गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

संप्रग की चुनौती हैं लटके विधेयक : दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा लेख



 (26-अप्रैल-13)

22 अप्रैल से शुरू संसद का बजट सत्र अपने पहले दिन से ही हंगामे की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है! बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत ही हंगामे वाली रही एवं वर्तमान राजनीतिक परिस्थियों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि संसदीय सत्र की  आगामी कार्यवाही  भी हंगामों बीच ही चलेगी ! संसद के इस बजट सत्र के शुरू होते ही दिल्ली में बढ़  रहे दुष्कर्म के मामलों में सरकार की विफलता पर विपक्ष द्वारा हंगामा खड़ा किया गया तो वहीँ सरकार से अलग हुई तृणमूल ने भी अपने तेवर तल्ख़  ही रखे ! अगर देखा जाय तो आगामी लोकसभा चुनाव के नजरिये से संसद का यह बजट सत्र बहुत ही महत्वपूर्ण है जिसमे वित्त विधेयक के अलावा खाद्य सुरक्षा जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण विधेयक सरकार द्वारा पास कराये जाने की प्रतिबद्धता है ! हालाकि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियां यु.पी.ए सरकार के अनुकूल नहीं है ! वर्तमान के राजनीतिक घटनाक्रमों में अगर देखा जाय तो संसद की कार्यवाही ना चलने देने एवं सरकार को विभिन्न मुद्दों पर घेरने के पर्याप्त कारण विपक्ष के पास मौजूद हैं और विपक्ष उन कारणों को भुनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ने वाला  ! सरकार को सदन में घेरने के लिए विपक्ष के पास मुद्दों की कोई कमी है ऐसा नहीं कहा जा सकता है ! कोयला आवंटन मामले में चल रही सीबीआई जांच में कथित सरकारी हस्तक्षेप पर राज्यसभा में पहले ही दिन गतिरोध पैदा कर चुकी बीजेपी द्वारा  हाल ही में आई मनरेगा में हजारों करोंड़ की धांधली के खुलासे वाली कैग की रिपोर्ट एवं लद्दाख सीमा पर चीनी घुसपैठ आदि  को भी इस सत्र में सरकार के खिलाफ हथियार बनाया जाना लगभग शुरू हो चूका  जिस पर आगे भी गतिरोध बना रहना तय के बराबर है ! चुनौतियों के नजरिये से यह सत्र सरकार  के लिए आसान नहीं दिख रहा क्योंकि बीजेपी के अलावा वाम दलों के अपने मुद्दों के साथ-साथ  तेलांगना राज्य आदि के मसलों पर सरकार को भारी गतिरोध झेलना ही पड़ेगा ! सरकार के लिए यह सत्र क्यों महत्वपूर्ण है इस विषय पर अगर गौर किया जाय  तो कई ऐसे महत्वपूर्ण विधेयक हैं जिनको हर हाल में पारित कराने की चुनौती सरकार की प्राथमिकता है ! आगामी लोकसभा चुनावों में अपनी कामयाबी कि फेहरिश्त लम्बी  रखने के लिए सरकार के कई ड्रीम प्रोजेक्ट इसी सत्र में पारित होने हैं ! कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गाँधी के महत्वाकांक्षी विधेयक के रूप में खाद्य सुरक्षा बिल को पास कराने के साथ-साथ भूमि अधिग्रहण एवं आर्थिक सुधारों से जुड़े अन्य तमाम बिल अभी आधे रास्ते में  लटके पड़े हैं !  निश्चित तौर पर इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर इन विधेयकों को सरकार पास करा पाने में असफल रहती है तो उसकी किरकिरी होनी तय है एवं चुनावों में भी इसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ सकता है ! अगर बजट सत्र के प्रथम चरण को देखें तो पता चलेगा  कि सरकार द्वारा पिछले सत्र में कुल 68 विधेयको की सूचि पारित कराने हेतु  प्रस्तावित की गयी थी  जिनमे विपक्ष के गतिरोध एवं असहमतियों के कारण मात्र सरकार 11 विधेयक ही पास करा पाने में कामयाब हो पाई थी ! बजट सत्र के तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों की तुलना में अगर वर्तमान गतिरोधो को देखा जाय तो स्थिति सरकार के लिए ज्यादा प्रतिकूल नजर आ रही है ! हालाकि बजट सत्र के प्रथम चरण में उत्पन्न गतिरोधों के बाद ऐसा नहीं है कि सरकार द्वारा विपक्षी दलों के साथ सहमति  बनाने का कोई प्रयास नहीं किया गया है ! भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर विपक्ष की तमाम असहमतियों पर सरकार सहमति बनाने का प्रयास करती रही है मगर हर मसले पर पूर्ण सहमति  बनाकर विधेयक पास करा लेगी ऐसा कहना अभी जल्दीबाजी होगी ! संसद के इस सत्र को सियासी चश्मे से समझे बिना इस बात का सही  आकलन नहीं किया जा सकता कि इस सत्र में कौन दल क्या पैंतरा चलने वाला है  ! अगर सरकार खाद्य सुरक्षा विधेयक लाकर इसका सियासी इस्तेमाल चुनाव में अपनी उपलब्धि के तौर पर करने का मंसूबा रखती है तो इस बात से भी नकारा नहीं जा सकता कि विपक्ष द्वारा इस बिल में रोड़े अटकाकर सरकार के मंसूबों पर पानी फेरने का काम किया जा सकता है ! अगर देखा जाय भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी सरकार के लिए अपनी साख बचाना अगर राजनीतिक चुनौती है तो वहीं विपक्ष के तौर पर बीजेपी के सामने सरकार की असफलताओं को जनता के बीच मुद्दे के रूप में कायम रखने की चुनौती है ! बीजेपी का सियासी चरित्र कभी इस बात की इजाजत नहीं देगा कि यु.पी.ए सरकार सहजता से सभी महत्वाकांक्षी विधेयकों को पास करा कर लोकसभा चुनाव में जनता के बीच जाए ! हालाकि लोकसभा में सरकार के पास इतना संख्या बल है कि वो अपने तमाम जरुरी विधेयक पारित करा ले ! मगर कई मसलों पर उसे उच्च सदन में गतिरोध झेलना पद सकता है !
     संसद के दोनों सदनों में अलग-अलग मसलों पर खड़ा होने वाला यह गतिरोध कोई नया नहीं है बल्कि आज की राजनीति में यह मुख्यधारा का राजनीतिक  चरित्र बनता जा रहा है ! अगर पिछले कुछ संसदीय सत्रों को नजीर के तौर पर देखें  तो लगभग सभी सत्रों में कार्यवाही के नाम पर हंगामे और गतिरोध ही देखने को मिलेंगे  ! वर्तमान राजनीतिक हालात एवं यु.पी.ए सरकार के ऊपर लग रहे भ्रष्टाचार सहित तमाम आरोपों को देखते हुए  अगर इस बजट सत्र के दुसरे चरण के भविष्य की दिशा और दशा का आकलन करें तो पूरा मामला  हंगामे और गतिरोध की भेंट चढ़ता दिख रहा है !हालाकि वित्त विधेयक के पास होने को लेकर किसी तरह की कोई शंका नहीं जताई जा सकती क्योंकि  विपक्ष के लिए भी उसमे विरोध के नाम पर कुछ ख़ास नहीं है ! मगर भूमि अधिग्रहण विधेयक सहित अन्य मसलों पर अन्य  दल अपनी-अपनी सियासत के दाँव पेंच जरुर आजमाते नजर आयेंगे ! संसद का बजट सत्र के शुरुआती दिन तो हंगामे की भेंट चढ़ ही चुके हैं और आगे भी राजनीतिक परिस्थितियां ऐसी बनती दिख रही हैं !ऐसे में इस बात की पुरी गुंजाइश बनती दिख रही है कि बजट सत्र के दुसरे चरण में 10 मई तक चलने वाला यह सत्र हंगामे और गतिरोधों के बीच ही चल पायेगा !

    लोकतंत्र में संसद की कार्यवाही बाधित करना एक नजरिये से अगर अनुचित लगता है तो वहीँ इसका दूसरा दृष्टिकोण भी है ! दूसरे नजरिये से अगर सोचें तो संसद की कार्यवाही ठप करके  विपक्ष भी अपनी वैचारिक एवं सैद्धांतिक प्रतिबद्धता के अनुकूल कुछ काम ही करता है जो संसद की कार्यवाही के चलते हुए संभव नहीं होता ! अगर किसी मसले पर विरोध के कारण संसद नहीं चलने दिया जाता है तो विपक्ष को मिले जनादेश का एक दृष्टिकोण यह भी माना जाना चाहिए कि विपक्ष ने वो ही किया जो वो चाहता है ! बाकी किसी  भी सरकार या विपक्ष ने क्या ठीक किया और क्या गलत किया इसका फैसला तो चुनाव में जनादेश से होना ही है !  

शिवानन्द द्विवेदी सहर

 

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