30-अप्रैल-2013
इन दिनों भाषाओं के उत्थान एवं पतन के विमर्शों से इतर उच्च अदालतों में भाषाई न्याय को लेकर देश में एक आंदोलन चल रहा है। उच्च न्यायिक प्रणालियों में न्याय की भाषा का सवाल जितना सहज लगता है, उतना है नहीं। बल्कि यह कुछ ज्यादा ही पेचीदा मसला है! धर्म से लेकर कर्म तक और सहमति से लेकर विरोध तक की आजादी देने वाले संविधान में उच्च न्यायिक व्यवस्था में न्याय की भाषा को लेकर जो प्रावधान किए गए हैं, उस पर बहस जरूर होनी चाहिए, क्योंकि यह मसला बहुसंख्यक आम आदमी से जुड़ा है।
बेहद आश्चर्यजनक तरीके से संविधान के अनुच्छेद 348 खंड एक के तहत सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी को अनिवार्य बनाते हुए हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं को प्रतिबंधित किया गया है, जिसे किसी भी तरह से न्यायपूर्ण नहीं कहा जा सकता! हालांकि उच्च स्तरीय न्यायिक प्रणाली में भारतीय भाषाओं के साथ हो रहे इस भेदभाव को लेकर अब तक कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ है, लेकिन यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है कि देश के किसी भी न्यायिक मंच पर जनता किस भाषा में अपने लिए न्याय की गुहार करे। यह तय करने का हक किसका है और किसका होना चाहिए? यहां सवाल न्याय की शुचिता अथवा भाषा के उत्थान-पतन का कतई नहीं है! यहां सीधा सवाल न्याय मांगने वालों की भाषा का है, जिसमें यह तय किया जाना जरूरी है कि कोई वादी उच्च न्यायिक अदालतों में क्यों अपनी भाषा में न्याय की गुहार नहीं लगा सकता।
वर्ष 2001 की जनगणना में प्राप्त भाषाई मापदंडों से जुड़े आंकड़ों एवं न्यायिक मंचों के लिए तय की गई भाषा के बीच एक अनोखा विरोधाभास नजर आता है! जिस मुल्क में 43 फीसदी लोग हिंदी को अपनी प्रथम भाषा मानते हों एवं लगभग इतने ही लोग अपनी क्षेत्रीय भाषा को प्रथम एवं हिंदी को द्वितीय भाषा मानते हों, वहां महज 0.2 फीसद लोगों की प्रथम भाषा अंग्रेजी को कानूनी तौर पर न्याय की भाषा बनाकर उच्च स्तरीय न्यायिक कार्यों में अनिवार्य बना दिया गया है! देश की बहुसंख्यक आबादी को अगर अपनी प्रथम भाषा में न्याय की गुहार लगाने की इजाजत नहीं मिली है, तो इस पूरे मामले को लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन से जोड़कर देखा जाना गलत नहीं होगा! हमें नहीं भूलना चाहिए कि मानवाधिकार से जुड़े विमर्शों में न्याय को सबसे अहम यों ही नहीं माना गया है! न्याय और अन्याय के मापदंडों के आधार पर ही किसी भी विमर्श की शुचिता को कायम किया जा सकता है! ऐसे में हमें इस बात का मूल्यांकन तो करना ही होगा कि विविधाताओं वाले इस देश में हमारा लोकतंत्र अपनी भाषाओं के साथ कितना न्याय कर पा रहा है! न्याय के दरवाजे पर ही अन्याय का यह जो विधान खड़ा किया गया है, वह हमारी सामाजिक एवं ऐतिहासिक मान्यताओं पर सवाल खड़े कर रहा है! भारतीय भाषाओं के साथ हो रहे इस घोर अन्याय से जहां न्यायिक संस्थाओं में बहुसंख्यक आबादी को अवसर नहीं मिलता, वहीं सभी भारतीय भाषाओं के प्रति आम लोग उदासीन होते जा रहे हैं।
संविधान के अनुच्छेद 348 खंड 2 के तहत निर्धारित प्रावधान में यहां तक कहा गया है कि अगर किसी राज्य के उच्च न्यायालय को हिंदी का प्रयोग करना पड़ा, तो उस राज्य के राज्यपाल को सबसे पहले राष्ट्रपति से अनुमति लेनी होगी! इससे ऐसा लगता है, मानो यह जनता की अभिव्यक्ति की भाषा से जुड़ा मामला न होकर अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मसला हो! तार्किक एवं न्यायोचित तो यही है कि समाज को भाषाई दायरों में न बांधा जाए, बेशक इसके लिए सरकार को अपने प्रशिक्षण इकाई को और मजबूत बनाना पड़े! हमें समझना होगा कि जज और न्यायालय जनता के लिए बने हैं, न कि जनता इन संस्थानों के लिए। न्यायिक मूल्यों के आधार पर यही उचित है कि समाज से जुड़े कार्य समाज की भाषा में ही किए जाएं। अंग्रेजी को लेकर आपत्ति नहीं है, लेकिन उच्च न्यायिक प्रणाली में हिंदी समेत तमाम भारतीय भाषाओं की उपेक्षा आपत्तिजनक है।
शिवानन्द द्विवेदी सहर





