Posted On May - 26 - 2013
शिवानन्द द्विवेदी सहर
न्याय एक ऐसा मसला है जिसको लेकर कई स्तरों पर बहुआयामी विमर्श चलते रहे हैं। इस दिशा में चल रहे तमाम विमर्शों के बीच आज न्याय और न्यायालयों में प्रयोग की जानी वाली भाषा से जुड़ी बहस मुख्यधारा का विषय बनी हुई है। संवैधानिक रूप से कई ऐसे बिंदु हैं जो वाकई इस विषय को ना सिर्फ गंभीर बल्कि भारतीय भाषाओं के नजरिये से चिंतनीय भी बनाते हैं। संवैधानिक मानकों के आधार पर अगर देखा जाये तो न्यायिक प्रक्रियाओं में हिन्दी सहित तमाम भारतीय भाषाओं की स्थिति हाशिए पर नजर आती है। हिन्दी सहित तमाम भारतीय भाषाओं को लेकर भारतीय संविधान की धारा 348 (खंड एक) के तहत निर्धारित प्रावधान में यह स्पष्ट तौर पर लिखा गया है कि उच्च न्यायलय एवं सर्वोच्च न्यायालय में अंग्रेजी को ही अनिवार्य भाषा के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। इस प्रावधान का सबसे आश्चर्यजनक पहलू ये है कि आम जनता के न्यायिक गुहार के इन मंचों पर भारत की राजभाषा हिन्दी तक को भी स्वीकृति नहीं दी गयी है। संविधान की इसी धारा के खंड दो के तहत यह प्रावधान है कि अगर किसी राज्य के उच्च न्यायालय को अंग्रेजी की बजाय हिन्दी में कोई कार्यवाही करनी हो तो उस राज्य के राज्यपाल द्वारा पहले राष्ट्रपति से अनुमति लेना अनिवार्य होगा। इस नियम के तहत सन्ï 2002 में मध्यप्रदेश एवं 2010 में गुजरात सहित एकाध और राज्यों के राज्यपालों द्वारा किसी मामले से संबंधित कार्य को हिन्दी में करने की अनुमति मांगी गयी जिसे तत्कालीन राष्ट्रप्रमुखों द्वारा स्वीकार नहीं किया गया।
भारतीय संविधान में निहित इस विधान के बारे में आज आम जनता को बेशक ज्यादा कुछ ना पता हो लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से इसका खमियाजा तो कहीं ना कहीं उन्हें ही भुगतना पड़ता है। आखिर किन अध्ययनों अथवा किन तर्कों के आधार पर भारतीय संविधान में निहित भाषाओं से संबंधित इस विधान को स्वीकृति दी गयी है यह समझ से परे है। भारत की कुल जनसंख्या को अगर भाषाई मापदंडों के आधार पर वर्गीकृत करके देखें तो यह विधान जनभावना ेंसे मेल नहीं खाता। 2001 जनगणना में प्राप्त भाषाई ग्राफ के अनुसार भारत की कुल 43 प्रतिशत जनसंख्या हिन्दी को अपनी प्रथम भाषा के तौर पर स्वीकार करती है जबकि 30 प्रतिशत से ज्यादा लोग हिन्दी को द्वितीय वरीयता देते हुए अपनी क्षेत्रीय भाषाओं को प्रथम भाषा मानते हैं। वहीं दूसरी तरफ अंग्रेजी को अपनी प्रथम भाषा मानने वाले लोगों की कुल जनसंख्या दो लाख छब्बीस हजार के आसपास है जो तत्कालीन कुल जनसंख्या की 0.2 प्रतिशत के लगभग है। इन आंकड़ों को देखने के बाद पहला सवाल यही उठता है कि क्या इन्हीं 0.2 प्रतिशत लोगों को ध्यान में रख कर न्यायिक प्रक्रिया का यह भाषाई पैमाना तय किया गया है या इसके पीछे सरकार का कोई और तर्क भी है? जिस देश 99.98 प्रतिशत आबादी अंग्रेजी को अपनी प्रथम भाषा के रूप में स्वीकार तक नहीं करती है उस देश की समूची उच्च न्यायिक प्रक्रिया में ना सिर्फ अंग्रेजी का अनिवार्य होना एवं अन्य सभी भारतीय भाषाओं का कानूनी तौर पर प्रतिबंधित होना बेहद अप्रासंगिक एवं अतार्किक प्रतीत होता है।
दरअसल यहां सवाल किसी भाषा के उत्थान या पतन का नहीं है। यहां सवाल भाषा के साथ हो रहे अन्याय एवं उस भाषा को बोलने वाले लोगों की व्यवस्था में हिस्सेदारी का है। बिना किसी तर्क एवं बिना किसी तरह का सामाजिक अध्ययन किये देश की समूची उच्च न्यायिक व्यवस्था में अंग्रेजी थोपने के साथ-साथ हिन्दी सहित तमाम भारतीय भाषाओं को प्रतिबंधित करने का सीधा अर्थ है कि यह नियम बहुसंख्यक जनता के न्यायिक अभिव्यक्ति के माध्यम को हाशिए पर लाने का काम कर रहा है। अगर कोई व्यक्ति स्वेच्छा की भाषा में न्याय की अर्जी तक नहीं दाखिल कर सकता तो इसे व्यक्ति के भाषाई अधिकार का हनन नहीं तो और क्या कहा जाये। हालांकि न्यायिक प्रक्रियाओं में बहुभाषाई मान्यता का विरोध करने के पीछे सरकारी तर्क ये है कि इससे संसाधन का खर्च बढ़ेगा और प्रक्रिया में जटिलता आयेगी। सरकार की तरफ से दिये जाने वाला यह तर्क इस नजरिये से बेहद आधारहीन लगता है कि जिस भौगोलिक समाज का मात्र 0.2 प्रतिशत हिस्सा जिस भाषा को अपनी प्रथम भाषा मानता है उस भाषा को सहज मानकर अनिवार्य कर दिया गया है जबकि 99.98 प्रतिशत लोगों की भाषाओं को जटिलता का तर्क देकर प्रतिबंधित कर दिया गया है। बहुभाषाई समाज वाला देश होने के बावजूद अगर हिन्दी को अपनी प्रथम भाषा मानने वालों की संख्या इस देश में आज भी सबसे ज्यादा है तो फिर समाज के लिए कार्यरत विभागों अथवा संस्थाओं की भाषा भी वही क्यों ना हो जो समाज की भाषा है। न्यायाधीश एवं न्यायालय समाज के लिए बने हैं न कि समाज न्यायालय एवं न्यायाधीश के लिए। अत: जटिलता एवं सुविधा का पैमाना जनता एवं समाज की सहूलियत के मापदंडों को आधारभूत मानकर तय किया जाना चाहिए । समाज के विभिन्न पहलुओं पर चल रही न्याय की लड़ाइयों के दायरों से भाषाई संघर्षों को अलग नहीं रखा जाना चाहिए। यह विधान भारतीय भाषाओं के साथ महज भेदभाव का विषय न होकर न्यायिक संघर्षों का विषय है। भाषा के आधार पर अगर अवसर में कटौती की जाती है तो इसे भी भाषाओं के साथ भेदभाव का ही एक उदाहरण माना जा सकता है। भारतीय भाषाओं के साथ इस अन्यायपूर्ण रवैये को लेकर लगभग चार महीने से दिल्ली कांग्रेस मुख्यालय के सामने धरने पर बैठे आइआईटीयन श्याम रूद्र पाठक साफ तौर पर कहते हैं कि यह पूरा मसला भाषाई न्याय से जुड़ा है न कि उत्थान और पतन से जुड़ा है।
अंग्रेजी को बतौर भाषा स्वीकार करने अथवा सुविधानुसार अपने कार्यों में प्रयोग करने से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि किसी भी भाषा एवं उस भाषा को बोलने वाले समाज के साथ अन्याय न हो। लोगों को उनके द्वारा बोली जाने वाली प्रथम भाषा में अगर न्यायिक अपील करने तक का हक नहीं मिलेगा तो भला न्याय के अन्य पहलुओं पर कैसे विश्वस्त हुआ जा सकता है। संसाधनों एवं जटिलताओं के बहाने भाषाओं के साथ हो रहे इस अन्यायपूर्ण दोहरेपन से बचकर इनको इनका वाजिब हक दिये जाने की जरूरत है।
भारतीय संविधान में निहित इस विधान के बारे में आज आम जनता को बेशक ज्यादा कुछ ना पता हो लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से इसका खमियाजा तो कहीं ना कहीं उन्हें ही भुगतना पड़ता है। आखिर किन अध्ययनों अथवा किन तर्कों के आधार पर भारतीय संविधान में निहित भाषाओं से संबंधित इस विधान को स्वीकृति दी गयी है यह समझ से परे है। भारत की कुल जनसंख्या को अगर भाषाई मापदंडों के आधार पर वर्गीकृत करके देखें तो यह विधान जनभावना ेंसे मेल नहीं खाता। 2001 जनगणना में प्राप्त भाषाई ग्राफ के अनुसार भारत की कुल 43 प्रतिशत जनसंख्या हिन्दी को अपनी प्रथम भाषा के तौर पर स्वीकार करती है जबकि 30 प्रतिशत से ज्यादा लोग हिन्दी को द्वितीय वरीयता देते हुए अपनी क्षेत्रीय भाषाओं को प्रथम भाषा मानते हैं। वहीं दूसरी तरफ अंग्रेजी को अपनी प्रथम भाषा मानने वाले लोगों की कुल जनसंख्या दो लाख छब्बीस हजार के आसपास है जो तत्कालीन कुल जनसंख्या की 0.2 प्रतिशत के लगभग है। इन आंकड़ों को देखने के बाद पहला सवाल यही उठता है कि क्या इन्हीं 0.2 प्रतिशत लोगों को ध्यान में रख कर न्यायिक प्रक्रिया का यह भाषाई पैमाना तय किया गया है या इसके पीछे सरकार का कोई और तर्क भी है? जिस देश 99.98 प्रतिशत आबादी अंग्रेजी को अपनी प्रथम भाषा के रूप में स्वीकार तक नहीं करती है उस देश की समूची उच्च न्यायिक प्रक्रिया में ना सिर्फ अंग्रेजी का अनिवार्य होना एवं अन्य सभी भारतीय भाषाओं का कानूनी तौर पर प्रतिबंधित होना बेहद अप्रासंगिक एवं अतार्किक प्रतीत होता है।
दरअसल यहां सवाल किसी भाषा के उत्थान या पतन का नहीं है। यहां सवाल भाषा के साथ हो रहे अन्याय एवं उस भाषा को बोलने वाले लोगों की व्यवस्था में हिस्सेदारी का है। बिना किसी तर्क एवं बिना किसी तरह का सामाजिक अध्ययन किये देश की समूची उच्च न्यायिक व्यवस्था में अंग्रेजी थोपने के साथ-साथ हिन्दी सहित तमाम भारतीय भाषाओं को प्रतिबंधित करने का सीधा अर्थ है कि यह नियम बहुसंख्यक जनता के न्यायिक अभिव्यक्ति के माध्यम को हाशिए पर लाने का काम कर रहा है। अगर कोई व्यक्ति स्वेच्छा की भाषा में न्याय की अर्जी तक नहीं दाखिल कर सकता तो इसे व्यक्ति के भाषाई अधिकार का हनन नहीं तो और क्या कहा जाये। हालांकि न्यायिक प्रक्रियाओं में बहुभाषाई मान्यता का विरोध करने के पीछे सरकारी तर्क ये है कि इससे संसाधन का खर्च बढ़ेगा और प्रक्रिया में जटिलता आयेगी। सरकार की तरफ से दिये जाने वाला यह तर्क इस नजरिये से बेहद आधारहीन लगता है कि जिस भौगोलिक समाज का मात्र 0.2 प्रतिशत हिस्सा जिस भाषा को अपनी प्रथम भाषा मानता है उस भाषा को सहज मानकर अनिवार्य कर दिया गया है जबकि 99.98 प्रतिशत लोगों की भाषाओं को जटिलता का तर्क देकर प्रतिबंधित कर दिया गया है। बहुभाषाई समाज वाला देश होने के बावजूद अगर हिन्दी को अपनी प्रथम भाषा मानने वालों की संख्या इस देश में आज भी सबसे ज्यादा है तो फिर समाज के लिए कार्यरत विभागों अथवा संस्थाओं की भाषा भी वही क्यों ना हो जो समाज की भाषा है। न्यायाधीश एवं न्यायालय समाज के लिए बने हैं न कि समाज न्यायालय एवं न्यायाधीश के लिए। अत: जटिलता एवं सुविधा का पैमाना जनता एवं समाज की सहूलियत के मापदंडों को आधारभूत मानकर तय किया जाना चाहिए । समाज के विभिन्न पहलुओं पर चल रही न्याय की लड़ाइयों के दायरों से भाषाई संघर्षों को अलग नहीं रखा जाना चाहिए। यह विधान भारतीय भाषाओं के साथ महज भेदभाव का विषय न होकर न्यायिक संघर्षों का विषय है। भाषा के आधार पर अगर अवसर में कटौती की जाती है तो इसे भी भाषाओं के साथ भेदभाव का ही एक उदाहरण माना जा सकता है। भारतीय भाषाओं के साथ इस अन्यायपूर्ण रवैये को लेकर लगभग चार महीने से दिल्ली कांग्रेस मुख्यालय के सामने धरने पर बैठे आइआईटीयन श्याम रूद्र पाठक साफ तौर पर कहते हैं कि यह पूरा मसला भाषाई न्याय से जुड़ा है न कि उत्थान और पतन से जुड़ा है।
अंग्रेजी को बतौर भाषा स्वीकार करने अथवा सुविधानुसार अपने कार्यों में प्रयोग करने से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि किसी भी भाषा एवं उस भाषा को बोलने वाले समाज के साथ अन्याय न हो। लोगों को उनके द्वारा बोली जाने वाली प्रथम भाषा में अगर न्यायिक अपील करने तक का हक नहीं मिलेगा तो भला न्याय के अन्य पहलुओं पर कैसे विश्वस्त हुआ जा सकता है। संसाधनों एवं जटिलताओं के बहाने भाषाओं के साथ हो रहे इस अन्यायपूर्ण दोहरेपन से बचकर इनको इनका वाजिब हक दिये जाने की जरूरत है।



