शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

देशकाल की सीमा से परे गुलजार सृजन : राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित लेख

 साहित्य, संगीत और सिनेमा तीनों विधाओं को दशकों से गुलजार करते आ रहे गुलजार अब इन शब्दों के क्रम में इतने प्रासंगिक हो चुके हैं कि उनके बिना एक खालीपन सा लगता है। गुलजार न सिर्फ एक महान गीतकार हैं बल्कि साहित्य और सिनेमा के क्षेत्र के भी ख्यातिलब्ध हस्ताक्षर हैं। हाल ही में दिल्ली स्थित इंडिया हेबिटेट सेंटर में गुलजार की चुनिंदा नज्मों और गीतों को संकलित कर लिखी गयी पुस्तक ‘उम्र से लंबी सड़कों पर’ के विमोचन समारोह में आये गुलजार से ना सिर्फ बातचीत हुई बल्कि उनको बखूबी सुनने का मौका भी मिला। गुलजार बेहद सरल, सहज और उदार व्यक्तित्व के धनी है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वे दूर से जितने खास नजर आते हैं नजदीक आने पर उतने आम हो जाते हैं। उम्र से लंबी सड़कों का फासला तय कर चुके गुलजार आज उस मुकाम पर हैं जहां समय उनके पीछे-पीछे भागता नजर आ रहा है और वो साहित्य के अर्श पर खड़े हमेशा कुछ और गढ़ देने को व्याकुल और तत्पर दिखते हैं। एक साहित्य सृजक के रूप में गुलजार की तमाम कृतियां साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करती हैं। शायद ही किसी को पता हो कि जन-जन को कंठस्थ अमर प्रार्थना ‘हे प्रभो आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिए’ गुलजार की ही कलम से निकली महानतम कृति है। साहित्य के इतिहास में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि किसी सृजनकर्ता द्वारा किया गया सृजन इतना ख्यातिलब्ध हो जाए कि उसे सृजनकर्ता के नाम की जरूरत ही न पड़े। साहित्य के इस अनोखेपन पर बोलते हुए प्रख्यात साहित्यकार केदारनाथ सिंह कहते हैं, ‘जब सृजनकर्ता द्वारा किया कोई गया सृजन अपने सृजक से बड़ा हो जाए तो यह उस सर्जक की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है। यह साहित्य का बड़ा ही दुर्लभ दृश्य है जब रचना खुद ही अपने रचयिता से प्रतिस्पर्धा करती नजर आ रही हो।’ सृजन और सृजक के बीच महानता की इस साहित्यिक प्रतिस्पर्धा में भी गुलजार का कोई सानी नहीं है। उनके द्वारा लिखे गए तमाम ऐसे गीत हैं जो लोगों की जुबान पर आज भी कंठस्थ हैं लेकिन लोग यह नहीं जानते कि इसका रचयिता कौन है। गांव गलियों से लेकर शहर की पक्की सड़कों तक या परंपराओं के पुजारियों से लेकर आधुनिकत जीवन शैली जीने वाले युवाओं तक, हर जगह गुलजार अपने गीतों, नज्मो और कृतियों के रूप में देशकाल की सारी सीमाओं से परे गुलजार दिखते हैं। 1956 में सम्पूरन सिंह से गुलजार बन कर गीतकारी का लोहा मनवाने वाले गुलजार आज अनगिनत महान कृतियों के स्वामी हैं। अपनी नज्मों से फिजाओं में खुशबू का रंग भरना कोई गुलजार से सीखे। उनकी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वो भाषाई विविधताओं के बावजूद अपनी लेखनी में शब्दों का चयन करने में बखूबी सफलता प्राप्त कर लेते हैं। उनकी कृतियों में राजस्थानी, पंजाबी, भोजपुरी जैसे देशज भाषाओं के शब्दों सहित हिन्दी और उर्दू का अनोखा सामंजस्य देखने को मिलता है। हिन्दी और पंजाबी मिश्रित गीत लिखते समय भी गुलजार अंग्रेजी शब्दों के सटीक प्रयोग का साहस सहजता से कर जाते हैं। मुख्यधारा के साहित्य की विधाओं में अगर गुलजार के कृत्यों पर नजर डालें तो पता चलता है कि उन्होंने अपनी कलम से साहित्य को भी समृद्ध करने का काम किया है। कम शब्दों में ज्यादा कह जाने की नजीर उनकी इस त्रिवेणी में दिखती है जिसमे वो लिखते है- ‘मां ने जिस चांद सी दुल्हन की दुआ दी थी मुझे, आज की रात वह फुटपाथ से देखा मैंने..रात भर रोटी नजर आया है वो चांद मुझे। तीन पंक्तियों की इस छोटी सी रचना के माध्यम से गुलजार इतना कुछ कहने में सफल हो जाते हैं कि उन्हें गागर में सागर भरने वाले कवियों में शुमार किया जा सकता है। हिन्दी व उर्दू सहित तमाम छोटी- बड़ी के भाषाओं के शब्दों पर बेजोड़ पकड़ रखने वाले गुलजार की नज्में भी साहित्य से सिनेमा तक छाई रही हैं। उनकी तमाम मशहूर नज्मो में से एक है- ‘मुझसे एक नज्म का वादा है कि मिलेगी मुझसे, डूबती नब्जों में जब दर्द को नींद आने लगे। अपने भीतर विविधताओं से परिपूर्ण न जाने कितने अर्थों का समावेश करती नजर आती है यह नज्म। यूं देखा जाए तो रचनात्मक स्तर पर अगर गुलजार को सबसे ज्यादा ख्याति मिली है तो शानदार गीतों के कारण। साहित्यकार गुलजार को सिनेमाई गुलजार बनाने में उनकी गीतकारी बेजोड़ कड़ी का काम करती नजर आती है। गुलजार के गीत ही हैं जो उन्हें भारतीय सिनेमा से सीधे तौर पर जोड़ते हैं। यूं तो सिनेमा के क्षेत्र में गुलजार ने निर्देशन से लेकर संवाद लेखन तक में हाथ आजमाया है मगर साहित्यकार गुलजार को लोकप्रिय गुलजार बनाने का श्रेय भाषाई जकड़न से मुक्त उनके गीतों को ही जाता है। सफल गीतकार के रूप में उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अपने गीतों में भाषाई विविधता के साथ-साथ शब्द चयन आदि को लेकर मुक्तहस्त नजर आते हैं। इस संदर्भ में अगर गुलजार के तमाम गीतों को देखा जाए तो प्रतीत होता है कि गुलजार जहां शब्दों को पंक्तिबद्ध करने के लिए बड़ी चतुराई से शब्दों को तोड़-मरोड़ देने में कामयाब हो जाते हैं, वहीं शब्द चयन को लेकर बहुत बेफिक्र नजर आते हैं। गुलजार के शब्द चयन पर वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी टिप्पणी करते हैं कि ‘शब्दों को जरूरत के अनुकूल बदल लेने में गुलजार की निपुणता का परिचय उनके इस पहले गीत में ही देखने को मिल जाता है जिसमें वे लिखते है ‘मोरा गोरा रंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे।’ गीत की इस पंक्ति में ‘ले’ और ‘दे’ को ‘लई’ और ‘दई’ में बदल कर गुलजार ने गीत की सुंदरता को चार चांद लगा दिये !’ शब्दों के रूपांतरण की यह कला गुलजार को ना सिर्फ एक गीतकार बल्कि परिपक्व साहित्यकार के रूप में भी स्थापित करती है। बदलते परिवेश और सिनेमा की मांग के अनुरूप गुलजार के गीतों का रंग भी बदलता गया है। साठ के दशक से गीतकारी के सफर पर निकले गुलजार के गीतों में तमाम विविधताओं के दर्शन संभव हैं। उनका गीतकार मन आधुनिक युवा पीढ़ी के स्वाद को भी बखूबी पहचानता है और पारंपरिक साहित्य की सृजनात्मकता भी समझता है !
हालांकि सिनेमा की जरूरत पर आधारित अपने कई गीतों पर गुलजार आलोचनाओं से भी घिरे नजर आते हैं, बावजूद इसके इसे पारम्परिकता एवं आधुनिकता के बीच का सिनेमाई समन्वय बिठाने में उनकी कामयाबी ही कहेंगे जो उन्हें सत्तर के दशक का महान गीतकार तो बनाती ही है, साथ ही वर्तमान पीढ़ी के चहेते गीतकार के रूप में भी स्थापित करती है। संगीत, सिनेमा और साहित्य तीनों को गुलजार ने सदा अपनी लेखनी से न सिर्फ लाभान्वित किया है बल्कि कई मानकों पर समृद्ध भी किया है। अपनी कृतियों, व्यक्तित्व, रचनात्मकता एवं सृजनशीलता को समय के साथ जारी रखने वाले गुलजार साहित्य, संगीत और सिनेमा के बीच सामंजस्य बिठाने वाली चंद शख्सियतों में से एक हैं। अपने शायराना मिजाज का श्रेय शैलेन्द्र एवं प्रदीप को देते हुए मंच से वह खुद को अदना गीतकार बताते हैं। वह कहते हैं कि शैलेन्द्र और प्रदीप जैसे गीतकारों का नाम लिए बिना कोई महफिल कभी गुलजार नहीं हो सकती चाहे कितने भी गुलजार आ जाएं। बेशक गुलजार का ऐसा कहना उनकी महानता द्योतक है मगर इसमे भी कोई शक नहीं कि गुलजार के बिना भला कोई महफिल क्या गुलजार हो? विनोद खेतान द्वारा सद्य: संकलित पुस्तक ˜उम्र से लंबी सड़कों पर के अलावा गुलजार की अब से पहले अनेक रचनाएं प्रकाश में आ चुकी हैं जिनमे पांच, पन्द्रह और पचहत्तर एवं यारे जुलाहे खासी मशहूर हैं। यह गुलजार ही हैं जो उम्र से लंबी सड़को का सफर तय करने बाद भी उमंग से कह पाते है कि ˜दिल तो बच्चा है जी।
शिवानंद द्विवेदी

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