शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

पहले भी आईं हैं वालमार्ट की करतूतें सामने : दैनिक जागरण में प्रकाशित लेख







सरकार की कोशिशों और घटकों  के सहयोग से खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश विधेयक को दोनों सदनों से पास करा लिया गया ! एफ.डी.आइ पास होने के बाद अब खुदरा व्यापार में वालमार्ट के सीधे निवेश की सारी अडचनों को विराम लग गया है  !खुदरा व्यापार के क्षेत्र में  जिस वालमार्ट की अगुवानी करने को सरकार सालों से बेताब दिख रही थी उस वालमार्ट का आना भी अब तय हो चुका है ! वालमार्ट के भारत में निवेश करने से होने वाले फायदों की जो फेहरिश्त सरकार द्वारा दिखाई जाती रही है उसमें किसानो और बेरोजगारों को होने वाले फायदे के साथ-साथ आर्थिक सुधार की जरूरतों को प्रमुखता से रखा गया  हैं ! एफ.डी.आइ और वालमार्ट के आने से होने वाले फायदों को बताने के लिए सरकार द्वारा गढे गए तमाम कसीदों को संदर्भ में रख कर अगर समझने का प्रयास किया जाय तो हमें सबसे पहले वालमार्ट के निवेश की मूल धारणा एवं उद्देश्यों को समझना होगा ! इतना तो तय है कि वालमार्ट का खुदरा व्यापार के क्षेत्र में भारत में निवेश करना पूर्णतया व्यवसायिक है, और ऐसा भी नहीं है कि वालमार्ट द्वारा भारत में ये कोई पहला निवेश किया जाना है या इसके पहले वालमार्ट ने भारत में काम नहीं किया है ! हा, प्रत्यक्ष तौर पर सीधा निवेश का रास्ता साफ़ ना होने की वजह से आज के पहले  वालमार्ट जैसी कम्पनियाँ भारत में साझेदार के रूप में निवेश करती रही हैं ! अभी हाल ही के साल में पंजाब में भारती समूह के साथ साझीदारी में इसी वालमार्ट ने किसानो के साथ एक करार किया जिसमे किसानो को तमाम लुभावने सपने दिखाए गए ! इस करार के तहत किसानो द्वारा उत्पादित बेबीकार्न(शिशु मक्का) को कंपनी द्वारा करार में निर्धारित मूल्यों पर खरीदे जाने का प्रावधान रखा गया था !  इस करार में ऐसा कहा गया कि किसानो द्वारा उत्पादन किये गए बेबोकॉर्न  को  वालमार्ट द्वारा आठ रुपया प्रतिकिलो के दर से खरीद लिया जायेगा ! वालमार्ट के साथ हुए इस करार में  किसानो को अच्छा मुनाफा होने की संभावना नजर आयी और उन्होंने इस करार के तहत भारी मात्रा में बेबीकार्न उत्पादन का काम शुरू किया ! उत्पादन के बाद तय करार के अनुसार वालमार्ट-भारती द्वारा उनके उत्पादों को करार में तय आठ रुपये प्रति किलो की दर से खरीद लिया गया ! वालमार्ट-भारती द्वारा किसानो से आठ रुपये की दर से खरीदे गए बेबीकार्न को पंजाब के ही शहरों में १०० रुपये प्रति किग्रा की दर से बेचकर भारी मुनाफे कमाया जा रहा है  जबकि किसानो के हाथ मुनाफे के नाम पर २ से ३ रुपये प्रति किग्रा हाथ लग पाया रहा है !
पंजाब के किसानो के साथ हुए इस करार और इसके परिणामों को आधारभूत मानकर अगर खुदरा व्यापार में वालमार्ट के आने से किसानो को होने वाले फायदों की संभावना को तलाशा जा रहा  तो ऐसा कतई नहीं लगता कि मुनाफे के उद्देश्यों से बाजार को हथियाने की भागमभाग में दौड़ रहीं ये विदेशी कम्पनियाँ भारतीय किसानो के हितों के अनुकूल कही से भी काम करेंगी ! एक कंपनी अगर किसानो से खरीदे गए उत्पादों को खरीद मूल्य से दस गुनी कीमत पर उसी बाजार को बेचती है तो कहीं ना कहीं सवाल कंपनी की नीयत और देश की बहुसंख्यक आम जनता के के हितों में उसकी भूमिका पर उठना लाजिमी है ! वालमार्ट जैसी कंपनी का अगर कुल कारोबार देखें तो भारतीय खुदरा बाजार के स्थानीय निवेशकों की हालात तुलनात्मक रूप से बहुत ही नाजुक प्रतीत होती है ! किसी भी नजरिये से ऐसा नहीं प्रतीत होता कि लगभग ५०० अरब डॉलर प्रति वर्ष का कारोबार करने वाली वालमार्ट से हमारे स्थानीय खुदरा निवेशक मुकाबला कर पायेंगे ! वालमार्ट के विश्व स्तरीय आधारभूत संरचना पर अगर नजर डाले तो इस कंपनी का खुदरा व्यापार के क्षेत्र में दुनिया के १५ देशों में लगभग साढे आठ हजार बड़े स्टोर्स हैं जबकि भारत के थोक व्यापार में भारती समूह के साथ भी इस कंपनी का निवेश है जो बेस्ट प्राइस के नाम से चल रहा है !
भारतीय कारपोरेट जगत के निवेशको से अगर वालमार्ट के बाजार की तुलना की जाय तो भी  वालमार्ट की पहुँच को पकडना दूर की कौड़ी साबित होता दिख रहा है ! भारतीय बाजार के सर्वोच्च  दस मुनाफा कमाने वाली कंपनियों का कुल मुनाफा भी वालमार्ट के कुल मुनाफे के सामने कहीं ठहरता नहीं दिख रहा ! ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारतीय कम्पनियाँ वालमार्ट से प्रतिस्पर्धा कर पाने में अधिक दिनों तक सक्षम रह पाएंगी ? इस संदर्भ में इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि प्रतिस्पर्धा में असंतुलन की स्थिति से बाजार में वालमार्ट के वर्चस्व की स्थिति ना उत्पन्न होने लगे ! भारत में खुदरा बाजार का कुल कारोबार भी वालमार्ट के अकेले के कारोबार से कम है ! अत: इस बात से बिलकुल इनकार नहीं किया जा सकता कि वालमार्ट अगर भारत में निवेश करेगा तो अपनी पूँजी को मुनाफे में बदलने के सारे हथकंडे आजमाने की तैयारी के साथ आएगा ! हाल ही में भारत में निवेश करने से पहले लाबिंग के नाम पर वालमार्ट द्वारा दिये गए १२५ करोंड़ के खर्च के ब्योर को अन्यथा नहीं लिया जाना  चाहिए ! लाबिंग के नाम पर खर्च किये गए इस बड़ी धनराशि से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में वालमार्ट द्वारा किस  स्तर तक बाजार में उतरने का प्रयास किया जा सकता है ! इसमें कोई दो राय नहीं कि बाजार फतह करने की होड़ में वालमार्ट जैसी कम्पनियाँ निश्चित तौर पर स्थानीय खुदरा व्यापारियों के लिए मुसीबत का सबब बन सकती है ! वर्तमान में भारतीय खुदरा बाजार में लगभग डेढ़ करोंड़ के आस-पास निवेशक है और इनका कुल निवेश ३५० अरब डॉलर का है ! ५०० अरब डॉलर का अकेले कारोबार करने वाली वालमार्ट का बाजार अकेले भारत के कुल खुदरा बाजार से बड़ा नजर आता है ऐसे में भारत का असंगठित खुदरा बाजार वालमार्ट के मुकाबले टिक पायेगा ,ऐसा मुश्किल ही लगता है !
            बाजार,अर्थवयवस्था और आम जनता के नजरिये से अगर वालमार्ट के खुदरा क्षेत्र में निवेश को समझने का प्रयास किया जाय तो तमाम ऐसे तथ्य निकाल कर सामने आते हैं,जो कि आम किसान अथवा छोटे निवेशकों के लिए चिंताजनक प्रतीत होते ! सबसे पहला तथ्य ये है कि बेशक हम वालमार्ट के निवेश में भारतीय अर्थव्यवस्था के बेहतरी की संभावनाओं को तलाश रहे हैं लेकिन खुदरा बाजार में  विदेशी निवेश को इस नजरिये से भी देखना होगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि एक समय ऐसा आ जाए कि समूचा खुदरा बाजार वालमार्ट के इर्द-गिर्द चक्कर काटता नजर आये और खुदरा बाजार पर वालमार्ट का एकक्षत्र राज्य कायम हो जाय ! किसी भी बाजार पर किसी निवेशक की संप्रभुता का कायम हो जाना बाजार को जनविरोधी बना देता है और जनता बाजार से त्रस्त होने लगती है ! बेशक वालमार्ट अत्यन्त छोटे शहरों या निचले दुकानदारों को तुरंत प्रभावित ना करे लेकिन ऐसा भी नहीं है एक समय बाद जब वालमार्ट का बाजार पर वर्चस्व कायम हो जायेगा तो इससे निचले स्तर के खुदरा व्यापारी हुए बिना रह पायेंगे ! साथ ही इस सच्चाई को तो सरकार नहीं नकार सकती कि हमारे बड़े शहरों में भी गरीबी और बेघरी जैसी समस्याएं आज भी कायम हैं ! ऐसे में अगर दिल्ली जैसे शहरों में भी खुदरा व्यापार के क्षेत्र में वालमार्ट का वर्चस्व कायम हो जाय और अन्य निवेशक बाजार से बाहर हो जाय तो गरीब तबके से आने वाले बहुसंख्यक समुदाय का क्या होगा ? अंतर्राष्ट्रीय बाजार के आंकड़ों के ग्राफ पर बेशक हम वालमार्ट जैसी विदेशी कंपनियों के सहारे कीर्तमान रचते नजर आयें  लेकिन देश के  वर्तमान आंतरिक हालात के नजरिये से तो ये बिलकुल उचित नहीं प्रतीत होता है ! वालमार्ट का बाजारवादी वर्चस्व बेशक देश के अल्पसंख्यक उच्च वर्ग के लिए फायदे का सौदा नजर आ रहा हो लेकिन देश का बहुसंख्यक मध्यम एवं निम्न वर्ग तो इस बाजारवादी वर्चस्व के कारण हाशिए पर ही जाता नजर आ रहा है ! चाहे वो पंजाब का किसान हो या यू.पी ,बिहार का बेरोजगार !!

शिवानन्द द्विवेदी “सहर”

देवनागरी बनाम रोमन के दुष्चक्र : राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित लेख




कोई भी भाषा किसी न किसी लिपि पर निर्भर जरुर होती है लेकिन कोई खास लिपि किसी भाषा के लिए अनिवार्य है या नहीं इस विषय पर वृहद स्तर पर बहस चल रही है ! भाषा और लिपि दोनों एक दूसरे से करीब से संबद्ध होने के बावजूद भाषाई तकनीक के दृष्टिकोण से बहुत अलग-अलग तथ्य है एवं दोनों के अलग-अलग मायने हैं, अलग-अलग परिभाषाएं हैं ! एक तरफ जहाँ लिपि और भाषा को लेकर बहुसंख्यक शिक्षित वर्ग में भ्रम की स्थिति देखने को मिलती है तो वहीँ भाषा की बारीकियों को करीब से समझने वाले भाषाविदों के बीच भी यह हमेशा एक बहस का विषय रहा है ! हिन्दी के संदर्भ में अगर लिपि और भाषा को समझने का प्रयास करें तो जहाँ हिन्दी एक संपन्न भाषा के तौर पर प्रतिष्ठित है तो वहीँ देवनागरी इस भाषा की सबसे सहज और तटस्थ  लिपि के तौर पर जानी जाती है ! इसमे कोई दो राय नहीं कि  अपने भाषाई विकास के शैशव काल से ही हिन्दी को देवनागरी में ही लिखे जाने की सर्वमान्य परम्परा रही है और हिन्दी के लिए देवनागरी को सबसे अनुकूल लिपि के तौर पर स्वीकार किया गया है ! लेकिन जैसे-जैसे प्रद्द्योगिकी और तकनीक के त्वरित विकास ने जनसंचार एवं लेखनी को प्रभावित करना शुरू किया हिन्दी में लिपि को लेकर एक नयी बहस ने जन्म ले लिया ! तकनीक के रास्ते सहूलियत तलाशने की होड़ में भागते वर्तमान समाज ने हिन्दी लेखनी में देवनागरी की बजाय रोमन को ज्यादा आसान और सहज उपलब्ध माध्यम मानना शुरू कर दिया ! आज हिन्दी लेखनी के संदर्भ में मूल देवनागरी बनाम रोमन की बहस ने भाषाविदों को भी दो अलग-अलग धड़ों में बांट दिया है और इस बहस को ज्वलंत किया है ! हिन्दी के लिए प्रयुक्त लिपि के संबंध में एक धड़ा यह मानता है कि हिन्दी के अंतरराष्ट्र्रीय स्तर पर प्रचार-प्रसार एवं  विकास की दिशा में तकनीक के आधुनिक संसाधनों एवं वैश्विक मंचों पर देवनागरी लिपि की जटिलता बाधक साबित हो सकती है जबकि रोमन लिपि के माध्यम से हिन्दी को ज्यादा सहजता से प्रचारित किया जा सकता है ! भाषा के जानकारों का यह समूह इस बात पर बल देता है कि तकनीकी विकास के अनुरूप तेज़ी से बदलते सामाजिक एवं शैक्षिक वातावरण में हिन्दी लेखनी में रोमन लिपि को स्वीकार करना हिन्दी के वैश्विक स्तर पर प्रसार के लिए सबसे कारगर उपाय साबित हो सकता है ! हिन्दी को देवनागरी के दायरे में बाँध कर रखना भाषाई दृष्टिकोण से हिन्दी को अंतरर्राष्ट्रीय स्तर पर सीमित और संकुचित बनाता है ! वहीँ देवनागरी को हिन्दी भाषा के लिए सबसे उपयोगी लिपि को मानने वाला दूसरा तबका हिन्दी लेखन में रोमन स्वीकृति को हिन्दी के भाषाई व्याकरण एवं शब्द संरचना के दृष्टिकोण से अनुचित मानता है ! देवनागरी के समर्थकों का मानना है कि किसी भी भाषा को बेशक किसी भी लिपि में लिखा जा सके मगर भाषाई परिशुद्धता के दृष्टिकोण से यह देखना जरूरी है कि कौन सी लिपि किस भाषा के शब्द संरचना,शब्द उच्चारण,व्याकरण आदि के दृष्टिकोण से सबसे तटस्थ और पुष्ट प्रतीत होती है ! इनके अनुसार, उच्चारण एवं शब्द संरचना के हिसाब से हिन्दी को जितनी सुंदरता और सहजता से देवनागरी में प्रस्तुत किया जा सकता है उतनी स्पष्टता से रोमन में कर पाना संभव नहीं है !
      भाषा और लिपि के संदर्भ में चल रही यह बहस आजादी के बाद से ही पनपने लगी थी और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भी रोमन में हिन्दी लिखने से कोई एतराज नहीं था ! तबसे लेकर आज तक अक्सर रोमन बनाम देवनागरी की बहस साहित्य जगत में चलती रही है और इस पर जवाब सवाल होता रहा है ! अगर थोड़ा अलग नजरिये से देखें तो भारत में हिन्दी ही नहीं वरन उर्दू को भी देवनागरी में ही लिखा एवं पढ़ा जाता है ! इसमें कोई दो राय नहीं कि हिन्दी लेखन में रोमन की तुलना में देवनागरी की स्वीकार्यता प्राथमिक एवं सामाजिक स्तर पर बहुत ज्यादा रही है ! परन्तु आज के तकनीकी विकास की रफ़्तार ने लेखन की दिशा में देवनागरी को को मात दे दिया है ! आज की पीढ़ी में जब कलम की जगह की-बोर्ड की प्रासंगिकता ज्यादा बढ़ रही है और चिट्ठी-पत्री का जगह मोबाइल मैसेजों ने ले लिया है तो लेखनी का स्वरुप बदलना भी स्वाभाविक है ! तकनीक के सहारे संचार को तीव्र रफ़्तार देने में लिपि बाधक ना बने इसलिए आज की पीढ़ी ने देवनागरी और रोमन के संघर्षों से मुक्त सहूलियत का रास्ता अख्तियार करना मुनासिब समझा ! परिणामत: आज तकनीक के अत्याधुनिक माध्यमों से होने वाले तमाम संचार रोमन की राह पकड़ कर चल रहे हैं ! पश्चिम देशों से आयात की हुई इस तकनीक में पाश्चात्य का पारंपरिक स्वाद दिखना स्वाभाविक है अत: लेखनी के लिए रोमन को जितना सहज बनाया गया है देवनागरी उतनी ही दुष्कर प्रतीत होती है ! तकनीक के सहारे लेखन करने के लिए आपको रोमन आसानी से उपलब्ध है जबकि मूल देवनागरी समझना थोड़ा मुश्किल हो चुका है ! की-बोर्ड के माध्यम से देवनागरी लिखने में इसलिए भी कठिनाई है कि एक मानक स्तर का कोई भी की-बोर्ड रोमन लिपि के लिए ज्यादा सहज और सरल बनाया जाता है !तकनीक के माध्यम से लेखन करने एवं तीव्र संचार सम्प्रेषण की चाह ने आधुनिक पीढ़ी को रोमन के प्रति ज्यादा आकृष्ट किया है और बहुसंख्यक लोगों द्वारा रोमन में हिन्दी लेखन को आसानी से स्वीकार भी किया जा चुका है ! हालाकि इसी तकनीक ने देवनागरी को भी सहज बनाने के उद्देश्य से तमाम रोमन से देवनागरी रूपांतरण के तकनीक भी उपलब्ध कराये हैं, जिसकी मदद से हम रोमन में लिखकर उसका आसानी से देवनागरी रूपांतरण प्राप्त कर सकते हैं ! लेकिन लिपि के अस्तित्व के दृष्टिकोण से देवनागरी लेखन के लिए उपयुक्त हो रही यह रूपांतरण प्रक्रिया बहुत घातक सिद्ध हो रही है ! मूल देवनागरी के संरचना के हिसाब से अगर इस रूपांतरण तकनीक को देखें तो इसमे लिखते समय हम शब्द संरचना रोमन में ही करते हैं लेकिन उसका परिणाम हमको देवनागरी में प्राप्त होता है जिसे कि किसी भी नजरिये से परिशुद्ध देवनागरी नही कहा जा सकता ! इस तकनीक के माध्यम से शब्द संरचना का देवनागरी व्याकरण नष्ट होने का खतरा है बेशक हम छणिक तौर पर देवनागरी लिख पाने में सफल हो रहे हों ! इस तरह की तकनीक का विकास भी देवनागरी में हिन्दी लेखन को कमजोर ही करता है ना कि इससे देवनागरी की मूल संरचना का विकास या प्रसार हो रहा है !
      आज जब तकनीक की सम्पन्नता के दौर में रोमन लिपि में हिन्दी लेखन की सहजता प्रतिष्ठित हो रही है तो निश्चित तौर पर इस बात पर विचार करने का समय आ गया है कि हिन्दी को सबसे करीब से कौन सी लिपि प्रस्तुत करने में सक्षम है ?हमें इन सवालों पर गंभीरता से विचार करने की जरुरत है कि  क्या हिन्दी को रोमन के सहारे भी उतने ही प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है जितना देवनागरी में संभव है ? सवाल यह भी है कि रोमन के बढते वर्चस्व से हिन्दी के मूल व्याकरण को तो कोई खतरा नहीं है ? क्या शब्द संरचना एवं उच्चारण की स्पष्टता को रोमन लिपि में भी उतने ही पारदर्शीता के साथ लिखा एवं पढ़ा जा सकता है जितना देवनागरी लिपि में संभव है ? और सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि इस बात से भला कैसे आश्वस्त हो लिया जाय कि रोमन में लिखे जाने मात्र से हिन्दी को वैश्विक मंच पर एक भाषा का मुकाम मिल सकता है ? क्योंकि इस बात से बिलकुल इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रचार प्रसार के अन्धुत्साह में रोमन का हाथ थाम कर भागती हुई  हिन्दी विश्व मंच पर मात्र बोली की तरह स्वीकार्य ना हो जाय बजाय भाषा बनने के ! हमें रोमन की रफ़्तार से सम्हलते हुए इस विषय पर पुनर्विचार करना जरूरी है एवं मूल देवनागरी एवं देवनागरी में फर्क को समझने की जरुरत है !
शिवानन्द द्विवेदी “सहर”

     

महफूज नहीं भारत-नेपाल सीमा : अप्रकाशित लेख




सीमा सुरक्षा सहित तमाम अन्य अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के मसले पर जिस तरह से भारत सरकार द्वारा अक्सर चिंता जताई जाती है अथवा नीति निर्माण के पुख्ता इंतजाम किये जाते रहे हैं, इस मामले में भारत-नेपाल सीमा  सुरक्षा नीति की स्थिति को अपवाद  कहा जाना उचित होगा ! भारत-नेपाल सीमा पर चल रही हलचलों को लेकर कोई राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ठोस नीति निर्माण का ना तो विशेष प्रयास ही किया गया है और ना ही इसे मुख्यधारा के अंतर्राष्ट्रीय मामले के तौर पर स्वीकार ही किया गया है ! रक्षा मंत्रालय एवं गृह मंत्रालय दोनों ही सीमा-सुरक्षा एवं आंतरिक सुरक्षा के मसले पर नेपाल-भारत सीमा पर चुप्पी साधे हुए हैं और किसी भी नीतिगत निर्णय का खाका तक नहीं तैयार कर पाए हैं ! सरकारों द्वारा नेपाल-भारत सीमा सुरक्षा के मसले पर दिखाई जा रही इस असंवेदनशीलता का कतई यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि नेपाल सीमा पूर्णतया सुरक्षित है और वहाँ सब कुछ शांतिप्रिय ढंग से चल रहा है ! सरकार को यह बात बखूबी पता होनी चाहिए  कि राजशाही के खातमे एवं माओवादी संघर्षों के बाद से अभी तक नेपाल की आंतरिक स्थिति सामान्य नहीं हो पाई है और नेपाल अपने आंतरिक संघर्षों से जूझ रहा है जिसका असर निकटतम पड़ोसी होने के नाते भारतीय सीमा पर पड़ना स्वाभाविक है  ! बेशक नेपाल में माओवादी-यू.सी.पी.एन सरकार में गठबंधन के रूप में शामिल हैं लेकिन नेपाल के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य अभी भी सामान्य नहीं हो पाए हैं और संविधान सभा के मसले पर नेपाल में स्थिति अस्थिर बनी हुई है ! आज नेपाल में माओवादीयों के भी दो धड़े बन गए है जिसमे एक धड़ा माओवादी नेता मोहन वैद्य के नेतृत्व में सक्रिय है और ये भारत का धुर विरोधी धड़ा है ! हालाकि माओवादीयों द्वारा तो हमेशा से भारत को नेपाल के पिछडेपन का कारण बता कर भारत  विरोध किया जाता रहा है ! एक लम्बे हिंसक संघर्षों के बाद जब नेपाल में  राजशाही का अंत हुआ और सत्ता में माओवादियों की हिस्सेदारी सुनिश्चित  हुई तो निश्चित तौर पर भारत-नेपाल के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर असर पड़ना स्वाभाविक था, और पड़ा भी !संबंधो के बदलते नजरिये का ही फर्क ही तो था कि नेपाल द्वारा भारत के साथ हुए साठ के दशक के उस समझौते को ताक पर रखते हुए नए हथियार खरीदे गए,जिसमे कहा गया था कि नेपाल कोई भी हथियार आदि बिना भारत की अनुमति के नहीं खरीदेगा ! अगर बात सत्ता बदलावों से भारत सीमा सुरक्षा पर पड़े असर की करें तो उत्तर प्रदेश के तमाम जिलों से सटे नेपाल सीमा पर हालात लागातार नाजुक होते जा रहे हैं और आये दिन नेपाल की तरफ से भारत विरोधी मुहीम को को बढाने का काम किया जाता रहा है ! अभी कुछ ही दिनों पहले नेपाल के माओवादी नेता मोहन वैद्य के नेतृत्व वाले माओवादी गुट द्वारा भारत से नेपाल जाने वाली गाड़ियों को लेकर जो हिंसात्मक रुख अख्तियार किया गया जिसमे तमाम गाड़ियों को निशाना बनाया गया लेकिन उस पर हम कोई अंतर्राष्ट्रीय कदम नहीं उठाये, कहीं ना कहीं यह असंवेदनशीलता नेपाल सीमा एवं नेपाल  को लेकर हमारी लचर नीति को दर्शाता है ! नेपाल की तरफ से भारत विरोधी मुहीम अक्सर चलाई जाती रही हैं बावजूद इन सबके इस अंतर्राष्ट्रीय समस्या पर अभी तक हमारी सरकार गंभीर नहीं हो पा रही है ! नेपाल से सटे तमाम जिलों जिनमे महाराजगंज,सिद्धार्थनगर,लखीमपुर खीरी प्रमुख हैं,से भारी मात्रा में खाद एवं अनाज आदि नेपाल सीमा पार भेजा जाता रहा है जिससे नेपाल के पहाड़ी इलाकों में लोगों का जीवन यापन होता है ! ऐसे में प्रश्न ये उठता है कि खुलेआम चल रही ये आवाजाही क्या सुरक्षा के दृष्टिकोण से उचित है ? क्या इस आवाजाही पर सरकारी  अंकुश नहीं लगाया जाना चाहिए ?
                  भारत-नेपाल सीमा की सुरक्षा को लेकर हमारे पास कोई ठोस नीति नहीं हो पाने के कारण नेपाल सीमा, बाहर से आने वाले माओवादी संगठनो,अपराधियों,आतंकवादीयों के लिए सबसे आसान रास्ता बनती जा रही है और भारी संख्या में हथियार आदि की तस्करी की संभावना प्रबल होती जा रही है ! इसमे कोई दो राय नहीं कि बांग्लादेश एवं पाकिस्तान सीमा पर चौकस सुरक्षा इंतजाम होने के कारण तमाम वाह्य राष्ट्रविरोधी ताकते नेपाल के रास्ते भारत में घुसपैठ करने की कोशिश करती रही हैं या बहुत हद तक घुसपैठ कर पाने में सफल भी हो रही हैं,जिस पर नकेल कसने में हम नीतिगत रूप पूरी तरह से नाकाम साबित हो रहे हैं ! भारत-नेपाल सीमा की कमजोर सुरक्षा नीति से  देश के आंतरिक एवं वाह्य सुरक्षा पर पडने वाले प्रभावों को अगर चीन एवं पाकिस्तान के परिप्रेक्ष्य में  समझने का प्रयास करें तो इस बात को स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं होनी चाहिए  कि चीन द्वारा नेपाल का इस्तेमाल भारत में आंतरिक अस्थिरिता का माहौल बनाने के लिए किया जा सकता है या किया भी जा रहा है ! इस बात से भी नकारा नहीं जा सकता है कि नेपाल में राजशाही के खिलाफ माओवादी संघर्ष को शुरूआत से ही चीन का आंतरिक समर्थन प्राप्त था ! ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि आज जब माओवादी दल सत्ता में भागीदार हैं तो चीन भारत के खिलाफ अपने मकसद को साधने में कोई कोर कसर नहीं छोडेगा ! दूसरी तरफ पाकिस्तान भी मावोवादी ताकतों का सहारा लेकर कहीं ना कहीं अपनी आतंकवादी गतिविधियों को नेपाल से सटे सीमावर्ती इलाको में बढाने में हमेशा से प्रयासरत रहा है और भारी संख्या में आतंकवादी गतिविधियों में इस्तेमाल में होने वालीं सामग्री नेपाल के रास्ते भारत भेजी जाती रही हैं ! भारत में पहले से ही नक्स्लावाद एवं माओवाद एक आंतरिक संकट बना हुआ है ऐसे में अगर नेपाल सीमा से इन संगठनों को मदद पहुचती है तो निश्चित रूप से यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए चिंता की बात है जिस पर सरकार को गंभीर होने की जरुरत है !
            आज जब पाकिस्तान,बांग्लादेश एवं चीन से लगी भारतीय सीमाओं को चौकस सुरक्षा इंतजामों से लैस किया गया है तो सवाल उठना लाजिमी है कि फिर नेपाल सीमा के साथ इस तरह का दोहरा रवैया क्यों ? इस संदर्भ में नेपाल के आंतरिक हालात को संज्ञान में लेते हुए  नेपाल-भारत सीमा पर भारत के विदेश मंत्रालय एवं एवं रक्षा मंत्रालय सहित गृह मंत्रालय को गंभीर होने की जरुरत है एवं सीमा सुरक्षा को लेकर द्विपक्षीय ठोस नीतियों को अमली जामा पहनाने  की जरुरत पर भी  बल दिया जाना चाहिए  ! नेपाल-भारत मसले को गंभीरता से लेते हुए आवाजाही के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानको के अनुरूप नियम बनाने एवं उसके क्रियान्वयन पर ठोस नीति निर्माण की आवश्यकता है  ! नेपाल की लगभग पाँच सौ किलीमीटर में फैली सीमा को किस तरह से चाक चौबंद किया जाया इसके लिए भी आंतरिक सुरक्षा नीतियों सहित वाह्य सुरक्षा नीतियों को पुख्ता करने पर समय रहते ठोस कदम उठाये जाने चाहिए  ! नेपाल के आंतरिक राजनीति में बढते माओवादी हस्तक्षेप को मद्देनजर रखते हुए भारत को नेपाल-भारत सीमा की गंभीरता को समझना अत्यंत जरूरी है वरना नेपाल सीमा के प्रति नरम रुख देश के आंतरिक सुरक्षा के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकते हैं !

शिवानन्द द्विवेदी “सहर”

चेहरे बदलने की सियासत : दैनिक जागरण में प्रकाशित





सियासत के अध्याय में एक कहावत यह भी प्रासंगिक होती जा रही है कि बात चरित्र पर बन आये तो चेहरा बदलना कई बार कारगर हो जाता है  ! समय-समय पर चेहरे बदल कर सियासत का चेहरा साफ़ रखने का यह फार्मूला भारतीय राजनीति में काफी व्यवहारिक होता जा रहा है, जिसका प्रयोग केन्द्र से लेकर राज्यों की सरकारों द्वारा भी खूब किया जाने लगा है ! पिछले कुछ सालों में ऐसा बहुतायत देखने को मिला है कि जब-जब सियासत का चरित्र कृरूप दिखा आनन्-फानन में चेहरे ही बदले गए, जिसे आज की मीडिया “डैमेज कंट्रोल” का भी नाम देती है ! हालाकि डैमेज  कंट्रोल का यह फार्मूला राष्ट्र की जनता के बीच राजनीति की शुचिता को कायम कर पाने में कितना कामयाब हो पाया है या हो पायेगा यह एक बड़ा विषय है और बहस का मुद्दा भी ! आज जब पिछले तीन साल के कार्यकाल में तीसरी बार यूपीए-२ की मनमोहन सरकार द्वारा मंत्रीमंडल के चेहरे बदलने की कवायदें की गयीं हैं तो निश्चित रूप से सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या इसके पीछे सरकार का मकसद सिर्फ नए चेहरों को मौका देना है या अंदरूनी सियासत कुछ और भी है ? लोकसभा चुनाव में अब तैयारीयों के दृष्टिकोण से ज्यादा समय शेष नहीं बचा और साथ ही कई राज्यों में कांग्रेस की साख दाँव पर लगी है,ऐसे में मंत्रीमंडल में हुए इस बड़े बदलाव को सियासत के गुणा-भाग से अलग रख कर नहीं देखा जा सकता ! भ्रष्टाचार के मुद्दे पर श्रृंखलाबद्ध घिरती जा रही मनमोहन सरकार अभी तक कोई ऐसा काम नहीं कर पाई जिससे कि उसे इस संकट से निजात मिल सके ! भ्रष्टाचार के मुद्दे को समेटने की कवायदों में एफ.डी.आई ,प्रोन्नति में आरक्षण,आर्थिक सुधार जैसे कई पैंतरे सरकार द्वारा चले गए लेकिन मामला बनता नहीं दिखा, जिससे कि सरकार को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर राहत मिल सके !यह बात कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व  को बखूबी पता है कि आगामी चुनावों तक अगर इस भ्रष्टाचार के मुद्दे को समेटा नहीं गया तो परिणाम बहुत प्रतिकूल  भी आ सकते हैं ! मनमोहन सिंह के मंत्रीमंडल में हुए इस बड़े बदलाव, जिसमे दो चार नहीं बल्कि लगभग दो दर्जन चेहरों को बदला गया है और मनीष तिवारी सरीखे तमाम युवा चेहरों को मौका दिया गया एवं विशेष जिम्मेदारी दी गयी है ! बड़े स्तर पर हुए इस बदलाव को अगर चुनावी नफा नुकसान के आधार पर देखें तो मंत्रीमंडल में टीम राहुल गाँधी के तमाम युवा चेहरे सरकार में बने हुए हैं लेकिन हमेशा की तरह एक बार फिर राहुल गाँधी ने सरकार में जाने से इनकार कर दिया है ! यहाँ युवाओं को मौका देकर कहीं ना कहीं राहुल गाँधी की सियासत का भावी रास्ता साफ़ करने का प्रयास किया गया है साथ ही यह जताने का भी प्रयास किया गया है  कि राहुल गाँधी द्वारा युवाओं को राजनीति से जोडने का एजेंडा केवल बातों तक सीमित नहीं है ! आगामी लोकसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में  देखा जाय तो  मंत्रीमंडल में हुआ यह बदलाव राजनीतिक दृष्टिकोण से राहुल गाँधी की आगामी सियासत को मजबूत करने एवं उनके राजनीतिक एजेंडे को पुख्ता करने के लिए किया गया है ! हालाकि यह बदलाव राहुल गांधी की सियासत को कितना बल देगा यह तो समय आने पर ही पता चलेगा क्योंकि पिछले तमाम चुनावों में राहुल गाँधी द्वारा आजमाए तमाम सियासी हथकंडे चुनावी अखांडे में चारों खाने चित्त ही हुए है ! ऐसे में आगामी चुनाव राहुल गाँधी के लिए भी किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं हैं,अत: पूरी कांग्रेस राहुल गाँधी को इस परीक्षा की घड़ी से उबारने में कोई  ढिलाई बरतने को तैयार नहीं दिख रही ! मंत्रीमंडल में हुए व्यापक बदलाव के समय को लेकर अगर स्थिति को समझने का प्रयास किया जाय तो एक बात स्पष्ट होती है कि भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों से घिरी सरकार द्वारा यह बदलाव तब किया गया जब प्रमुख विपक्षी दल बी.जे.पी खुद अपने अध्यक्ष नितिन गडकरी पर लगे तमाम भ्रष्टाचार एवं फर्जीवाड़े के आरोपों से बचाव की मुद्रा में आ गयी है ! ऐसे में अपना बचाव कर रही भा.जा.पा के विरोध से निजात पाकर कांग्रेस द्वारा सियासी हवा का रुख बदलने का प्रयास किया गया है, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता ! हालाकि इस पुरे बदलाव में कहीं भी ऐसा नहीं जाहिर होने दिया गया है कि सरकार को यह कदम भ्रष्टाचार के लगे तमाम आरोपों के कारण उठाने पड़ रहे हैं बेशक सुबोध कान्त सहाय जैसे मंत्रीयों को अपना पद छोडना पड़ा हो ! हालाकि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे तमाम मंत्री अभी भी सरकार में बने हुए हैं जिससे सरकार को यह कहने का संबल मिल सकता है कि इस पुरे बदलाव के पीछे भ्रष्टाचार का कोई लेना देना नहीं है,यह सिर्फ नए चेहरों को मौका देने के लिए किया गया है ! इस पुरे बदलाव में अगर देखें तो कांग्रेस द्वारा कहीं ना कहीं क्षेत्रों और राज्यों में कमजोर हो रहे अपने नेतृत्व को मजबूती देने का उद्देश्य भी साफ़ झलकता है ! अगर नजर पश्चिम बंगाल पर डाले तो हाल ही में ममता बनर्जी के समर्थन वापसी एवं प्रणब मुखर्जी के रायसीना हिल्स जाने के बाद सियासत के नजरिये से पश्चिम बंगाल सरकार के नियंत्रण से छूटता जा रहा था,शायद इसी पकड़ को कायम रखने के लिए और ममता बनर्जी से सियासी हिसाब बराबर करने के लिए बंगाल से तीन मंत्री बनाये गये ! वही अगर तुलनात्मक रूप से देखें तो यू.पी और बिहार मिलाकर कुल एक सौ तीस संसदीय क्षेत्र वाले राज्यों से मात्र पाँच मंत्रीयों को जगह मिल पाई है ! गठबंधन की सियासत में अगर यू.पी से कांग्रेस के हाथ कुछ नहीं भी लगता तो बात मुलायम या मायावती से बनाई जा सकती है क्योंकि दोनों ही गठबंधन में भागीदार हैं, शायद इसी दूरगामी सोच के तहत इन राज्यों को मंत्रीमंडल में पर्याप्त भागीदारी नहीं दी गयी है !
      आगामी चुनावों को मद्देनजर रखते हुए इस पुरे फेर बदल को डैमेज कंट्रोल का प्रयास कहें या मुद्दांतरण की सियासत या इससे भी दो कदम आगे बढ़कर राहुल गाँधी की सियासी राह मजबूत करने का एकजुट प्रयास,लेकिन हर हालात में एक सवाल अब भी बना हुआ है कि क्या ये फेर बदल कांग्रेस और उसके नेताओं के प्रति जनता में उठे आक्रोश और अविश्वास की भावना को खतम करने में सफल हो सकेगा ?क्योंकि गौर करने वाली बात है कि जिस शशि थरूर को पिछले साल आईपीएल फ्रेंचाइजी विवाद पर हटाया गया था अब पुन: मंत्री मंडल में जगह दी गयी है ! इतना तो लगभग तय के बराबर है कि कांग्रेस के लिए आगामी डेढ़ साल की राह आसान नहीं दिखती ! तमाम प्रयासों के बावजूद भी यह सवाल जनमानस के पटल पर बना ही रहेगा कि क्या चेहरे बदल जाने मात्र से सरकार का चरित्र भी बदल सकता है ? क्या सरकार द्वारा नए चेहरों को खड़ा करना इस बात की गारंटी है कि अब सबकुछ संभल चुका है ? जनता के मन में यह भी प्रश्न है कि क्या भ्रष्टाचार जैसी समस्या को महज चेहरा बदलने की सियासत से खतम किया जा सकता है ? आज जनता के पास ना तो सरकार का दिया लोकपाल है,ना महिला विधेयक,ना ही महंगाई पर किया गया नियंत्रण और ना ही रोजगार आदि के पर्याप्त अवसर ,ऐसे में क्या इन समस्यायों को पाटने में ये चेहरे कामयाब हो पायेंगे ,बड़ा सवाल बना हुआ है ! चेहरे बदलने से सरकार का चरित्र बदलेगा ऐसा कैसे मान लिया जाय ?