(9-अप्रैल-13)
मोदी बनाम राहुल को लेकर महीनों से जारी बहस के बीच भाजपा के 33वे स्थापना दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में एक नया मोड़ आ गया ! कार्यक्रम में भाजपा के दिल्ली इकाई के अध्यक्ष विजय गोयल ने आडवाणी के नेतृत्व में आगामी लोकसभा चुनाव जीतने की बात क्या कर दी समूची मीडिया से लेकर सियासी हलकों में मोदी बनाम आडवाणी का जाप होने लगा ! हालाकि यहाँ एक बात गौर करने वाली है कि दोनों ही मामलों में एक पक्ष के रूप में नरेंद्र मोदी कायम हैं चाहें वो मोदी बनाम राहुल हो या मोदी बनाम आडवाणी ! आडवाणी बनाम मोदी वाली इस बहस में ऐसा कुछ भी नहीं है कि इस पर कोई आश्चर्य जताया जाय या बहुत खलबली पैदा की जाय ! यह एक ऐसा बयान था जिसकी उम्मीद पहले से थी ! भाजपा की अंदरूनी राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में अगर यह कहा जाय तो गलत नहीं होगा कि भाजपा को हराने के लिए भाजपा खुद ही काफी है यहाँ किसी विरोधी की जरुरत नहीं है ! अगर कोई यह कहता है कि प्रधानमंत्री पद के लिए लालकृष्ण आडवाणी स्वेच्छा से अपना नाम वापस ले लिए हैं तो यह सरासर गलत होगा ! आधिकारिक तौर पर आजतक लालकृष्ण आडवाणी की तरफ से कोई ऐसा बयान नहीं आया है जिसमे उन्होंने खुद को प्रधानमंत्री पद से अलग किया हो बल्कि कई बार तो लालकृष्ण आडवाणी के बयानों में प्रधानमंत्री ना बन पाने का मलाल साफ़ झलकता है ! आप अगर गौर किये हों तो जब-जब नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए किसी सार्वजनिक मंच से उछला है ठीक उसके तुरंत बाद लालकृष्ण आडवाणी का कोई ऐसा बयान या ब्लॉग आदि आता है जो भाजपा के लिए ही मुश्किलें पैदा कर देने वाला हो ! दरअसल इस पुरे मसले को अगर कांग्रेस और भाजपा के बीच तुलनात्मक रूप से देखें तो अनोखा विरोधाभाष नजर आता है ! कांग्रेस में नीचे से लेकर शीर्ष तक सब प्रधानमंत्री पद के लिए सिर्फ एक राहुल गाँधी के नाम का जाप करते हैं तो वहीँ राहुल गाँधी कहते हैं कि प्रधानमंत्री बनने वाला सवाल निरर्थक है ! जबकि इसके उलट भाजपा में नीचे से ऊपर तक सब यही कहते हैं कि भाजपा में कई नाम हैं जो प्रधानमंत्री बनने योग्य है लेकिन सहमति एक पर भी नहीं बन पाती बल्कि अंदरूनी खीँच तान ही मच जाती है ! आपसी खीच-तान का यह अंदरूनी मसला आजतक भाजपा के लिए नासूर बना हुआ है और कई मोर्चों पर भाजपा को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा है ! प्रधानमंत्री पद के लिए आडवाणी का नाम लिए जाने के बाद अगर वाकई आडवाणी की मंशा नहीं होती प्रधानमंत्री बनने कि तो यह मामला वहीँ का वहीँ खतम किया जा सकता था ! अगर उसी कार्यक्रम में मंच से बोलते हुए आडवाणी यह कह देते कि उनको प्रधानमंत्री नहीं बनना तो यह मामला इतना तुल नहीं पकड़ता और भाजपा के अंदरूनी संगठन को भी मजबूती मिलती ! मगर आडवाणी द्वारा उसी मंच इस मामले का खंडन करने की बजाय यह कहा गया कि वो अभी भी पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता हैं और सक्रिय राजनीति में अपनी सहभागिता देने को तैयार हैं ! आडवाणी के इस बयान का निहितार्थ यही निकलता है कि उनके के मन में अभी भी एक मौका और आजमाने की लालसा दबी हुई है जो वक्त आने पर बाहर भी आ सकती है ! इसमें कोई दो राय नहीं कि कई मसलों पर लालकृष्ण आडवाणी की सहमति मोदी के साथ नहीं होती है और वो इसकी अभियक्ति करने से भी नहीं चुकते ! आगामी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद को लेकर भाजपा में होने वाली खींचतान की शुरुआत लगभग हो चुकी है ! आज बेशक पार्टी में मोदी की मांग बढ़ती जा रही है लेकिन इस बात को भी खारिज नहीं किया जा सकता कि लोकसभा चुनाव नजदीक आते ही जब आधिकारिक तौर पर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार कि घोषणा करने की बात आयेगी तब भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में ही विरोध के तमाम स्वर उठने लगेंगे ! भाजपा का शीर्ष नेतृत्व बतौर प्रधानमंत्री उम्मेदवार मोदी का नाम सहजता से स्वीकार कर लेगा इसकी संभावना बहुत कम है ! हमें राजनीति के इस चरित्र को समझना होगा कि वक्त और जरुरत से पहले कोई भी मंझा हुआ नेता अपनी राय नहीं रख रहा है ! आडवाणी का नाम आज उठा है और आडवाणी ने अगर इसे खारिज नहीं किया तो इस बात को मान लेना चाहिए कि मोदी के लिए भाजपा से पार पाना आसान नहीं है ! मोदी बेशक कार्यकर्ताओं की पहली पसंद हों , बेशक राष्ट्रीय छवि बनाकर उभर रहे हों लेकिन इस सच्चाई को भी नकार नहीं सकते कि अभी सिर्फ उनके समर्थकों के स्वर फुट रहे हैं ! उनके विरोधी तो अभी चुप्पी साधे भाजपा के शीर्ष पर बैठे हैं जो वक्त आने पर ना सिर्फ बोलेंगे बल्कि खूब बोलेंगे ! भाजपा का यह अंदरूनी खींचतान इस वजह से भी है क्योंकि दशकों से राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय राष्ट्रीय नेता अपनी मह्तावाकंक्षाओं का बलिदान किसी राज्य स्तर के मुख्यमंत्री के लिए कैसे करना चाहेंगे ! इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर अगर शीर्ष नेतृत्व के बीच सहमति बनाने की स्थिति आई तो मोदी की बजाय आडवाणी को लेकर ज्यादा आसानी से सहमति बन पायेगी ! सियासत में रंग और राज बदलते देर नहीं लगती अत: आज अर्श पर दिख रहे मोदी को कब सियासत में फर्श की राह पकडनी पड़े इसका कोई ठिकाना नहीं ! हाँ ये अलग बात है कि कांग्रेस से टकराने के लिए जितने प्रभावी मोदी साबित हो रहें हैं उतने आडवाणी नहीं हो सकते ! कार्यकर्ताओं में जो जूनून मोदी पैदा कर पा रहे हैं वो आडवानी द्वारा अब संभव नहीं है हालाकि यह काम दशकों पहले आडवाणी द्वारा अपनी रथयात्राओं से किया जा चुका है ! कांग्रेस से टकराना आज मोदी के लिए जितना आसान लग रहा हैं अपने अंदरूनी संगठन से पार पाने में मोदी को उतनी ही मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा ! प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी के सामने इस सियासी चक्रव्यूह के दो-दो दरवाजों से पार पाने की चुनौती है ! जो आडवाणी अभी गंभीर और इमोशनल दिख रहे हैं अगर कल को अपने तेवर बदल कर फिर सियासत के अखाड़े में कूद पड़ें तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा !
अपने संगठनात्मक चरित्र के अनुसार भाजपा में अंदरूनी खींच-तान की शुरुआती पहल हो चुकी है और भविष्य में यह और वृहद स्तर पर देखने को मिलेगी ! लोकसभा चुनाव का सागर मंथन करने निकले मोदी को इस बात का आभास होना चाहिए कि सागर मंथन करना अलग चीज़ है और अमृत पान करना अलग चीज़ ! कोई जरूरी नहीं कि जो आज सियासी माहौल तैयार कर रहा कुर्सी भी उसी के लिए तैयार की जा रही हो ! लेकिन इस सबके बावजूद इतना तो कहा ही जा सकता है कि अबतक कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी से दो-दो हाथ करते नरेंद्र मोदी को अब अपने पार्टी में दो-दो हाथ करते देखें जाने की पहल हो चुकी है ! भाजपा में कुछ भी नया नहीं हो रहा बल्कि वो वही कर रही है जो हमेशा से करती आई है ! नफा-नुकसान तो बहुत बाद की बात है !
शिवानन्द द्विवेदी सहर

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