शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

बदहाली की ओर गन्ने की खेती : अमर उजाला कॉम्पैक्ट में (6-अप्रैल-13) को प्रकाशित मेरा लेख


उत्तर प्रदेश में गन्ने की खेती अब तक के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है! पिछले कुछ वर्षों में लगातार चीनी उत्पादन में कमी इस बात का सुबूत है कि प्रदेश में गन्ना खेती के हालात बहुत बेहतर नहीं हैं! एक दौर में देश के कुल चीनी उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश से आता था, लेकिन उसमें अब साल-दर-साल कमी होती जा रही है! पिछले कई वर्षों से यह देखने को मिल रहा है कि चीनी उत्पादन के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश अपने तय लक्ष्यों को छू पाने में लगातार विफल साबित हुआ है! आज न तो पहले की तरह गन्ने की लहलहाती खेती नजर आती है और न ही गन्ना पेराई के लघु उद्योग के रूप में क्रेशर मशीनें ही दिखती हैं! ज्यादातर चीनी मिलें बंद हो चुकी हैं और जो मिलें बची हैं, वे जर्जर अवस्था में हैं।
एक वह भी दौर था, जब केवल पूर्वांचल के गोरखपुर मंडल में दो दर्जन से ज्यादा चीनी मिलें चलती थीं और चीनी उत्पादन होता था! लेकिन आज स्थिति यह है कि गन्ना उत्पादन में अग्रणी देवरिया जिले की पांच में से चार सरकारी चीनी मिलें वर्षों से ठप पड़ी हैं, जबकि एक मात्र चीनी मिल किसी निजी के कंपनी के नियंत्रण में चल रही है! हालाकि अब उन चीनी मिलों को सरकारी भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि लगभग सभी चीनी मिलों को सरकार ने निजी कंपनियों के हाथों बिना किसी उचित करार और कीमत के बेच दिया है! पूर्वांचल में चीनी मिलों और गन्ने की खेती की दुर्दशा पर प्रख्यात भोजपुरी कवि एन डी देहाती ने ठीक ही लिखा है, ना उंख लऊकी ना ही उखियार बबुआ, नाही लऊकी कवनो गांवे कोल्हार बबुआ...!
पिछले डेढ़ दशकों में तेजी से बंद हुई चीनी मिलों के साथ-साथ गन्ने की खेती के प्रति किसानों के मोहभंग को समझने की कोशिश करें, तो कई सवाल सामने आ खड़े होते हैं! बड़ा सवाल यह कि आखिर किन वजहों से पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में चीनी मिलें बंद हुईं ? क्या गन्ने की खेती से मोहभंग के लिए यही तो जिम्मेदार नहीं है?
असल में गन्ना खेती के प्रति किसानों की उदासीनता की कई वजहें हैं। सही समय पर उनके उत्पादों का वाजिब भुगतान न होना किसानों के मोहभंग के प्रमुख कारणों में से एक है! गन्ना किसानों का साफ कहना है कि अगर उनके उत्पादों का उचित मूल्य समय पर नहीं मिलेगा, तो वे आखिर क्यों इसकी खेती करेंगे! गन्ना किसानों के भुगतान के मामले में हमेशा से ही सहकारी चीनी मिलों का रवैया बहुत ही लेट-लतीफ रहा है! महीनों इंतजार के बाद चीनी मिलों द्वारा मनमाने ढंग से भुगतान करने के चलते किसानों का रुझान गन्ने की खेती से निरंतर टूटता गया है! प्रदेश के ज्यादातर गन्ना किसान इसे घाटे का सौदा मानते हैं! अभी पिछले वर्ष ही प्रदेश की सभी चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का संयुक्त बकाया लगभग 900 करोड़ रुपये के आसपास था, जिसका अब तक पूरी तरह से भुगतान नहीं किया जा सका है! इसके अलावा, गन्ने में रोगों के कारण भी उत्पादन घटा है।
हालांकि उत्तर प्रदेश की सरकारों का रुख भी बहुत सकारात्मक नहीं रहा है! घाटे के नाम पर बंद हुई दर्जनों से ज्यादा सहकारी चीनी मिलों को पुनः: संचालित करने की दिशा में कोई प्रयास करने के बजाय सरकारों ने उन्हें निजी कंपनियों के हाथों औने-पौने दामों पर बेच दिया। अरबों की संपत्ति को महज कुछ करोड़ में बेच देने वाली सरकारों की नीयत पर सवाल इसलिए भी उठते हैं, क्योंकि गन्ने की खेती की बदहाली में सरकार के इस कदम का काफी योगदान है। इसके अलावा इस पूरे खरीद-फरोख्त में भ्रष्टाचार का भी अंदेशा जताया जा रहा है, जिसे खारिज नहीं किया जा सकता।
गन्ने की खेती में हो रही कमी का सीधा असर चीनी की कीमतों पर पड़ने वाला है! किसानों के मोहभंग के कारण ही गन्ना उत्पादन घटने से चीनी की कीमतें नियंत्रण से बाहर होती जा रही हैं। जब तक इस स्थिति को बदलने के लिए सरकारी स्तर पर ठोस प्रयास नहीं किए जाएंगे, तब तक चीनी उत्पादन के लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकता। 
शिवानन्द  द्विवेदी सहर 


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