शनिवार, 27 अप्रैल 2013

न्याय की लड़ाई में भारतीय भाषाएँ : राष्ट्रीय सहारा में प्रकशित मेरा लेख



28-अप्रैल-13

न्याय की अर्जी का अधिकार तो देश के हर आम और खास व्यक्ति को समान रूप से प्राप्त है ! न्याय एक ऐसा मसला है जिसको लेकर कई स्तरों पर बहुआयामी विमर्श चलते रहे हैं ! इस दिशा में चल रहे तमाम विमर्शों के बीच आज न्याय और न्यायालयों में प्रयोग की जानी वाली भाषा से जुड़ी बहस मुख्यधारा का विषय बनी हुई है ! संवैधानिक रूप से कई ऐसे बिंदु हैं जो वाकई इस विषय को ना सिर्फ गंभीर बल्कि भारतीय भाषाओं के नजरिये से चिंतनीय भी बनाते हैं ! संवैधानिक मानकों के आधार पर अगर देखा जाय तो न्यायिक प्रक्रियाओं में हिन्दी सहित तमाम भारतीय भाषाओं की स्थिति हाशिए पर नजर आती है ! हिन्दी सहित तमाम भारतीय भाषाओं को लेकर भारतीय संविधान की धारा 348 खण्ड एक के तहत निर्धारित प्रावधान में यह स्पष्ट तौर पर लिखा गया है कि उच्च न्यायलय एवं सर्वोच्च न्यायालय में अंग्रेजी को ही अनिवार्य भाषा के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है ! इस प्रावधान का सबसे आश्चर्यजनक पहलू ये है कि आम जनता के न्यायिक गुहार के इन मंचों पर भारत की राजभाषा हिन्दी तक को भी स्वीकृति नहीं दी गयी है ! संविधान की इसी धारा के खण्ड दो के तहत यह प्रावधान है कि अगर किसी राज्य के उच्च न्यायालय को अंग्रेजी की बजाय हिन्दी में कोई कार्यवाही करनी हो तो उस राज्य के राज्यपाल द्वारा पहले राष्ट्रपति से अनुमति लेना अनिवार्य होगा ! इस नियम के तहत सन 2002 में मध्यप्रदेश एवं 2010 में गुजरात सहित एकाध और राज्यों के राज्यपालों द्वारा किसी मामले से सम्बंधित कार्य को हिन्दी में करने की अनुमति मांगी गयी जिसे तत्कालीन राष्ट्प्रमुखों द्वारा स्वीकार नहीं किया गया ! भारतीय संविधान में निहित इस विधान के बारे में आज आम जनता को बेशक ज्यादा कुछ ना पता हो लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से इसका खामियाजा तो कहीं ना कहीं उन्हें ही भुगतना पड़ता है ! आखिर किन अध्ययनों अथवा किन तर्कों के आधार पर भारतीय संविधान में निहित भाषाओं से सम्बंधित इस विधान को स्वीकृति दी गयी है यह समझ से परे है ! भारत की कुल जनसँख्या को अगर भाषाई मापदंडों  के आधार पर वर्गीकृत करके देखें तो जो आंकड़े प्राप्त होते हैं उनसे यह स्पष्ट होगा कि संविधान में निहित यह विधान पूरी तरह से अन्यायपूर्ण एवं जनभावना का विरोधी है ! 2001 जनगणना में प्राप्त भाषाई ग्राफ के अनुसार भारत की कुल 43% जनसँख्या हिन्दी को अपनी प्रथम भाषा के तौर पर स्वीकार करती है जबकि 30 % से ज्यादा लोग हिन्दी को द्वितीय वरीयता देते हुए अपनी क्षेत्रीय भाषाओं को प्रथम भाषा मानते हैं! वहीँ दूसरी तरफ अंग्रेजी को अपनी प्रथम भाषा मानने वाले लोगों की कुल जनसँख्या दो लाख छब्बीस हजार के आस-पास है जो तत्कालीन कुल जनसँख्या की 0.2% के लगभग है ! इन आंकड़ों को देखने के बाद पहला सवाल यही उठता है कि क्या इन्ही 0.2% लोगो को ध्यान में रख कर न्यायिक प्रक्रिया का यह भाषाई पैमाना तय किया गया है या इसके पीछे सरकार का कोई और तर्क भी है ? जिस देश 99.98% आबादी अंग्रेजी को अपनी प्रथम भाषा के रूप में स्वीकार तक नहीं करती है उस देश की समूची उच्च न्यायिक प्रक्रिया में ना सिर्फ अंग्रेजी  का अनिवार्य होना  एवं अन्य सभी भारतीय भाषाओं का  कानूनी तौर पर प्रतिबंधित होना बेहद अप्रासंगिक एवं अतार्किक प्रतीत होता है !
      दरअसल यहाँ सवाल किसी भाषा के उत्थान या पतन का नहीं है ! यहाँ सवाल भाषा के साथ हो रहे अन्याय एवं उस भाषा को बोलने वाले लोगों की व्यवस्था में हिस्सेदारी का है ! बिना किसी तर्क एवं बिना किसी तरह का सामाजिक अध्ययन किये  देश की समूची उच्च न्यायिक व्यवस्था में अंग्रेजी थोपने के साथ-साथ हिन्दी सहित तमाम भारतीय भाषाओं को प्रतिबंधित करने का सीधा अर्थ है कि यह नियम बहुसंख्यक जनता के न्यायिक अभिव्यक्ति के माध्यम को हाशिए पर लाने का काम कर रहा है ! अगर कोई व्यक्ति अपनी स्वेच्छा की भाषा में न्याय की अर्जी तक नहीं दाखिल कर सकता तो इसे व्यक्ति के भाषाई अधिकार का हनन नहीं तो और क्या कहा जाय ! हालाकि न्यायिक प्रक्रियाओं में बहुभाषाई मान्यता का विरोध करने के पीछे सरकारी तर्क ये है कि इससे संसाधन का खर्च बढ़ेगा और प्रक्रिया में जटिलता आयेगी ! सरकार की तरफ से दिये जाने वाला यह तर्क इस नजरिये से बेहद आधारहीन लगता है कि जिस भौगोलिक समाज का मात्र .2%  हिस्सा जिस भाषा को अपनी प्रथम भाषा मानता है उस भाषा को सहज मानकर अनिवार्य कर दिया गया है  जबकि 99.98% लोगों की भाषाओं को जटिलता का तर्क देकर प्रतिबंधित कर दिया गया है ! बहुभाषाई समाज वाला देश होने के बावजूद भी अगर हिन्दी को अपनी प्रथम भाषा मानने वालों की संख्या इस देश में आज भी सबसे ज्यादा है तो फिर समाज के लिए कार्यरत विभागों अथवा संस्थाओं की भाषा भी वही क्यों ना हो जो समाज की भाषा है ! इसमें किसी को दो राय नहीं होनी चाहिए कि न्यायाधीश एवं न्यायलय समाज के लिए बने हैं ना कि समाज न्यायलय एवं न्यायाधीश के लिए ! अत: अगर जटिलता एवं सुविधा का पैमाना जनता एवं समाज की सहूलियत के मापदंडों को आधारभूत मानकर  तय किया जाना चाहिए ना कि विभागों एवं संस्थाओं के सहूलियत के मापदंडों के आधार पर  ! भाषाओं को लेकर जिन न्यायिक विधानों का दुष्चक्र खड़ा किया गया है उनमे कहीं ना कहीं आम आदमी की समस्याएं हाशिए पर जा चुकी हैं ! लोकतंत्र में न्याय की लड़ाई सबसे अहम एवं प्रमुख है और समाज के विभिन्न पहलुओं पर चल रही न्याय की लड़ाईयों के दायरों से भाषाई संघर्षों को अलग नहीं रखा जाना चाहिए ! यह विधान भारतीय भाषाओं के साथ महज भेदभाव का विषय ना होकर न्यायिक संघर्षों का विषय है जिसको लेकर भाषाई लड़ाई को आगे बढाने की जरुरत है ! नौकरियों की नियुक्ति प्रक्रिया में अंग्रेजी अनिवार्य करने की बजाय सही कदम यह होना चाहिए कि भाषाई अनिवार्यता से मुक्त नियुक्ति करने के पश्चात जरूरी भाषा का प्रशिक्षण प्रदान किया जाय ! भाषा के आधार पर अगर अवसर में कटौती की जाती है तो इसे भी भाषाओं के साथ भेदभाव का ही एक उदाहरण माना जा सकता है ! भारतीय भाषाओं के साथ संवैधानिक नियामकों की आड़ लेकर किये जा रहे इस अन्याय पूर्ण रवैये को लेकर लगभग चार महीने से दिल्ली कोंग्रेस मुख्यालय के सामने धरने पर बैठे आइआईटीयन श्याम रूद्र पाठक साफ़ तौर पर कहते हैं “यह पूरा मसला भाषाई न्याय से जुड़ा है ना कि उत्थान और पतन से जुड़ा है !”
      अंग्रेजी को बतौर भाषा स्वीकार करने अथवा सुविधानुसार अपने कार्यों में प्रयोग करने से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि किसी भी भाषा एवं उस भाषा को बोलने वाले समाज के साथ अन्याय ना हो ! न्याय के दरवाजे पर ही अगर भाषाओं के साथ इस कदर अन्यायपूर्ण दोहरा रवैया अपनाया जा रहा है तो यह निश्चित तौर पर बेहद दुर्भाग्यपूर्ण हैं ! समाज में रहने वाले लोग एवं उनके द्वारा बोली जाने वाली प्रथम भाषा में अगर उनको न्यायिक अपील करने तक का हक नहीं मिलेगा तो भला न्याय के अन्य पहलूओं पर कैसे विश्वस्त हुआ जा सकता है ! कम से कम संघ स्तर पर त्रिभाषीय पद्धति की स्वीकृति तो मिलनी ही चाहिए ! इस दिशा में राज्य स्तर पर पहल शुरू हो चुकी है एवं कुछ राज्यों जैसे बिहार,राजस्थान,मध्यप्रदेश आदि में इस प्रावधान में बदलाव भी किया गया है मगर संघ स्तर पर अभी व्यापक संघर्ष जारी रखने की जरुरत है ! संसाधनों एवं जटिलताओं के बहाने भाषाओं के साथ हो रहे इस अन्यायपूर्ण दोहरापन से बचकर इनको इनका वाजिब हक दिये जाने की जरुरत है !
  

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