंद की सियासत का हिस्सा बनने के  ! संगठनात्मक रूप से जब भी कोई बंद या प्रदर्शन बुलाया जाता है तो वो राजनीति से प्रेरित होता है और ट्रेड यूनियन के इस हड़ताल को भी सियासत से परे नहीं रखा जा सकता !  किसी भी विरोध प्रदर्शन का हिंसात्मक होना ना तो प्रदर्शन और ना ही लोकतंत्र के लिए ही बेहतर कहा जा सकता  है ! हिंसात्मक आंदोलन महज उत्पातियों को पनाह देने के अवसर के तौर पर इस्तेमाल होते रहे  हैं और प्रदर्शन में जितनी ज्यादा हिंसा होगी सरकार पर जवाबदेही का दबाव उतना ही कम होगा ! अत: किसी भी विरोध प्रदर्शन की सबसे बड़ी मजबूती यह है कि वो कितना नियंत्रित एवं लक्ष्योंमुख है और सरकार पर अपना असर छोड़ पाने में कितना  कामयाब रहा है ! कम से इस बंद के बाद इतना तो कहा ही जा सकता है कि यू.पी एवं हरियाणा जैसे राज्यों में हड़ताल का असर कम और हिंसा का असर ज्यादा रहा जो कि सरकार को सुकुन देने वाला है ! क्योंकि, बंद का असर सरकार पर दबाव बनाता है जबकि हिंसा का दबाव महज पुलिस-प्रशासन पर होता है ! 
शिवानन्द  द्विवेदी सहर 

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित मेरा यह लेख

जवाबदेही से बचना ही हादसों की वजह

जवाबदेही से भागना और भी त्रासद : दैनिक जागरण में प्रकाशित

जागरण  में प्रकाशित लेख


भारतीय लोकतंत्र के संघीय ढांचे की सबसे बड़ी खामी यही है कि यहां जब भी किसी पेचीदा या गंभीर मसले पर अपनी जवाबदेही तय करने का वक्त आता है तो अक्सर केंद्र और राज्य की सरकारें एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाती नजर आती हैं। वहीं एक विभाग दूसरे विभाग पर गलतियों-खामियों का ठीकरा फोड़ता दिख जाता है। इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर हुआ हादसा बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन उससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तब पैदा हो गई, जब इस पूरे हादसे पर रेल मंत्रालय और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच जवाबदेही को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। एक ट्रेन के तयशुदा प्लेटफॉर्म से अचानक दूसरे प्लेटफॉर्म पर भेज दिए जाने से हुई भागमभाग में यह हादसा हो गया। हालांकि इस मामले में रेलवे विभाग को इस बात का जवाब देना चाहिए कि क्या उन्हें नहीं पता था कि स्टेशन पर बेतहाशा भीड़ है तो अचानक ट्रेन का प्लेटफॉर्म बदलने से भीड़ को काबू करना मुश्किल हो सकता है? इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण बात और क्या होगी कि हादसे के बाद जब 36 से ज्यादा श्रद्धालु अपनी जान गंवा चुके थे और सैकड़ों लोग घायलावस्था में बेसुध पड़े थे, उसी दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री इस हादसे का ठीकरा रेल विभाग पर फोड़ते नजर आ रहे थे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने इस हादसे पर रेलवे की लापरवाहियों को जिम्मेदार ठहराया तो वहीं रेलमंत्री पवन बंसल ने जवाब में एक लापरवाही भरा बयान देते हुए कहा कि भीड़ संभालने की जिम्मेदारी रेलवे की नहीं होती। इस पूरे हादसे के दौरान एंबुलेंस की मुस्तैदी समय पर नहीं गई थी, चिकित्सकों की टीम को स्टेशन पर नहीं बुलाया गया था, लेकिन पुलिस विभाग ने लाठियां भांज कर भीड़ को काबू करने का नायाब हथकंडा जरूर अपनाया। हादसे प्रायोजित नहीं होते हैं, लेकिन हादसे के बाद हमारी सरकार और प्रशासन द्वारा जिस तरह से निपटा गया है, वह बेहद निराशाजनक और लापरवाही भरे रवैये के सिवाय कुछ भी नहीं नजर आता। इस पूरे हादसे ने हमारे तंत्र की लापरवाही और खामियों को तो उजागर किया ही है, कई और सवाल भी खड़े किए हैं। हादसे के इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसे हादसों को लेकर हमारे पास ऐसी कोई ठोस नीति क्यों नहीं है, जिसके आधार पर ऐसे हादसों के लिए जवाबदेही तय की जा सके? ऐसा कतई नहीं है कि उत्तर प्रदेश सरकार या रेलवे को नहीं पता था कि महाकुंभ के दौरान इलाहाबाद में भारी भीड़ उमड़ेगी? ऐसे में भीड़ को देखते हुए प्रदेश प्रशासन एवं रेलवे द्वारा पहले से ही भीड़ प्रबंधन को लेकर अपसी समन्वय क्यों नहीं बनाया गया था? बेशक, मुआवजे और आरोप-प्रत्यारोप के सियासी हथकंडों को अपनाकर प्रदेश सरकार और रेल मंत्रालय अपनी जवाबदेही से कतरा रहे हों, लेकिन ऐसा कर लेने मात्र से उनकी नाकामियों पर पर्दा नहीं पड़ जाता। इस पूरे हादसे के लिए कहीं न कहीं दोनों ही सामान रूप से जिम्मेदार नजर आते हैं। संयुक्त रूप से दोनों की सबसे बड़ी नाकामी यह है कि इतनी बड़ी भीड़ को संभालने के लिए रेलवे और उत्तर प्रदेश सरकार ने संयुक्त नीतियां तैयार नहीं की और इस भारी भीड़ को बस राम भरोसे छोड़ दिया। आपसी समन्वय का अभाव ही था कि हादसे के बाद त्वरित रूप से ठोस कदम उठाने के बजाय आपसी खींचतान की स्थिति उत्पन्न हो गई। दोनों सरकारों को यह पता होना चाहिए कि एक ऐसा आयोजन जहां करोड़ों की संख्या में लोग देश के कोने-कोने से जुटते हैं, वहां प्रबंधन की जिम्मेदारी किसी एक की नहीं हो सकती। हादसे के तीन दिन बीतने के बाद भी अब तक न तो रेलवे द्वारा ही और न ही प्रदेश प्रशासन द्वारा ही घटना के लिए जिम्मेदार दोषियों की पहचान की जा सकी है। बस खानापूर्ति के लिए जांच के आदेश दे दिए हैं। अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग बजाते चल रहे अलग-अलग विभागों के बीच आपसी समन्वय का अभाव और सरकारों द्वारा अपनी तय जवाबदेही से मुकरना ही ऐसे हादसों की बड़ी वजह है। जब सरकारें ही अपनी जवाबदेही एक-दूसरे पर थोपेंगी तो भला उस विभाग के कर्मचारी या अधिकारी अपनी जवाबदेही कैसे तय करेंगे। ऐसे मामलों के प्रति सियासत से ऊपर उठकर नीतियां तैयार करने और उन पर पूरी जवाबदेही के साथ अमल करने की जरूरत है। कोई जांच या कोई मुआवजा उन लोगों को वापस नहीं ला सकता, जो हमेशा के लिए अपनों को छोड़ गए हैं।

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

देशकाल की सीमा से परे गुलजार सृजन : राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित लेख

 साहित्य, संगीत और सिनेमा तीनों विधाओं को दशकों से गुलजार करते आ रहे गुलजार अब इन शब्दों के क्रम में इतने प्रासंगिक हो चुके हैं कि उनके बिना एक खालीपन सा लगता है। गुलजार न सिर्फ एक महान गीतकार हैं बल्कि साहित्य और सिनेमा के क्षेत्र के भी ख्यातिलब्ध हस्ताक्षर हैं। हाल ही में दिल्ली स्थित इंडिया हेबिटेट सेंटर में गुलजार की चुनिंदा नज्मों और गीतों को संकलित कर लिखी गयी पुस्तक ‘उम्र से लंबी सड़कों पर’ के विमोचन समारोह में आये गुलजार से ना सिर्फ बातचीत हुई बल्कि उनको बखूबी सुनने का मौका भी मिला। गुलजार बेहद सरल, सहज और उदार व्यक्तित्व के धनी है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वे दूर से जितने खास नजर आते हैं नजदीक आने पर उतने आम हो जाते हैं। उम्र से लंबी सड़कों का फासला तय कर चुके गुलजार आज उस मुकाम पर हैं जहां समय उनके पीछे-पीछे भागता नजर आ रहा है और वो साहित्य के अर्श पर खड़े हमेशा कुछ और गढ़ देने को व्याकुल और तत्पर दिखते हैं। एक साहित्य सृजक के रूप में गुलजार की तमाम कृतियां साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करती हैं। शायद ही किसी को पता हो कि जन-जन को कंठस्थ अमर प्रार्थना ‘हे प्रभो आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिए’ गुलजार की ही कलम से निकली महानतम कृति है। साहित्य के इतिहास में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि किसी सृजनकर्ता द्वारा किया गया सृजन इतना ख्यातिलब्ध हो जाए कि उसे सृजनकर्ता के नाम की जरूरत ही न पड़े। साहित्य के इस अनोखेपन पर बोलते हुए प्रख्यात साहित्यकार केदारनाथ सिंह कहते हैं, ‘जब सृजनकर्ता द्वारा किया कोई गया सृजन अपने सृजक से बड़ा हो जाए तो यह उस सर्जक की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है। यह साहित्य का बड़ा ही दुर्लभ दृश्य है जब रचना खुद ही अपने रचयिता से प्रतिस्पर्धा करती नजर आ रही हो।’ सृजन और सृजक के बीच महानता की इस साहित्यिक प्रतिस्पर्धा में भी गुलजार का कोई सानी नहीं है। उनके द्वारा लिखे गए तमाम ऐसे गीत हैं जो लोगों की जुबान पर आज भी कंठस्थ हैं लेकिन लोग यह नहीं जानते कि इसका रचयिता कौन है। गांव गलियों से लेकर शहर की पक्की सड़कों तक या परंपराओं के पुजारियों से लेकर आधुनिकत जीवन शैली जीने वाले युवाओं तक, हर जगह गुलजार अपने गीतों, नज्मो और कृतियों के रूप में देशकाल की सारी सीमाओं से परे गुलजार दिखते हैं। 1956 में सम्पूरन सिंह से गुलजार बन कर गीतकारी का लोहा मनवाने वाले गुलजार आज अनगिनत महान कृतियों के स्वामी हैं। अपनी नज्मों से फिजाओं में खुशबू का रंग भरना कोई गुलजार से सीखे। उनकी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वो भाषाई विविधताओं के बावजूद अपनी लेखनी में शब्दों का चयन करने में बखूबी सफलता प्राप्त कर लेते हैं। उनकी कृतियों में राजस्थानी, पंजाबी, भोजपुरी जैसे देशज भाषाओं के शब्दों सहित हिन्दी और उर्दू का अनोखा सामंजस्य देखने को मिलता है। हिन्दी और पंजाबी मिश्रित गीत लिखते समय भी गुलजार अंग्रेजी शब्दों के सटीक प्रयोग का साहस सहजता से कर जाते हैं। मुख्यधारा के साहित्य की विधाओं में अगर गुलजार के कृत्यों पर नजर डालें तो पता चलता है कि उन्होंने अपनी कलम से साहित्य को भी समृद्ध करने का काम किया है। कम शब्दों में ज्यादा कह जाने की नजीर उनकी इस त्रिवेणी में दिखती है जिसमे वो लिखते है- ‘मां ने जिस चांद सी दुल्हन की दुआ दी थी मुझे, आज की रात वह फुटपाथ से देखा मैंने..रात भर रोटी नजर आया है वो चांद मुझे। तीन पंक्तियों की इस छोटी सी रचना के माध्यम से गुलजार इतना कुछ कहने में सफल हो जाते हैं कि उन्हें गागर में सागर भरने वाले कवियों में शुमार किया जा सकता है। हिन्दी व उर्दू सहित तमाम छोटी- बड़ी के भाषाओं के शब्दों पर बेजोड़ पकड़ रखने वाले गुलजार की नज्में भी साहित्य से सिनेमा तक छाई रही हैं। उनकी तमाम मशहूर नज्मो में से एक है- ‘मुझसे एक नज्म का वादा है कि मिलेगी मुझसे, डूबती नब्जों में जब दर्द को नींद आने लगे। अपने भीतर विविधताओं से परिपूर्ण न जाने कितने अर्थों का समावेश करती नजर आती है यह नज्म। यूं देखा जाए तो रचनात्मक स्तर पर अगर गुलजार को सबसे ज्यादा ख्याति मिली है तो शानदार गीतों के कारण। साहित्यकार गुलजार को सिनेमाई गुलजार बनाने में उनकी गीतकारी बेजोड़ कड़ी का काम करती नजर आती है। गुलजार के गीत ही हैं जो उन्हें भारतीय सिनेमा से सीधे तौर पर जोड़ते हैं। यूं तो सिनेमा के क्षेत्र में गुलजार ने निर्देशन से लेकर संवाद लेखन तक में हाथ आजमाया है मगर साहित्यकार गुलजार को लोकप्रिय गुलजार बनाने का श्रेय भाषाई जकड़न से मुक्त उनके गीतों को ही जाता है। सफल गीतकार के रूप में उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अपने गीतों में भाषाई विविधता के साथ-साथ शब्द चयन आदि को लेकर मुक्तहस्त नजर आते हैं। इस संदर्भ में अगर गुलजार के तमाम गीतों को देखा जाए तो प्रतीत होता है कि गुलजार जहां शब्दों को पंक्तिबद्ध करने के लिए बड़ी चतुराई से शब्दों को तोड़-मरोड़ देने में कामयाब हो जाते हैं, वहीं शब्द चयन को लेकर बहुत बेफिक्र नजर आते हैं। गुलजार के शब्द चयन पर वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी टिप्पणी करते हैं कि ‘शब्दों को जरूरत के अनुकूल बदल लेने में गुलजार की निपुणता का परिचय उनके इस पहले गीत में ही देखने को मिल जाता है जिसमें वे लिखते है ‘मोरा गोरा रंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे।’ गीत की इस पंक्ति में ‘ले’ और ‘दे’ को ‘लई’ और ‘दई’ में बदल कर गुलजार ने गीत की सुंदरता को चार चांद लगा दिये !’ शब्दों के रूपांतरण की यह कला गुलजार को ना सिर्फ एक गीतकार बल्कि परिपक्व साहित्यकार के रूप में भी स्थापित करती है। बदलते परिवेश और सिनेमा की मांग के अनुरूप गुलजार के गीतों का रंग भी बदलता गया है। साठ के दशक से गीतकारी के सफर पर निकले गुलजार के गीतों में तमाम विविधताओं के दर्शन संभव हैं। उनका गीतकार मन आधुनिक युवा पीढ़ी के स्वाद को भी बखूबी पहचानता है और पारंपरिक साहित्य की सृजनात्मकता भी समझता है !
हालांकि सिनेमा की जरूरत पर आधारित अपने कई गीतों पर गुलजार आलोचनाओं से भी घिरे नजर आते हैं, बावजूद इसके इसे पारम्परिकता एवं आधुनिकता के बीच का सिनेमाई समन्वय बिठाने में उनकी कामयाबी ही कहेंगे जो उन्हें सत्तर के दशक का महान गीतकार तो बनाती ही है, साथ ही वर्तमान पीढ़ी के चहेते गीतकार के रूप में भी स्थापित करती है। संगीत, सिनेमा और साहित्य तीनों को गुलजार ने सदा अपनी लेखनी से न सिर्फ लाभान्वित किया है बल्कि कई मानकों पर समृद्ध भी किया है। अपनी कृतियों, व्यक्तित्व, रचनात्मकता एवं सृजनशीलता को समय के साथ जारी रखने वाले गुलजार साहित्य, संगीत और सिनेमा के बीच सामंजस्य बिठाने वाली चंद शख्सियतों में से एक हैं। अपने शायराना मिजाज का श्रेय शैलेन्द्र एवं प्रदीप को देते हुए मंच से वह खुद को अदना गीतकार बताते हैं। वह कहते हैं कि शैलेन्द्र और प्रदीप जैसे गीतकारों का नाम लिए बिना कोई महफिल कभी गुलजार नहीं हो सकती चाहे कितने भी गुलजार आ जाएं। बेशक गुलजार का ऐसा कहना उनकी महानता द्योतक है मगर इसमे भी कोई शक नहीं कि गुलजार के बिना भला कोई महफिल क्या गुलजार हो? विनोद खेतान द्वारा सद्य: संकलित पुस्तक ˜उम्र से लंबी सड़कों पर के अलावा गुलजार की अब से पहले अनेक रचनाएं प्रकाश में आ चुकी हैं जिनमे पांच, पन्द्रह और पचहत्तर एवं यारे जुलाहे खासी मशहूर हैं। यह गुलजार ही हैं जो उम्र से लंबी सड़को का सफर तय करने बाद भी उमंग से कह पाते है कि ˜दिल तो बच्चा है जी।
शिवानंद द्विवेदी

हवाओं में तैरते जहर से बेखबर दुनिया : दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित लेख



हवाओं में तैरते ज़हर से बेखबर दुनिया

प्राकृतिक संसाधनों के असंतुलित दोहन एवं भौतिक संसाधनों के प्रति मानव के अनावश्यक रूप से बढ़ रहे अत्यधिक आकर्षण ने लगभग पुरे विश्व को पर्यावरणीय संकट के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया है ! एक स्वस्थ समाज निर्माण में स्वास्थ्यपरक एवं शुद्ध वातावरण की अहम भूमिका होती है,लेकिन पिछले कुछ सालों में हमारा विश्व समाज विकसित हो रहे अत्याधुनिक संसाधनों को पा लेने की होड़ में पर्यावरण के महत्व एवं जीवन में इसकी अनिवार्यता को भूल सा गया है !इसमे कोई दो राय नही कि आज आधुनिकता के  अन्धुत्साह में सब कुछ पलक झपकते पा लेने की महत्वाकांक्षा ने हमारे  पर्यावरण के लिए संकट की स्थिति उत्पन्न कर दी है ! एक तरफ जहाँ जल-प्रदुषण से मरने वालों की संख्या में लागातार इजाफा होता जा रहा है तो वहीं वायु प्रदुषण की विशुद्धता में हो  रही कमी भी पर्यावरण के लिए किसी संकट से कम नही है ! आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ आगामी २०५० तक वायु प्रदुषण से मरने वालों की संख्या जल प्रदुषण से मरने वालों से ज्यादा हो जाएगी जो अभी कम है ! अनुमानित आंकड़े में इस बात का जिक्र किया गया है कि २०५० तक हमारे वातावरण की हवाओं में जहर इतना फ़ैल चुका होगा जिससे प्रत्येक साल ३६ लाख से ज्यादा लोग काल के  ग्रास में समाते जायेंगे ! इन आंकड़ो  में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि वायु प्रदुषण का सबसे ज्यादा प्रभाव भारत एवं चीन  जैसे देशों में ही देखने को मिलेगा ! निश्चित रूप से स्वच्छ वायु मानव जीवन की सबसे बड़ी जरुरत  है  और इसके अभाव में जीवन का संकट उत्त्पन्न जाता है ! ऐसे में अगर हम पर्यावरण संरक्षण एवं वायु विशुद्धीकरण के प्रति समय रहते   सजग एवं सचेष्ट नही हुए तो आगामी वर्षों में हमारा जीवन संकट में होना तय है ! वैश्विक पर्यावरणीय परिदृश्य-२०५० नामक रिपोर्ट में जलवायु में अस्थिरिता एवं वायु प्रदुषण से मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों पर सर्वाधिक चिंता जताई गयी है ! आज तकनीक एवं संसाधनों के प्रति मानवीय महत्वाकांक्षाओं में हो रही गुणोत्तर वृद्धि ने उत्पादन की प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया है ! मांग और आपूर्ति के इसी होड़ ने बड़ी कंपनियों से लेकर आम आदमी तक को पर्यावरण के प्रति लापरवाह एवं निष्फिक्र बना दिया है ! आज सब कुछ एक क्षण में पा लेने की होड़ और सब कुछ सबसे पहले उपलब्ध करा देने की जल्दीबाजी के बीच शायद किसी को इससे उत्पन्न  भावी संकट का आभास  तक नही हो पा रह ! बढ़ते कल-कारखानों एवं तमाम अन्य उद्दोगों में इस्तेमाल ऊर्जा संसाधनों से हमारे वातारवरण की हवाओं में ग्रीन हाउस गैस की मात्रा में तेज़ी से बढ़ोत्तरी होती जा रही है एवं आगामी वर्षों में इसमे और बढ़ोत्तरी की संभावना




जताई जा रही है जो कि पर्यावरणीय सुरक्षा के  दृष्टिकोण से चिंतापूर्ण विषय है ! हवाओं में फ़ैल रहे ग्रीन हाउस  गैस की मात्रा में वृद्धि का सीधा प्रभाव ओजोन परत पर पडता   है और ओजोन परतपतली   होती जा  रही है एवं इसके दिन-प्रतिदिन और पतले होने की संभावना बनती जा रही है ! ग्रीन हाउस नामक ज़हर की चपेट में आते जा रहे ओजोन लेयर के पतले होने के कारण सूरज से आने वाली पराबैगनी किरणे केंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का कारण बनेगी और परिणामत: इससे मरने वालों की संख्या में इजाफा होता जायेगा ,जिसे रोकना शायद तब संभव न हो सके ! ग्रीन हॉउस गैस रूपी जहर का असर सिर्फ केंसर से मरने वालों तक सिमित न होकर अन्य तमाम समस्याओं को जन्म देने वाले कारक के रूप में भी देखा जा सकता है ! इस बात की पूरी संभावना है कि वायुप्रदूषण के कारण कई नयी तरह की बीमारियों का भी जन्म हो सकता है और समाज को चिकित्सा के दोहरे संकट का सामना करना पड़ सकता है जो कि अपने आप में बहुत विकत समस्या की तरह है ! इतना तो लगभग तय के बराबर है कि हमारे प्राकृतिक हवाओं में फ़ैल रहा यह ज़हर समाज के लिए किसी भावी आपदा से कम नही प्रतीत हो रहा है !अत: ग्रीन हाउस गैस रूपी ज़हर के हवाओं में घुलने एवं ओजोन के परत का स्तर बारीक होने के परिणाम समाज के लिए बहुत भयावह एवं समाज को संकट ग्रस्त करने वाले लगते हैं ! जैसा कि अनुमान जताया जा रहा है  कि २०५० तक दुनिया की ७०% आबादी शहरों में निवास कर रही होगी और तब केवल वायु प्रदुषण से मरने वालों का ग्राफ १० लाख से चार गुना ज्यादा बढ़कर चालीस लाख के आंकड़े को छू रहा होगा !संभावना इस बात की भी बलवती है कि अगर समय रहते इस समस्या पर नियंत्रण नहीं किया जा सका तो २०५० तक दुनिया के एक अरब चार करोड लोगों को स्वच्छ एवं स्वास्थ्यपरक आक्सीजन तक मयस्सर नही होगा !
                  आगामी तीन दशकों में पडने वाले प्रदूषित वायु के इन दुष्प्रभावों से बेखबर दिख रहे मानव समाज ना तो इसके नियंत्रण के प्रति सजग हो रहा और ना ही पर्यवारण एवं वायु शुद्धता के प्रति सचेष्ट दिख रहा है ! आधुनिकता के भागमभाग में आज का मानव अपने ही साँसों के साथ आँख मिचौनी का खेल खेलता नजर आ रहा है ! आम आदमी तो दूर की बात यहाँ तो हमारी सरकार सहित विश्व के तमाम सराकारों के माथे पर पर्यावरण के इस भावी खतरे को लेकर कोई सिकन तक नही दिखता !चुकी वायु प्रदुषण एवं ग्रीन हाउस गैस का सबसे ज्यादा प्रभाव भारत में पडने का खतरा जताया



जा रहा है अत: निश्चित रूप से भारत सरकार को इस समस्या को बढ़ने से रोकने एवं इस पर नियंत्रण करने के लिए गंभीर होना पड़ेगा एवं इसके निराकरण में  कुछ ठोस एवं दूरगामी उपायों को अमल में लाना पडेगा ! आगामी पर्यावरणीय संकट को सन्दर्भ में रखते हुए सरकार द्वारा पर्यावरन के अनुकूल ऊर्जा संसाधनों को वैकल्पिक रूप से लाने पर योजना बनाने एवं उसे लागू कराने पर बल देने की जरुरत है ! पर्यावरण अनुकूल ऊर्जा स्रोतों का प्रयोग होने से काफी हद तक इस समस्या से निजात पाने में मदद मिलेगी !इस क्रम में सरकार द्वारा इस बात पर बल देने की जरुँरत है कि उन ऊर्जा स्रोतों जिनसे पर्यावरण को संकट है ,के ऊपर किसी तरह की टैक्स छूट आदि जैसी रियायत नही दी जाय एवं उनके उपभोग का दायरा भी तय किया जाय ! कल-कारखानों और आम आदमी के बीच मांग और आपूर्ति का दायरा भी सुनिश्चित किये जाने की जरुरत है ! सड़क पर पेट्रोल डीजल आदि की गाड़ियों पर सरकार द्वारा पर्यावरण के दृष्टिकोण से तमाम प्रयास भी किये जा रहे हैं ,ठीक उसी ताराह के के प्रयास अन्य दिशाओं में भी किया जाना चाहिए !
उपरोक्त उपायों पर सख्त निति  निर्माण किये बिना मानव के साँसों के संकट से जुडी इन समस्याओं से निजात पाना नामुमकिन है ! हमें हर संभव प्रयास कर हवाओं में तैर रहे इन जहारीले कणों का रास्ता रोकना ही होगा वरना आगामी सालों में समूची दुनिया जीवन के संकट से जूझ रही होगी और तब हमारे पास करने के लिये ना तो कोई उपाय होगा ना ही वक्त !!

शिवानन्द द्विवेदी “सहर”