गुरुवार, 21 मार्च 2013

केन्द्र पर नकेल कसते क्षेत्रीय दल : दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित मेरा लेख (21- मार्च-13)


आजादी के बाद की भारतीय केंद्रीय राजनीति में राजनीतिक दलों के उद्दभव एवं उनके  प्रभावों को दो काल-खण्डों में विभाजित करके ज्यादा बेहतर समझा जा सकता है !राजनीति का वो भी एक दौर था जब कांग्रेस सत्ता में थी और सदन में विपक्ष के नाम पर महज गिने-चुने कुछ नाम दिखते थे जबकि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियां उस दौर के बिलकुल विपरीत नजर आती हैं ! आज 203 लोकसभा सीट जीत कर देश की सबसे बड़े राजनीतिक पार्टी के रूप में सत्ता में बैठी कांग्रेस को मात्र 18 लोकसभा सीट जीतने वाली  डीएमके द्वारा आँखे  क्या दिखाई जाती हैं कि केन्द्र सरकार के तीन-तीन शीर्षस्थ  मंत्रियों को  डीएमके प्रमुख की मान-मनौवल करने उनके दरवाजे तक जाना पड़ जाता है ! हालाकि डीएमके द्वारा समर्थन वापस लिए जाने के ऐलान से  सरकार के संख्या बल पर कोई ऐसा संकट नहीं आ रहा है जिससे उसका बहुमत प्रभावित हो रहा हो,क्योंकि सरकार को यू.पी की दो बडे राजनीतिक दलों का बाहर से समर्थन प्राप्त है ! इसलिए डीएमके प्रमुख के मान-मनौवल के लिए तीन-तीन मंत्रियों के जाने को सरकार बचाने की चिंता के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए ! इस पुरे मान-मनौवल के राजनीतिक मायने बहुत दूरगामी हैं ! कांग्रेस सहित सभी दलों को इस बात का बखूबी अंदाजा है कि केन्द्र की राजनीति में सत्ता के समीकरण अब क्षेत्रीय दलों एवं उन दलों के क्षत्रपों की भूमिका के बिना किसी भी राष्ट्रीय दल के बनते नहीं दिख रहे ! भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का व्यापक प्रभाव कायम हुए अभी दो दशक ही हुए हैं लेकिन इन दो दशकों में ही क्षेत्रीय दलों के क्षत्रपों एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने दिल्ली की राजनीति को काफी प्रभावित किया है ! नब्बे के दशक के अंतिम दौर में अटल बिहारी वाजपेयी के नतृत्व में 24 छोटे-बड़े दलों को जोड़कर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बनाया गया एवं सत्ता का समीकरण तैयार किया गया ! एनडीए के गठन को केन्द्र की राजनीति में क्षेत्रीय दलों के हस्तक्षेप की शुरुआती कड़ी के रूप में देखा जा सकता है ! हालाकि ऐसा नहीं कहा जा सकता है नब्बे के दशक से पहले क्षेत्रीय दलों का कोई अस्तित्व ही नहीं था या उनकी किसी राज्य में सरकार नहीं थी ! उस दौर में पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार बन चुकी  थी एवं दक्षिण के राज्यों में भी क्षेत्रीय राजनीतिक दल उभर कर सामने आने लगे थे ! मगर इस बात से भी गुरेज नहीं होनी चाहिए कि नब्बे के दशक अथवा एनडीए के गठन से पहले केंद्रीय राजनीति में इन दलों का हस्तक्षेप बहुत प्रभावी नहीं था ! वर्तमान राजनीति के प्रभावी क्षेत्रीय दलों पर अगर नजर डाले तो एन.सी.पी और तृणमूल कांग्रेस जैसे क्षेत्रीय दल तो ऐसे हैं जो नब्बे के दशक के  अंतिम दौर में कांग्रेस से ही अलग होकर बने और आज केन्द्र की राजनीति का अहम हिस्सा साबित हो रहे हैं ! एनडीए का गठन एक तरह का ऐसा राजनैतिक बदलाव था जिसमे राज्यों की राजनीति में सिमटे लोक जनशक्ति पार्टी जैसे तमाम क्षेत्रीय दलों के क्षत्रप भी एनडीए का हिस्सा बनकर केन्द्र की सियासत करते नजर आये ! नब्बे के दशक में ही उत्तरप्रदेश के दो बड़े राजनीतिक दल संगठनात्मक रूप से सशक्त होकर उभरे  और वर्तमान राजनीति में दोनों ही यू.पी.ए सरकार के खेवनहार बने हुए हैं ! क्षेत्रीय दलों के केंद्रीय हस्तक्षेप एवं राजनीतिक उत्थान के नजरिये से नब्बे का दशक बहुत महत्वपूर्ण रहा है ! हालाकि गठबंधन के नजरिये से अगर देखा जाय तो नरसिम्हा राव सरकार में भी कुछ दलों का वाह्य समर्थन कांग्रेस द्वारा लिया गया था ! लेकिन केंद्रीय राजनीति में घटकों का कोई पहला संगठनात्मक ढांचा पहली बार एनडीए के तौर पर ही सामने आया !नए राजनीतिक दलों के अस्तित्व में आने के नजरिये से नब्बे का दशक भारतीय दलीय प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण काल  कहा जा सकता है ! उसी दौर में कांग्रेस में टूट पैदा हुई और ममता बनर्जी एवं शरद पवार जैसे नेता अलग होकर अपना राजनीतिक दल बनाये और आज वर्तमान की केंद्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए हैं ! वर्तमान केंद्रीय राजनीति में इन तमाम क्षेत्रीय दलों का प्रभाव समय-समय पर दिखता भी रहता है ! आजाद भारत में दलीय व्यवस्था के आधार पर विभाजित दो काल-खंडों के बीच का बड़ा फर्क यही है कि पहला काल-खण्ड एकदलीय राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह एवं आंदोलनों का रहा है जबकि दूसरे कालखंड में बहुदलीय राजनीति व्यवस्था सशक्त रूप से केंद्रीय राजनीति में अपना हस्तक्षेप कर रही है   !
          भारतीय राजनीति में पिछले दो दशकों में तेजी से विकसित हुए क्षेत्रीय दलों के प्रभाव के कारणों का जायजा लिया जाय तो कई कारण नजर आते हैं ! कहीं ना कहीं आपातकाल के कारण देश की जनता के मन में सत्ता के विकेन्द्रीकरण की समझ विकसित हुई ! सत्ता के केन्द्रीयकरण से असंतुष्ट जनता के बीच तत्कालीन कांग्रेस सरकार की मनमानी रास नहीं आई और परिणामत: क्षेत्रीय दलों के प्रति जनता ने भरोसा दिखाना शुरू किया ! इस संदर्भ में अगर यू.पी एवं बिहार में क्षेत्रीय दलों के प्रादुर्भाव को ही देखें तो यू.पी में दलित बहुजन का मुद्दा लेकर दलित वोटर्स का ध्रुवीकरण करने के लिए कांशीराम आगे आये तो वहीँ यादव-पिछड़ा-मुस्लिम वोटर्स के एजेंडे पर मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी का जन्म हुआ ! यू.पी में नवगठित इन दोनों राजनीतिक दलों ने कांग्रेस के वोटबैंक में ही सेंध लगाईं और समय पडने पर राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में कांग्रेस के खिलाफ लामबंद भी हुए ! वहीँ बिहार में लालू प्रसाद यादव ने मुस्लिम-यादव समीकरण तैयार कर कांग्रेस और वामपंथ की जमीं खिसका दिया ! राज्यों के स्थानीय मुद्दों पर स्थानीय सियासत करने एवं जातिगत आधार पर एजेंडा तय करने का यह फार्मूला क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के विकास की वजह बना ! कभी कांग्रेस के धुर समर्थक रहे दलित और मुस्लिम आजकल यू.पी में कांग्रेस से बहुत दूर हो चुके हैं ! कमोबेश यही हालात राष्ट्रीय दलों का बिहार में भी है क्योंकि बिहार में नितीश के साथ गठबंधन के कारण ही भाजपा ठीक स्थिति में नजर आती है !
     क्षेत्रीय क्षत्रपों को केंद्रीय राजनीति में अपनी हैसियत का अंदाजा बखूबी है तभी तो  बिहार से आकर नितीश कुमार दिल्ली में अधिकार रैली करते हैं और यह कहते हैं कि जो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देगा दिल्ली उसी की होगी ! नितीश के इस बयान को केवल कांग्रेस नहीं बल्कि भाजपा पर भी चलाये गए  निशाने के तौर पर देखा जाना चाहिए ! नितीश ने अपनी क्षमता का आकलन करते हुए ही कहा कि देश की दोनों राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों में किसी को सरकार बनाने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होगी ! वहीँ दिल्ली तख़्त को अक्सर घुडकी देते रहने वाले मुलायम सिंह यादव का केंद्रीय राजनीति में हस्तक्षेप तो  अक्सर दिखता रहता है ! वहीँ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का केंद्रीय राजनीति में हस्तक्षेप तो कई अहम राष्ट्रीय मुद्दों को प्रभावित करता रहा है ! बेशक ममता बनर्जी  अभी यू.पी.ए से बाहर हैं लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा एवं कांग्रेस दोनों राजनीतिक गठबंधनो की नजर उनपर भी बनी हुई है ! केंद्रीय राजनीति में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का प्रभाव अब इतना बढ़ चुका है कि अक्सर तीसरे मोर्चे तक की बात सरकार बनाने के लिए उठती रहती हैं ! आजादी के अंतिम तीन दशकों की राजनीति में क्षेत्रीय मुद्दों एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के साथ-साथ क्षेत्रीय क्षत्रपों की ताकत भी बढ़ी है ! इसका सबसे बड़ा उदाहरण यू.पी विधानसभा चुनाव में देखने को मिल चुका है जहाँ राष्ट्रीय दलों के प्रमुख क्षत्रप के रूप में बेनी प्रसाद वर्मा,सलमान खुर्शीद योगी आदित्यनाथ सहित कई क्षत्रपों की मुश्किलें बढ़ी हैं ! वर्तमान भारतीय राजनीतिक परिवेश को देखते हुए इतना कहा ही जा सकता है कि आजाद भारत के अंतिम तीन दशकों का दौर बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था के विकास वाला रहा है !  

शिवानन्द द्विवेदी सहर 
 

रविवार, 10 मार्च 2013

दवा परीक्षण का अवैध धंधा : जनसत्ता में कवर पेज पर प्रकाशित मेरी फुल पेज स्टोरी



दवाओं के अवैध परीक्षण पर मेरी यह विस्तृत रिपोर्ट 10 मार्च-13 के जनसत्ता में रविवारी के कवर पेज प्रकाशित हुई है !



शिवानन्द द्विवेदी सहर

स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के निवारण के लिए दवाइयां जितनी आवश्यक होती हैं अगर दवाइयों का इस्तेमाल गलत ढंग से होने लगे तो उतनी ही जानलेवा भी साबित होती हैं ! 2005 से लेकर 2012 तक पिछले सात सालों में दवाइयों के परीक्षण को लेकर सरकारी हीला-हवाली एवं लोगों के सेहत से खिलवाड़ किये जाने सम्बन्धी जो पुख्ता आंकड़े प्राप्त हुए हैं वो ना सिर्फ चौकाने वाले हैं बल्कि स्वास्थ्य और सेहत को लेकर केन्द्र एवं राज्यों की सरकारों एवं सम्बंधित  विभागों के लापरवाहीं की पोल खोल रहे हैं ! स्वास्थ्य मामलों  पर काम करने वाली एक गैर सरकारी संस्था की पहल पर ड्रग्स नियंत्रक कार्यालय द्वारा उपलब्ध कराई गयी जानकारी के मुताबिक़ भारत में ड्रग्स ट्रायल क़ानून 2005 संशोधन लागू होने के बाद जनवरी 2005 से लेकर जून 2012 के बीच कुल 475 नए रासायनिक तत्वों से बनी दवाओं के परीक्षण की इजाजत दी गयी है  ! बताना जरूरी होगा कि नए दवाओं का परीक्षण सबसे ज्यादा जोखिम भरा परीक्षण होता है जिसके अत्यंत गंभीर परिणाम आने का डर रहता हैं ! इन 475 दवाओं के परिक्षण के लिए कुल 57,303 मरीजों के समूह को लिया गया जिनमे अबतक 39,022 मरीजों का परीक्षण काल पूरा हो चुका है जबकि 18,281 मरीज अभी भी अंडर क्लिनिकल ट्रायल हैं !475 दवाओं के परिक्षण और 39,022 मरीजों के इस्तेमाल के बाद मात्र 17 दवाओं को बाजार में उतारने की अनुमति प्राप्त हो पाई है जबकि शेष बहुत सारी दवाओं को मरीजों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक माना गया हैं ! पिछले पाँच सालों में चले इन दवाओं के परीक्षणों के दौरान कुल 2644 लोगों की मौत हुई जिनमे 80 लोगों के मौत की आधिकारिक पुष्टि दवाइयों के नाकारात्मक असर के कारण की गयी है ! हालाकि शेष लोगों की मौत किन वजहों से हुई है यह अभी सवालों के घेरे में हैं और इसके जांच की मांग स्वास्थ्य पर काम करने वाले तमाम संगठनों द्वारा की जा रही है ! इन संगठनो का दावा है कि अगर निष्पक्ष  जाँच किया जाय तो परीक्षण के दौरान मरे तमाम लोगों के मृत्यु की वजह के रूप में  दवाइयों का नाकारत्मक असर ही कारण के रूप आएगा जिसे दवा कंपनियों एवं डाक्टरों द्वारा छुपाया जा रहा है ! इन 475 दवाओं के परीक्षण के दौरान कुल 11975 लोग तमाम तरह की प्रतिकूल स्वास्थ्य समस्याओं के शिकार पाए गए जिनमे 506 लोगों के स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के पीछे परीक्षण के दौरान इस्तेमाल दवाओं को कारण बताया गया ! हलाकि यह भी जांच का विषय है क्योंकि जांच के बाद 506 के इस आंकड़े में भारी इजाफा भी होने की संभावना जताई जा रही है !ज्ञात हो कि इस मामले पर राज्यसभा में भी सवाल पूछे जा चुके हैं एवं स्वास्थ्य मामलों की संसदीय समिति की रिपोर्ट भी जारी की जा चुकी है जिसमे दवाओं के परीक्षण में हुई भारी स्तर पर लापरवाही  को देखा गया है !
            भारत में मरीजों पर दवाओं के परिक्षण के दौरान मृत्यु होने की दशा में अथवा  स्वास्थ्य क्षतिपूर्ति के संबंध में पीड़ित पक्ष को मुआवजा दिये जाने एवं  वीमा कराये जाने  सम्बन्धी  कोई ठोस क़ानून ना होने की वजह से अभी तक मात्र 40 मृतकों के परिजनों को दवा कंपनियों द्वारा मनमाने ढंग से औनी-पौनी राशि मुआवजे के तौर पर दी गयी  है ! औषधि एवं प्रसाधन क़ानून 1945  में संशोधन प्रस्ताव 2005 लाये जाने के बावजूद परिक्षण के दौरान सबसे ज्यादा खतरे के घेरे में रहने वाले मरीजों के मुआवजे एवं वीमा आदि के संबंध में कोई ख्याल नहीं रखा गया !जिन गिने-चुने मरीजों के नाम मुआवजे की राशि दी भी गयी तो उस राशि एवं उन्ही दवा कंपनियों द्वारा अन्य देशों में पीडितों को दी जाने वाली मुआवजा राशि में भारी दोहरापन का रवैया कंपनियों द्वारा बरता गया   ! 2011 में जिस कंपनी ने दवा परिक्षण के दौरान हुई एक स्त्री की मौत के मुआवजे के तौर पर नाइजीरिया में लगभग अस्सी लाख रुपये का  मुआवजा दिया उसी कंपनी ने भारत में हुई एक मौत पर मात्र ढाई लाख रुपये मुआवजे के तौर पर दिया ! मुआवजे कि राशि को लेकर ठोस कानूनी प्रावधान ना होने की वजह से दवा कम्पनियाँ अपने मनमाने कीमतों पर जिंदगियों का  सौदा करती  रही हैं ! कानूनी तौर पर लचर एवं दवा कंपनियों के अनुकूल प्रावधान होने की वजह से ही दवाओं के परिक्षण के नजरिये से विदेशी दवा कंपनियों द्वारा बड़ी संख्या में भारत का रुख किया जा रहा है !475  नए रसायनों के अलावा लगभग 1500 अन्य दवाओं का परिक्षण वैध एवं अवैध तरीके से देश के तमाम अस्पतालों एवं संस्थानों में किया जा रहा है ! स्वास्थ्य के खतरों से बेपरवाह स्वास्थ्य मंत्रालय भी अभी तक इस मसले पर चुप्पी ही साधे हुआ था ! फिलहाल सर्वोच्च न्यायलय के समय-समय पर किये जाते रहे हस्तक्षेप के बाद यह मामला स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिवों के हाथ पहुँच सका  है !हाल ही में सम्बंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए 30 जनवरी 2013 को माननीय सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर.एम लोढा एवं न्यायमूर्ति आर दवे की खंड्फीठ द्वारा दिये गए सख्त निर्देश में यह कहा गया है कि हर तरह के दवा परीक्षण स्वास्थ्य सचिवों की देख-रेख में ही किये जाए एवं मरीजों को इस बात से पहले ही अवगत कराया जाय कि उनके ऊपर उक्त दवाओं का परीक्षण किया जा रहा है ! मरीज को यह बताना अनिवार्य होगा कि उक्त दवा के परिक्षण से उसके स्वास्थ्य पर किस तरह के नाकारत्मक प्रभाव के पड़ने की संभावना है ! साथ ही मरीज का स्वास्थ्य वीमा लेना अनिवार्य होगा ! इस मसले पर सख्त होते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने इन नियमों का उलंघन करने वालों पर 5 से 10 साल की कैंद का प्रावधान रखा है  ! लेकिन सवाल ये है कि नियमों को ताक पर रख कर पिछले सात  सालों में जिन पचासों हजार मरीजों के साथ छलावा हुआ है उनकी भरपाई कैसे की जायेगी ?
            कम से कम आंकड़े तो यही बताते हैं कि दवाओं के परीक्षण को लेकर भारत एक बेहद खतरनाक प्रयोगशाला बनता जा रहा है जहाँ मानव शरीर का इस्तेमाल मशीनों की तरह किया जा रहा है !लोगों के स्वास्थ्य एवं जीवन से बेपरवाह इन दवा कंपनियों द्वारा चिकित्सकों की मिली-भगत से  आजतक ना जाने कितने उन  लोगों को अपना प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष शिकार बनाया होगा,इसका कोई आंकड़ा किसी के पास मौजूद नहीं है ! आंकड़ों से जुदा ना जाने कितने लोग ऐसे होंगे जो दवाओं के अवैध परीक्षण के कारण अपनी जान से हाथ धो बैठे होंगे और ना जाने कितने स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से आज भी ग्रसित जीवन जीने को मजबूर होंगे  ! तमाम आधिकारिक सूत्रों से प्राप्त दवाओं के परीक्षण सम्बन्धी इन आंकड़ों को अगर बारीकी से समझने की कोशिश की जाय तो तमाम तरह के सवाल उभर कर सामने आते है ! बड़ा सवाल ये है कि जिन दवाओं की कोई जरुरत नहीं है उन दवाओं के परीक्षण की इजाजत ही क्यों दी गयी और अगर कुछ जरूरी परीक्षण की इजाजत दी भी गयी तो उसके पुख्ता नियामक क्यों नहीं तय किये गए ? दवाओं के परीक्षण के दौरान इन सात सालों में लोगों को अँधेरे में रखकर उनके स्वास्थ्य एवं जीवन से जमकर खिलवाड़ किया गया हैं ! प्राप्त आंकड़ों को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि अगर इस पुरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाय तो तमाम लोग गैर-इरादतन हत्या,भ्रष्टाचार सहित अन्य कई मामलों में दोषी पाए जायेंगे ! इस पुरे मामले के हर पहलू पर गंभीर जांच होनी ही चाहिए !
क्या है दवा परिक्षण प्रक्रिया की खामियां
सामान्यतया ऐसे रसायन जिनका आविष्कार पहले कभी नहीं हुआ उन दवाओं का परीक्षण सबसे अधिक जोखिम भरा होता है ! ऐसी दवाओं के खतरों के कारण दुनिया के तमाम विकसित  देश इन दवाओं के  परीक्षण की इजाजत नहीं देते लेकिन भारत में ऐसी दवाओं का परीक्षण भी धड़ल्ले से हो रहा है ! इन दवाओं का परीक्षण मूलतया चार चरणों में किया जाता है ! प्रथम चरण में इन दवाओं के जहरीले ना होने का परीक्षण जानवरों पर किया जाता है उसके बाद द्वितीय चरण में कुछ मरीजों के ऊपर इन दवाओं का परीक्षण किया जाता है ! तीसरे चरण में इन दवाओं का परीक्षण बड़ी संख्या में लोगों पर किया जाता है फिर अंतिम चरण में इन दवाओं का परीक्षण हजारों की संख्या में लोगो पर किया जाता है !कानूनी लचरता के कारण प्रथम चरण से लेकर तीसरे चरण तक के परीक्षण भारत में अन्य देशों की तुलना में ज्यादा आसानी से संभव हो पाते है ! इन परीक्षणों के दौरान परीक्षकों द्वारा विविध प्रकार की जनजातियों एवं बीमारियों वाले भौगोलिक क्षेत्रों के मानकों को दरकिनार कर रखा जाना इन परीक्षणोंको और जोखिम भरा बनाते हैं ! विशेषज्ञों की राय में ऐसा बताया गया है कि जो दवा मंगोल जनजाति के मरीजों के लिए उपयुक्त साबित हुई है  कोई जरूरी नहीं है कि वही दवा द्रविण समुदाय के लोगों के लिए भी उपयुक्त होगी !आश्चर्यजनक ढंग से इंदौर के महात्मा गाँधी चिकित्सा महाविदद्यालय में शिशु रोग विशेषज्ञ द्वारा लगभग 2700लडकियों पर ह्यूमन पेपलिना वायरस की दवा को आजमाया गया जबकि इस प्रदेश में यह बीमारी अस्तित्व में ही नहीं है ! जिन बीमारियों का कोई अस्तित्व ही नहीं है या उनके अन्य उपचार उपलब्ध हैं वहाँ नए प्रयोगों को करना स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ नहीं तो और क्या है ?



परीक्षण में लापता बच्चों का इस्तेमाल
इसी मामले को अगर एक अन्य समस्या के साथ जोड़कर देखा जाय तो पिछले पाँच सालों में कई हजारों की संख्या में गरीब तबके के बच्चे अगवा किये गए हैं ! ऐसे बच्चों को अगवा कर अथवा बहला-फुसला कर इनके ऊपर दवाओं का अवैध तरीके से परीक्षण किये जाने की संभावना तमाम संगठनों द्वारा जताई जाती रही है ! गरीब तबके के अनपढ़ अथवा अशिक्षित बच्चों  को बहला-फुसला कर एवं थोड़े बहुत रुपयों का लालच देकर भी इस तरह के कार्यों को अंजाम दिया जाता  रहा है ! दवाइयों के परिक्षण में इन मासूमो का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जा रहा है,इस संभावना को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता ! लापता हो रहे बच्चों पर काम करने वाली एक गैर सरकारी संस्था ने ऐसा अंदेशा जताया है कि आधिकारिक  आंकड़ों के अलावा चल रहे  देश में  अन्य सक्रिय अवैध  दवाओं के परीक्षण केन्द्रों पर इन्ही मासूमो को मशीन की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है ! बच्चों के स्वास्थ्य के नजरिये से यह बेहद खतरनाक है !
अवैध कमाई कर रहे डाक्टर
बेशक दवाइयों के परिक्षण में जिंदगी को जाने-अंजाने दाँव पर लगा रहे मरीजों के हाथ कुछ आये ना आये लेकिन डाक्टर्स की जेबें लागातार मोटी हो रहीं हैं ! भारत में दवाइयों के परिक्षण का कुल कारोबार लगभग 2500 करोंड़ के आस-पास पहुँच चुका है ! आर्थिक अपराध ब्यूरो द्वारा दी गयी रिपोर्ट में जो बताया गया है वो सीधे तौर पर इस पुरे मामले में डाक्टरों की मिलीभगत की पुष्टि करता है ! रिपोर्ट में बताया गया गया है कि मध्यप्रदेश के इंदौर में अलग-अलग अस्पतालों में 3202 मरीजों पर दवाओं का परिक्षण बिना उनको इस परिक्षण से अवगत कराये पाँच चिकत्सकों द्वारा किया गया जिसके एवज में दवा कंपनियों द्वारा कुल 3 करोंड़ 57 लाख रुपये की धनराशि उन चिकत्सकों के निजी खातों में दी गयी ! बिना बताये किये गए इन परीक्षणों में कुल 81 मरीजों में से कुछ को दवाओं के दुष्प्रभावों के चलते जान से हाथ धोना पड़ा और कुछ स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रसित हैं ! हैरानी की बात ये है कि दवाओं के परिक्षण के नाम पर करोंडों की उगाही करते इस चिकित्सकों की जेबें तो कंपनियों द्वारा खूब गरम की जा रहीं हैं  लेकिन पीडितों को अभी तक मुआवजे के नाम पर कुछ भी नहीं मिल सका है ! जिन पाँच डाक्टरों ने इन मरीजों पर परिक्षण किया उनमे से एक चिकित्सक एथिक्स कमेटी के ज्वाइंट सेक्रेटरी रह चुके हैं और एक विभागाध्यक्ष के पद पर तैनात रहे हैं !इन चिकित्सकों पर अभी तक कोई कार्यवाई नहीं हो सकी है !
कब-कब हुईं कितनी मौतें
2007  में परीक्षण के दौरान 137 मरीज मरे
2008 में परीक्षण के दौरान 288 मरीज मरे
2009 में परीक्षण के दौरान 637 मरीज मरे
2010 में परीक्षण के दौरान 671 मरीज मरे
2011-12 में परीक्षण के दौरान 911 मरीज मरे 



बुधवार, 6 मार्च 2013

पुस्तक समीक्षा : स्मृतियों में रूस

लन्दन में निवास कर रहीं लेखिका शिखा वार्ष्णेय जी की संस्मरण पुस्तक "स्मृतियों में रूस" की मेरे द्वारा लिखी गयी समीक्षा को अमेरिका की एक हिन्दी पत्रिका "यादें" ने प्रकाशित किया है !


मंगलवार, 5 मार्च 2013

वामपंथ की चुनौतियां और माणिक सरकार : दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित(6 मार्च-13)

अगर आप भूले ना हों तो अभी कुछ ही महीने पहले संपन्न हुए गुजरात चुनाव को सियासी गलियारों से लेकर मीडिया महकमे तक खूब चर्चा मिली और आज भी मोदी को केंद्रीय सियासत का चेहरा साबित करने में  कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही ! लेकिन इसके ठीक विपरीत हाल ही में संपन्न हुए त्रिपुरा चुनाव में चौथी बार जीत दर्ज करने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के माणिक सरकार को लेकर ना तो सियासी चौराहों पर ही कोई खास चहल-पहल दिखीं है  और ना ही मीडिया द्वारा ही ज्यादा कुछ इस चुनाव पर ज्यादा ध्यान दिया गया है ! हालाकि यहाँ मोदी बनाम माणिक पर बहस किये जाने की प्रासंगिकता बेशक नहीं  हो लेकिन संघराज्य भारत के संदर्भ में त्रिपुरा बनाम गुजरात एवं वामपंथ बनाम मुख्यधारा की केंद्रीय राजनीति पर तो बहस होनी ही चाहिए ! लोकतांत्रिक चुनावी पद्धतियों के जिन मानकों के आधार पर गुजरात से तीसरी बार चुनकर नरेंद्र मोदी आते हैं उन्ही पद्धतियों से होकर त्रिपुरा से चौथी बार माणिक सरकार आते हैं ! समान लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से चुनकर आने के बावजूद केंद्रीय सियासत के विश्लेषकों  का नजरिया दोनों को लेकर अलग-अलग है ! यहाँ गुजरात बनाम त्रिपुरा की बात करना इसलिए भी जरूरी लगता है क्योंकि पिछले कार्यकाल की अपेक्षा अपनी पार्टी को  एक सीट कम दिला पाने वाले नरेंद्र मोदी को बड़े ही नाटकीय ढंग से केंद्रीय सियासत का सबसे चर्चित चेहरा बनाकर पेश किया जाता है ! वहीँ रिकोर्ड सीटों के साथ चौथी बार बहुमत में आने वाली इस वामपंथी सरकार के सबसे गरीब मुख्यमंत्री का नाम मीडिया के लिए कोई मुद्दा नहीं बन पाता है ! इस बात को खारिज नहीं किया जा सकता है कि त्रिपुरा भारत का ही एक राज्य है और वहाँ भी इसी लोकतंत्र का जनमत रहता है, एवं अपनी जनसँख्या के अनुपात में राजनीति में उस भूभाग की भागीदारी भी उतनी ही है जितनी किसी अन्य राज्य की ! ऐसे में सवाल ये है कि आखिर एक राज्य की विधानसभा चुनाव जिसमे एक अलग तरह की पारम्परिक विचारधारा को भारी जनादेश मिला हो,को देश की राजनीति में इतने हल्के में क्यों लिया गया  ! ऐसा भी नहीं है कि इस देश में वामपंथ अपवाद है या यहाँ से वामपंथ की जड़ें पूरी तरह से उखड चुकी हैं ! हाँ, इतना जरूर है कि आजादी के बाद से लागातार वामपंथ की जड़े बहुत हद तक कमजोर जरुर हुई हैं ! पश्चिम बंगाल की करारी शिकस्त एवं दक्षिण भारत के राज्य केरल में अपना जनादेश गंवा चुकी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पास खोने और सजोने के लिए त्रिपुरा ही शेष बचा है ! उत्तर भारत के राज्यों आज वामपंथ की लहर बेशक कहीं नही दिखती हो लेकिन पचास और साठ  के दशक वाले  इतिहास के पन्ने इस बात के गवाह हैं कि आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में वामपंथी जनाधार उत्तर भारत के तमाम राज्यों में भी बढ़-चढ़कर था और उत्तर-प्रदेश एवं बिहार जैसे राज्यों में भी हंसिया वाले लाल-पताका लिए लोग लाल-सलाम करते आसानी से  दिख जाते थे  ! उस दौर में जब जनसंघ का लोकतांत्रिक जनाधार एक या दो सीट पर सिमट रहा था और लोहिया का समाजवाद भी अभी लगभग सुसुप्त ही था तब लाल-सलाम के नारे अक्सर चरखा का विरोध करते मजदूरों की आवाज बुलंद कर रहे थे ! लेकिन आज सियासत का स्वरुप और जनाधार की मानसिकता दोनों में व्यापक बदलाव आ चुका है ! आज उत्तर भारत के हिन्दी भाषी राज्यों में लाल सलाम का ना ही कैडर ही सशक्त है और ना ही उसका कोई सियासी जनाधार ही कायम रह पाया है ! आज लोहिया का समाजवाद यू.पी के तख़्त पर ताजपोशी कर रहा है तो जनसंघ केंद्रीय राजनीति में सत्ता से विपक्ष तक की भूमिका में नजर आ चुका है ! अपने पुख्ता जनाधार वाले दो राज्यों में सत्ता खो चुकी मार्क्सवादी पार्टी के लिए त्रिपुरा चुनाव भले ही सुकुन देने वाला रहा है लेकिन वर्तमान परिवेश में  राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथ के समक्ष कई तरह की चुनौतियाँ भी उत्पन्न हुईं हैं ! विश्व के मजदूरों को एक मंच पर लाने का आह्वान करने वाले कार्ल मार्क्स के पथों पर चलते-चलते भारतीय वामपंथ में हुए इस राजनैतिक बिखराव के मायनों को समझने की जरुरत है ! जिस धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक समानता के उद्देश्यों को मजदुर बनाम पूँजीवाद का स्वरुप देकर संघर्ष करने की कोशिशे भारतीय वामपंथियों द्वारा की गयी उसका लाभ अन्य राजनीतिक दलों को मिला ! आजाद भारत के शुरुआती दिनों में कांग्रेस को सवर्णों एवं पूजीपतियों की पार्टी बताकर निचले तबके के मजदुरों को एकीकृत करने का नारा वामपंथी दलों द्वारा दिया गया था उसका लाभ यू.पी में कभी मायावती का बहुजन तो कभी मुलायम का समाजवाद लेता दिख  रहा है ! धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों वाले  संघर्षों को बीजेपी बनाम कांग्रेस ने धुल धसरित कर दिया ! भारतीय राजनीति में वामपंथ के प्रति लागातर कम हुए राजनैतिक आकर्षण के तमाम कारणों में सबसे बड़ा कारण यह है कि यह  भारतीय मजदूर वर्ग को पूँजीवाद के खिलाफ एकीकृत कर पाने में नाकामयाब रहा ! इस नाकामयाबी का सबसे बड़ा कारण यह है कि भारतीय समाज अन्य मुल्कों की अपेक्षा अत्यधिक राष्ट्रवादी भावना से ओत-प्रोत  है क्योंकि हजारों साल गुलामी के बाद आजादी के संघर्षों एवं बलिदानों के इतिहास ने यहाँ के आम आदमी तक को राष्ट्रनिष्ठ ज्यादा बनाया बजाय कि पूंजीवादी संघर्षों के तरफ ले जाने के ! राष्ट्रवादी मानसिकता का विकास होने की वजह से परम्पराओं, धरोहरों एवं संस्कृति के प्रति अनोखी निष्ठां भी इस मुल्क में अधिकाधिक रही जिससे मार्क्सवादी उद्देश्यों को काफी हद तक नुकसान हुआ है ! दरअसल, वामपंथी विचारक अथवा प्रचारक इस बात को समझने में चूक कर गए कि कोई भी विचारधारा राजनैतिक रूप से तभी समृद्ध हो पायेगी जब वो उस आवाम के परम्पराओं एवं संस्कृतियों के अनुरूप खुद में बदलाव लाने को लेकर उदार हो !भारतीय समाज में ईशनिंदा कभी भी स्वीकार्य नहीं थी लेकिन वामपंथ ने ईशनिंदा पर खुद को कायम रखा जो कि उसके लागातार हो रहे पतन का तमाम कारणों में से एक कारण कहा जा सकता है ! एक राष्ट्र जहाँ राष्ट्रवाद हर वर्ग हर तबके के खून में समाया हो वहाँ अगर राष्ट्रीयता के मूल्यों को दरकिनार कर कोई सियासी फार्मूला तय किया जाएगा तो उसकी सफलता की गुंजाइश अत्यंत कम रहती है ! यहीं कारण है कि मजदुर वर्ग की लड़ाई को ही जातिगत वर्गीकरण के आधार पर लड़ते हुए बसपा और सपा सरीखे दल राजनीतिक रूप से ज्यादा जनाधार बना पाने में कामयाब रहे ! हमें सियासत के इस तकनीकी पहलू पर गौर करना चाहिए कि जिस वर्ग की लड़ाई वामपंथ द्वारा  आजादी के शुरुआती दशक में लड़ी का रही थी  कमोबेश उसी वर्ग की लड़ाई लड़कर आज के क्षेत्रीय दल केंद्रीय सियासत में भागीदारी कर रहे हैं !     आज जब मोदी का नाम माणिक सरकार पर भारी पड रहा है तो यह  शिकायत वाजिब है और सियासत एवं मीडिया के दोहरापन पर शिकायत होनी भी चाहिए ! लेकिन इस बात को कैसे खारिज किया जाय कि कहीं ना कहीं वामपंथ अपनी विचारधारा को जनता से जोड़ पाने में लगातार नाकामयाब रहा जिससे उसका राजनीतिक महत्व कम होता गया परिणामत: मुख्यधारा की केंद्रीय राजनीति में उसकी भूमिका लगातार अप्रासंगिक होती गयी  ! आज मजदुर खुद ही वर्गीकृत हो गया है और वो अपने अपने स्तर पर अलग-अलग तरह के संघर्ष करता नजर आ रहा जबकि उसे एकीकृत होना चाहिए था ! इससे हास्यपद बात और भला क्या हो सकती है कि वेतन बढ़ाने के मजदूरों के संघर्षों को पूँजीवाद के खिलाफ संघर्ष के तौर पर देखा जा रहा है ! आज वामपंथ खुद ही बहुविचारों में बट चुका है ऐसे में जबतक वो केंद्रीय सियासत में अपनी प्रभावी भूमिका नहीं कायम कर पायेगा उसका बहुत विकास संभव नहीं है ! माणिक सरकार द्वारा दिलाई गयी इस जीत से इस वामपंथी दल को हौसला जरुर मिला होगा मगर चुनौतियाँ अभी बड़ी हैं !
शिवानन्द द्विवेदी सहर 

सोमवार, 4 मार्च 2013

मोदी को लेकर मुगालते में भाजपा : दैनिक जागरण में प्रकाशित (5 मार्च)



लोकसभा चुनाव जितना ही नजदीक आ रहा है, भाजपा का सियासी पारा उतना ऊपर उठता दिख रहा है। शायद यह पहली बार ही है कि राजनीतिक उद्देश्यों से नरेंद्र मोदी ने एक महीने के अंदर दूसरी बार दिल्ली का रुख किया गया हो। अगले लोकसभा चुनावों की रणनीतियों को तय करने लिए भाजपा द्वारा आयोजित राष्ट्रीय परिषद का महाअधिवेशन पूरी तरह से मोदी पर केंद्रित रहा और पार्टी अध्यक्ष से लेकर सभी बड़े नेता नमो नम: का जाप करते दिखे। कार्यक्रम के दौरान पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने जिस तरह से मोदी का महिमा मंडन किया, वह इस बात का संकेत है कि भाजपा भी बतौर प्रधानमंत्री मोदी की दावेदारी को लेकर अब काफी हद तक खुलकर बोलने लगी है। हालांकि इस कार्यक्रम के दौरान मंच से ऐसा कुछ भी नहीं बोला गया, जिससे इस बात की पुष्टि हो जाए कि नरेंद्र मोदी आगामी चुनाव में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। मगर पूरे कार्यक्रम के दौरान मोदी को कार्यकर्ताओं और पार्टी नेताओं द्वारा जो तवज्जो दी गई, उस आधार पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा के सबसे वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की भूमिका अब पार्टी संरक्षक की होगी, न कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की। आज मोदी भले ही भाजपा का सबसे चर्चित चेहरा बन चुके हैं, मगर ये मोदी समर्थकों के अंध उत्साह के अलावा कुछ भी नहीं है कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर मोदी को आगे खड़ा कर देने मात्र से भाजपा बहुमत में आ जाएगी या सरकार बना लेगी। मोदी के नाम पर अगर भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव लड़ती है तो उसके तमाम फायदे भी होंगे और तमाम नुकसान भी। हमें इस बात को समझना होगा कि लोकतंत्र में सरकार संख्या बल से बनती है, न कि नारेबाजी और हो-हल्ला मात्र से। संख्या बल जुटा पाने की क्षमता को नजरंदाज कर मोदी मंत्र का जाप करना सिवाय ख्याली पुलाव पकाने के कुछ भी नहीं है। कार्यकर्ताओं को यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि जिन मोदी का नाम लेकर वह मोदी की छवि का राष्ट्रीयकरण कर रहे हैं, उन्हीं मोदी को इसी गुजरात विधानसभा चुनाव में पिछली बार के मुकाबले एक सीट कम पर संतोष करना पड़ा है। मोदी को सारथी बनाकर रथ हांकने वाली भाजपा के समक्ष प्रमुख सवाल यह है कि मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनाए जाने मात्र से भाजपा कहां-कहां लाभ ले सकती है और कहां-कहां उसे नुकसान झेलना पड़ सकता है? इन सवालों के आधार पर मोदीमय होती जा रही भाजपा की चुनावी कसरत के निहितार्थ को समझने का प्रयास करें तो इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है कि औपचारिक रूप से मोदी का नाम आगे आते ही कांग्रेस मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण करने का प्रयास कर सकती है। अगर यह समीकरण यूपी जैसे राज्यों में बन गया तो भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। मोदी के आने से भाजपा के अंदरूनी समीकरण भी डगमगाने का खतरा है, जो सियासी नजरिये से चुनाव के ठीक पहले नाकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। पिछले डेढ़ दशक में केंद्रीय राजनीति में सत्ता तक पहंुचने में घटकों के सहयोग का व्यापक प्रभाव देखा जा रहा है और वर्तमान राजनीतिक समीकरण ऐसे बन चुके हैं कि बिना मजबूत घटकों के सहयोग से सरकार किसी की बनती नहीं दिख रही है। ऐसे में गठबंधन के नजरिये से मोदी का नाम भाजपा के लिए कितना माकूल है, इसका मूल्यांकन करना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है। वर्तमान सियासी परिस्थितियों में गठबंधन के नजरिये से कांग्रेस की स्थिति पहले से ही भाजपा से बेहतर है, जबकि मोदी के आने के बाद भाजपा को सबसे ज्यादा खतरा गठबंधन टूटने को लेकर है। केंद्रीय राजनीति में आज जब सत्ता तक पहंुचने के लिए गठबंधन को मजबूत करने पर बल दिए जाने की बात की जाती रही है, ऐसे में अगर भाजपा अपने गठबंधन में नए घटकों को नहीं जोड़ पाती है या वर्तमान गठबंधन को कायम नहीं रख पाती है तो उसके लिए सत्ता की राह दूर की कौड़ी साबित होगी। गुजरात में विकास पुरुष की छवि रखने वाले नरेंद्र मोदी अगर विकास के नाम पर गुजरात चुनाव में ही पिछली बार के मुकाबले बढ़त नहीं हासिल कर पाए तो उनसे विकास के नाम पर देश में भाजपा को बढ़त दिलाने की उम्मीद करना भरोसे का सियासी कार्ड प्रतीत नहीं होता। जहां तक मोदी के हिंदुत्व वाली छवि की बात है तो शायद भाजपा और मोदी दोनों के लिए ही यह मुद्दा बेशक सीटें बढ़ाने वाला हो जाए, लेकिन इस मुद्दे के आधार पर कोई भी ऐसा समीकरण नहीं दिख रहा, जो भाजपा को सत्ता के गलियारों तक ले जा सकता है।
शिवानन्द  द्विवेदी सहर 

रविवार, 3 मार्च 2013

भाषाई साम्रज्यवाद के खतरे : राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित(3 मार्च -13)

एक भाषा को बोलने वाला समाज जब किसी अन्य भाषा का अनुसरण करने वाले समाज के संपर्क में आता है तो दोनों के बीच पहला आदान- प्रदान भाषा का ही होता है। यानी अलग-अलग भाषाओं वाले समाजों के बीच सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक या अन्य किसी भी प्रकार के समन्वय को व्यवहार में लाने के लिए प्राथमिक तौर पर भाषाओं के बीच का समन्वय अनिवार्य होता है। भाषाओं के समन्वय में शब्दों के आदान-प्रदान की संभावना सर्वाधिक होती है क्योंकि किसी भी भाषा को समझने के लिए उसके शब्दों को समझना जरूरी है। भाषाई इतिहास को पलटें तो काफी हद तक यह बात सही प्रतीत होती है कि शब्दों के आदान-प्रदान के क्रम में वही भाषा भौगोलिक दृष्टि से ज्यादा व्यापक व समृद्ध बन पाई है जिसने अपने शब्दों का वर्चस्व बड़े भूभाग पर कायम रखने में सफलता हासिल की है। इस बात को सिरे से कतई खारिज नहीं किया जा सकता है कि समय और वैश्विक विकास के समानांतर भाषाओं के बीच का अंतर्सघर्ष भी दशकों पूर्व शुरू हो चुका है। साम्राज्यवाद के शुरु आती दौर में दुनिया की साम्राज्यवादी ताकतों ने यह बात मान ली थी कि किसी भी भू-भाग पर साम्राज्य विस्तार के लिए उनकी भाषाओं का विस्तार भी जरूरी है। हालांकि एक समाज के दूसरे समाज में जाने से भाषाओं एवं शब्दों का आदान-प्रदान स्वत: संचालित प्रक्रिया भी है जो भाषाई विकास की दृष्टि से ठीक भी कही जा सकती है क्योंकि शब्द आदान-प्रदान की स्वत: होने वाली प्रक्रिया में किसी भी भाषा के मूल शब्दों के गौण होने का खतरा नहीं रहता है, बेशक नए शब्द स्वीकार कर लिए जाएं। इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि भाषा की सम्पन्नता एवं समृद्धि के लिए अगर अनिवार्य हो जाए तो अन्य भाषाओं के शब्दों को स्वीकार किया जाना चाहिए, क्योंकि शब्दों के अभाव में भाषा विपन्न सी नजर आती है। भौगोलिक दृष्टि से भाषा के विस्तार के लिए भी शब्दों का संतुलित एवं अनुशासित आदान-प्रदान जरूरी है ताकि शब्दों की समृद्धि के साथ-साथ भाषा को भी व्यापक बनाया जा सके। हालांकि दो या दो से अधिक भाषाओं के बीच शब्दों के आदान-प्रदान की स्वत: चलने वाली प्रक्रिया को भाषाई साम्राज्यवाद ने काफी हद तक नुकसान पहुंचाया है। उदाहरण के लिए पश्चिमी व यूरोपीय साम्राज्यवाद के दौर में भाषाएं भी काफी प्रभावित हुईं। साम्राज्यवाद के स्वर्णिम दौर में साम्राज्यवादी राष्ट्र जहां भी गये, अपनी भाषा का प्रभाव अन्य भाषाओं को बोलने वाले समाज पर इस कदर छोड़ आये कि उसे महज भाषाई आदान-प्रदान कहना तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता। कहीं न कहीं उनकी भाषा ने समाज को प्रभावित किया, साथ ही उस समाज अथवा भू-भाग की मूल भाषा को भी अंशत: ही सही, लेकिन प्रभावित करने में सफलता पायी। भाषाई साम्राज्यवाद का असर जिस समाज अथवा भूभाग पर दिखा, उसकी पारंपरिक भाषा को प्रभावित करने अथवा उस भाषा में बेवजह घुसपैठ करने की कोशिश की गयी जो समय के साथ विकसित ही हो रही है। बेशक आज न वो साम्राज्यवाद है और न ही उन साम्राज्यवादी ताकतों का शासन लेकिन उनके द्वारा स्थापित भाषाई साम्राज्यवाद का प्रभाव या कुप्रभाव आज भी न सिर्फ देखने को मिल रहा है बल्कि त्वरित गति से विकसित भी हो रहा है। इस संदर्भ में यह आंकड़ा उल्लेखनीय है कि एक अनुमान के मुताबिक समूची दुनिया में लगभग पांच हजार के आस-पास बोली-भाषाएं चलन में रही हैं। लेकिन वर्तमान में इन पांच हजार भाषाओं में से लगभग तीन हजार से ज्यादा विलुप्त होने की कगार पर हैं या विलुप्त हो चुकी हैं। इसी आंकड़े का दूसरा पहलू यह भी है कि वर्तमान में पूरी दुनिया में लगभग पांच सौ भाषाएं ऐसी हैं जो विभिन्न भूभागों में सशक्त रूप से प्रयोग में लाई जा रही हैं और इनमे से लगभग दो सौ की अपनी लिपि न होने बावजूद वे काफी प्रचलित हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर के भाषाई मानकों के आधार पर भूभागीय दृष्टिकोण से बोली जाने वाली भाषाओं की संख्या भी लगातार कम होती जा रही है और कुछ गिनी- चुनी भाषाओं का ही बोल-बाला बढ़ता जा रहा है, जो तमाम भाषाओं के विकास की दृष्टि से ठीक नहीं कहा जा सकता। तीन हजार के आस-पास विलुप्त हो रही भाषाओं के संदर्भ में यह भी गौर करना जरूरी है कि विलुप्त हो रही इन भाषाओं को बोलने वाला समाज आज अन्य भाषाओं को स्वीकार कर चुका है, जबकि उस समाज की मूल पारंपरिक भाषा विलुप्त होने के कगार पर है। दुनिया में बढ़ते अंग्रेजी सहित कुछ अन्य अंतरराष्ट्रीय भाषाओं के वर्चस्व एवं उन भाषाओं द्वारा अन्य भाषाओं में की जा रही घुसपैठ के नजरिये से अगर हिन्दी को देखें तो आदान-प्रदान का भारी असंतुलन नजर आता है। शब्दों का एक संतुलित आदान-प्रदान किन्हीं दो भाषाओं के लिए स्वीकार्य हो सकता है। मगर यदि शब्दों के आदान-प्रदान में असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होने लगे तो यह उस भाषा के लिए नुकसानदायक सिद्ध हो सकता है जिस भाषा ने शब्दों का निर्यात, आयात के अनुपात में कम किया हो। दो भाषाओं के बीच शब्दों के आयात और निर्यात का संतुलन ही शब्द आदान-प्रदान कहलाता है, जबकि यदि इनके बीच असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होने लगे तो एक भाषा का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। आज हिन्दी में सहजता से प्रयुक्त हो रहे अंग्रेजी भाषा के शब्दों को देखा जाय तो तमाम शब्द ऐसे मिलेंगे जो मुख्यधारा की हिन्दी में तो शामिल हो चुके हैं लेकिन हिन्दी के विकास की दृष्टि से उनका कोई ठोस औचित्य नहीं नजर आता। उल्लेखनीय होगा कि हिन्दी में अन्य भाषा के शब्दों को मुख्यधारा के शब्द के तौर पर शब्दकोश में जगह देने या उनके प्रयोग करने से पहले भाषाई अनुशासन का पालन करना अनिवार्य होना चाहिए। इस बात का खास ख्याल रखा जाना चाहिए कि जिस शब्द को हम हिन्दी की मुख्यधारा के शब्द के रूप में स्वीकार कर रहे हैं, हिन्दी को उसकी जरूरत कितनी है और क्या उस शब्द के लिए हमारी भाषा में कोई पर्याय शेष नहीं बचा है? अंग्रेजी के शब्दों की धड़ल्ले से हिन्दी में हो रही घुसपैठ इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि, हम बड़ी सहजता से अंग्रेजी के शब्दों का अपने वाक्य संरचना में हिन्दीकरण कर दे रहे हैं जिस वजह से उस शब्द का हिन्दी भाषा में पर्यायवाची शब्द गौण होता जा रहा है ! उदाहरणार्थ, अगर हिन्दी के विद्यालय शब्द को देखें तो इसकी स्थिति ‘स्कूल’ शब्द के समक्ष नाजुक प्रतीत होती है। जिस तरह स्कूल शब्द को वाक्य संरचना में स्कूल या स्कूलों की तरह बनाकर हिन्दीकरण किया जा रहा है, इसे विद्यालय या पाठशाला जैसे हिन्दी के पारंपरिक शब्दों को विलुप्त करने की शुरुआती कवायद के रूप में देखा जा सकता है। मुख्यधारा की हिन्दी में विद्यालय शब्द की मौजूदगी में स्कूल शब्द का हिन्दीकारण होना शब्द आदान- प्रदान नहीं, बल्कि भाषाई घुसपैठ का नमूना मात्र है। इसमे दो राय नहीं कि जिस अनुपात में हम अंग्रेजी शब्दों को हिन्दी की मुख्यधारा में ला रहे हैं, उस अनुपात में हिन्दी के शब्द अंग्रेजी की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पा रहे हैं। अंग्रेजी अपने भाषाई अनुशासन के अंतर्गत ही शब्दों के आयात को स्वीकार करती है और सिर्फ उन्ही वाह्य भाषा के शब्दों को लेती है जिनके पर्याय अंग्रेजी में उपलब्ध नहीं है, जैसे ‘साड़ी।’ साड़ी जैसा परिधान क्योंकि उस समाज की परंपरा या संस्कृति का हिस्सा नहीं है इसलिए उसके लिए वहां उसका पर्यायवाची नहीं है लिहाजा जरूरत के मुताबिक उसे प्रयोग में लाना उसकी मजबूरी है। हिन्दी और अंग्रेजी के बीच के भाषाई आदान-प्रदान के असंतुलन को गंभीरता से लेने की जरूरत है। हमारे भाषाविदों व साहित्यकारों को शब्द चयन के प्रति अत्यधिक उदार होने की बजाय भाषा के प्रति अनुशासित होने की जरूरत है। सहजता व उदारता के अन्ध उत्साह में कहीं न कहीं हिन्दी की क्षति हो रही है और अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ रहा है। इस विषय पर खुली बहस की जरूरत है और हिन्दी में शब्दों के आदान-प्रदान में अनुशासन का दायरा निर्धारित करने की जरूरत है। विलुप्त हो रही भाषाओं से सबक लेते हुए हिन्दी को पुन: परिभाषित किये जाने और अनुशासन के दायरे में समेटने की जरूरत पर बल दिया जाना चाहिए। अगर हिन्दी अपने मूल स्वरूप और पारंपरिक शब्द खोती जाएगी तो कहीं अंतरराष्ट्रीय भाषा बनने की बजाय महज बोली में न सिमट जाए।
शिवानंद द्विवेदी

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

पिछले बजट के क्या हासिल : दैनिक जागरण में प्रकाशित लेख


देश के कुल आय-व्यय का लेखा जोखा प्रस्तुत किए जाने वाले इस सालाना बजट को परंपराओं में भले ही आम बजट कहा जाता रहा है, लेकिन हमेशा से इस बजट ने देश की आम जनता को निराश ही किया है। 28 फरवरी को पेश किए गए इस आम बजट में सरकार द्वारा आम जनता के हितों में की गई घोषणाओं की व्यावहारिकता को तो अभी देखना बाकी है, लेकिन सवाल यह भी है कि पिछले साल सरकार द्वारा पेश किए गए आम बजट के निर्धारित लक्ष्यों को कहां तक प्राप्त किया जा सका है। भारतीय संसदीय व्यवस्था में जितनी बहस वर्तमान में पेश हुए बजट को लेकर होती है, उतनी बहस पिछले बजट की समीक्षा एवं उसकी उपलब्धियों या खामियों को लेकर नहीं होती। हर साल फरवरी-मार्च महीने में आम जनता, किसान, मजदूर, छोटे-बड़े व्यापारियों सहित तमाम नौकरी पेशे वाले लोग बजट की राह ताकते हैं कि शायद इस बार उनके ऊपर भी उनकी चुनी सरकार मेहरबान हो जाए और उन्हें कुछ राहत मिले। इसी आस और विश्वास की उधेड़-बुन में वे भूल जाते हैं कि पिछली बार के बजट में इसी सरकार ने उनके लिए क्या दिया था, कितना दिया था और उनको कितना मिला। इस बात से तो कतई इन्कार नहीं किया जा सकता कि आम जनता के लिए सिरदर्द बन चुकी महंगाई के कारण तमाम क्षेत्रों में आए भारी असंतुलन को दूर कर पाने में अब तक के सारे बजट बौने साबित हुए हैं। पहली पंचवर्षीय योजना से लेकर अब तक की बारहवीं पंचवर्षीय योजना तक हर एक योजना में कृषि को महत्वपूर्ण जगह दी गई और हर साल कृषि बजट में इजाफा किया गया। इसके बावजूद कृषि का स्तर सुधरने की बजाय लगातार अपने अवसान की तरफ जाता दिख रहा है। कृषि के क्षेत्र में पिछले वर्ष के बजट में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत 9,270 करोड़, द्वितीय हरित क्रांति के नाम पर एक हजार करोड़, कृषि ऋण के नाम पर 5,75,000 करोड़, सिचाई योजना के नाम पर तुलनात्मक वृद्धि के साथ 14,270 करोड़ रुपये का बजट पेश किया गया था। लेकिन बजट के कागजों में लुटाया गया यह धन आज तक किसानों की किसानी को चमकदार बना पाने में कामयाब नहीं हो पाया है। फिर इस बार इस बजट से कैसे उम्मीद करें!