बुधवार, 31 जुलाई 2013

दवा परीक्षण क़ानून में सुधार जरूरी : दैनिक डीएनए में प्रकाशित मेरा लेख


  • शिवानन्द द्विवेदी सहर

भारत दवा परीक्षण के नाम पर धडल्ले से की जा रही काली कमाई एवं मरीजों के जीवन से खिलवाड़ की घटना अब देश की राजधानी दिल्ली के बड़े अस्पतालों तक अपनी जड़ें जमाने में कामयाब हो चुकी है ! कुछ ही महीने पहले एक खबर में यह बात सामने आई थी कि दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में सैकड़ों की संख्या में बच्चों पर अवैध ढंग से दवाओं का  परीक्षण किया जा रहा है ! रिपोर्ट के मुताबिक़ सैकड़ों मासूमो पर किये गये नई दवाओं के परीक्षण में उनकों अथवा उनके अभिभावकों को अँधेरे में रखा गया था ! हालाकि भारत में दवाओं के अवैध ढंग से हो रहा परीक्षण कोई नई बात नहीं है ! इसको लेकर आये दिन सवाल उठते रहे हैं और विभिन्न संगठनों द्वारा चिंता जताई जाती रही है ! लेकिन अब चुकि मामला देश की राजधानी दिल्ली के सबसे प्रतिष्ठित अस्पतालो में से एक सफदरजंग तक पहुच चुका है तो इसके प्रति अत्यधिक गंभीर होने की जरुरत है  ! दरअसल, दवा परीक्षण के बढते अवैध कारोबार की वजहों पर अगर विचार किया  जाय तो सबसे पहली खामी दवा परीक्षण क़ानून में ही नजर आती है !दवा परीक्षण के मामले में भारतीय क़ानून पूरी तरह से निष्क्रिय एवं नाकाफी साबित हो रहा है ! दवा परीक्षण के  संदर्भ में दुनिया के अन्य देशों से भारतीय क़ानून की तुलना करने पर यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हमारा कानून महज निष्क्रिय नियामकों का पुलिंदा होने के अलावा कुछ भी नहीं  है ! जबकि अवैध दवा परीक्षण  के बढ़ रहे मामलों की  गंभीरता को देखते हुए इसमें तमाम स्तरों पर सुधारों की जरुरत बहुत पहले से जताई जा रही  है ! दरअसल नए दवाओं का परीक्षण बेहद खतरनाक होता है और उसके तमाम दुष्परिणामों की गुंजाइश रहती है ! अत: दुनिया के तमाम विकसित एवं विकासशील देश नए रसायनों के खतरों से सावधानी बरतते हुए  अपने यहाँ दवाओं के परीक्षण के शुरुआती तीन चरणों की कानूनी तौर पर इजाजत तक नहीं देते हैं ! जबकि,भारत में दवाओं के परीक्षण की कानूनी तौर पर इजाजत है ! नजीर के तौर पर अगर देखा जाय तो सन 2005 से लेकर अबतक भारत में कुल 475 नए दवाओं के परीक्षण की कानूनी तौर पर इजाजत दी गयी है ! बताना जरूरी होगा कि नए दवाओं का परीक्षण सबसे ज्यादा जोखिम भरा परीक्षण होता है जिसके अत्यंत गंभीर परिणाम आने का डर रहता हैं ! इन 475 दवाओं के परिक्षण के लिए कुल 57,303 मरीजों के समूह को लिया गया था जिनमे अबतक 39,022 मरीजों का परीक्षण काल पूरा हो चुका है जबकि 18,281 मरीज अभी भी अंडर क्लिनिकल ट्रायल हैं !475 दवाओं के परिक्षण और 39,022 मरीजों के इस्तेमाल के बाद मात्र 17 दवाओं को बाजार में उतारने की अनुमति प्राप्त हो पाई है जबकि शेष बहुत सारी दवाओं को मरीजों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक माना जा चुका है ! अब बड़ा सवाल ये उठता है कि अब तक हुए कुल 475 दवाओं के परीक्षण में अगर मात्र 17 दवाओं को ठीक माना गया है तो क्या जिन दवाओं को स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं माना गया उन दवाओं का  कुप्रभाव मरीजों के स्वास्थ्य पर नहीं पड़ा होगा ?  आंकड़े बताते हैं कि पिछले आठ सालों में चले इन दवाओं के परीक्षणों के दौरान कुल 2644 लोगों की मौत हुई जिनमे कानूनी लचरता की वजह  से मात्र 80 लोगों के ही मौत की पुष्टि दवाओं के परीक्षण के कारण की जा सकी है  जबकि इन आंकड़ो की वास्तविकता कुछ और ही है  ! दवा परीक्षण क़ानून की लचरता का इससे बड़ा प्रमाण भला और क्या होगा कि मरीजों पर दवाओं के परिक्षण के दौरान मृत्यु होने की दशा में अथवा  स्वास्थ्य क्षतिपूर्ति के संबंध में पीड़ित पक्ष को मुआवजा दिये जाने एवं  वीमा कराये जाने  सम्बन्धी  कोई ठोस क़ानून ना होने की वजह से अभी तक मात्र 40 मृतकों के परिजनों को दवा कंपनियों द्वारा मनमाने ढंग से औनी-पौनी राशि मुआवजे के तौर पर दी गयी  है ! औषधि एवं प्रसाधन क़ानून 1945  में संशोधन प्रस्ताव 2005 लाये जाने के बावजूद परिक्षण के दौरान सबसे ज्यादा खतरे के घेरे में रहने वाले मरीजों के मुआवजे एवं वीमा आदि के संबंध में कोई ख्याल नहीं रखा गया !जिन गिने-चुने मरीजों के नाम मुआवजे की राशि दी भी गयी तो उस राशि एवं उन्ही दवा कंपनियों द्वारा अन्य देशों में पीडितों को दी जाने वाली मुआवजा राशि में भारी दोहरापन का रवैया कंपनियों द्वारा बरता गया   ! 2011 में जिस कंपनी ने दवा परिक्षण के दौरान हुई एक स्त्री की मौत के मुआवजे के तौर पर नाइजीरिया में लगभग अस्सी लाख रुपये का  मुआवजा दिया उसी कंपनी ने भारत में हुई एक मौत पर मात्र ढाई लाख रुपये मुआवजे के तौर पर दिया ! मुआवजे कि राशि को लेकर ठोस कानूनी प्रावधान ना होने की वजह से दवा कम्पनियाँ अपने मनमाने कीमतों पर जिंदगियों का  सौदा करती  रही हैं ! कानूनी तौर पर लचर एवं दवा कंपनियों के अनुकूल प्रावधान होने की वजह से ही दवाओं के परिक्षण के नजरिये से विदेशी दवा कंपनियों द्वारा बड़ी संख्या में भारत का रुख किया जा रहा है ! दवा परीक्षण के अवैध मामलों पर सख्त कानूनी कार्यवाही का प्रावधान ना होने की वजह से ही सरकार द्वारा अनुमति प्राप्त 475  नए रसायनों के अलावा लगभग 1500 अन्य दवाओं का परिक्षण वैध एवं अवैध तरीके से देश के तमाम अस्पतालों एवं संस्थानों में किया जा रहा है ! स्वास्थ्य के खतरों से बेपरवाह स्वास्थ्य मंत्रालय भी अभी तक इस मसले पर चुप्पी ही साधे हुआ था, लेकिन  सर्वोच्च न्यायलय के समय-समय पर किये जाते रहे हस्तक्षेप के बाद यह मामला स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिवों के हाथ पहुँच सका  है !हाल ही में सम्बंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए  3 जनवरी 2013 को माननीय सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर.एम लोढा एवं न्यायमूर्ति आर दवे की खंड्फीठ द्वारा दिये गए सख्त निर्देश में यह कहा गया कि हर तरह के दवा परीक्षण स्वास्थ्य सचिवों की देख-रेख में ही किये जाए एवं मरीजों को इस बात से पहले ही अवगत कराया जाय कि उनके ऊपर उक्त दवाओं का परीक्षण किया जा रहा है ! मरीज को यह बताना अनिवार्य होगा कि उक्त दवा के परिक्षण से उसके स्वास्थ्य पर किस तरह के नाकारत्मक प्रभाव के पड़ने की संभावना है ! साथ ही मरीज का स्वास्थ्य वीमा लेना अनिवार्य होगा ! इस मसले पर सख्त होते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने इन नियमों का उलंघन करने वालों पर 5 से 10 साल की कैंद की भी सिफारिश की  है  !
      हालाकि माननीय सर्वोच्च न्यायलय के सख्त निर्देश के बावजूद भी ऐसे मामले सिर्फ इस वजह से रुकने का नाम नहीं ले रहे क्योंकि दवा परीक्षण का यह गोरखधंधा वर्तमान में लागू क़ानून की पकड़ से परे है ! इस दिशा में सबसे पहली पहल यही होनी चाहिए  कि दवा परीक्षण क़ानून में व्यापक सुधार लाते हुए दवा परीक्षण के लिए अनुमति प्रक्रिया को सख्त एवं जटिल बनाया जाय ताकी दवा कंपनियों द्वारा भारत को दवा परीक्षण की प्रयोगशाला के तौर पर प्रयोग करने से रोका जा सके   ! साथ ही मुआवजे,वीमा आदि को लेकर कंपनियों की जवाबदेही के प्रति पुख्ता नियामक भी तय किये जाने की सख्त जरुरत है ! दवा परीक्षण में शामिल चिकित्सकों की जवाबदेही भी कानूनी तौर तय किये जाने चाहिए वरना करोंडो के लालच में चिकित्सक भी दवाओं नाम जहर का घोल मासूम मरीजों को पिलाते  रहेंगे ! खतरनाक होते दवा परीक्षण के इस धंधे पर कानूनी नकेल कसे बिना नियंत्रण संभव नहीं है !

बुधवार, 24 जुलाई 2013

यूपी में फिर सुलग रहा आरक्षण का मुद्दा :दैनिक जागरण नेशनल में यह लेख


  • शिवानन्द द्विवेदी सहर 

आगामी लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आते जा रहे हैं सभी राजनितिक दलों द्वारा सियासत की विसात पर अपने-अपने ताल पैंतरे बिछाने का काम शुरू हो गया है ! लोकसभा चुनावों के लिहाज से उत्तरप्रदेश भारत का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे अधिक सीटों वाला राज्य है जहाँ से कुल अस्सी सांसद लोकसभा में चुनकर आते हैं ! अत: लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद सत्ता के समीकरणों में यूपी पर सबकी नज़रें होना लाजिमी है ! यूपी के राजनितिक समीकरणों पर अगर बात करें तो यूपी का राजनीतिक समीकरण बहुत हद तक जातिगत आधार पर तय होता है ! यह एक ऐसा राज्य है जहाँ बड़े-बड़े से मुद्दे भी जातिगत वोटबैंक की राजनीति के आगे घुटने टेकते नजर आते हैं ! अत: यूपी के अंदरूनी सियासी मिजाज के लिहाज से यहाँ  आरक्षण का मुद्दा सबसे ज्यादा फिट और सटीक बैठता नजर आता है ! ऐसा कहना इसलिए गलत नहीं होगा क्योंकि पिछले दो दशकों यूपी में सियासत जाति और धर्म के आधार पर सफलता से होती रही है और आरक्षण के मानक भी कुछ इसी तरह के हैं ! चाहें जाति के आधार पर 22% और 27% की राजनीति हो या पसमांदा समाज की राजनीति हो ! यूपी के हालिया मिजाज को देखें तो एक बार फिर आरक्षण पर सियासत की जमीन तैयार करने की कवायदें शुरू हो चुकी हैं,बेशक इस बार हथियार उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग को बनाया जा रहा है ! लोक सेवा आयोग की परीक्षा प्रणाली में तय आरक्षण नीति में बदलावों को जिस तरह से लागू किया गया है उसके आधार पर इस बात का पूरी संभावना जताई जा सकती है कि चुनावी तापमान का आभास होते ही यह चिंगारी लौ पकडती नजर आयेगी और परीक्षाओं में आरक्षण के नाम पर यूपी में ओबीसी का ध्रुवीकरण करने का पैंतरा सत्तारूढ़ दल द्वारा चल दिया जाएगा !  भविष्य के उन सियासी पैतरों की बुनियाद रखी जा चुकी है जिसका एक उदाहरण है इलाहाबाद लोक सेवा आयोग दफ्तर पर आरक्षण के खिलाफ हुआ प्रदर्शन ! आरक्षण की मूल मान्यता एवं उद्देश्य को अगर समझने का प्रयास करें तो यह एक संविधान निहित शब्द है ! सामाजिक न्याय एवं सत्ता से व्यवस्था तक में सभी वर्गों के लिए सामान अवसर एवं सामान प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए संवैधानिक स्तर पर आरक्षण नीति अपनाई गयी थी !लेकिन सामाजिक न्याय के नाम पर लाये गए आरक्षण का पिछले कुछ सालों में जितना दुरुपयोग राजनितिक दलों दवारा अपना सियासी पैंतरा साधने के लिए किया गया है,शायद ही किसी और मुद्दे का इतना दुरुपयोग किया गया होगा ! अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा प्रणाली की हालिया आरक्षण नीति को लेकर भारी बवाल देखने को मिला जिसमे आरक्षण के विरोध में चल रहा प्रदर्शन अचानक उग्र और हिंसात्मक हो गया ! उच्च स्तरीय परीक्षाओं में अगर तय आरक्षण नीति को देखें तो यह 1994 में लागू आरक्षण अधिनियम के तहत परीक्षा के अंतिम चयन में तय कोटे के हिसाब से आरक्षण नीति लागू करने का प्रावधान रखा गया है जो कि काफी हद तक न्यायोचित भी कहा जा सकता है ! लिहाजा, इस अधिनियम से सबकी हिस्सेदारी और सबके प्रतिनिधित्व की संभावनाओं को बल मिलता नजर आता है ! मगर 1994 में लागू आरक्षण अधिनियम को ताक पर रखते हुए उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर नई आरक्षण नीति वर्ष 2011 में लागू कर दी गयी ! आयोग द्वारा लागू इस नयी नीति के तहत ये प्रावधान रखा गया कि प्रारंभिक परीक्षा से लेकर मुख्य परीक्षा एव साक्षत्कार आदि सभी चरणों में आरक्षण प्रभावी होगा और सभी चरणों के परीक्षा परिणाम इसी नियामक के तहत जारी किये जायेंगे ! इस मामले में सबसे आश्चर्यजनक तथ्य ये है कि आयोग द्वारा इन नए नियामकों को त्वरित कार्यवाही करते हुए तब लागू किया जब 2011 के प्रारंभिक परीक्षा परिणाम निकल चुके थे ! सवाल उठाना लाजिमी है कि आखिर लोक सेवा आयोग द्वारा इतना बड़ा कदम इतनी जल्दीबाजी में क्यों उठाया गया ? हालाकि इस पुरे विवाद का दूसरा पक्ष ये भी है कि परीक्षा प्रणाली में आरक्षण नीति लागू करने का अधिकार आयोग को नहीं बल्कि राज्य और केन्द्र की सरकारों को है ! तार्किक तौर पर अगर उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा लागू किये गए इन नए नियामकों को देखें तो यह कई स्तरों पर न्यायिक मान्यताओं को खारिज करता नियामक प्रतीत होता है !इसमें कोई दो राय नहीं कि उत्तर प्रदेश में लागू इस नयी आरक्षण नीति के कई दुष्परिणाम हैं जिनको आयोग द्वारा संज्ञान में लिए बिना ही नई नीति लागू कर दी गयी ! छात्रो द्वारा दिया जाने वाला यह तर्क वाजिब और प्रासंगिक है कि इस नए नियामक के लागू होने से तीनो चरणों में अलग-अलग स्तर पर आरक्षित वर्ग के छात्र अनारक्षित वर्ग में ओवरलैप हो जायेंगे । लिहाजा,आरक्षित वर्ग के मेरिट वाले छात्रों के अनारक्षित वर्ग में ओवरलैप हो जाने से सामान्य वर्ग के छात्र लगातार तीनों ही चरण में बाहर होते जाएंगे । परिणामत: अगर इसी क्रम से परीक्षा प्रणाली चलती रही तो साक्षत्कार तक पहुंचते पहुंचते सामान्य वर्ग के छात्रों का प्रतिशत घटकर बीस-पचीस प्रतिशत से भी कम हो जाएगा।
अब सवाल ये उठता है कि क्या ये पूरा मसला महज आयोग की अपनी नीति का हिस्सा है या आयोग के कंधे पर बन्दुक रखकर निशाना कोई और साधने की कोशिश कर रहा है ! इतना तो तय है कि परीक्षा में आरक्षण नीति को लागू करना आयोग का काम भी नहीं है और उसका अधिकार भी नहीं है ! अत: संदेह की सुई बार-बार राजनीति के चुनावी पैतरों पर जाकर इसलिए अटकती है क्योंकि इस मुद्दे का लाभ अक्सर राजनितिक दलों द्वारा चुनावों में लिया जाता रहा है ! फिलहाल अभी मामला अदालत के अधीन जा चुका है और अदालत ने इस पुरे मामले में आयोग से रिपोर्ट माँगी है ! हो सकता है कि माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायलय द्वारा आयोग के इस फैसले पर रोक भी लगा दी जाय और मामला लंबित हो जाय मगर यूपी की सियासत में यह मुद्दा तो कायम रहेगा ही ! आगामी लोकसभा चुनाव में ओबीसी को रिझाने की राजनीति करने के लिए यह मुद्दा काफी कारगर साबित हो सकता है जिसे सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी कायम रखना चाहेगी ! परिणाम जो भी आये मगर इतना तो तय है कि आरक्षण को जिन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए हमारे संविधान में जगह दी गयी उन उद्देश्यों की बजाय आरक्षण का प्रयोग राजनीति और पैंतरेबाजी करने में किया जा रहा है ! बेशक राजनीति की पैंतरेबाजी में नुकसान किसी को भी उठाना पड़े चाहे वो सामान्य वर्ग का परीक्षार्थी हो या आरक्षित कोटे से आने वाला परीक्षार्थी ही क्यों ना हो लेकिन आरक्षण की सियासत कर रहीं राजनितिक पार्टियां तो खूब आरक्षण के नाम पर खूब फसल काटती नजर आ रही हैं ! 


मंगलवार, 23 जुलाई 2013

आपदाओं से स्कूली बच्चों को बचाने की मुहीम : दैनिक डीएनए में प्रकाशित मेरा लेख



  • शिवानन्द द्विवेदी सहर 
प्राकृतिक आपदाएं ना तो बताकर आती हैं और ना ही उसकी पूर्व सुचना ही किसी को होती है ! हाल ही में उत्तराखंड में आये दैवीय अथवा प्राकृतिक आपदा की विनाशलीला के तमाम पहलुओं पर बहुआयामी चर्चाएं हुईं है ! वैसे तो आपदाओं की आँखें नहीं होती हैं और जब वो अपना कहर बरपाती हैं तो क्या बच्चे और क्या बूढ़े,क्या पुरुष और क्या महिलायें,सबको अपने कालग्रास में लील जाती हैं ! मगर ऐसा भी नहीं है कि आकस्मिक उत्पन्न होने वाली आपदाओं को लेकर हमें हाथ पर हाथ धरे बैठना चाहिए ! बेशक हमारा नियंत्रण आपदाओं को रोकने में बहुत हद तक नहीं है लेकिन कम से कम आपदाओं के प्रति होने वालों क्षतियों एवं उन्हें रोकने के उपायों पर तो हमारे पास नीतियां एवं तैयारियां होनी चाहिए ! प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसानों को अगर वर्गीकृत करके अलग-अलग वर्गों में देखें और समझने का प्रयास करें तो इसी वर्गीकरण के आधार पर काफी हद तक समाधान भी निकाले जा सकते हैं ! नजीर के तौर पर अगर प्राकृतिक आपदाओं में हुई स्कूली बच्चों की मौतों के आंकड़ों पर गौर किया जाय तो आंकड़े वाकई चौकाने वाले नजर आयेंगे ! आपदाओं के संदर्भ में विद्यालयों में सतर्कता एवं उपायों का जिक्र अलग से करना इसलिए भी मुनासिब प्रतीत होता है क्योंकि विद्द्यालय एक ऐसी जगह है जहाँ नियमित सैकड़ों हजारों की संख्या में बच्चें एकत्रित होते हैं एवं किसी भी आपदा का सीधा प्रभाव उन हजारों बच्चों पर एक जगह और साथ पड़ने की संभावना रहती है ! आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि केवल 1990 के बाद आये भूकंपों में लगभग कई हजार की संख्या में केवल स्कूली बच्चे जान गवां दिये जबकि सैकड़ों विद्द्यालयों की इमारतें ध्वस्त हो गयीं ! राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा जारी रिपोर्ट में इस बात का साफ़ तौर पर उल्लेख है कि गुजरात में कुछ साल पहले आये भूकंप में 971 स्कूली बच्चे स्कुल की बिल्डिंग्स गिरने की वजह से जान गवा चुके हैं  ! आपदाओं में जाने वाली जानों को अगर वर्गीकृत करके अलग-अलग आंकड़ों में देखें तो मरने वालों में बड़ी संख्या बच्चों की निकल कर आती है जिसे सही प्रबंधन आदि के द्वारा काफी हद तक कम किया जा सकता है ! दुनिया के तमाम देशों में आपदाओं से निपटने के लिए क्षतियों के वर्गीकरण की यही पद्धति इस्तेमाल की जाती रही है जो कि अभी भारत में व्यापक तौर पर इस्तेमाल नहीं हो रही है ! हालाकि इस दिशा में शुरुआती कदम बढाते हुए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा राष्ट्रीय विद्यालय सुरक्षा कार्यक्रम चलाने की मुहीम शुरू की गयी है ! चुकि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण विभाग सीधे तौर पर प्रधानमंत्री कार्यलय के अधीन आता है एवं वर्तमान में इसके चेयरमैन स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही हैं अत: इस कार्यक्रम की सफलता को लेकर अपेक्षाएं ज्यादा होना लाजिमी है ! राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा लगभग 48.47 करोंड़ रुपये विद्यालय सुरक्षा कार्यक्रम के नाम पर प्रस्तावित किये गए हैं और इस दिशा में काफी हद तक काम पूरा भी किया जा चुका है ! अगर स्कुल सेफ्टी से जुड़े इस पुरे कार्यक्रम को समझने का प्रयास करें तो इस प्रारंभिक स्तर पर इस पुरे मुहीम में फिलहाल 22 राज्यों को शामिल किया गया है एवं प्रत्येक राज्य में दो सर्वाधिक आपदा प्रभावित जिलों को रखा गया है ! इस अभियान के तहत प्रत्येक राज्य से जिन दो जिलों को चुना गया है उनमे प्रत्येक जिले से दो सौ विद्यालयों को “आपदा रिस्क एजुकेशन” का प्रशिक्षण दिये जाने का प्रावधान है ! इसके तहत यह लक्ष्य रखा गया है कि प्राम्भिक स्तर पर प्रत्येक जिले में लगभग 500 शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाएगा ! आपदाओं से निपटने एवं स्कूली स्तर पर उनसे सतर्क रहने के साथ-साथ इस पुरे प्रशिक्षण में इस बात का खास ख्याल रखा गया है कि आपदाओ के प्रति सतर्क होकर किस तरह से विद्यालयों के मरम्मत आदि का ख्याल रखा जाय ! इस पुरे अभियान में केंद्रीय स्तर पर चली इस मुहीम की जिम्मेदारी राज्यों पर भी दी गयी है कि वो केन्द्र की तर्ज पर राज्य स्तरीय स्कुल सेफ्टी कार्यक्रम को चलायें एवं आपदा संभावित क्षेत्रों में इन नीतियों को लागू करने का प्रयास करें ! फिलहाल केन्द्र द्वारा प्राम्भिक स्तर पर चलाये जा रहे इस कार्यक्रम में लगभग देश के 8800 विद्द्यालय एवं लगभग 11000 शिक्षक इसमे जुड़ जायेंगे जो कि आपदाओं से निपटने की दिशा में एक प्रभावी कदम माना जा सकता है ! तमाम नियामकों एवं तय समय के अंदर कार्यक्रम पूरा करने की जवाबदेही आदि के प्रावधानों से युक्त राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का यह प्रोजेक्ट अगर वाकई पूरी इमानदारी के साथ अपने कार्यों को अंजाम देता है तो आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में यह एक तरह का बड़ा परिवर्तन माना जाएगा जो कि फिलहाल भारत में हीला-हवाली के हवाले ही रहा है !
            इसमें कोई दो राय नहीं स्कुल सेफ्टी प्रोग्राम अगर सफल होता है तो इसी के तर्ज पर आपदा प्रबंधन की दिशा में तमाम नए प्रयोगों के रास्ते खुलते नजर आयेंगे ! आपदाओं से निपटने के मामले में हमेशा से देखा गया है कि भारत में कोई ठोस नियामक नहीं रहा है और बड़ी से बड़ी आपदाओं को महज मुआवजे से पाटने की परम्परा रही है ! मुआवजा कभी भी किसी आपदा से निपटने का वाजिब समाधान नहीं होता बल्कि आपदाओं से नीतियों एवं कार्य प्रणालियों से निपटा जा सकता है ! कहीं किसी आपदा की खबर आते ही मुआवजे आदि घोषणाएँ और आरोप-प्रत्यारोप का शुरू हो जाना ही भारत में अबतक आपदाओं के समय की प्रमुख कार्यवाहियों में शामिल रहा है लेकिन तकनीकी रूप से व्यवस्थित शायद यह अपने आप में कोई पहला कार्यक्रम है जो आपदाओं के प्रति लोगों को प्रशिक्षित एवं परिपक्व बनाने की दिशा में काम कर रहा है ! बेशक अभी इस कार्यक्रम के तहत आपदाओं से प्रभावित एक खास तबके को ही चुना गया है लेकिन ऐसा कतई नहीं है कि सफल होने के बाद सके दायरों को विस्तृत नहीं किया जायेगा ! आपदा प्रबंधन से सम्बंधित इस कार्यक्रम के प्रशिक्षण आदि के लिए प्राथमिक स्तर पर शिक्षण संस्थानों को चुनना एक सही फैसला है ! हालाकि भारत जैसे देश में करोंडो की योजनाएं कैसे कागजों तक सिमट कर रह जाती हैं ये कोई नई बात नहीं है मगर बावजूद इसके आपदा प्रबंधन कि दिशा में की गयी इस पहल को फिलहाल साकारात्मक नजरिये से देखने की जरुरत है ! इसको लेकर यह तो कहा ही जा सकता है कि बिना किसी नीति और बिना किसी नियामक के चलते आ रहे आपदा प्रबंधन कार्य को यह ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से काफी मदद मिल सकती है, बशर्ते ये कार्यक्रम फाइलों और कागजों के ढेर में दबे कहीं सिमट ना जायें !

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

गन्ना किसानों की बदहाली : दैनिक जागरण नेशनल में लेख





  • शिवानन्द द्विवेदी सहर

चीनी उत्पादन और गन्ने की खेती के नजरिये से अग्रणी स्थान पर शुमार किये जाने वाले उत्तर प्रदेश में गन्ने की खेती अबतक के सबसे बदहाली वाले दौर से गुजर रही है ! पिछले कुछ सालों में लागातार कम हुआ चीनी उत्पादन इस बात का सुबूत है कि उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानी के हालात बहुत बेहतर नहीं हैं !  इसमें कोई दो राय नहीं कि एक दौर में भारत के कुल चीनी उत्पादन का बड़ा हिस्सा उत्तरप्रदेश से आता था जिसमे अब साल दर साल कमी होती जा रही है  ! पिछले कई सालों से  यह देखने को मिल रहा है कि चीनी उत्पादन के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश अपने तय लक्ष्यों को छु पाने में लगातार असफल साबित  हुआ है ! वर्तमान में गन्ना खेती के नजरिये से अगर देखा जाय तो तब हालात बहुत बदल चुके हैं ! आज यहाँ ना तो गन्ने के लहलहाते खेत ही दिखाई पड़ते हैं ना ही गन्ना पेराई के लघु उद्द्योग के रूप में क्रेशर मशीन ही खालिहानो में नजर आती है ! अगर देखा जाय तो ज्यादातर चीनी मिले बंद हो चुकी हैं और जर्जर अवस्था में हैं जबकि जो मिलें चल रही हैं उनके भी हालात फटेहाल ही हैं ! गन्ने की खेती का वो भी एक दौर था जब केवल पूर्वांचल के गोरखपुर मंडल में दो दर्जन से ज्यादा चीनी मिलें चलती थीं और भारी मात्रा में चीनी उत्पादन होता था ! नजीर के तौर पर अगर उत्तरप्रदेश के ही गन्ना उत्पादन में अग्रणी एक जिले का सर्वे देखा जाय तो तो बिहार सीमा से सटे देवरिया जिले की पाँच में से चार सरकारी चीनी मिलें सालों से ठप पड़ी हैं जबकि एक मात्र चीनी मिल किसी निजी के कंपनी के नियंत्रण में चल रही है ! हालाकि अब उन चीनी मिलों को अब सरकारी भी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि लगभग सभी चीनी मिलों को लगभग एक दशक पहले की तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा निजी कंपनियों के हाथों बिना किसी उचित करार और बिना वाजिब कीमत के बेचा जा चुका है ! पिछले डेढ़ दशकों में तेजी से बंद हुईं चीनी मिलों के साथ-साथ  गन्ने की खेती के प्रति हुए किसानो के मोहभंग के कारणों को समझने का प्रयास किया जाय तो तमाम सवाल सवाल खड़े होते हैं ! बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर किन वजहों के चलते पिछले कुछ सालों में बड़ी संख्या में चीनी मिलें तेजी से बंद हुई हैं ? सवाल यह भी है कि कहीं गन्ने की खेती से हो रहे किसानों के मोहभंग के पीछे की वजह चीनी मिलों का बंद होना ही तो नहीं है ? इन तमाम सवालों पर गौर करने के बाद यहाँ मामला केवल गन्ना-किसानी की बदहाली से जुड़ा ना होकर सरकारी हीला-हवाली एवं भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ भी नजर आता है !  इस बात को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता कि अगर निष्पक्ष जांच हो तो गन्ना मिलों के बंद होने एवं औने-पौने कीमतों पर सरकार द्वारा उन्हें बेचे जाने के पीछे बड़े स्तर का भ्रष्टाचार खुलकर सामने आएगा ! दरअसल, इस पुरे मामले की सच्चाई ये है कि पिछली सरकारों द्वारा गन्ना मिलों के नुक्सान में चलने का हवाला देकर निजी कंपनियों के हाथों बेहद कम कीमतों एवं बिना किसी पुख्ता करार किये बेच दिया गया ! इस पुरे मामले में सरकार और निजी कंपनियों के बीच सांठ-गाँठ की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता ! उदाहरण के तौर पर देवारियां जिला स्थित भटनी चीनी मिल जिसकी वाजिब कीमत अरबों में आंकी गयी है,को मात्र कुछ करोंड़ में एक कंपनी हनी वेल के हाथों बेच दिया गया है ! यह मामला अभी अदालत के अधीन है !
     इस मसले पर अगर गन्ना किसानों का नजरिया देखें तो गन्ने की खेती को लेकर आज का किसान बेहद नाकारात्मक हो चुका है ! चुकि गन्ने की फसल कामर्शियल फसल के श्रेणी में आती है अत: इस फसल की बुवाई किसानों द्वारा मुनाफे के लिए हमेशा से की जाती रही है ! मगर पिछले कुछ सालों में सही समय पर उनके उत्पादों का वाजिब भुगतान मिलों द्वारा ना होना कहीं ना कहीं किसानों के मोहभंग के प्रमुख कारणों में से एक है ! गन्ना किसानों का साफ़ तौर पर कहना है कि अगर उनके उत्पादों का उचित मूल्य सही समय पर नहीं मिलेगा तो वो आखिर क्यों इस दिशा में निवेश करेंगे ! इसमें कोई दो राय नहीं गन्ना किसानों के भुगतान के मामले में हमेशा से ही सहकारी चीनी मिलों का रवैया बहुत ही लेट-लतीफ़ वाला रहा है ! महीनों इंतज़ार के बाद चीनी मिलों द्वारा मनमाने ढंग से किसानों को उनके गन्ना उत्पादन का भुगतान किये जाने से किसानों का रुझान गन्ने की खेती से लागातार टूटता गया है ! उत्तर प्रदेश के बहुसंख्यक गन्ना किसान गन्ने की खेती को घाटे का निवेश  मानकर इससे दूरी बना चुके हैं ! अभी पिछले साल ही प्रदेश की सभी चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का संयुक्त बकाया लगभग 900 करोंड़ के आस-पास था जिसका भुगतान अभी तक पूरी तरह से नहीं किया जा सका है ! निश्चित तौर पर गन्ने की खेती के गिरते ग्राफ को लेकर सरकार कि संवेदनहीन भूमिका को खारिज नहीं किया जा सकता ! उत्तरप्रदेश की सरकारों का रुख भी गन्ने की किसानी को लेकर अभी तक बहुत साकारात्मक नहीं नजर आया है ! इस मसले पर गौर करने वाली बात ये है कि घाटे के नाम पर बंद हुई दर्जनों से ज्यादा सहकारी चीनी मिलों को सरकारों द्वारा पुन: संचालित करने की दिशा में प्रयास करने की बजाय उन्हें निजी कंपनियों को औने-पौने दामों पर बेच दिया गया ! अरबों की सम्पति को महज कुछ करोड़ में बेचने वाली सरकारों के नीयत पर सवाल इसलिए उठते लाजिमी हैं ! गन्ना मिलों के इस पुरे खरीद-फरोख्त में बड़े स्तर के भ्रष्टाचार का अंदेशा भी जताया जा रहा है जिसे सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है !
     सरकारी असंवेदनशीलता एवं भ्रष्टाचार के कारण गन्ने की खेती में हो रही कमी का सीधा असर चीनी के उत्पादन  पर पड़ने लगा  है ! गन्ने की खेती के प्रति कृषकों के मोहभंग के कारण ही गन्ना उत्पादन में भारी कमी देखी जा रही है परिणामत: चीनी की कीमतें भी हमारे नियंत्रण से बाहर होती जा रही है ! कम हो रही चीनी की मिठास को एक चिंता के तौर पर समझते हुए अधिक से अधिक मात्रा में गन्ना उत्पादन की दिशा में सरकारी स्तर पर बल दिये बगैर चीनी उत्पादन के लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता है ! इस दिशा में एक पहल ये जरुर होनी चाहिए कि गन्ना मिलों को सरकारी नियंत्रण में किस तरह से चलाया जाय ! साथ ही गन्ना मिलों को निजी हाथों में बेचने के नियामक भी तय होने चाहिए ! अगर यूपी जैसे राज्य में में गन्ना उत्पादन की बदहाली पर जल्द गंभीर नहीं हुआ गया तो भविष्य में चीनी का संकट और अधिक बढ़ जाएगा और मामला नियंत्रण में नहीं रहेगा ! पूर्वांचल में चीनी मिलों और गन्ने की खेती की दुर्दशा को अपने शब्दों में बयान करते पूर्वांचल के प्रख्यात भोजपुरी कवि एन.डी देहाती लिखते है “अब ना उंख लऊकी ना ही उखियार बबुआ, नाही लऊकी कवनो गाँवे कोल्हार बबुआ”..!