- शिवानन्द द्विवेदी सहर
भारत दवा परीक्षण के नाम पर धडल्ले से की जा रही काली कमाई एवं मरीजों के जीवन से खिलवाड़ की घटना अब देश की राजधानी दिल्ली के बड़े अस्पतालों तक अपनी जड़ें जमाने में कामयाब हो चुकी है ! कुछ ही महीने पहले एक खबर में यह बात सामने आई थी कि दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में सैकड़ों की संख्या में बच्चों पर अवैध ढंग से दवाओं का परीक्षण किया जा रहा है ! रिपोर्ट के मुताबिक़ सैकड़ों मासूमो पर किये गये नई दवाओं के परीक्षण में उनकों अथवा उनके अभिभावकों को अँधेरे में रखा गया था ! हालाकि भारत में दवाओं के अवैध ढंग से हो रहा परीक्षण कोई नई बात नहीं है ! इसको लेकर आये दिन सवाल उठते रहे हैं और विभिन्न संगठनों द्वारा चिंता जताई जाती रही है ! लेकिन अब चुकि मामला देश की राजधानी दिल्ली के सबसे प्रतिष्ठित अस्पतालो में से एक सफदरजंग तक पहुच चुका है तो इसके प्रति अत्यधिक गंभीर होने की जरुरत है ! दरअसल, दवा परीक्षण के बढते अवैध कारोबार की वजहों पर अगर विचार किया जाय तो सबसे पहली खामी दवा परीक्षण क़ानून में ही नजर आती है !दवा परीक्षण के मामले में भारतीय क़ानून पूरी तरह से निष्क्रिय एवं नाकाफी साबित हो रहा है ! दवा परीक्षण के संदर्भ में दुनिया के अन्य देशों से भारतीय क़ानून की तुलना करने पर यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हमारा कानून महज निष्क्रिय नियामकों का पुलिंदा होने के अलावा कुछ भी नहीं है ! जबकि अवैध दवा परीक्षण के बढ़ रहे मामलों की गंभीरता को देखते हुए इसमें तमाम स्तरों पर सुधारों की जरुरत बहुत पहले से जताई जा रही है ! दरअसल नए दवाओं का परीक्षण बेहद खतरनाक होता है और उसके तमाम दुष्परिणामों की गुंजाइश रहती है ! अत: दुनिया के तमाम विकसित एवं विकासशील देश नए रसायनों के खतरों से सावधानी बरतते हुए अपने यहाँ दवाओं के परीक्षण के शुरुआती तीन चरणों की कानूनी तौर पर इजाजत तक नहीं देते हैं ! जबकि,भारत में दवाओं के परीक्षण की कानूनी तौर पर इजाजत है ! नजीर के तौर पर अगर देखा जाय तो सन 2005 से लेकर अबतक भारत में कुल 475 नए दवाओं के परीक्षण की कानूनी तौर पर इजाजत दी गयी है ! बताना जरूरी होगा कि नए दवाओं का परीक्षण सबसे ज्यादा जोखिम भरा परीक्षण होता है जिसके अत्यंत गंभीर परिणाम आने का डर रहता हैं ! इन 475 दवाओं के परिक्षण के लिए कुल 57,303 मरीजों के समूह को लिया गया था जिनमे अबतक 39,022 मरीजों का परीक्षण काल पूरा हो चुका है जबकि 18,281 मरीज अभी भी अंडर क्लिनिकल ट्रायल हैं !475 दवाओं के परिक्षण और 39,022 मरीजों के इस्तेमाल के बाद मात्र 17 दवाओं को बाजार में उतारने की अनुमति प्राप्त हो पाई है जबकि शेष बहुत सारी दवाओं को मरीजों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक माना जा चुका है ! अब बड़ा सवाल ये उठता है कि अब तक हुए कुल 475 दवाओं के परीक्षण में अगर मात्र 17 दवाओं को ठीक माना गया है तो क्या जिन दवाओं को स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं माना गया उन दवाओं का कुप्रभाव मरीजों के स्वास्थ्य पर नहीं पड़ा होगा ? आंकड़े बताते हैं कि पिछले आठ सालों में चले इन दवाओं के परीक्षणों के दौरान कुल 2644 लोगों की मौत हुई जिनमे कानूनी लचरता की वजह से मात्र 80 लोगों के ही मौत की पुष्टि दवाओं के परीक्षण के कारण की जा सकी है जबकि इन आंकड़ो की वास्तविकता कुछ और ही है ! दवा परीक्षण क़ानून की लचरता का इससे बड़ा प्रमाण भला और क्या होगा कि मरीजों पर दवाओं के परिक्षण के दौरान मृत्यु होने की दशा में अथवा स्वास्थ्य क्षतिपूर्ति के संबंध में पीड़ित पक्ष को मुआवजा दिये जाने एवं वीमा कराये जाने सम्बन्धी कोई ठोस क़ानून ना होने की वजह से अभी तक मात्र 40 मृतकों के परिजनों को दवा कंपनियों द्वारा मनमाने ढंग से औनी-पौनी राशि मुआवजे के तौर पर दी गयी है ! औषधि एवं प्रसाधन क़ानून 1945 में संशोधन प्रस्ताव 2005 लाये जाने के बावजूद परिक्षण के दौरान सबसे ज्यादा खतरे के घेरे में रहने वाले मरीजों के मुआवजे एवं वीमा आदि के संबंध में कोई ख्याल नहीं रखा गया !जिन गिने-चुने मरीजों के नाम मुआवजे की राशि दी भी गयी तो उस राशि एवं उन्ही दवा कंपनियों द्वारा अन्य देशों में पीडितों को दी जाने वाली मुआवजा राशि में भारी दोहरापन का रवैया कंपनियों द्वारा बरता गया ! 2011 में जिस कंपनी ने दवा परिक्षण के दौरान हुई एक स्त्री की मौत के मुआवजे के तौर पर नाइजीरिया में लगभग अस्सी लाख रुपये का मुआवजा दिया उसी कंपनी ने भारत में हुई एक मौत पर मात्र ढाई लाख रुपये मुआवजे के तौर पर दिया ! मुआवजे कि राशि को लेकर ठोस कानूनी प्रावधान ना होने की वजह से दवा कम्पनियाँ अपने मनमाने कीमतों पर जिंदगियों का सौदा करती रही हैं ! कानूनी तौर पर लचर एवं दवा कंपनियों के अनुकूल प्रावधान होने की वजह से ही दवाओं के परिक्षण के नजरिये से विदेशी दवा कंपनियों द्वारा बड़ी संख्या में भारत का रुख किया जा रहा है ! दवा परीक्षण के अवैध मामलों पर सख्त कानूनी कार्यवाही का प्रावधान ना होने की वजह से ही सरकार द्वारा अनुमति प्राप्त 475 नए रसायनों के अलावा लगभग 1500 अन्य दवाओं का परिक्षण वैध एवं अवैध तरीके से देश के तमाम अस्पतालों एवं संस्थानों में किया जा रहा है ! स्वास्थ्य के खतरों से बेपरवाह स्वास्थ्य मंत्रालय भी अभी तक इस मसले पर चुप्पी ही साधे हुआ था, लेकिन सर्वोच्च न्यायलय के समय-समय पर किये जाते रहे हस्तक्षेप के बाद यह मामला स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिवों के हाथ पहुँच सका है !हाल ही में सम्बंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए 3 जनवरी 2013 को माननीय सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर.एम लोढा एवं न्यायमूर्ति आर दवे की खंड्फीठ द्वारा दिये गए सख्त निर्देश में यह कहा गया कि हर तरह के दवा परीक्षण स्वास्थ्य सचिवों की देख-रेख में ही किये जाए एवं मरीजों को इस बात से पहले ही अवगत कराया जाय कि उनके ऊपर उक्त दवाओं का परीक्षण किया जा रहा है ! मरीज को यह बताना अनिवार्य होगा कि उक्त दवा के परिक्षण से उसके स्वास्थ्य पर किस तरह के नाकारत्मक प्रभाव के पड़ने की संभावना है ! साथ ही मरीज का स्वास्थ्य वीमा लेना अनिवार्य होगा ! इस मसले पर सख्त होते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने इन नियमों का उलंघन करने वालों पर 5 से 10 साल की कैंद की भी सिफारिश की है !
हालाकि माननीय सर्वोच्च न्यायलय के सख्त निर्देश के बावजूद भी ऐसे मामले सिर्फ इस वजह से रुकने का नाम नहीं ले रहे क्योंकि दवा परीक्षण का यह गोरखधंधा वर्तमान में लागू क़ानून की पकड़ से परे है ! इस दिशा में सबसे पहली पहल यही होनी चाहिए कि दवा परीक्षण क़ानून में व्यापक सुधार लाते हुए दवा परीक्षण के लिए अनुमति प्रक्रिया को सख्त एवं जटिल बनाया जाय ताकी दवा कंपनियों द्वारा भारत को दवा परीक्षण की प्रयोगशाला के तौर पर प्रयोग करने से रोका जा सके ! साथ ही मुआवजे,वीमा आदि को लेकर कंपनियों की जवाबदेही के प्रति पुख्ता नियामक भी तय किये जाने की सख्त जरुरत है ! दवा परीक्षण में शामिल चिकित्सकों की जवाबदेही भी कानूनी तौर तय किये जाने चाहिए वरना करोंडो के लालच में चिकित्सक भी दवाओं नाम जहर का घोल मासूम मरीजों को पिलाते रहेंगे ! खतरनाक होते दवा परीक्षण के इस धंधे पर कानूनी नकेल कसे बिना नियंत्रण संभव नहीं है !



