(17-अप्रैल-2013)
भारतीय लोकतंत्र के पिछले दो दशकों की केंद्रीय सियासत पर अगर नज़र डालें तो समूची केंद्रीय राजनीति धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता के इर्द-गिर्द ही नजर आती है। मुद्दा चाहे जिस तरह का भी हो, समर्थन एवं विरोध का निर्णय धर्मनिरपेक्षता के पैमानों पर ही लिया जाता रहा है। दिल्ली में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद भाजपा के अहम सहयोगी जनता दल यूनाइटेड ने साफ कर दिया कि वो किसी भी हाल में साम्प्रदायिक छवि वाले किसी भी नेता को बतौर प्रधानमंत्री स्वीकार नहीं करेगा। अपने सिद्धांतों का हवाला देकर साम्प्रदायिकता से किनारा करते जदयू के इस निर्णय को मोदी से किनारा करने के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। मोदी का नाम लिए बगैर जदयू के आला नेताओं ने भाजपा को साफ संकेत दे दिया है कि लोकसभा चुनाव में वो किसी भी हाल में मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर स्वीकार नहीं करने वाले। अगर बारीकी से प्रधानमंत्री पद को लेकर जारी ऊहापोह एवं सियासत के सागर मंथन को देखें तो पैमाने की सुई धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता पर ही जाकर ठहरती है। शब्दार्थ के हिसाब से धर्मनिरपेक्षता के मायने बेशक कुछ और हों मगर सियासत में तो धर्मनिरपेक्षता को अलग-अलग राजनीतिक दलों द्वारा अपने-अपने ढंग से ही परिभाषित किया जाता रहा है।
जनता दल यूनाइटेड की दो दिवसीय बैठक का ज्यादा हिस्सा अप्रत्यक्ष रूप से मोदी को निशाना बनाने एवं खुद को धर्मनिरपेक्ष साबित करने के नाम रहा। नीतीश कुमार ने साफ तौर पर कहा कि देश को अटल जी जैसा सबको जोड़कर चलने वाला प्रधानमंत्री चाहिए जो समय आने पर टोपी भी पहन सकता हो। नीतीश कुमार द्वारा अपने भाषण में जिस टोपी का जिक्र किया गया सियासत में उसके निहितार्थ सबको पता है। भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए भी खुद को धर्मनिरपेक्ष साबित करने की कोई भी कोर-कसर जनता दल यूनाइटेड द्वारा इस बैठक में नहीं छोड़ी गयी। हालांकि, धर्मनिरपेक्षता पर अगर बात की जाये तो यह स्पष्ट होगा कि नीतीश कुमार की धर्मनिरपेक्षता के दायरे बहुत चयनित नजर आते हैं। नीतीश कुमार की धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा में राम-मंदिर आंदोलन के दौरान बाबरी मस्जिद मामले में आरोपी लालकृष्ण आडवाणी को सांप्रदायिक नहीं माना गया है जबकि बाबरी प्रकरण में लालकृष्ण आडवाणी का नाम प्राथमिकी में दर्ज किया गया था जो मामला अभी न्यायालय के अधीन है। सवाल ये है कि नीतीश कुमार की साम्प्रदायिकता का निशाना केवल मोदी ही क्यों बन रहे हैं? धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मोदी का विरोध करने वाले नीतीश कुमार के ऊपर यह सवाल उठना तो लाजि़मी है कि क्या नीतीश कुमार मोदी के अलावा समूची भाजपा को धर्मनिरपेक्षता के तराजू पर खरा पाते हैं? नीतीश कुमार की धर्मनिरपेक्षता की यह दोहरी नजर समझ से परे है कि गुजरात दंगों की जांच के लिए गठित एसआईटी द्वारा मोदी को क्लीन चिट दिये जाने के बावजूद मोदी नीतीश को साम्प्रदायिक लगते हैं जबकि बाबरी ध्वंस की साजिश के नामजद आरोपी आडवाणी धर्मनिरपेक्ष दिखाई देते। हालांकि, नीतीश कुमार जिस धर्मनिरपेक्षता के मापदंडों के आधार पर मोदी विरोधी सियासत करते नजर आ रहे हैं उससे वो कोई राष्ट्रीय राजनीतिक मकसद साध रहे हों कतई नहीं लगता। बल्कि इसमें भी उनकी बिहार की क्षेत्रीय सियासत के नफे-नुकसान ही नज़र आते हैं।
नीतीश कुमार द्वारा धर्मनिरपेक्षता की सियासत का जो शिगूफा छोड़ा जा रहा है उसके मूलत: दो उद्देश्य नजर आते हैं। बिना नाम लिए मोदी के खिलाफ छेड़ी गई इस जंग का पहला उद्देश्य यह है कि किसी भी तरह मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए आगे आने से रोका जाये। मोदी के विरोध के बहाने नीतीश कुमार कोई राष्ट्रीय राजनीति नहीं कर रहे बल्कि वो बिहार की राजनीति ही करते नजर आ रहे हैं। मोदी का चेहरा आगे आना उनकी स्थानीय सियासत के समीकरणों को सूट नहीं करेगा। बिहार का मुस्लिम मतदाता लालू प्रसाद यादव की राजद से दूर होकर नीतीश कुमार के साथ खड़ा है और नीतीश की सरकार बनाने में उसका अहम योगदान भी है। अगर नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए आगे किये जाते हैं तो नीतीश के सामने भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए उन मुस्लिम वोटर्स को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती साबित होगी। नीतीश कुमार आगामी लोकसभा चुनाव में अपने स्थानीय राजनीतिक समीकरणों के साथ कोई जोखिम नहीं लेना चाहते। नीतीश कुमार अभी बिहार की राजनीति तक ही खुद को सीमित रखना चाहते हैं और राष्ट्रीय राजनीति में प्रत्यक्ष सहभागिता करने की उनकी कोई रुचि नहीं है जैसी कि मोदी को है। लेकिन नीतीश कुमार की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का दायरा इतना तो है ही कि वो अपने समकक्ष, किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को राष्ट्रीय मंच पर आसानी से नहीं आने देना चाहेंगे। आज से नहीं बल्कि काफी समय से विकास पुरुष बनाम सुशासन बाबु की बहस होती रही है। ऐसे में नीतीश का मोदी विरोधी होना इस दृष्टिकोण से भी स्वाभाविकता के अनुरूप लगता है।
खैर मोदी विरोध की वजहें नीतीश कुमार द्वारा चाहे जो भी बताई जायें मगर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर केवल मोदी से आपत्ति जताना किसी भी गैर भाजपाई अथवा गैर एनडीए नेता अथवा कार्यकर्ता को रास नहीं आ रहा। केन्द्र की राजनीति के रास्ते अपनी स्थानीय राजनीति की बुनियाद को पुख्ता कर रहे नीतीश कुमार बेशक आज अटल बिहारी वाजपेयी की नजीर देते दिख रहे हों लेकिन बुनियादी सच्चाई तो यही है कि धर्मनिरपेक्षता के बहाने मोदी की राह में रोड़ा अटकाने का काम नीतीश कुमार द्वारा आगे भी किया जाता रहेगा। नीतीश कुमार द्वारा दिये गए भाषण से भाजपा के कई दिग्गज मन ही मन प्रसन्न भी होंगे और वक्त आने पर इसका समर्थन भी करेंगे। कांग्रेस के साथ न जाने एवं मोदी विरोधी शर्तों पर गठबंधन में कायम रहने के साथ-साथ जदयू द्वारा लोकसभा चुनाव से पहले दिसंबर तक भाजपा को अपना पत्ता खोलने की नसीहत भी दी गयी है। हालांकि, जनता दल यूनाइटेड के लिए भी वर्तमान में प्रमुख चुनौती यह है कि वह अपने आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारी गठबंधन के अनुरूप करे या अकेले करे। इतना तो मान लिया जाना चाहिए कि अगर मोदी आते हैं तो जनता दल यूनाइटेड द्वारा गठबंधन तोड़ लिया जाएगा। जदयू कभी भी बिहार के राजनीतिक समीकरण के साथ समझौता नहीं कर सकती क्योंकि केंद्रीय राजनीति में उसके पास भाजपा के अलावा भी अन्य विकल्प मिलेंगे मगर बिहार हाथ से जाने के बाद उसके पास कुछ नहीं बचेगा।
जनता दल यूनाइटेड की दो दिवसीय बैठक का ज्यादा हिस्सा अप्रत्यक्ष रूप से मोदी को निशाना बनाने एवं खुद को धर्मनिरपेक्ष साबित करने के नाम रहा। नीतीश कुमार ने साफ तौर पर कहा कि देश को अटल जी जैसा सबको जोड़कर चलने वाला प्रधानमंत्री चाहिए जो समय आने पर टोपी भी पहन सकता हो। नीतीश कुमार द्वारा अपने भाषण में जिस टोपी का जिक्र किया गया सियासत में उसके निहितार्थ सबको पता है। भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए भी खुद को धर्मनिरपेक्ष साबित करने की कोई भी कोर-कसर जनता दल यूनाइटेड द्वारा इस बैठक में नहीं छोड़ी गयी। हालांकि, धर्मनिरपेक्षता पर अगर बात की जाये तो यह स्पष्ट होगा कि नीतीश कुमार की धर्मनिरपेक्षता के दायरे बहुत चयनित नजर आते हैं। नीतीश कुमार की धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा में राम-मंदिर आंदोलन के दौरान बाबरी मस्जिद मामले में आरोपी लालकृष्ण आडवाणी को सांप्रदायिक नहीं माना गया है जबकि बाबरी प्रकरण में लालकृष्ण आडवाणी का नाम प्राथमिकी में दर्ज किया गया था जो मामला अभी न्यायालय के अधीन है। सवाल ये है कि नीतीश कुमार की साम्प्रदायिकता का निशाना केवल मोदी ही क्यों बन रहे हैं? धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मोदी का विरोध करने वाले नीतीश कुमार के ऊपर यह सवाल उठना तो लाजि़मी है कि क्या नीतीश कुमार मोदी के अलावा समूची भाजपा को धर्मनिरपेक्षता के तराजू पर खरा पाते हैं? नीतीश कुमार की धर्मनिरपेक्षता की यह दोहरी नजर समझ से परे है कि गुजरात दंगों की जांच के लिए गठित एसआईटी द्वारा मोदी को क्लीन चिट दिये जाने के बावजूद मोदी नीतीश को साम्प्रदायिक लगते हैं जबकि बाबरी ध्वंस की साजिश के नामजद आरोपी आडवाणी धर्मनिरपेक्ष दिखाई देते। हालांकि, नीतीश कुमार जिस धर्मनिरपेक्षता के मापदंडों के आधार पर मोदी विरोधी सियासत करते नजर आ रहे हैं उससे वो कोई राष्ट्रीय राजनीतिक मकसद साध रहे हों कतई नहीं लगता। बल्कि इसमें भी उनकी बिहार की क्षेत्रीय सियासत के नफे-नुकसान ही नज़र आते हैं।
नीतीश कुमार द्वारा धर्मनिरपेक्षता की सियासत का जो शिगूफा छोड़ा जा रहा है उसके मूलत: दो उद्देश्य नजर आते हैं। बिना नाम लिए मोदी के खिलाफ छेड़ी गई इस जंग का पहला उद्देश्य यह है कि किसी भी तरह मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए आगे आने से रोका जाये। मोदी के विरोध के बहाने नीतीश कुमार कोई राष्ट्रीय राजनीति नहीं कर रहे बल्कि वो बिहार की राजनीति ही करते नजर आ रहे हैं। मोदी का चेहरा आगे आना उनकी स्थानीय सियासत के समीकरणों को सूट नहीं करेगा। बिहार का मुस्लिम मतदाता लालू प्रसाद यादव की राजद से दूर होकर नीतीश कुमार के साथ खड़ा है और नीतीश की सरकार बनाने में उसका अहम योगदान भी है। अगर नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए आगे किये जाते हैं तो नीतीश के सामने भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए उन मुस्लिम वोटर्स को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती साबित होगी। नीतीश कुमार आगामी लोकसभा चुनाव में अपने स्थानीय राजनीतिक समीकरणों के साथ कोई जोखिम नहीं लेना चाहते। नीतीश कुमार अभी बिहार की राजनीति तक ही खुद को सीमित रखना चाहते हैं और राष्ट्रीय राजनीति में प्रत्यक्ष सहभागिता करने की उनकी कोई रुचि नहीं है जैसी कि मोदी को है। लेकिन नीतीश कुमार की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का दायरा इतना तो है ही कि वो अपने समकक्ष, किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को राष्ट्रीय मंच पर आसानी से नहीं आने देना चाहेंगे। आज से नहीं बल्कि काफी समय से विकास पुरुष बनाम सुशासन बाबु की बहस होती रही है। ऐसे में नीतीश का मोदी विरोधी होना इस दृष्टिकोण से भी स्वाभाविकता के अनुरूप लगता है।
खैर मोदी विरोध की वजहें नीतीश कुमार द्वारा चाहे जो भी बताई जायें मगर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर केवल मोदी से आपत्ति जताना किसी भी गैर भाजपाई अथवा गैर एनडीए नेता अथवा कार्यकर्ता को रास नहीं आ रहा। केन्द्र की राजनीति के रास्ते अपनी स्थानीय राजनीति की बुनियाद को पुख्ता कर रहे नीतीश कुमार बेशक आज अटल बिहारी वाजपेयी की नजीर देते दिख रहे हों लेकिन बुनियादी सच्चाई तो यही है कि धर्मनिरपेक्षता के बहाने मोदी की राह में रोड़ा अटकाने का काम नीतीश कुमार द्वारा आगे भी किया जाता रहेगा। नीतीश कुमार द्वारा दिये गए भाषण से भाजपा के कई दिग्गज मन ही मन प्रसन्न भी होंगे और वक्त आने पर इसका समर्थन भी करेंगे। कांग्रेस के साथ न जाने एवं मोदी विरोधी शर्तों पर गठबंधन में कायम रहने के साथ-साथ जदयू द्वारा लोकसभा चुनाव से पहले दिसंबर तक भाजपा को अपना पत्ता खोलने की नसीहत भी दी गयी है। हालांकि, जनता दल यूनाइटेड के लिए भी वर्तमान में प्रमुख चुनौती यह है कि वह अपने आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारी गठबंधन के अनुरूप करे या अकेले करे। इतना तो मान लिया जाना चाहिए कि अगर मोदी आते हैं तो जनता दल यूनाइटेड द्वारा गठबंधन तोड़ लिया जाएगा। जदयू कभी भी बिहार के राजनीतिक समीकरण के साथ समझौता नहीं कर सकती क्योंकि केंद्रीय राजनीति में उसके पास भाजपा के अलावा भी अन्य विकल्प मिलेंगे मगर बिहार हाथ से जाने के बाद उसके पास कुछ नहीं बचेगा।
शिवानन्द द्विवेदी सहर

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