रविवार, 29 सितंबर 2013

बढती जनसँख्या घटता पशुधन : जनसत्ता में प्रकाशित लेख

  • शिवानन्द द्विवेदी सहर 

पशु सम्पदा की दृष्टि से भारत का पुरे विश्व में प्रथम स्थान है !
एक आंकड़े केअनुसार पूरी दुनिया के कुल पशुओं की 19 फीसद सँख्या भारत में ही पाई जाती है ! गणना के ग्राफ पर अगर भारत में कुल पशुधन की संख्या का जायजा लें तो पशु गणना की अंतिम रिपोर्ट यही कहती है कि देश के 28 राज्यों तथा 7 केन्द्र शासित प्रदेशों में 48.5 करोड़ की संख्या में पशुधन हैं । हालाकि, आजादी के बाद 1951 में हुई प्रथम पशुगणना में यह संख्या 27 करोंड़ 30 लाख के आस-पास बताई गयी थी जो कि 2003 में की गयी अबतक की अंतिम पशुगणना में व्यापक वृद्धि के साथ 48.5 करोंड़ तक पहुच चुकी थी ! इस लिहाज से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वर्तमान में भारत की कुल पशुधन संपदा 50 करोंड़ के आस-पास तक पहुच चुकी होगी !  हालाकि,भारत सहित पूरी दुनिया में पशुओं की अनेकों प्रजातियां पाई जाती ऐसे में यह समझना बेहद जरूरी है कि किन पशुओं को पशुधन के अंतर्गत रखा गया है ! कुछ अपवादों को छोड़ दें तो हर वो पशु अथवा पशु समूह जिन्हें श्रम,मांस-भोजन,रेशे अथवा अन्य उत्पादनों के उद्देश्यों से पाला जाता है, को पशुधन कहा जाता है ! लेकिन इस मामले में मछली पालन एवं मुर्गी पालन अपवाद हैं, क्योंकि कुछ विशेष हालातों को छोडकर इन्हें पशुधन के अंतर्गत नहीं रखा गया है ! पशुधन के मामले में दुनिया का अव्वल देश होने के नाते भारत की अर्थव्यवस्था में पशुधन के व्यापक प्रभावों एवं इसके हस्तक्षेपों को नकारा नहीं जा सकता ! सिंधु घाटी की खुदाई में  प्राप्त तथ्यों की प्रमाणिकता को अगर आधार माना जाय तो इस बात में कोई संदेह नहीं कि तब की  भारतीय अर्थव्यवस्था में भी पशुधन का महत्वपूर्ण योगदान रहा था ! चुकि भौगोलिक एवं पर्यावरणीय परिस्थियों के हिसाब से  भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहाँ की लगभग पचास से पैसठ फीसद आबादी कृषि निहित रोजागारों पर निर्भर है ! अत: भारतीय अर्थव्यवस्था की कृषि के प्रति निर्भरता को देखते हुए कृषि क्षेत्र में पशुधन के योगदान एवं इसकी भूमिका को भी समझना जरूरी होगा ! कृषि के क्षेत्र में पशुधन की भूमिका एवं इसके योगदान से सम्बंधित आंकड़े बताते हैं कि देश में कृषि उत्पादन में पशुपालन का योगदान 30 फीसद है । एक अनुमान के अनुसार कृषि में पशुश्रम का कुल मूल्य 300 से 500 करोड़ रुपये के आस-पास है । एक तरफ जहाँ पशुओं के गोबर से खाद प्राप्त होती है तो वहीँ दुसरी तरफ उनके सींग, खुर एवं रेशे आदि का कई तरह से उपयोग किया जाता रहा है । ग्रामीण क्षेत्रों में तो कृषि सम्बन्धी यातायात के लिए पशुओं का ही विशेष कर  उपयोग किया जाता रहा है । एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में लगभग कुल 1.5 करोड़ बैलगाड़ियों की संख्या है और ग्रामीण यातायात में इनकी बहुत बड़ी भूमिका है ।

इन सबके अलावा भारत में पशुधन का बड़ा उपयोग दुग्ध उत्पादन के लिए किया जाता रहा है ! चुकि भारत की कुल पशु संपदा का बड़ा हिस्सा दुधारू नस्लों के पशुओं का है अत: दुग्ध उत्पादन के नजरिये से भी भारत का विश्व में  अग्रणी होना आपेक्षित है ! लेकिन दुग्ध उत्पादन के मामले में आंकड़े बिलकुल उलट हैं और भारत की स्थिति वैसी नहीं हैं जैसी की होनी चाहिए ! विश्व के अवव्ल दर्जे का पशुधन संपन्न देश होने के बावजूद हमारे पास या तो अच्छे नस्ल के दुधारू पशु नहीं हैं या होने के बावजूद भी हम दुग्ध उत्पादन में बढोत्तरी कर पाने में लागातार नाकामयाब ही साबित हो रहे हैं ! सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सालाना प्रति गाय से करीब 1108 किलो और प्रति भैंस से करीब 1531 किलो दूध का उत्पादन होता है जबकि वैव्श्रिक स्तर पर यह आंकड़ा प्रति गाय करीब 2287 किलो दूध के उत्पादन का है । अमेरिका जैसे विकसित देशों में तो इस नस्लकी गाय प्रति वर्ष करीब 6000 लीटर दूध देती है।  हालाकि इस बात को सम्बंधित विभागों द्वारा स्वीकार किया जा चुका है कि भारत के दुधारू पशुओं में अच्छी नस्लों का अभाव है अथवा अगर अच्छी नस्लें हैं भी तो उंनकी पहचान कर उन्हें संरक्षित नहीं किया जा रहा है ! लेकिन इस बात का कोई ठोस जवाब किसी के पास नहीं है कि अगर नस्ल अच्छी नहीं है तो नस्ल सुधार की दिशा में अबतक क्या ठोस पहल किये गए हैं अथवा जो अच्छी नस्लें हैं उनकी पहचान कर उन्हें संरक्षित क्यों नहीं किया जा रहा है ?  इतना ही नहीं बल्कि दूध की गुणवत्ता के लिहाज से भी विदेशी पशुओं की नस्लें हमसे बेहतर हैं ! ऐसे में एक बात साफ़ तौर पर कही जा सकती है कि हीला-हवाली की बजाय भारत में गायों एवं भैंसों की नस्ल सुधारने की आवश्यकता है। गायों के दूध की क्वालिटी में सुधार करना भी जरूरी है। ऐसे में जिन नस्लों की पहचान नहीं हो पा रही है उनको आयातित नस्लों से क्रॉस कराने की भी योजना पर काम करने की जरुरत है ! क्योंकि अगर भारतीय दुधारू पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता में कमी होगी तो पशुपालक वर्ग द्वारा इसे घाटे का सौदा मान लिया जायेगा ! परिणामत: भारत में पशुधन कि स्थिति में गिरावट होने की संभावना बलवती होगी ! इस दिशा में ठोस उपाय करते हुए पशुओं के नस्ल सुधार एवं संरक्षण की दिशा में पहल की सख्त एवं शीघ्र जरुरत है !
पशुओं की कटान
पशुधन संरक्षण के मामले में भारत के समक्ष दूसरी सबसे बड़ी चुनौती पशुओं के अवैध कटान की है ! नियामकों को ताक पर रख कर धड्द्ल्ले से चल रहे बूचडखानो में हो रहा पशु वध, निश्चित तौर पर भारतीय पशु संपदा के लिए बेहद खतरनाक है ! गोमांस और गोकशी को लेकर भारत में अक्सर राजनीति तक होती रही है और इसको राजनितिक रंग दिया जाता रहा है ! भारत के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्द्यालयों में से एक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय तक में आये दिन छात्रावास में रह रहे वर्ग विशेष के छात्रों द्वारा गोमांस की मांग करके अपनी राजनीति को परवान चढाने की कवायदें तो अक्सर ही की जाती रहीं हैं ! हालाकि गोकशी अथवा पशुओं का कटान बेहद संवेदनशील और चिंताजनक मुद्दा है ! पशुधन संरक्षण की दिशा में भारत की स्थिति इसी बात से चिंता जनक प्रतीत होती है कि भारत मांस का बड़ा निर्यात करने वाला देश बनता जा रहा है ! भारत से आज अरब देशों व पाकिस्तान को हजारों करोड़ रु.का मांस निर्यात हो रहा है। आंकड़े गवाह हैं कि वर्ष 2007-08 में 3550 करोड़ रुपये, एवं 2008-09 में 4840 करोड़ रु.का मांस निर्यात 2009-10 में बढ़कर 5481 करोड़ रु. का हो गया था। एक संस्था द्वारा जारी आंकड़ो में बताया गया है कि भारत में प्रतिमिनट 260 पशु काटे जा रहे हैं, जिनमें 35 गायें शामिल हैं। आंकड़ों के अनुसार 1957 में देश में 267 कत्लखाने थे, जो कि आज बढ़कर 36031 हो गये हैं। कत्लखानो में हुई यह वृद्धि पशु संरक्षण के दृष्टिकोण से बेहद निराशाजनक वृद्धि है ! पशु संरक्षण के नजरिये से मांस व्यापार  बेशक घातक हो मगर मांस व्यापारियों के लिए पशुहत्या एक बेहद फायदे का कारोबार बन चुका है । उन्हें मांस विक्रय से तो अच्छी आमदनी होती ही है, साथ ही पशु की खाल, सींग, खुर, आंतों आदि तमाम अंगों को बेचकर भी उन्हें भारी मुनाफा होता है। दुधारू जिंदा पशु यदि तीस-चालीस हजार रु. का है तो कटने के बाद वह साठ-सत्तर हजार रु. का हो जाता है। इसलिए दुधारू पशु भी बड़ी संख्या में काटे जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश सहित देश के तमाम राज्य मांस निर्यात के बड़े अड्डे बन गये हैं। प. उत्तर प्रदेश के तमाम जिलों से प्रतिदिन सात से आठ सौ टन मांस निर्यात हो रहा है। इस निर्यात तथा स्थानीय मांसाहारियों की पूर्ति हेतु यहां हर रोज 25 से 30 हजार पशु काटे जा रहे हैं। इनमें तीन चौथाई तो बिल्कुल अवैध तरीके से काटे जा रहे हैं, जिसमें प्रदूषण नियंत्रण, पशु यातायात तथा पशु क्रूरता निवारण अधिनियम जैसे कानून ताक पर रख दिये जाते हैं। आश्चर्य की बात तो ये है कि सरकारी नियंत्रण वाले सभी कत्लखाने भी कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं। साथ ही चल रहीं पशुओं की हड्डियां पकाने की भट्टियां वायु को भीषण रूप से प्रदूषित करके सांस लेना दूभर कर रही हैं। कत्लखानों से निकल रहे खून के परनालों और गंदगी मिश्रित पानी ने जमीन के नीचे के पाने को भी जहरीला बनाया है। भैंस के साथ-साथ काटे जा रहे गोवंश के कारण साम्प्रदायिक सौहार्द भी अनेक बार बिगड़ा है। पशुपालन विभाग के अनुसार प्रजनन के मुकाबले दोगुनी संख्या में काटे जाने के कारण पशु धन तेजी से कम हो रहा है। बीते पांच सालों में पशुओं की संख्या आधे से कम रह गयी है। साथ ही इस नाकारात्मक प्रभाव दूध की कीमतों पर पड़ा है जिससे दूध के दाम दोगुने से ज्यादा हो गये हैं। पशुओं के अवैध कटानों पर अगर जल्द ही अंकुश नहीं लगाया गया तो भविष्य में मामला हाथ से जाता दिख रहा है ! अवैध कटानो के चलते पशुओं की अच्छी नस्लें भी लुप्त होती जा रही हैं !


पशुधन बजट एवं व्यापरिक स्थिति  
भारत में पशुधन के आर्थिक एवं रोजगारपरक महत्व को देखते हुए पिछले कुछ सालों में केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा व्यापक स्तर पर बजटीय प्रावधान रखा गया एवं तमाम योजनाओं के माध्यम से पशुधन विकास को बल देने की दिशा में प्रयास भी किये गए हैं ! चुकि पशुपालन एवं दुग्ध विकास आदि राज्य सूची के विषय हैं अत: इस मामले में ज्यादा जवाब देही राज्य सरकारों की बनती है ! लेकिन इसका ये कतई यह मतलब नहीं है कि इस विषय पर बिलकुल मौन रहे ! दरअसल भारत की कुल राष्ट्रीय आय का 10 फीसद हिस्सा पशुधन से आता है अत: प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही पशुधन विकास के लिए बजटीय प्रावधान रखा गया था ! पशुधन के राष्ट्रीय महत्व को ध्यान मेंरखतेहुएपशुधनकेविकासकेलिएप्रथमपंचवर्षीययोजनाके अंतर्गत  8 करोड़रुपये कीराशिरखीगईथी ।समय के साथ-साथ इसराशि मेंउत्तरोत्तरवृध्दिही होतीगई। वर्तमान संदर्भ में अगर देखें तो वर्ष 2010-11 में पशुधन एवं दुग्ध विकास के लिए केन्द्र की तरफ से 1104 करोंड़ रूपये और वर्ष 2011-12 में 1243 करोंड़ रुपये खर्चे गए हैं ! हालाकि ग्यारहवी पंचवर्षीय योजना में पशुधन विकास दर का लक्ष्य 6 से 8 फीसद रखा गया था लेकिन तय लक्ष्यों तक नहीं पंहुचा जा सका और पशुधन विकास दर 4.8 फीसद की ही हासिल हो सकी ! लिहाजा बारहवीं पंचवर्षीय योजना में ऐसे प्रयास किये जा रहे हैं कि पशुधन विकास दर के पूर्व लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके ! इस दिशा में पहल करते हुए सरकारों द्वारा पशुधन विकास के लिए उपयोगी साबित होने वाली कई नीतियों पर काम किये जाने का प्रावधान रखा गया है ! बाराहंवी पंचवर्षीय योजना के तय लक्ष्यों को प्राप्त की चुनौतियों पर अगर एक नजर डालें तो पशु रोगों पर नियंत्रण,आहार और चारे की कमी,नस्ल सुधार के आधुनिक तकनीक संसाधनो की कमी, इस दिशा में प्रचार-प्रसार एवं प्रशिक्षण आदि की समुचित व्यवस्था कराना, बड़ी चुनौतियाँ भी हैं ! लेकिन इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए कई राज्यों की सरकारों की तरफ से व्यापक स्तर पर पहल शुरू की जा चुकी है ! उन्ही राज्यों से से एक राज्य छत्तीसगढ़ भी है जहाँ पशुधन विकास की दिशा में व्यापक काम हुआ है ! अगर देखा जाय तो भारत में पशुधन की वाणिज्यिक स्थिति अभी उस स्तर की नहीं हो पाई है जितने की दरकार है ! अगर व्यापारिक नजरिये से पशुधन विकास की दिशा में काम किया जाय तो बेहद अच्छे परिणाम आ सकते हैं ! फिलहाल बिना किसी व्यापरिक गुणवत्ता के ही वर्ष 2010-11 में पशुधन से कुल निर्यात 25 हजार 408 करोंड़ रुपये का हुआ था, तो अगर पशुधन को व्यापारिक महत्व दिया जाय तो इसमें और अधिक उत्थान होने की संभावना है !

पशुधन विकास में जरुरी कदम
आज सबसे ज्यादा जरूरी हो गया है कि  पशुधन की उन्नति के लिए सर्वप्रथम सुझाव है कि इसे उद्योग का दर्जा प्रदान किया जाए जिस प्रकार अन्य उद्योग अनेक प्रकार की सुविधाएं प्राप्त करते हैं उसी प्रकार यदि पशुपालन व्यवसाय को सुविधाएं प्राप्त होने लगे तो दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति कर सकेंगे । समय-समय पर पशु-प्रदर्शनियों एवं मेलों का आयोजन और पशुपालन व्यवसाय में लगे दक्ष लोगों को पुरस्कृत किया जाना चाहिए पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, दूरदर्शन आदि प्रचार माध्यमों से पशुपालन व्यवसाय से होने वाले लाभों से आम जनता को परिचित कराना चाहिए ताकि अन्य व्यक्ति पुशपालन व्यवसाय के प्रति आकर्षित हो सकें । पशु शक्ति बहुमुखी शक्ति है, भारतवासी इससे भली प्रकार से परिचित भी हैं, आवश्यकता है केवल इस ओर ध्यान देने की ।


पशु संपदा से प्राकृतिक और भौगोलिक रूप से संपन्न भारत में अगर नियोजित ढंग से पशुधन उद्द्योग पर ध्यान दिया जाय तो न सिर्फ कृषि बल्कि अन्य कई क्षेत्रों में इसके प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष फायदे दिखने लगेंगे ! अवैध कटानो पर कानूनी शिकंजा कसने के साथ-साथ पारम्परिक मूल्यों को भी सहेजने की जरुरत है ! गाय,भैंस आदि दुधारू पशु है अत: इनके कटान पर ठोस नियामक तय किये जायें एवं अवैध कटान करने वालों को दण्डित करने में देरी न की जाय ! भारत के लिए पशुधन विकास में नस्ल सुधार बड़ी जरुरत है ! अत: विदेशी दुधारू नस्लों को भारत लाकर भारत में उस नस्ल को बढ़ावा देने की दिशा में पुरजोर पहल किये जाने की जरुरत है ! यह पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक एवं प्रशिक्षण पर आधारित होनी चाहिए ताकि आम कृषक अथवा पशुपालक को भी पशुधन के सही उपयोग एवं महत्व का पता चल सके ! कृषि प्रधान देश भारत के लिए पशुधन का व्यापार न सिर्फ राष्ट्रीय स्तर की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बना सकता बल्कि लघु उद्द्योगों के तौर पर भी एक नई पहल साबित हो सकता है !

(इस लेख के कई हिस्से जनसत्ता के प्रकाशित लेख में संपादित हो सकते हैं लेकिन मूल लिखा हुआ लेख यही है)


बुधवार, 25 सितंबर 2013

एकता परिषद की बैठक में अनेकता के सुर : दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा लेख



  • शिवानन्द द्विवेदी सहर
साम्प्रदायिक तनावों एवं सामुदायिक विभाजनो को दूर करने के लिए बुलाई गयी
राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक खुद ही आपसी आरोप-प्रत्यारोप और सियासी छीटाकसी की भेंट चढती नजर आई ! राष्ट्रीय एकता परिषद की इस बैठक की पहली दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यही है कि सदभाव कायम करने के इस अहम मसलेपर बुलाई गयी बैठक में कई राज्यों के मुख्यमंत्री और कई राजनीतिक दलों के प्रमुख शामिल होने तक से परहेज कर लिए ! परम्पराओं एवं नियामकों के अनुसार राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में  पहले तक परिषद के सदस्यों एवं राजनीतिक दलों के प्रतिनिधी नेताओं के अलावा प्रत्येक राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल होते रहे हैं ! लेकिन इस बार हुई 16वी बैठक में मात्र सोलह राज्यों के मुख्यमंत्रियों का हिस्सा लेना एव शेष राज्यों के मुख्यमंत्रियों सहित कई दलों के आला नेताओं का इस बैठक से किनारा करना बेहद निराशाजनक कदम कहा जा सकता है ! सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात तो ये है कि मुज्जफरनगर मसले पर समाजवादी पार्टी सरकार पर आरोप-प्रत्यारोप गढ़ने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती के साथ-साथ प्रधानमंत्री पद के भाजपा घोषित उम्मीदवार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस बैठक से नदारद रहे !  हालाकि  राष्ट्रीय एकता परिषद की इस बैठक को लेकर सवालों की सुई उनके ऊपर तो उठती ही है जो इस बैठक को दरकिनार कर दिये लेकिन बैठक में शामिल हुए प्रतिनिधियों पर भी कम सवाल नहीं उठते हैं ! समाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता के नाम पर बुलाई गयी यह बैठक सियासत के दरारों में विभाजित होती दिखी और आरोप-प्रत्यारोप की भेंट चढ़ गयी ! राष्ट्रीय एकता के नाम पर बुलाई गयी इस बैठक के हासिल के तौर पर ना तो कोई आम सहमति के साथ आगे बढ़ने का निर्णय नजर आया और ना ही ऐसीकोई नीतिगत चर्चा ही नजर आई जिसके आधार पर इस बैठक की सफलता को प्रमाणित किया सकता हो ! सियासत से ऊपर उठते हुए आम सहमति की बजाय सभी शामिल प्रतिनिधी अपनी ढपली अपना राग का जाप करते नजर आये ! इस बैठक में शामिल प्रधानमंत्री सहित अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा बैठक में रखीगयी बातों पर अगर गौर करें तो उनके द्वारा दिये गए सभी बयान सिवाय अपनी सियासी कवायदों के कुछ नहीं नजर आयेंगे ! सभा की शुरुआत करते हुए ही प्रधानमंत्री द्वारा भाजपा और सपा पर निशाना साधने को बैठक की उद्देश्यों  के लिहाज से बेहद गलत शुरुआत कही जा सकती है ! सपा और भाजपा को निशाने परलेते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन द्वारा साम्प्रदायिक दंगो के प्रति केंद्र सरकार की जवाबदेही से साफ़ तौर पर किनारा करने को बेहद गैरजिम्मेदाराना बयानही कहा जाएगा जो कि इन नाजुक परिस्थितियों में एक देश के प्रधानमंत्री द्वारा उस समय तो नहीं ही दिया जाना चाहिए था  जब राष्ट्रीय एकता की बैठक बुलाई गयी हो । गौरतलब है कि बैठक की शुरुआत में ही प्रधानमंत्री ने साफ़ तौर पर कहा कि साम्प्रदायिक दंगो के लिए राज्य जिम्मेदार है केंद्र नहीं । लिहाजा जब प्रधानमंत्री द्वारा सभा की सियासी शुरुआत कर दी गयी तो भला बाक़ी लोग कैसे चुप रहें ! भाजपा के इकलौते शामिल हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंहचौहान ने अपनी पार्टी के बयानों को ही दोहराते हुए पुरे दंगे को तुष्टिकरण से जोड़ दिया तो वहीँ अखिलेश यादव  और नितीश कुमार ने धार्मिक उन्माद और साम्प्रदायिकता आदि का हवाला देकर भाजपा पर निशाना साधा ! इस पुरे बैठक में तकरीबन उतनी ही बातें बोली गयीं जितनी आम सभाओं या मीडिया में पहले से  बोली जाती रही हैं ! ऐसे में बड़ा सवाल है कि फिर इस विशेष बैठक का औचित्य क्या था और यह बैठक क्यों होनी चाहिए थी ?     दरअसल इस पुरे बैठक में सिवाय अपनी-अपनी सियासत पुख्ता करने के कुछ भी नही हुआ है !सही मायनों में अगर देखा जाय तो राष्ट्रीय एकता परिषद की इस बैठक में उन उपायों पर बात कीजानी चाहिए थी कि जिनके द्वारा दंगों के खिलाफ राजनितिक एवं प्रशासनिक एकजुटता  कायम की जा सकती हो ! सरकारी स्तर पर बुलाई गयी इस बैठक में एक मुख्यमंत्री और एक प्रधानमंत्री की प्रथम जवाबदेही अपने राज्य अथवा देश के प्रति होनी चाहिए जहां कि जनता ने उसे अपना जनादेश सौपा है न कि अपने राजनीतिक दल के प्रति । हाँ इस बैठक में दंगों को लेकर अपनी जवाबदेही तय करने का नैतिक साहस भले किसी में न दिखा हो लेकिंन सोशल मीडिया  पर दंगो का ठीकरा फोड़ने को लेकर एक अद्द्भुत राजनीतिक एका देखने को मिला । राष्ट्रीय एकता परिषद इस बैठक में सोशल मीडिया पर लगाम कसे जाने को लेकर क्या पक्ष औरक्या विपक्ष,सभी एकजुट नजर आये । पूरी बैठक में यही वो एकमात्र मुद्दा रहा जहां आपसी विरोधाभास नहीं देखा गया । बड़ा सवाल ये है कि जब भी कोई अप्रिय घटना होती है तो हमारे राजनितिक जमात द्वारा सोशल मीडिया को ही निशाना बनाकर ऐसे एकजुटता दिखाई जाती है मानो अमुक घटना के पीछे एक मात्र कारण सोशल मीडिया की व्यापकता ही हो । इस सन्दर्भ में इस बात को बेशक स्वीकारकिया जा सकता है कि सोशल मीडिया के माध्यम से अफवाह आदि को फैलाया जाता है मगर इसे इस स्तर पर भी नहीं स्वीकार किया जा सकता कि हमारी सरकार अपनी जवाबदेही को ताक़ पर रखकर सारा ठीकरा सोशल मीडिया पर फोड़ दें । फिलहाल इतना तो तय है कि अलग-अलग तरह के बहानो से सोशल मीडिया पर कवायदें तो चल ही रहीहैं ।खैर,जो भी हो फिलहाल दंगो पर भविष्य  में नियंत्रण रखने एवं संघीय स्तर पर एकजुटता के दिशा में कोइ साकारात्मक परिणाम आते नहीं दिख रहे सिवाय आपसी नूराकुश्ती के ।इस तरह की बैठक की औपचारिकताओं से ना तो दंगो के दंश से छुटकारा मिलता दिख रहा है ना ही साम्प्रदायिक सदभाव की दिशा में ही कोई राजनितिक इच्छा शक्ति को ही बल मिलता दिख रहा है ।  सही बात तो ये है कि हमारे रहनुमाओं में साम्प्रदायिक सदभाव कायम करने की नीयत ही नहीं है और वोआज भी इसे राजनितिक एजेंडे के तौर पर हवा देकर अपने वोटबैंक दुरुस्त करने में लगे हुए हैं । अगर वाकई साम्प्रदायिक सदभाव और राष्ट्रीय एकता के प्रति समर्पण भाव होता तो कम से कम 12 राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा इस बैठक का बहिष्कार नही किया गया होता और मायावती सरीखे उत्तरप्रदेश के नेता संयुक्त प्रयासों के इस पहल से किनारा करते नहीं नजर आते । ये सच है कि प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा समर्थित दावेदार होने के नाते नरेन्द्र मोदी इस बैठक से किनारा किये लेकिन बेहतर होता कि अगर वो भी इस बैठक में आकरअपनी बात रखे होते । भला यह देश उस व्यक्ति को बतौर अपना प्रधानमंत्री कैसे स्वीकार करेगा जो सौहार्द के इस मसले पर मंच तक आने से परहेज कर रहा हो । नरेन्द्र मोदी नही आये ये उनका राजनितिक फैसला है लेकिन दस्तूर और मौका यही कहता है कि उन्हें आना चाहिए था । खैर जो भी हो इतना तो तय है कि एकता केनाम पर बुलाई गयी इस बैठक में सबसे ज्यादा सियासी विभेद देखने को मिला जो कि राष्ट्रीय एकता के लिए अच्छे संकते के तौर पर नहीं देखा जा सकता है ।

मंगलवार, 24 सितंबर 2013

खूब खलेगी मोहन सिंह की कमी : डीएनए में प्रकाशित लेख



  • शिवानन्द  द्विवेदी सहर

ऐसे समय में जब उत्तरप्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार
मुज्जफरनगर मामले में पूरी तरह घिरी हुई है और उसके समाजवादी विचारधारा की शुचिता पर सवाल उठ रहे हैं,ऐसे में लोहिया और जनेश्वर मिश्र के पथ पर आजीवन चलने वाले तेज तर्रार समाजवादी नेता मोहन सिंह का जाना सपा के लिए अपूरणीय छति की तरह है ! समाजवादी पार्टी को पिछले तीन सालों में हुई पारंपरिक समाजवादियों के रूप में यह तीसरी छति है ! यों तो परिवाद के आरोपों से हमेशा दो-चार होती रहने वाली समाजवादी पार्टी में मोहन सिंह उन नेताओं में से एक थे जो सभी परिस्थितियों में अपने राजनितिक आदर्शों और समाजवाद की बुनियादी शर्तों के साथ जीवन यापन किये ! साठ के दशक में जब कांग्रेस विरोधी आंदोलन की बुनियाद रखी गयी थी और समाजवादी लेखक मधु लिमये सरीखे लोगों द्वारा इलाहाबाद में आंदोलन को समर्थन दिया जा रहा था, उस दौरान मोहन सिंह भी उस आंदोलन से जुड़ गए ! अपनी राजनैतिक कुशलता के  कारण ही सन 1968-69 में वो इलाहाबाद विश्वविद्द्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष भी चुने गये थे !   आज जब उत्तरप्रदेश की समाजवादी पार्टी सरकार के समक्ष तमाम विपरीत परिस्थितियां हैं और  लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती भी शुरू है, ऐसे में समाजवादी पार्टी के सबसे लंबे समय तक सचेतक के रूप में काम करने वाले मोहन सिंह की कमी ना सिर्फ खलेगी बल्कि उसका असर चुनावों में भी दिखेगा !  मोहन सिंह काफी समय से देवरिया सदर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ते और चुने जाते रहे हैं, जहाँ उनका सीधा मुकाबला भाजपा से होता रहा है ! हालाकि पिछली बार यह समीकरण टूट गया था और देवरिया सीट बसपा के खाते में चली गयी थी,लिहाजा उन्हें राज्यसभा में बैठना पड़ा था ! ओजस्वी वक्ता और कद्द्वारा नेता के रूप में ख्यातिलब्ध मोहन सिंह के राजनैतिक आदर्श भी बेहद साफ़-सुथरे रहे हैं और वो कभी भी ना तो खुद को समाजवादी पार्टी के ऊपर खड़ा करने की कोशिश किये और ना ही कभी अपने राजनैतिक मूल्यों के साथ समझौता करते ही देखे गए हैं ! अभी एक साल ही हुए जब डीपी यादव मामले में अखिलेश कि खिलाफत करने के कारण उन्हें पार्टी के प्रवक्ता पद से हटा दिया गया था उस दौरान भी वो कद्दावर नेता चुप रहा था ! हालाकि मोहन सिंह के जाने से अगर सबसे ज्यादा प्रभावित कोई जगह है तो वो है देवरिया लोकसभा सीट ! मोहन सिंह के अत्यंत करीबी बताते हैं हैं कि मोहन सिंह अपनी राजनितिक विरासत अपनी बेटी कनकलता को सौपना चाहते थे और इसकी शुरुआत पिछले साल कई कार्यक्रमों में हो भी चुकी थी ! शायद मोहन सिंह की ऐसी इच्छा रही हो कि उनकी पुत्री कनकलता को उनके लोकसभा सीट देवरिया से आगामी लोकसभा चुनाव में टिकट दिया जाय लेकिन ऐसा हो नहीं सका ! कारण जो भी हों लेकिन देवरिया लोकसभा सीट से कनकलता को टिकट ना मिलने के बावजूद मोहन सिंह कभी इस मामले को सार्वजनिक नहीं किये जबकि इसी समाजवादी पार्टी में खून के रिश्तों में ही पिता,पुत्र और बहु तीनो राजनीति में घुसाए गए हैं ! फिलहाल मोहन सिंह के आकस्मिक मृत्यु के बाद देवरिया के समीकरण थोड़े बदलते से दिख रहे हैं और अपने राज्यसभा के अधूरे कार्यकाल में ही परलोक सिधार गए मोहन सिंह की पारंपरिक सीट पर सहानुभूति के आधार पर शायद कोई बड़ा फेरबदल देखा जाय ! मोहन सिंह के निधन की खबर आते ही देवरिया शहर में ना सिर्फ शोक की लहर दौडी बल्कि राजनितिक कयासबाजियां भी तेज हो गयीं ! चुकी, देवारियां लोकसभा सीट पर बसपा ने ब्राह्मण कार्ड खेलकर कमलेश शुक्ल को अपना उमीदवार घोषित किया है एवं सपा ने पूर्व आईएएस रामेन्द्र त्रिपाठी को उम्मीदवार घोषित किया है ! भाजपा ने अपने पत्ते अभी नहीं खोले हैं लेकिन देवरिया सीट के लिए पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सूर्यप्रताप शाही और पूर्व सांसद श्री प्रकाश मणि त्रिपाठी के बीच रस्साकसी की अंदरूनी ख़बरें देवारियां की सडकों पर आम हैं ! अगर वर्तमान स्थिति के आधार पर आगमी चुनाव का आकलन करें तो रामेन्द्र त्रिपाठी की स्थिति बेहद नाजुक है और वो यहाँ से तीसरे नम्बर पर रह सकते हैं जबकि सीधी लड़ाई भाजपा और बसपा के बीच होनी है ! अब जब मोहन सिंह जो कि देवरिया से सपा के प्रत्याशी हुआ करते थे उनके निधन की सहानुभूति के तौर पर उनकी अंतिम इच्छा पूरी करते हुए रामेन्द्र त्रिपाठी का टिकट काट दिया जाता है और कनकलता को टिकट दिया जाता है तो समीकरण पूरी तरह से पलट जायेंगे ! हालाकि अंदरूनी तौर पर ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि रामेन्द्र त्रिपाठी को बैठना पड़ेगा क्योंकि पिछली बार गँवा चुकी इस लोकसभा सीट को पुन: मोहन सिंह के विरासत के रूप में उनकी पुत्री को देने से समाजवादी पार्टी को भी परहेज नहीं होगी ! मोहन सिंह की व्यक्तिगत और पारिवारिक दोनों छवियाँ बेहद साफ़-सुथरी रही हैं अत: सपा मौके की नजाकत को देखते हुए कनकलता को टिकट दे सकती है !
     फिलहाल भविष्य में जो भी लेकिन मोहन सिंह के आकस्मिक निधन से देश की समजवादी विचारधारा को एक बड़ा नुकसान हुआ है जिसकी भारपाई वाकई संभव नहीं है ! मोहन सिंह उस दौर में समाजवादी पार्टी के साथ जुड़े जब समाजवादी पार्टी की बुनियाद रखी जा रही थी और अखिलेश सरीखे समाजवादी नेता तब बहुत छोटे-छोटे बच्चे होंगे ! लेकिन समाजवाद के नाम पर परिवारवाद का ऐसा दुष्चक्र पैदा हुआ कि समाजवाद का झंडा उठाने वाले कैडर नेता हाशिए पर चले गए और अखिलेश सरीखे नए और अनुभव हीन चेहरे सत्ता पर आसीन हो गए ! छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्र और समाजवादी  बी के तिवारी की कतार को बढाने वाले मोहन सिंह के निधन ने फिलहाल इस कतार को विराम दे दिया है और उत्तप्रदेश की समाजवादी पार्टी में अब कोई समाजवादी बचा है ऐसा नहीं कहा जा सकता ! अगर वाकई समाजवाद अपनी शुचिता के साथ कायम होता तो मुख्यमंत्री जैसे पदों पर मोहन सिंह और जनेश्वर मिश्र जैसे लोग एक बार जरुर पहुचे होते ! जिस राज्य में कई बार समाजवादी पार्टी की सरकार बनी हो और वहाँ एक बार भी कोई पारंपरिक समाजवादी मुख्यमंत्री ना बन पाया हो तो इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा ! मुलायम सिंह बेशक समाजवादी राजनीति के प्रणेता रहे हों लेकिन अब वो किसी भी नजरिये से समजवादी नहीं रहे और परिवारवाद से ग्रसित एक कुटिल राजनेता बन चुके हैं ! मोहन सिंह जैसे नेता वाकई सच्चे समाजवादी थे और उनका जाना किसी राजनितिक दल और किसी लोकसभा सीट से ज्यादा एक विचारधारा और एक आंदोलन की छति है जिसको कभी पूरा नहीं किया जा सकता !

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

अमेरिकी हार है सीरिया युद्ध का टलना : दैनिक जागरण नेशनल में प्रकाशित

  • शिवानन्द  द्विवेदी सहर
हाल ही में सीरिया द्वारा रासायनिक हथियारों का प्रयोग किये जाने को
मुद्दा बनाकर अमेरिका द्वारा सीरिया पर हमला करने का एलान किया गया जिसका अन्तराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक विरोध देखा गया । सीरिया पर हमले को लेकर अमेरिका द्वारा ये दलील दी जाती रही कि सीरिया द्वारा रासायनिक हथियारों का प्रयोग किया गया है जिसमे हजारों लोग मरे हैं और इससे विश्व में शान्ति का संकट पैदा हो सकता है । सीरिया मुद्दे पर अमेरिकी हस्तक्षेप का आलम यहाँ तक पहुच गया कि अमेरिका द्वारा कई युद्ध पोत और युद्ध सामग्री सीरिया सीमा की तरफ समुद्री मार्ग से भेज दी गयी । इस पुरे मसले पर अमेरिका द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका की भी परवाह न के बराबर ही की गयी । हालाकि इस मामले में सबसे पहले हस्तक्षेप करते हुए दुनिया की एक अन्य महाशक्ति रूस ने अमेरिका से अपील की कि उसे सीरिया पर हमले को लेकर इस कदर उग्र नहीं होना चाहिए । रूस के अलावा चीन और ब्रिटेन भी अमेरिका द्वारा सीरिया पर हमला करने के पक्ष में नहीं दिखे और अपना विरोध दर्ज कराये । दरअसल इस पुरे मामले को केवल रासायनिक हथियारों के प्रयोग पर अमेरिकी आपत्ति के लिहाज से देखना प्रासंगिक नहीं प्रतीत होता । अगर देखा जाय तो सोबियत संघ के विघटन के बाद एक ध्रुवीय विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति के रूप में उभरी अमेरिका की नीति सदैव से ही विश्व की आर्थिक एवं प्राकृतिक संपदाओं के श्रोतो पर अपने नियंत्रण को कायम करने की रही है । अमेरिका द्वारा इसी नीति के तहत मानवाधिकार एवं लोकतंत्र की स्थापना के नाम पर ईराक का युद्ध भी लड़ा गया था । दरअसल ईराक युद्ध में भी अमेरिका की नजर ईराक में अकूत मात्रा में उपलब्ध तेल पर थी ।अंतराष्ट्रीय सुरक्षा, मानवाधिकार एवं लोकतांत्रिक मूल्यों का हवाला देकर अमेरिका द्वारा हमेशा से ही अपनी शक्ति का दुरूपयोग किया जाता रहा है और अपनी तानाशाही दिखाई जाती रही है । बहरहाल इस पुरे मामले में युद्द की जिद पर अड़े अमेरिका पर रूस और चीन ने दबाव बनाते हुए इस बात की पुरजोर पहल की कि इस सीरिया के रासायनिक हथियारों के प्रयोग करने के मसले को युद्ध की बजाय अन्य विकल्पो से सुलझाया जाय । हालाकि अमेरिका को लेकर कमोबेश हर मसले पर रूस और चीन का स्पस्ट विरोध देखा जाता है । चीन और रूस द्वारा अमेरिका ले विरोध का सबसे बड़ा कारण ये है की क्षेत्रफल और शक्ति सम्पन्नता के लिहाज से दोनों अमेरिका के प्रतिस्पर्धी हैं । विघटन से पूर्व तो रूस की अंतर्राष्ट्रीय शक्ति क्षमता अमेरिका के समानांतर हुआ करती थी । सीरिया पर हमला करने के वास्तविक मंसूबों को बारीकी से समझते हुए रूस ने इस बात के लिए पुरजोर पहल की कि जैसे भी हो इस युद्ध को टाला जा सके । चूकी रूस यह बखूबी जानता है अमेरिका द्वारा जब भी कहीं हमला किया जाता है तो यह अमेरिका के लिए फायदेमंद साबित होता है । सीरिया पर अमेरिकी हमले को टालने के लिए प्रतिबद्ध रूस ने अन्तराष्ट्रीय पहल करते हुए सीरिया के राष्ट्रपति बल अशर असद  को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वो अपने रासायनिक हथियार अंतराष्ट्रीय समुदाय को सौप दे और रासायनिक हथियारों के निषेध संधि पर हस्ताक्षर करते हुए इस समुदाय की सदस्यता ग्रहण कर ले । गौरतलब है कि सीरिया अबतक उन सात देशों में था जो इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किये थे । अमेरिकी तानाशाही के मंसूबों पर पानी फेरते हुए रूस ने न सिर्फ दुनिया को एक युद्ध से निकाला है बल्कि अपनी अंतराष्ट्रीय समझदारी के तहत अमेरिकी नीतियों को खारिज भी कराया है । गौर करना होगा कि कई मामलों में देखा गया है कि जब किसी तरह की कोई असंतुलित करने वाली अंतराष्ट्रीय घटना होती है तो सबसे पहले युद्ध की जल्दी अमेरिका ही दिखाता है । लेकिन सीरिया के मसले में रुसी हस्तक्षेप ने अमेरिकी मंसूबों को अपनी कूटनीतिक पैतरों से धुल चटाने का काम किया है । सीरिया पर हमले को लेकर अपना खुला विरोध दर्ज करा रहे रुसी विदेश मंत्री सर्गेइ लावरोव ने अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी से मुलाक़ात में इस बात का दबाव बनाया कि अमेरिका युद्ध को लेकर इतना अधिक जल्दीबाजी न दिखाए । रुसी विदेश मंत्री द्वारा की गयी इस मुलाक़ात को अमेरिकी मनमानी पर नकेल कसने की कवायद के रूप में देखा जाना चाहिए । आज पुरे विश्व को यह समझने की जरूरत है कि अपने निजी हितों एवं वैश्विक सर्वोच्चता को कायम रखने के लिए अमेरिका किसी ना किसी बहाने उन देशों को निशाना बनाने का प्रयास करेगा जिनसे वो संसाधनों का मनमाना दोहन कर सके और अपनी सर्वोच्चता का झंडा बुलंद कर सके । हालाकि सीरिया को लेकर रूस का रुख इस बात का सुबूत है कि अब अमेरिकी तानाशाही को कुटनीतिक चुनौतियाँ मिलने लगी हैं और उसका यह मनमाना व्यवहार दुनिया को स्वीकार्य नहीं है । रूस की पहल पर टाले गए इस युद्ध को अमेरिकी तानाशाही की हार और विश्व शान्ति की स्थापना में रूस और सीरिया की जीत के तौर पर देखा जाना चाहिए । चुकि सीरिया के मामले में अमेरिका द्वारा सीरिया पर रासायनिक हथियारों के समर्पण का दबाव कभी नहीं बनाया गया बल्कि शुरू से ही अमेरिका का युद्धोन्मादी चेहरा सामने आता रहा । अमेरिका का गाहे-बगाहे  उभरता रहने वाला यही युद्धोन्मादी चेहरा इस बात की तस्दीक करता है कि अमेरिका शान्ति और शक्ति संतुलन की बजाय निजी हितों की लडाइयां लड़ता रहा है । आज सीरिया पर युद्ध का गहराता संकट अगर टल गया है तो इसे अमेरिकी मंसूबों की शिकस्त एवं सीरिया के जीत रूप में देखने की जरुरत है ।      

वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव से हुई किताब चर्चा : नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

रविवार, 8 सितंबर 2013

कुछ पूछती तो कुछ बताती कवितायें : दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरी समीक्षा











  • शिवानन्द  द्विवेदी सहर
लन्दन में रह रहीं संस्मरण लेखिका शिखा वार्ष्णेय संस्मरण के अलावा कविताएं भी
लिखती हैं,ये बात मुझे तब पता चली जब उनकी कविता संग्रह “मन के प्रतिबिम्ब” मुझे पढ़ने को मिली ! कुल इक्यावन कविताओं वाले इस कविता संग्रह की हर कविता के पास अपनी भाव-संपदा,कथ्य-सम्पदा तो है ही साथ ही साहित्य की काव्य विधा के हर मानक पुष्ट होते नजर आते हैं ! वैसे यह पूरा काव्य संग्रह दो तरह की कविताओं में वर्गीकृत होता है ! इस काव्य संग्रह की कुछ कवितायें समाज से,खुद से और अनाम किसी से कुछ सवाल पूछती हुई आगे बढ़ती हैं तो कुछ ऐसी भी कवितायें भी हैं जो जवाब के रूप में बहुत कुछ बताती नजर आती हैं ! कविता संग्रह की तीसरी कविता “चीखते प्रश्न” की अगर बात की जाय तो वाकई यह कविता एक जीवंत सवाल की तरह समाज से टकराती नजर आती है ! बेहद सहज और सरल शब्दों में भारतीय महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी मांगती कविता “चीखते प्रश्न” निश्चित तौर पर इस कविता संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कविताओं में से एक है-

          कैसे कहूँ मै भारतीय हूं
              क्यों करूँ मै गुमान
आखिर किस बात का
जो इन्डियन शब्द निकलते ही
लग जाते हैं पीछे ...
वही न,
जहाँ रात तो छोड़ो
दिन में भी महिलाएं
नहीं निकल सकतीं घर से ?
एक लेखक अथवा एक कवि का पहला दायित्व ये होता है कि वो अपने सृजन के प्रति ईमानदार बने और अपने शब्दों और भावों के बीच सुन्दर और गैर-बनावटी समन्वय स्थापित करते हुए अपनी कृति को देशकाल और समाज के बने सांचों में कहीं ना कहीं फिट कर सके ! इसमें भी कोई संदेह नहीं कि कविता कभी भी कथन नहीं हो सकती अथवा कुछ कह देना मात्र ही कविता के मानकों को पुष्ट नहीं कर सकता ! सही अर्थों में देखा जाय तो कथ्य और भाव को जब किसी परिस्थिति से जोड़ लेने में कवि सफल जाता है तो कविता भी सफल हो जाती है ! मन के प्रतिबिम्ब कविता संग्रह में लेखिका ने अपनी कविता “प्रलय...बाकी है” के माध्यम से समाज के एक कुरूप चेहरे को बड़ी साफगोई से दिखा पाने में सफल होती हैं-
          तभी प्रकट हुई एक टोली
          वहशी,दानवों से वे भोगी
          इंसानों के इस दुनिया में
          पशुवत,कुंठित व मनोरोगी
          पल भर में बदल गया दृश्य
          क्षत-विक्षत पड़ी वो भोली !! (दामिनी प्रकरण पर)
मन के प्रतिबिम्ब कविता संग्रह की कवितायें ऐसी भी हैं जो सवाल और समाधान के बीच के टकरावों में समाधान के गुंजाइशों की एक किरण ना सिर्फ तलाश पाने में सफल होती हैं बल्कि समाज को संकेतों में ही उन गुंजाइशों से अवगत भी कराती हैं ! यह कहने में पाठक को कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि लेखिका द्वारा रचित कविता “यतीम” हमारे वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों के नजरिये से बेहद प्रासंगिक और यथार्थ के करीब प्रतीत होती है ! यतीम कविता का पहला चरण भारत के अनाथ बच्चों की दुर्दशा का सजीव और मार्मिक चित्रण करता है तो वही अपने प्रारब्ध तक जाते-जाते यह कविता इस समस्या के समाधान के कई साकारात्मक-नाकारात्मक पहलुओं को करीब से छुती नजर आती है –
          एक रात वहीँ
          कोई टोकरी में छोड़ गया था उसे,
          शायद अँधेरे में
          उसका रंग और मुस्कान
          नजर न आये हों उन्हें
          पर आज तो धुप है गहरी
          सब दिखेगा साफ़-साफ़
          यक़ीनन आज उसकी बारी है
          नए मम्मी पापा मिलने की....
भारतीय समाज और देशकाल से जुड़ी इन सभी कविताओं का लेखन लन्दन में रह रहीं लेखिका द्वारा होना भी सामाजिक जुडाव का एक अद्दभुत कौशल है ! इन कविताओं में ना तो किसी तरह का कोई बनावटीपन ही है और ना ही इनमें शाब्दिक जटिलता है ! ये कवितायेँ कुछ यूँ हैं मानो लिखी और प्रस्तुत नहीं की गयीं हों बल्कि परोसी गयी हों ! वाकई एक कविता पाठक से तभी जुड़ पाती है जब वो परोसी जाय ! इन तमाम कविताओं के अलावा भी तमाम कवितायें जैसे- मै तेरी परछाई हूँ,बर्फ के फाहे,गूंगा चाँद,मै बनाम हम, यही होता है रोज, इस पुरे कविता संग्रह की महत्वपूर्ण कवितायें हैं ! एक कविता “किस रूप में चाहूँ तुझे मै” में लेखिका श्रृंगार और विछोह के बीच मद्धम गति से चलने वाली उस नाव की नाविका बन जाती हैं जो किनारों को तलाशती तो है मगर किनारों का हर रूप उसे पसंद नहीं आता ! निश्चित तौर पर अपनी इक्यावन कविताओं के साथ यह कविता संग्रह “मन के प्रतिबिम्ब” एक सफल कृति है ! इस कविता संग्रह की सबसे बड़ी खासियत इसका भोलापन है ! जटिलताओं के दौर में उलझती आज की नई कविताओं के बीच कोई सीधी-साधी और भोली-भाली कविता मिल पाने अन्यत्र जितना मुश्किल है, यहाँ उतना ही आसान ! अपनी तमाम साकारात्मक पहलुओं को सहेजे यह कविता संग्रह खुद को स्वत: ही एक सफल किताब की शक्ल में तब्दील कर लेता है ! लेखिका की एक कविता से ही यह पूरा विश्लेषण पुष्ट होता नजर आता है अत: मै उसी कविता को यहाँ रखते हुए  शुभकामनाओं के साथ अपनी बात खतम करता हूँ-
          कभी देखो इन बादलों को
          जब काले होकर आसुओं से भर जाते हैं,
          तो बरस कर इस धरा को ढो जाते हैं
          कभी देखों इन पेड़ों को
          पतझड के बाद भी
          फिर फल-फुल से लड़ जाते हैं,
          कभी देखो इन नदियों को
          पर्वत से गिरकर भी,
          चलती रहती हैं !!.......................समाप्त