रविवार, 29 सितंबर 2013

बढती जनसँख्या घटता पशुधन : जनसत्ता में प्रकाशित लेख

  • शिवानन्द द्विवेदी सहर 

पशु सम्पदा की दृष्टि से भारत का पुरे विश्व में प्रथम स्थान है !
एक आंकड़े केअनुसार पूरी दुनिया के कुल पशुओं की 19 फीसद सँख्या भारत में ही पाई जाती है ! गणना के ग्राफ पर अगर भारत में कुल पशुधन की संख्या का जायजा लें तो पशु गणना की अंतिम रिपोर्ट यही कहती है कि देश के 28 राज्यों तथा 7 केन्द्र शासित प्रदेशों में 48.5 करोड़ की संख्या में पशुधन हैं । हालाकि, आजादी के बाद 1951 में हुई प्रथम पशुगणना में यह संख्या 27 करोंड़ 30 लाख के आस-पास बताई गयी थी जो कि 2003 में की गयी अबतक की अंतिम पशुगणना में व्यापक वृद्धि के साथ 48.5 करोंड़ तक पहुच चुकी थी ! इस लिहाज से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वर्तमान में भारत की कुल पशुधन संपदा 50 करोंड़ के आस-पास तक पहुच चुकी होगी !  हालाकि,भारत सहित पूरी दुनिया में पशुओं की अनेकों प्रजातियां पाई जाती ऐसे में यह समझना बेहद जरूरी है कि किन पशुओं को पशुधन के अंतर्गत रखा गया है ! कुछ अपवादों को छोड़ दें तो हर वो पशु अथवा पशु समूह जिन्हें श्रम,मांस-भोजन,रेशे अथवा अन्य उत्पादनों के उद्देश्यों से पाला जाता है, को पशुधन कहा जाता है ! लेकिन इस मामले में मछली पालन एवं मुर्गी पालन अपवाद हैं, क्योंकि कुछ विशेष हालातों को छोडकर इन्हें पशुधन के अंतर्गत नहीं रखा गया है ! पशुधन के मामले में दुनिया का अव्वल देश होने के नाते भारत की अर्थव्यवस्था में पशुधन के व्यापक प्रभावों एवं इसके हस्तक्षेपों को नकारा नहीं जा सकता ! सिंधु घाटी की खुदाई में  प्राप्त तथ्यों की प्रमाणिकता को अगर आधार माना जाय तो इस बात में कोई संदेह नहीं कि तब की  भारतीय अर्थव्यवस्था में भी पशुधन का महत्वपूर्ण योगदान रहा था ! चुकि भौगोलिक एवं पर्यावरणीय परिस्थियों के हिसाब से  भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहाँ की लगभग पचास से पैसठ फीसद आबादी कृषि निहित रोजागारों पर निर्भर है ! अत: भारतीय अर्थव्यवस्था की कृषि के प्रति निर्भरता को देखते हुए कृषि क्षेत्र में पशुधन के योगदान एवं इसकी भूमिका को भी समझना जरूरी होगा ! कृषि के क्षेत्र में पशुधन की भूमिका एवं इसके योगदान से सम्बंधित आंकड़े बताते हैं कि देश में कृषि उत्पादन में पशुपालन का योगदान 30 फीसद है । एक अनुमान के अनुसार कृषि में पशुश्रम का कुल मूल्य 300 से 500 करोड़ रुपये के आस-पास है । एक तरफ जहाँ पशुओं के गोबर से खाद प्राप्त होती है तो वहीँ दुसरी तरफ उनके सींग, खुर एवं रेशे आदि का कई तरह से उपयोग किया जाता रहा है । ग्रामीण क्षेत्रों में तो कृषि सम्बन्धी यातायात के लिए पशुओं का ही विशेष कर  उपयोग किया जाता रहा है । एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में लगभग कुल 1.5 करोड़ बैलगाड़ियों की संख्या है और ग्रामीण यातायात में इनकी बहुत बड़ी भूमिका है ।

इन सबके अलावा भारत में पशुधन का बड़ा उपयोग दुग्ध उत्पादन के लिए किया जाता रहा है ! चुकि भारत की कुल पशु संपदा का बड़ा हिस्सा दुधारू नस्लों के पशुओं का है अत: दुग्ध उत्पादन के नजरिये से भी भारत का विश्व में  अग्रणी होना आपेक्षित है ! लेकिन दुग्ध उत्पादन के मामले में आंकड़े बिलकुल उलट हैं और भारत की स्थिति वैसी नहीं हैं जैसी की होनी चाहिए ! विश्व के अवव्ल दर्जे का पशुधन संपन्न देश होने के बावजूद हमारे पास या तो अच्छे नस्ल के दुधारू पशु नहीं हैं या होने के बावजूद भी हम दुग्ध उत्पादन में बढोत्तरी कर पाने में लागातार नाकामयाब ही साबित हो रहे हैं ! सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सालाना प्रति गाय से करीब 1108 किलो और प्रति भैंस से करीब 1531 किलो दूध का उत्पादन होता है जबकि वैव्श्रिक स्तर पर यह आंकड़ा प्रति गाय करीब 2287 किलो दूध के उत्पादन का है । अमेरिका जैसे विकसित देशों में तो इस नस्लकी गाय प्रति वर्ष करीब 6000 लीटर दूध देती है।  हालाकि इस बात को सम्बंधित विभागों द्वारा स्वीकार किया जा चुका है कि भारत के दुधारू पशुओं में अच्छी नस्लों का अभाव है अथवा अगर अच्छी नस्लें हैं भी तो उंनकी पहचान कर उन्हें संरक्षित नहीं किया जा रहा है ! लेकिन इस बात का कोई ठोस जवाब किसी के पास नहीं है कि अगर नस्ल अच्छी नहीं है तो नस्ल सुधार की दिशा में अबतक क्या ठोस पहल किये गए हैं अथवा जो अच्छी नस्लें हैं उनकी पहचान कर उन्हें संरक्षित क्यों नहीं किया जा रहा है ?  इतना ही नहीं बल्कि दूध की गुणवत्ता के लिहाज से भी विदेशी पशुओं की नस्लें हमसे बेहतर हैं ! ऐसे में एक बात साफ़ तौर पर कही जा सकती है कि हीला-हवाली की बजाय भारत में गायों एवं भैंसों की नस्ल सुधारने की आवश्यकता है। गायों के दूध की क्वालिटी में सुधार करना भी जरूरी है। ऐसे में जिन नस्लों की पहचान नहीं हो पा रही है उनको आयातित नस्लों से क्रॉस कराने की भी योजना पर काम करने की जरुरत है ! क्योंकि अगर भारतीय दुधारू पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता में कमी होगी तो पशुपालक वर्ग द्वारा इसे घाटे का सौदा मान लिया जायेगा ! परिणामत: भारत में पशुधन कि स्थिति में गिरावट होने की संभावना बलवती होगी ! इस दिशा में ठोस उपाय करते हुए पशुओं के नस्ल सुधार एवं संरक्षण की दिशा में पहल की सख्त एवं शीघ्र जरुरत है !
पशुओं की कटान
पशुधन संरक्षण के मामले में भारत के समक्ष दूसरी सबसे बड़ी चुनौती पशुओं के अवैध कटान की है ! नियामकों को ताक पर रख कर धड्द्ल्ले से चल रहे बूचडखानो में हो रहा पशु वध, निश्चित तौर पर भारतीय पशु संपदा के लिए बेहद खतरनाक है ! गोमांस और गोकशी को लेकर भारत में अक्सर राजनीति तक होती रही है और इसको राजनितिक रंग दिया जाता रहा है ! भारत के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्द्यालयों में से एक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय तक में आये दिन छात्रावास में रह रहे वर्ग विशेष के छात्रों द्वारा गोमांस की मांग करके अपनी राजनीति को परवान चढाने की कवायदें तो अक्सर ही की जाती रहीं हैं ! हालाकि गोकशी अथवा पशुओं का कटान बेहद संवेदनशील और चिंताजनक मुद्दा है ! पशुधन संरक्षण की दिशा में भारत की स्थिति इसी बात से चिंता जनक प्रतीत होती है कि भारत मांस का बड़ा निर्यात करने वाला देश बनता जा रहा है ! भारत से आज अरब देशों व पाकिस्तान को हजारों करोड़ रु.का मांस निर्यात हो रहा है। आंकड़े गवाह हैं कि वर्ष 2007-08 में 3550 करोड़ रुपये, एवं 2008-09 में 4840 करोड़ रु.का मांस निर्यात 2009-10 में बढ़कर 5481 करोड़ रु. का हो गया था। एक संस्था द्वारा जारी आंकड़ो में बताया गया है कि भारत में प्रतिमिनट 260 पशु काटे जा रहे हैं, जिनमें 35 गायें शामिल हैं। आंकड़ों के अनुसार 1957 में देश में 267 कत्लखाने थे, जो कि आज बढ़कर 36031 हो गये हैं। कत्लखानो में हुई यह वृद्धि पशु संरक्षण के दृष्टिकोण से बेहद निराशाजनक वृद्धि है ! पशु संरक्षण के नजरिये से मांस व्यापार  बेशक घातक हो मगर मांस व्यापारियों के लिए पशुहत्या एक बेहद फायदे का कारोबार बन चुका है । उन्हें मांस विक्रय से तो अच्छी आमदनी होती ही है, साथ ही पशु की खाल, सींग, खुर, आंतों आदि तमाम अंगों को बेचकर भी उन्हें भारी मुनाफा होता है। दुधारू जिंदा पशु यदि तीस-चालीस हजार रु. का है तो कटने के बाद वह साठ-सत्तर हजार रु. का हो जाता है। इसलिए दुधारू पशु भी बड़ी संख्या में काटे जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश सहित देश के तमाम राज्य मांस निर्यात के बड़े अड्डे बन गये हैं। प. उत्तर प्रदेश के तमाम जिलों से प्रतिदिन सात से आठ सौ टन मांस निर्यात हो रहा है। इस निर्यात तथा स्थानीय मांसाहारियों की पूर्ति हेतु यहां हर रोज 25 से 30 हजार पशु काटे जा रहे हैं। इनमें तीन चौथाई तो बिल्कुल अवैध तरीके से काटे जा रहे हैं, जिसमें प्रदूषण नियंत्रण, पशु यातायात तथा पशु क्रूरता निवारण अधिनियम जैसे कानून ताक पर रख दिये जाते हैं। आश्चर्य की बात तो ये है कि सरकारी नियंत्रण वाले सभी कत्लखाने भी कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं। साथ ही चल रहीं पशुओं की हड्डियां पकाने की भट्टियां वायु को भीषण रूप से प्रदूषित करके सांस लेना दूभर कर रही हैं। कत्लखानों से निकल रहे खून के परनालों और गंदगी मिश्रित पानी ने जमीन के नीचे के पाने को भी जहरीला बनाया है। भैंस के साथ-साथ काटे जा रहे गोवंश के कारण साम्प्रदायिक सौहार्द भी अनेक बार बिगड़ा है। पशुपालन विभाग के अनुसार प्रजनन के मुकाबले दोगुनी संख्या में काटे जाने के कारण पशु धन तेजी से कम हो रहा है। बीते पांच सालों में पशुओं की संख्या आधे से कम रह गयी है। साथ ही इस नाकारात्मक प्रभाव दूध की कीमतों पर पड़ा है जिससे दूध के दाम दोगुने से ज्यादा हो गये हैं। पशुओं के अवैध कटानों पर अगर जल्द ही अंकुश नहीं लगाया गया तो भविष्य में मामला हाथ से जाता दिख रहा है ! अवैध कटानो के चलते पशुओं की अच्छी नस्लें भी लुप्त होती जा रही हैं !


पशुधन बजट एवं व्यापरिक स्थिति  
भारत में पशुधन के आर्थिक एवं रोजगारपरक महत्व को देखते हुए पिछले कुछ सालों में केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा व्यापक स्तर पर बजटीय प्रावधान रखा गया एवं तमाम योजनाओं के माध्यम से पशुधन विकास को बल देने की दिशा में प्रयास भी किये गए हैं ! चुकि पशुपालन एवं दुग्ध विकास आदि राज्य सूची के विषय हैं अत: इस मामले में ज्यादा जवाब देही राज्य सरकारों की बनती है ! लेकिन इसका ये कतई यह मतलब नहीं है कि इस विषय पर बिलकुल मौन रहे ! दरअसल भारत की कुल राष्ट्रीय आय का 10 फीसद हिस्सा पशुधन से आता है अत: प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही पशुधन विकास के लिए बजटीय प्रावधान रखा गया था ! पशुधन के राष्ट्रीय महत्व को ध्यान मेंरखतेहुएपशुधनकेविकासकेलिएप्रथमपंचवर्षीययोजनाके अंतर्गत  8 करोड़रुपये कीराशिरखीगईथी ।समय के साथ-साथ इसराशि मेंउत्तरोत्तरवृध्दिही होतीगई। वर्तमान संदर्भ में अगर देखें तो वर्ष 2010-11 में पशुधन एवं दुग्ध विकास के लिए केन्द्र की तरफ से 1104 करोंड़ रूपये और वर्ष 2011-12 में 1243 करोंड़ रुपये खर्चे गए हैं ! हालाकि ग्यारहवी पंचवर्षीय योजना में पशुधन विकास दर का लक्ष्य 6 से 8 फीसद रखा गया था लेकिन तय लक्ष्यों तक नहीं पंहुचा जा सका और पशुधन विकास दर 4.8 फीसद की ही हासिल हो सकी ! लिहाजा बारहवीं पंचवर्षीय योजना में ऐसे प्रयास किये जा रहे हैं कि पशुधन विकास दर के पूर्व लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके ! इस दिशा में पहल करते हुए सरकारों द्वारा पशुधन विकास के लिए उपयोगी साबित होने वाली कई नीतियों पर काम किये जाने का प्रावधान रखा गया है ! बाराहंवी पंचवर्षीय योजना के तय लक्ष्यों को प्राप्त की चुनौतियों पर अगर एक नजर डालें तो पशु रोगों पर नियंत्रण,आहार और चारे की कमी,नस्ल सुधार के आधुनिक तकनीक संसाधनो की कमी, इस दिशा में प्रचार-प्रसार एवं प्रशिक्षण आदि की समुचित व्यवस्था कराना, बड़ी चुनौतियाँ भी हैं ! लेकिन इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए कई राज्यों की सरकारों की तरफ से व्यापक स्तर पर पहल शुरू की जा चुकी है ! उन्ही राज्यों से से एक राज्य छत्तीसगढ़ भी है जहाँ पशुधन विकास की दिशा में व्यापक काम हुआ है ! अगर देखा जाय तो भारत में पशुधन की वाणिज्यिक स्थिति अभी उस स्तर की नहीं हो पाई है जितने की दरकार है ! अगर व्यापारिक नजरिये से पशुधन विकास की दिशा में काम किया जाय तो बेहद अच्छे परिणाम आ सकते हैं ! फिलहाल बिना किसी व्यापरिक गुणवत्ता के ही वर्ष 2010-11 में पशुधन से कुल निर्यात 25 हजार 408 करोंड़ रुपये का हुआ था, तो अगर पशुधन को व्यापारिक महत्व दिया जाय तो इसमें और अधिक उत्थान होने की संभावना है !

पशुधन विकास में जरुरी कदम
आज सबसे ज्यादा जरूरी हो गया है कि  पशुधन की उन्नति के लिए सर्वप्रथम सुझाव है कि इसे उद्योग का दर्जा प्रदान किया जाए जिस प्रकार अन्य उद्योग अनेक प्रकार की सुविधाएं प्राप्त करते हैं उसी प्रकार यदि पशुपालन व्यवसाय को सुविधाएं प्राप्त होने लगे तो दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति कर सकेंगे । समय-समय पर पशु-प्रदर्शनियों एवं मेलों का आयोजन और पशुपालन व्यवसाय में लगे दक्ष लोगों को पुरस्कृत किया जाना चाहिए पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, दूरदर्शन आदि प्रचार माध्यमों से पशुपालन व्यवसाय से होने वाले लाभों से आम जनता को परिचित कराना चाहिए ताकि अन्य व्यक्ति पुशपालन व्यवसाय के प्रति आकर्षित हो सकें । पशु शक्ति बहुमुखी शक्ति है, भारतवासी इससे भली प्रकार से परिचित भी हैं, आवश्यकता है केवल इस ओर ध्यान देने की ।


पशु संपदा से प्राकृतिक और भौगोलिक रूप से संपन्न भारत में अगर नियोजित ढंग से पशुधन उद्द्योग पर ध्यान दिया जाय तो न सिर्फ कृषि बल्कि अन्य कई क्षेत्रों में इसके प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष फायदे दिखने लगेंगे ! अवैध कटानो पर कानूनी शिकंजा कसने के साथ-साथ पारम्परिक मूल्यों को भी सहेजने की जरुरत है ! गाय,भैंस आदि दुधारू पशु है अत: इनके कटान पर ठोस नियामक तय किये जायें एवं अवैध कटान करने वालों को दण्डित करने में देरी न की जाय ! भारत के लिए पशुधन विकास में नस्ल सुधार बड़ी जरुरत है ! अत: विदेशी दुधारू नस्लों को भारत लाकर भारत में उस नस्ल को बढ़ावा देने की दिशा में पुरजोर पहल किये जाने की जरुरत है ! यह पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक एवं प्रशिक्षण पर आधारित होनी चाहिए ताकि आम कृषक अथवा पशुपालक को भी पशुधन के सही उपयोग एवं महत्व का पता चल सके ! कृषि प्रधान देश भारत के लिए पशुधन का व्यापार न सिर्फ राष्ट्रीय स्तर की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बना सकता बल्कि लघु उद्द्योगों के तौर पर भी एक नई पहल साबित हो सकता है !

(इस लेख के कई हिस्से जनसत्ता के प्रकाशित लेख में संपादित हो सकते हैं लेकिन मूल लिखा हुआ लेख यही है)