शनिवार, 27 अप्रैल 2013

न्याय की लड़ाई में भारतीय भाषाएँ : राष्ट्रीय सहारा में प्रकशित मेरा लेख



28-अप्रैल-13

न्याय की अर्जी का अधिकार तो देश के हर आम और खास व्यक्ति को समान रूप से प्राप्त है ! न्याय एक ऐसा मसला है जिसको लेकर कई स्तरों पर बहुआयामी विमर्श चलते रहे हैं ! इस दिशा में चल रहे तमाम विमर्शों के बीच आज न्याय और न्यायालयों में प्रयोग की जानी वाली भाषा से जुड़ी बहस मुख्यधारा का विषय बनी हुई है ! संवैधानिक रूप से कई ऐसे बिंदु हैं जो वाकई इस विषय को ना सिर्फ गंभीर बल्कि भारतीय भाषाओं के नजरिये से चिंतनीय भी बनाते हैं ! संवैधानिक मानकों के आधार पर अगर देखा जाय तो न्यायिक प्रक्रियाओं में हिन्दी सहित तमाम भारतीय भाषाओं की स्थिति हाशिए पर नजर आती है ! हिन्दी सहित तमाम भारतीय भाषाओं को लेकर भारतीय संविधान की धारा 348 खण्ड एक के तहत निर्धारित प्रावधान में यह स्पष्ट तौर पर लिखा गया है कि उच्च न्यायलय एवं सर्वोच्च न्यायालय में अंग्रेजी को ही अनिवार्य भाषा के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है ! इस प्रावधान का सबसे आश्चर्यजनक पहलू ये है कि आम जनता के न्यायिक गुहार के इन मंचों पर भारत की राजभाषा हिन्दी तक को भी स्वीकृति नहीं दी गयी है ! संविधान की इसी धारा के खण्ड दो के तहत यह प्रावधान है कि अगर किसी राज्य के उच्च न्यायालय को अंग्रेजी की बजाय हिन्दी में कोई कार्यवाही करनी हो तो उस राज्य के राज्यपाल द्वारा पहले राष्ट्रपति से अनुमति लेना अनिवार्य होगा ! इस नियम के तहत सन 2002 में मध्यप्रदेश एवं 2010 में गुजरात सहित एकाध और राज्यों के राज्यपालों द्वारा किसी मामले से सम्बंधित कार्य को हिन्दी में करने की अनुमति मांगी गयी जिसे तत्कालीन राष्ट्प्रमुखों द्वारा स्वीकार नहीं किया गया ! भारतीय संविधान में निहित इस विधान के बारे में आज आम जनता को बेशक ज्यादा कुछ ना पता हो लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से इसका खामियाजा तो कहीं ना कहीं उन्हें ही भुगतना पड़ता है ! आखिर किन अध्ययनों अथवा किन तर्कों के आधार पर भारतीय संविधान में निहित भाषाओं से सम्बंधित इस विधान को स्वीकृति दी गयी है यह समझ से परे है ! भारत की कुल जनसँख्या को अगर भाषाई मापदंडों  के आधार पर वर्गीकृत करके देखें तो जो आंकड़े प्राप्त होते हैं उनसे यह स्पष्ट होगा कि संविधान में निहित यह विधान पूरी तरह से अन्यायपूर्ण एवं जनभावना का विरोधी है ! 2001 जनगणना में प्राप्त भाषाई ग्राफ के अनुसार भारत की कुल 43% जनसँख्या हिन्दी को अपनी प्रथम भाषा के तौर पर स्वीकार करती है जबकि 30 % से ज्यादा लोग हिन्दी को द्वितीय वरीयता देते हुए अपनी क्षेत्रीय भाषाओं को प्रथम भाषा मानते हैं! वहीँ दूसरी तरफ अंग्रेजी को अपनी प्रथम भाषा मानने वाले लोगों की कुल जनसँख्या दो लाख छब्बीस हजार के आस-पास है जो तत्कालीन कुल जनसँख्या की 0.2% के लगभग है ! इन आंकड़ों को देखने के बाद पहला सवाल यही उठता है कि क्या इन्ही 0.2% लोगो को ध्यान में रख कर न्यायिक प्रक्रिया का यह भाषाई पैमाना तय किया गया है या इसके पीछे सरकार का कोई और तर्क भी है ? जिस देश 99.98% आबादी अंग्रेजी को अपनी प्रथम भाषा के रूप में स्वीकार तक नहीं करती है उस देश की समूची उच्च न्यायिक प्रक्रिया में ना सिर्फ अंग्रेजी  का अनिवार्य होना  एवं अन्य सभी भारतीय भाषाओं का  कानूनी तौर पर प्रतिबंधित होना बेहद अप्रासंगिक एवं अतार्किक प्रतीत होता है !
      दरअसल यहाँ सवाल किसी भाषा के उत्थान या पतन का नहीं है ! यहाँ सवाल भाषा के साथ हो रहे अन्याय एवं उस भाषा को बोलने वाले लोगों की व्यवस्था में हिस्सेदारी का है ! बिना किसी तर्क एवं बिना किसी तरह का सामाजिक अध्ययन किये  देश की समूची उच्च न्यायिक व्यवस्था में अंग्रेजी थोपने के साथ-साथ हिन्दी सहित तमाम भारतीय भाषाओं को प्रतिबंधित करने का सीधा अर्थ है कि यह नियम बहुसंख्यक जनता के न्यायिक अभिव्यक्ति के माध्यम को हाशिए पर लाने का काम कर रहा है ! अगर कोई व्यक्ति अपनी स्वेच्छा की भाषा में न्याय की अर्जी तक नहीं दाखिल कर सकता तो इसे व्यक्ति के भाषाई अधिकार का हनन नहीं तो और क्या कहा जाय ! हालाकि न्यायिक प्रक्रियाओं में बहुभाषाई मान्यता का विरोध करने के पीछे सरकारी तर्क ये है कि इससे संसाधन का खर्च बढ़ेगा और प्रक्रिया में जटिलता आयेगी ! सरकार की तरफ से दिये जाने वाला यह तर्क इस नजरिये से बेहद आधारहीन लगता है कि जिस भौगोलिक समाज का मात्र .2%  हिस्सा जिस भाषा को अपनी प्रथम भाषा मानता है उस भाषा को सहज मानकर अनिवार्य कर दिया गया है  जबकि 99.98% लोगों की भाषाओं को जटिलता का तर्क देकर प्रतिबंधित कर दिया गया है ! बहुभाषाई समाज वाला देश होने के बावजूद भी अगर हिन्दी को अपनी प्रथम भाषा मानने वालों की संख्या इस देश में आज भी सबसे ज्यादा है तो फिर समाज के लिए कार्यरत विभागों अथवा संस्थाओं की भाषा भी वही क्यों ना हो जो समाज की भाषा है ! इसमें किसी को दो राय नहीं होनी चाहिए कि न्यायाधीश एवं न्यायलय समाज के लिए बने हैं ना कि समाज न्यायलय एवं न्यायाधीश के लिए ! अत: अगर जटिलता एवं सुविधा का पैमाना जनता एवं समाज की सहूलियत के मापदंडों को आधारभूत मानकर  तय किया जाना चाहिए ना कि विभागों एवं संस्थाओं के सहूलियत के मापदंडों के आधार पर  ! भाषाओं को लेकर जिन न्यायिक विधानों का दुष्चक्र खड़ा किया गया है उनमे कहीं ना कहीं आम आदमी की समस्याएं हाशिए पर जा चुकी हैं ! लोकतंत्र में न्याय की लड़ाई सबसे अहम एवं प्रमुख है और समाज के विभिन्न पहलुओं पर चल रही न्याय की लड़ाईयों के दायरों से भाषाई संघर्षों को अलग नहीं रखा जाना चाहिए ! यह विधान भारतीय भाषाओं के साथ महज भेदभाव का विषय ना होकर न्यायिक संघर्षों का विषय है जिसको लेकर भाषाई लड़ाई को आगे बढाने की जरुरत है ! नौकरियों की नियुक्ति प्रक्रिया में अंग्रेजी अनिवार्य करने की बजाय सही कदम यह होना चाहिए कि भाषाई अनिवार्यता से मुक्त नियुक्ति करने के पश्चात जरूरी भाषा का प्रशिक्षण प्रदान किया जाय ! भाषा के आधार पर अगर अवसर में कटौती की जाती है तो इसे भी भाषाओं के साथ भेदभाव का ही एक उदाहरण माना जा सकता है ! भारतीय भाषाओं के साथ संवैधानिक नियामकों की आड़ लेकर किये जा रहे इस अन्याय पूर्ण रवैये को लेकर लगभग चार महीने से दिल्ली कोंग्रेस मुख्यालय के सामने धरने पर बैठे आइआईटीयन श्याम रूद्र पाठक साफ़ तौर पर कहते हैं “यह पूरा मसला भाषाई न्याय से जुड़ा है ना कि उत्थान और पतन से जुड़ा है !”
      अंग्रेजी को बतौर भाषा स्वीकार करने अथवा सुविधानुसार अपने कार्यों में प्रयोग करने से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि किसी भी भाषा एवं उस भाषा को बोलने वाले समाज के साथ अन्याय ना हो ! न्याय के दरवाजे पर ही अगर भाषाओं के साथ इस कदर अन्यायपूर्ण दोहरा रवैया अपनाया जा रहा है तो यह निश्चित तौर पर बेहद दुर्भाग्यपूर्ण हैं ! समाज में रहने वाले लोग एवं उनके द्वारा बोली जाने वाली प्रथम भाषा में अगर उनको न्यायिक अपील करने तक का हक नहीं मिलेगा तो भला न्याय के अन्य पहलूओं पर कैसे विश्वस्त हुआ जा सकता है ! कम से कम संघ स्तर पर त्रिभाषीय पद्धति की स्वीकृति तो मिलनी ही चाहिए ! इस दिशा में राज्य स्तर पर पहल शुरू हो चुकी है एवं कुछ राज्यों जैसे बिहार,राजस्थान,मध्यप्रदेश आदि में इस प्रावधान में बदलाव भी किया गया है मगर संघ स्तर पर अभी व्यापक संघर्ष जारी रखने की जरुरत है ! संसाधनों एवं जटिलताओं के बहाने भाषाओं के साथ हो रहे इस अन्यायपूर्ण दोहरापन से बचकर इनको इनका वाजिब हक दिये जाने की जरुरत है !
  

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

संप्रग की चुनौती हैं लटके विधेयक : दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा लेख



 (26-अप्रैल-13)

22 अप्रैल से शुरू संसद का बजट सत्र अपने पहले दिन से ही हंगामे की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है! बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत ही हंगामे वाली रही एवं वर्तमान राजनीतिक परिस्थियों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि संसदीय सत्र की  आगामी कार्यवाही  भी हंगामों बीच ही चलेगी ! संसद के इस बजट सत्र के शुरू होते ही दिल्ली में बढ़  रहे दुष्कर्म के मामलों में सरकार की विफलता पर विपक्ष द्वारा हंगामा खड़ा किया गया तो वहीँ सरकार से अलग हुई तृणमूल ने भी अपने तेवर तल्ख़  ही रखे ! अगर देखा जाय तो आगामी लोकसभा चुनाव के नजरिये से संसद का यह बजट सत्र बहुत ही महत्वपूर्ण है जिसमे वित्त विधेयक के अलावा खाद्य सुरक्षा जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण विधेयक सरकार द्वारा पास कराये जाने की प्रतिबद्धता है ! हालाकि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियां यु.पी.ए सरकार के अनुकूल नहीं है ! वर्तमान के राजनीतिक घटनाक्रमों में अगर देखा जाय तो संसद की कार्यवाही ना चलने देने एवं सरकार को विभिन्न मुद्दों पर घेरने के पर्याप्त कारण विपक्ष के पास मौजूद हैं और विपक्ष उन कारणों को भुनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ने वाला  ! सरकार को सदन में घेरने के लिए विपक्ष के पास मुद्दों की कोई कमी है ऐसा नहीं कहा जा सकता है ! कोयला आवंटन मामले में चल रही सीबीआई जांच में कथित सरकारी हस्तक्षेप पर राज्यसभा में पहले ही दिन गतिरोध पैदा कर चुकी बीजेपी द्वारा  हाल ही में आई मनरेगा में हजारों करोंड़ की धांधली के खुलासे वाली कैग की रिपोर्ट एवं लद्दाख सीमा पर चीनी घुसपैठ आदि  को भी इस सत्र में सरकार के खिलाफ हथियार बनाया जाना लगभग शुरू हो चूका  जिस पर आगे भी गतिरोध बना रहना तय के बराबर है ! चुनौतियों के नजरिये से यह सत्र सरकार  के लिए आसान नहीं दिख रहा क्योंकि बीजेपी के अलावा वाम दलों के अपने मुद्दों के साथ-साथ  तेलांगना राज्य आदि के मसलों पर सरकार को भारी गतिरोध झेलना ही पड़ेगा ! सरकार के लिए यह सत्र क्यों महत्वपूर्ण है इस विषय पर अगर गौर किया जाय  तो कई ऐसे महत्वपूर्ण विधेयक हैं जिनको हर हाल में पारित कराने की चुनौती सरकार की प्राथमिकता है ! आगामी लोकसभा चुनावों में अपनी कामयाबी कि फेहरिश्त लम्बी  रखने के लिए सरकार के कई ड्रीम प्रोजेक्ट इसी सत्र में पारित होने हैं ! कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गाँधी के महत्वाकांक्षी विधेयक के रूप में खाद्य सुरक्षा बिल को पास कराने के साथ-साथ भूमि अधिग्रहण एवं आर्थिक सुधारों से जुड़े अन्य तमाम बिल अभी आधे रास्ते में  लटके पड़े हैं !  निश्चित तौर पर इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर इन विधेयकों को सरकार पास करा पाने में असफल रहती है तो उसकी किरकिरी होनी तय है एवं चुनावों में भी इसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ सकता है ! अगर बजट सत्र के प्रथम चरण को देखें तो पता चलेगा  कि सरकार द्वारा पिछले सत्र में कुल 68 विधेयको की सूचि पारित कराने हेतु  प्रस्तावित की गयी थी  जिनमे विपक्ष के गतिरोध एवं असहमतियों के कारण मात्र सरकार 11 विधेयक ही पास करा पाने में कामयाब हो पाई थी ! बजट सत्र के तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों की तुलना में अगर वर्तमान गतिरोधो को देखा जाय तो स्थिति सरकार के लिए ज्यादा प्रतिकूल नजर आ रही है ! हालाकि बजट सत्र के प्रथम चरण में उत्पन्न गतिरोधों के बाद ऐसा नहीं है कि सरकार द्वारा विपक्षी दलों के साथ सहमति  बनाने का कोई प्रयास नहीं किया गया है ! भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर विपक्ष की तमाम असहमतियों पर सरकार सहमति बनाने का प्रयास करती रही है मगर हर मसले पर पूर्ण सहमति  बनाकर विधेयक पास करा लेगी ऐसा कहना अभी जल्दीबाजी होगी ! संसद के इस सत्र को सियासी चश्मे से समझे बिना इस बात का सही  आकलन नहीं किया जा सकता कि इस सत्र में कौन दल क्या पैंतरा चलने वाला है  ! अगर सरकार खाद्य सुरक्षा विधेयक लाकर इसका सियासी इस्तेमाल चुनाव में अपनी उपलब्धि के तौर पर करने का मंसूबा रखती है तो इस बात से भी नकारा नहीं जा सकता कि विपक्ष द्वारा इस बिल में रोड़े अटकाकर सरकार के मंसूबों पर पानी फेरने का काम किया जा सकता है ! अगर देखा जाय भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी सरकार के लिए अपनी साख बचाना अगर राजनीतिक चुनौती है तो वहीं विपक्ष के तौर पर बीजेपी के सामने सरकार की असफलताओं को जनता के बीच मुद्दे के रूप में कायम रखने की चुनौती है ! बीजेपी का सियासी चरित्र कभी इस बात की इजाजत नहीं देगा कि यु.पी.ए सरकार सहजता से सभी महत्वाकांक्षी विधेयकों को पास करा कर लोकसभा चुनाव में जनता के बीच जाए ! हालाकि लोकसभा में सरकार के पास इतना संख्या बल है कि वो अपने तमाम जरुरी विधेयक पारित करा ले ! मगर कई मसलों पर उसे उच्च सदन में गतिरोध झेलना पद सकता है !
     संसद के दोनों सदनों में अलग-अलग मसलों पर खड़ा होने वाला यह गतिरोध कोई नया नहीं है बल्कि आज की राजनीति में यह मुख्यधारा का राजनीतिक  चरित्र बनता जा रहा है ! अगर पिछले कुछ संसदीय सत्रों को नजीर के तौर पर देखें  तो लगभग सभी सत्रों में कार्यवाही के नाम पर हंगामे और गतिरोध ही देखने को मिलेंगे  ! वर्तमान राजनीतिक हालात एवं यु.पी.ए सरकार के ऊपर लग रहे भ्रष्टाचार सहित तमाम आरोपों को देखते हुए  अगर इस बजट सत्र के दुसरे चरण के भविष्य की दिशा और दशा का आकलन करें तो पूरा मामला  हंगामे और गतिरोध की भेंट चढ़ता दिख रहा है !हालाकि वित्त विधेयक के पास होने को लेकर किसी तरह की कोई शंका नहीं जताई जा सकती क्योंकि  विपक्ष के लिए भी उसमे विरोध के नाम पर कुछ ख़ास नहीं है ! मगर भूमि अधिग्रहण विधेयक सहित अन्य मसलों पर अन्य  दल अपनी-अपनी सियासत के दाँव पेंच जरुर आजमाते नजर आयेंगे ! संसद का बजट सत्र के शुरुआती दिन तो हंगामे की भेंट चढ़ ही चुके हैं और आगे भी राजनीतिक परिस्थितियां ऐसी बनती दिख रही हैं !ऐसे में इस बात की पुरी गुंजाइश बनती दिख रही है कि बजट सत्र के दुसरे चरण में 10 मई तक चलने वाला यह सत्र हंगामे और गतिरोधों के बीच ही चल पायेगा !

    लोकतंत्र में संसद की कार्यवाही बाधित करना एक नजरिये से अगर अनुचित लगता है तो वहीँ इसका दूसरा दृष्टिकोण भी है ! दूसरे नजरिये से अगर सोचें तो संसद की कार्यवाही ठप करके  विपक्ष भी अपनी वैचारिक एवं सैद्धांतिक प्रतिबद्धता के अनुकूल कुछ काम ही करता है जो संसद की कार्यवाही के चलते हुए संभव नहीं होता ! अगर किसी मसले पर विरोध के कारण संसद नहीं चलने दिया जाता है तो विपक्ष को मिले जनादेश का एक दृष्टिकोण यह भी माना जाना चाहिए कि विपक्ष ने वो ही किया जो वो चाहता है ! बाकी किसी  भी सरकार या विपक्ष ने क्या ठीक किया और क्या गलत किया इसका फैसला तो चुनाव में जनादेश से होना ही है !  

शिवानन्द द्विवेदी सहर

 

मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

नीतीश की सियासत का मकसद भी समझें : दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित मेरा लेख

(17-अप्रैल-2013)
भारतीय लोकतंत्र के पिछले दो दशकों की केंद्रीय सियासत पर अगर नज़र डालें तो समूची केंद्रीय राजनीति धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता के इर्द-गिर्द ही नजर आती है। मुद्दा चाहे जिस तरह का भी हो, समर्थन एवं विरोध का निर्णय धर्मनिरपेक्षता के पैमानों पर ही लिया जाता रहा है। दिल्ली में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद भाजपा के अहम सहयोगी जनता दल यूनाइटेड ने साफ कर दिया कि वो किसी भी हाल में साम्प्रदायिक छवि वाले किसी भी नेता को बतौर प्रधानमंत्री स्वीकार नहीं करेगा। अपने सिद्धांतों का हवाला देकर साम्प्रदायिकता से किनारा करते जदयू के इस निर्णय को मोदी से किनारा करने के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। मोदी का नाम लिए बगैर जदयू के आला नेताओं ने भाजपा को साफ  संकेत दे दिया है कि लोकसभा चुनाव में वो किसी भी हाल में मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर स्वीकार नहीं करने वाले। अगर बारीकी से प्रधानमंत्री पद को लेकर जारी ऊहापोह एवं सियासत के सागर मंथन को देखें तो पैमाने की सुई धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता पर ही जाकर ठहरती है। शब्दार्थ के हिसाब से धर्मनिरपेक्षता के मायने बेशक कुछ और हों मगर सियासत में तो धर्मनिरपेक्षता को अलग-अलग राजनीतिक दलों द्वारा अपने-अपने ढंग से ही परिभाषित किया जाता रहा है।
जनता दल यूनाइटेड की दो दिवसीय बैठक का ज्यादा हिस्सा अप्रत्यक्ष रूप से मोदी को निशाना बनाने एवं खुद को धर्मनिरपेक्ष साबित करने के नाम रहा। नीतीश कुमार ने साफ तौर पर कहा कि देश को अटल जी जैसा सबको जोड़कर चलने वाला प्रधानमंत्री चाहिए जो समय आने पर टोपी भी पहन सकता हो। नीतीश कुमार द्वारा अपने भाषण में जिस टोपी का जिक्र किया गया सियासत में उसके निहितार्थ सबको पता है। भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए भी खुद को धर्मनिरपेक्ष साबित करने की कोई भी कोर-कसर जनता दल यूनाइटेड द्वारा इस बैठक में नहीं छोड़ी गयी। हालांकि, धर्मनिरपेक्षता पर अगर बात की जाये तो यह स्पष्ट होगा कि नीतीश कुमार की धर्मनिरपेक्षता के दायरे बहुत चयनित नजर आते हैं। नीतीश कुमार की धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा में राम-मंदिर आंदोलन के दौरान बाबरी मस्जिद मामले में आरोपी लालकृष्ण आडवाणी को सांप्रदायिक नहीं माना गया है जबकि बाबरी प्रकरण में लालकृष्ण आडवाणी का नाम प्राथमिकी में दर्ज किया गया था जो मामला अभी न्यायालय के अधीन है। सवाल ये है कि नीतीश कुमार की साम्प्रदायिकता का निशाना केवल मोदी ही क्यों बन रहे हैं? धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मोदी का विरोध करने वाले नीतीश कुमार के ऊपर यह सवाल उठना तो लाजि़मी है कि क्या नीतीश कुमार मोदी के अलावा समूची भाजपा को धर्मनिरपेक्षता के तराजू पर खरा पाते हैं? नीतीश कुमार की धर्मनिरपेक्षता की यह दोहरी नजर समझ से परे है कि गुजरात दंगों की जांच के लिए गठित एसआईटी द्वारा मोदी को क्लीन चिट दिये जाने के बावजूद मोदी नीतीश को साम्प्रदायिक लगते हैं जबकि बाबरी ध्वंस की साजिश के नामजद आरोपी आडवाणी धर्मनिरपेक्ष दिखाई देते। हालांकि, नीतीश कुमार जिस धर्मनिरपेक्षता के मापदंडों के आधार पर मोदी विरोधी सियासत करते नजर आ रहे हैं उससे वो कोई राष्ट्रीय राजनीतिक मकसद साध रहे हों कतई नहीं लगता। बल्कि इसमें भी उनकी बिहार की क्षेत्रीय सियासत के नफे-नुकसान ही नज़र आते हैं।
नीतीश कुमार द्वारा धर्मनिरपेक्षता की सियासत का जो शिगूफा छोड़ा जा रहा है उसके मूलत: दो उद्देश्य नजर आते हैं। बिना नाम लिए मोदी के खिलाफ छेड़ी गई इस जंग का पहला उद्देश्य यह है कि किसी भी तरह मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए आगे आने से रोका जाये। मोदी के विरोध के बहाने नीतीश कुमार कोई राष्ट्रीय राजनीति नहीं कर रहे बल्कि वो बिहार की राजनीति ही करते नजर आ रहे हैं। मोदी का चेहरा आगे आना उनकी स्थानीय सियासत के समीकरणों को सूट नहीं करेगा। बिहार का मुस्लिम मतदाता लालू प्रसाद यादव की राजद से दूर होकर नीतीश कुमार के साथ खड़ा है और नीतीश की सरकार बनाने में उसका अहम योगदान भी है। अगर नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए आगे किये जाते हैं तो नीतीश के सामने भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए उन मुस्लिम वोटर्स को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती साबित होगी। नीतीश कुमार आगामी लोकसभा चुनाव में अपने स्थानीय राजनीतिक समीकरणों के साथ कोई जोखिम नहीं लेना चाहते। नीतीश कुमार अभी बिहार की राजनीति तक ही खुद को सीमित रखना चाहते हैं और राष्ट्रीय राजनीति में प्रत्यक्ष सहभागिता करने की उनकी कोई रुचि नहीं है जैसी कि मोदी को है। लेकिन नीतीश कुमार की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का दायरा इतना तो है ही कि वो अपने समकक्ष, किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को राष्ट्रीय मंच पर आसानी से नहीं आने देना चाहेंगे। आज से नहीं बल्कि काफी समय से विकास पुरुष बनाम सुशासन बाबु की बहस होती रही है। ऐसे में नीतीश का मोदी विरोधी होना इस दृष्टिकोण से भी स्वाभाविकता के अनुरूप लगता है।
खैर मोदी विरोध की वजहें नीतीश कुमार द्वारा चाहे जो भी बताई जायें मगर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर केवल मोदी से आपत्ति जताना किसी भी गैर भाजपाई अथवा गैर एनडीए नेता अथवा कार्यकर्ता को रास नहीं आ रहा। केन्द्र की राजनीति के रास्ते अपनी स्थानीय राजनीति की बुनियाद को पुख्ता कर रहे नीतीश कुमार बेशक आज अटल बिहारी वाजपेयी की नजीर देते दिख रहे हों लेकिन बुनियादी सच्चाई तो यही है कि धर्मनिरपेक्षता के बहाने मोदी की राह में रोड़ा अटकाने का काम नीतीश कुमार द्वारा आगे भी किया जाता रहेगा। नीतीश कुमार द्वारा दिये गए भाषण से भाजपा के कई दिग्गज मन ही मन प्रसन्न भी होंगे और वक्त आने पर इसका समर्थन भी करेंगे। कांग्रेस के साथ न जाने एवं मोदी विरोधी शर्तों पर गठबंधन में कायम रहने के साथ-साथ जदयू द्वारा लोकसभा चुनाव से पहले दिसंबर तक भाजपा को अपना पत्ता खोलने की नसीहत भी दी गयी है। हालांकि, जनता दल यूनाइटेड के लिए भी वर्तमान में प्रमुख चुनौती यह है कि वह अपने आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारी गठबंधन के अनुरूप करे या अकेले करे। इतना तो मान लिया जाना चाहिए कि अगर मोदी आते हैं तो जनता दल यूनाइटेड द्वारा गठबंधन तोड़ लिया जाएगा। जदयू कभी भी बिहार के राजनीतिक समीकरण के साथ समझौता नहीं कर सकती क्योंकि केंद्रीय राजनीति में उसके पास भाजपा के अलावा भी अन्य विकल्प मिलेंगे मगर बिहार हाथ से जाने के बाद उसके पास कुछ नहीं बचेगा।
शिवानन्द  द्विवेदी सहर


शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

भारत-नेपाल सीमा की सुरक्षा का सवाल : दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित मेरा लेख


सीमा सुरक्षा सहित तमाम अन्य अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के मसले पर जिस तरह से भारत सरकार द्वारा अक्सर चिंता जताई जाती है अथवा नीति निर्माण के पुख्ता इंतजाम किये जाते रहे हैं, इस मामले में भारत-नेपाल सीमा  सुरक्षा नीति की स्थिति को अपवाद  कहा जाना उचित होगा ! भारत-नेपाल सीमा पर चल रही हलचलों को लेकर कोई राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ठोस नीति निर्माण का ना तो विशेष प्रयास ही किया गया है और ना ही इसे मुख्यधारा के अंतर्राष्ट्रीय मामले के तौर पर स्वीकार ही किया जाता  है ! रक्षा मंत्रालय एवं गृह मंत्रालय दोनों ही सीमा-सुरक्षा एवं आंतरिक सुरक्षा के मसले पर नेपाल-भारत सीमा पर चुप्पी साधे हुए हैं और किसी भी नीतिगत निर्णय का खाका तक नहीं तैयार कर पाए हैं ! सरकारों द्वारा नेपाल-भारत सीमा सुरक्षा के मसले पर दिखाई जा रही इस असंवेदनशीलता का कतई यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि नेपाल सीमा पूर्णतया सुरक्षित है और वहाँ सब कुछ शांतिप्रिय ढंग से चल रहा है ! सरकार को यह बात बखूबी पता होनी चाहिए  कि राजशाही के खातमे एवं माओवादी संघर्षों के बाद से अभी तक नेपाल की आंतरिक स्थिति सामान्य नहीं हो पाई है और नेपाल अपने आंतरिक संघर्षों से जूझ रहा है जिसका असर निकटतम पड़ोसी होने के नाते भारतीय सीमा पर पड़ना स्वाभाविक है  ! बेशक नेपाल में माओवादी-यू.सी.पी.एन सरकार में गठबंधन के रूप में शामिल हैं लेकिन नेपाल के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य अभी भी सामान्य नहीं हो पाए हैं और संविधान सभा के मसले पर नेपाल में स्थिति अस्थिर बनी हुई है ! आज नेपाल में माओवादीयों के भी दो धड़े बन गए है जिसमे एक धड़ा माओवादी नेता मोहन वैद्य के नेतृत्व में सक्रिय है और ये भारत का धुर विरोधी धड़ा है ! हालाकि माओवादीयों द्वारा तो हमेशा से भारत को नेपाल के पिछडेपन का कारण बता कर भारत  विरोध किया जाता रहा है ! एक लम्बे हिंसक संघर्षों के बाद जब नेपाल में  राजशाही का अंत हुआ और सत्ता में माओवादियों की हिस्सेदारी सुनिश्चित  हुई तो निश्चित तौर पर भारत-नेपाल के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर असर पड़ना स्वाभाविक था, और पड़ा भी !संबंधो के बदलते नजरिये का ही फर्क ही तो था कि नेपाल द्वारा भारत के साथ हुए साठ के दशक के उस समझौते को ताक पर रखते हुए नए हथियार खरीदे गए,जिसमे कहा गया था कि नेपाल कोई भी हथियार आदि बिना भारत की अनुमति के नहीं खरीदेगा ! अगर बात सत्ता बदलावों से भारत सीमा सुरक्षा पर पड़े असर की करें तो उत्तर प्रदेश के तमाम जिलों से सटे नेपाल सीमा पर हालात लागातार नाजुक होते जा रहे हैं और आये दिन नेपाल की तरफ से भारत विरोधी मुहीम को को बढाने का काम किया जाता रहा है ! अभी कुछ ही दिनों पहले नेपाल के माओवादी नेता मोहन वैद्य के नेतृत्व वाले माओवादी गुट द्वारा भारत से नेपाल जाने वाली गाड़ियों को लेकर जो हिंसात्मक रुख अख्तियार किया गया जिसमे तमाम गाड़ियों को निशाना बनाया गया लेकिन उस पर हम कोई अंतर्राष्ट्रीय कदम नहीं उठाये, कहीं ना कहीं यह असंवेदनशीलता नेपाल सीमा एवं नेपाल  को लेकर हमारी लचर नीति को दर्शाता है ! नेपाल की तरफ से भारत विरोधी मुहीम अक्सर चलाई जाती रही हैं बावजूद इन सबके इस अंतर्राष्ट्रीय समस्या पर अभी तक हमारी सरकार गंभीर नहीं हो पा रही है ! नेपाल से सटे तमाम जिलों जिनमे महाराजगंज,सिद्धार्थनगर,लखीमपुर खीरी प्रमुख हैं,से भारी मात्रा में खाद एवं अनाज आदि नेपाल सीमा पार भेजा जाता रहा है जिससे नेपाल के पहाड़ी इलाकों में लोगों का जीवन यापन होता है ! ऐसे में प्रश्न ये उठता है कि खुलेआम चल रही ये आवाजाही क्या सुरक्षा के दृष्टिकोण से उचित है ? क्या इस आवाजाही पर सरकारी  अंकुश नहीं लगाया जाना चाहिए ?
            भारत-नेपाल सीमा की सुरक्षा को लेकर हमारे पास कोई ठोस नीति नहीं हो पाने के कारण नेपाल सीमा, बाहर से आने वाले माओवादी संगठनो,अपराधियों,आतंकवादीयों के लिए सबसे आसान रास्ता बनती जा रही है और भारी संख्या में हथियार आदि की तस्करी की संभावना प्रबल होती जा रही है ! इसमे कोई दो राय नहीं कि बांग्लादेश एवं पाकिस्तान सीमा पर चौकस सुरक्षा इंतजाम होने के कारण तमाम वाह्य राष्ट्रविरोधी ताकते नेपाल के रास्ते भारत में घुसपैठ करने की कोशिश करती रही हैं या बहुत हद तक घुसपैठ कर पाने में सफल भी हो रही हैं,जिस पर नकेल कसने में हम नीतिगत रूप पूरी तरह से नाकाम साबित हो रहे हैं ! भारत-नेपाल सीमा की कमजोर सुरक्षा नीति से  देश के आंतरिक एवं वाह्य सुरक्षा पर पडने वाले प्रभावों को अगर चीन एवं पाकिस्तान के परिप्रेक्ष्य में  समझने का प्रयास करें तो इस बात को स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं होनी चाहिए  कि चीन द्वारा नेपाल का इस्तेमाल भारत में आंतरिक अस्थिरिता का माहौल बनाने के लिए किया जा सकता है या किया भी जा रहा है ! इस बात से भी नकारा नहीं जा सकता है कि नेपाल में राजशाही के खिलाफ माओवादी संघर्ष को शुरूआत से ही चीन का आंतरिक समर्थन प्राप्त था ! ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि आज जब माओवादी दल सत्ता में भागीदार हैं तो चीन भारत के खिलाफ अपने मकसद को साधने में कोई कोर कसर नहीं छोडेगा ! दूसरी तरफ पाकिस्तान भी मावोवादी ताकतों का सहारा लेकर कहीं ना कहीं अपनी आतंकवादी गतिविधियों को नेपाल से सटे सीमावर्ती इलाको में बढाने में हमेशा से प्रयासरत रहा है और भारी संख्या में आतंकवादी गतिविधियों में इस्तेमाल में होने वालीं सामग्री नेपाल के रास्ते भारत भेजी जाती रही हैं ! भारत में पहले से ही नक्स्लावाद एवं माओवाद एक आंतरिक संकट बना हुआ है ऐसे में अगर नेपाल सीमा से इन संगठनों को मदद पहुचती है तो निश्चित रूप से यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए चिंता की बात है जिस पर सरकार को गंभीर होने की जरुरत है !
        आज जब पाकिस्तान,बांग्लादेश एवं चीन से लगी भारतीय सीमाओं को चौकस सुरक्षा इंतजामों से लैस किया गया है तो सवाल उठना लाजिमी है कि फिर नेपाल सीमा के साथ इस तरह का दोहरा रवैया क्यों ? इस संदर्भ में नेपाल के आंतरिक हालात को संज्ञान में लेते हुए  नेपाल-भारत सीमा पर भारत के विदेश मंत्रालय एवं एवं रक्षा मंत्रालय सहित गृह मंत्रालय को गंभीर होने की जरुरत है एवं सीमा सुरक्षा को लेकर द्विपक्षीय ठोस नीतियों को अमली जामा पहनाने  की जरुरत पर भी  बल दिया जाना चाहिए  ! नेपाल-भारत मसले को गंभीरता से लेते हुए आवाजाही के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानको के अनुरूप नियम बनाने एवं उसके क्रियान्वयन पर ठोस नीति निर्माण की आवश्यकता है  ! नेपाल की लगभग पाँच सौ किलीमीटर में फैली सीमा को किस तरह से चाक चौबंद किया जाया इसके लिए भी आंतरिक सुरक्षा नीतियों सहित वाह्य सुरक्षा नीतियों को पुख्ता करने पर समय रहते ठोस कदम उठाये जाने चाहिए  ! नेपाल के आंतरिक राजनीति में बढते माओवादी हस्तक्षेप को मद्देनजर रखते हुए भारत को नेपाल-भारत सीमा की गंभीरता को समझना अत्यंत जरूरी है वरना नेपाल सीमा के प्रति नरम रुख देश के आंतरिक सुरक्षा के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकते हैं !

शिवानन्द द्विवेदी “सहर”

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

मोदी की राह में अपने बनेंगे रोड़े : दैनिक जागरण नेशनल में प्रकाशित मेरा लेख



 (9-अप्रैल-13)

मोदी बनाम राहुल को लेकर महीनों से जारी बहस के बीच भाजपा के 33वे स्थापना दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में एक नया मोड़ आ गया ! कार्यक्रम में भाजपा के दिल्ली इकाई के अध्यक्ष विजय गोयल ने आडवाणी के नेतृत्व में आगामी लोकसभा चुनाव जीतने की बात क्या कर दी समूची मीडिया से लेकर सियासी हलकों में मोदी बनाम आडवाणी का जाप होने लगा ! हालाकि यहाँ एक बात गौर करने वाली है कि दोनों ही मामलों में एक पक्ष के रूप में नरेंद्र मोदी कायम हैं चाहें वो मोदी बनाम राहुल हो या मोदी बनाम आडवाणी ! आडवाणी बनाम मोदी वाली इस बहस में ऐसा कुछ भी नहीं है कि इस पर कोई आश्चर्य जताया जाय या बहुत खलबली पैदा की जाय ! यह एक ऐसा बयान था जिसकी उम्मीद पहले से थी ! भाजपा की अंदरूनी राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में अगर यह कहा जाय तो गलत नहीं होगा कि भाजपा को हराने के लिए भाजपा खुद ही काफी है यहाँ किसी विरोधी की जरुरत नहीं है ! अगर कोई यह कहता है कि प्रधानमंत्री पद के लिए लालकृष्ण आडवाणी स्वेच्छा से अपना नाम वापस ले लिए हैं तो यह सरासर गलत होगा ! आधिकारिक तौर पर आजतक लालकृष्ण आडवाणी की तरफ से कोई ऐसा बयान नहीं आया है जिसमे उन्होंने खुद को प्रधानमंत्री पद से अलग किया हो   बल्कि कई बार तो लालकृष्ण आडवाणी के बयानों में प्रधानमंत्री ना बन पाने का मलाल साफ़ झलकता है ! आप अगर गौर किये हों तो जब-जब नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए किसी सार्वजनिक मंच से उछला है ठीक उसके तुरंत बाद लालकृष्ण आडवाणी का कोई ऐसा बयान या ब्लॉग आदि आता है जो भाजपा के लिए ही मुश्किलें पैदा कर देने वाला हो ! दरअसल इस पुरे मसले को अगर कांग्रेस और भाजपा के बीच तुलनात्मक रूप से देखें तो अनोखा विरोधाभाष नजर आता है ! कांग्रेस में नीचे से लेकर शीर्ष तक सब प्रधानमंत्री पद के लिए सिर्फ एक राहुल गाँधी के नाम का जाप करते हैं तो वहीँ राहुल गाँधी कहते हैं कि प्रधानमंत्री बनने वाला सवाल निरर्थक है ! जबकि इसके उलट भाजपा में नीचे से ऊपर तक सब यही कहते हैं कि भाजपा में कई नाम हैं जो प्रधानमंत्री बनने योग्य है लेकिन सहमति एक पर भी नहीं बन पाती बल्कि अंदरूनी खीँच तान ही मच जाती है ! आपसी खीच-तान का यह अंदरूनी मसला आजतक भाजपा के लिए नासूर बना हुआ है और कई मोर्चों पर भाजपा को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा है ! प्रधानमंत्री पद के लिए आडवाणी का नाम लिए जाने के बाद अगर वाकई आडवाणी की मंशा नहीं होती प्रधानमंत्री बनने कि तो यह मामला वहीँ का वहीँ खतम किया जा सकता था ! अगर उसी कार्यक्रम में मंच से बोलते हुए आडवाणी यह कह देते कि उनको प्रधानमंत्री नहीं बनना तो यह मामला इतना तुल नहीं पकड़ता और भाजपा के अंदरूनी संगठन को भी  मजबूती मिलती ! मगर आडवाणी द्वारा उसी मंच इस मामले का खंडन करने की बजाय यह  कहा गया कि वो अभी भी पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता हैं और सक्रिय राजनीति में अपनी सहभागिता देने को तैयार हैं ! आडवाणी के इस बयान का निहितार्थ यही निकलता है कि  उनके के मन में अभी भी एक मौका और आजमाने की लालसा दबी हुई है जो वक्त आने पर बाहर भी आ सकती है ! इसमें कोई दो राय नहीं कि कई मसलों पर लालकृष्ण आडवाणी की सहमति मोदी के साथ नहीं होती है और वो इसकी अभियक्ति करने से भी नहीं चुकते ! आगामी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद को लेकर भाजपा में होने वाली खींचतान की शुरुआत लगभग हो चुकी है ! आज बेशक पार्टी में मोदी की मांग बढ़ती जा रही है लेकिन इस बात को भी खारिज नहीं किया जा सकता कि लोकसभा चुनाव नजदीक आते ही जब आधिकारिक तौर पर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार कि घोषणा करने की बात आयेगी तब भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में ही विरोध के तमाम स्वर उठने लगेंगे ! भाजपा का शीर्ष नेतृत्व बतौर प्रधानमंत्री उम्मेदवार मोदी का नाम सहजता से स्वीकार कर लेगा इसकी संभावना बहुत कम है ! हमें राजनीति के इस चरित्र को समझना होगा कि वक्त और जरुरत से पहले कोई भी मंझा हुआ नेता अपनी राय नहीं रख रहा है ! आडवाणी का नाम आज उठा है और आडवाणी ने अगर इसे खारिज नहीं किया तो इस बात को मान लेना चाहिए कि मोदी के लिए भाजपा से पार पाना आसान नहीं है ! मोदी  बेशक कार्यकर्ताओं की पहली पसंद हों , बेशक राष्ट्रीय छवि बनाकर उभर रहे हों लेकिन इस सच्चाई को भी नकार नहीं सकते कि अभी सिर्फ उनके समर्थकों के स्वर फुट रहे हैं ! उनके विरोधी तो अभी चुप्पी साधे भाजपा के शीर्ष पर बैठे हैं जो वक्त आने पर ना सिर्फ बोलेंगे बल्कि खूब बोलेंगे ! भाजपा का यह अंदरूनी खींचतान इस वजह से भी है क्योंकि दशकों से राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय राष्ट्रीय नेता अपनी मह्तावाकंक्षाओं का बलिदान किसी राज्य स्तर के मुख्यमंत्री के लिए कैसे करना चाहेंगे ! इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर अगर शीर्ष नेतृत्व के बीच सहमति बनाने की स्थिति आई तो मोदी की बजाय आडवाणी को लेकर ज्यादा आसानी से सहमति बन पायेगी ! सियासत में रंग और राज बदलते देर नहीं लगती अत: आज अर्श पर दिख रहे मोदी को कब सियासत में फर्श की राह पकडनी पड़े इसका कोई ठिकाना नहीं ! हाँ ये अलग बात है कि कांग्रेस से टकराने के लिए जितने प्रभावी मोदी साबित हो रहें हैं उतने आडवाणी नहीं हो सकते ! कार्यकर्ताओं में जो जूनून मोदी पैदा कर पा रहे हैं वो आडवानी द्वारा अब संभव नहीं है हालाकि यह काम दशकों पहले  आडवाणी द्वारा अपनी रथयात्राओं से किया जा चुका है !  कांग्रेस से टकराना आज मोदी के लिए  जितना आसान लग रहा  हैं अपने अंदरूनी संगठन से पार पाने में मोदी को उतनी ही मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा ! प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी के सामने इस सियासी चक्रव्यूह के दो-दो दरवाजों से पार पाने की चुनौती है ! जो आडवाणी अभी गंभीर और इमोशनल दिख रहे हैं अगर कल को अपने तेवर बदल कर फिर सियासत के अखाड़े में कूद पड़ें तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा !
      अपने संगठनात्मक चरित्र के अनुसार भाजपा में अंदरूनी खींच-तान की शुरुआती पहल हो चुकी है और भविष्य में यह और वृहद स्तर पर देखने को मिलेगी ! लोकसभा चुनाव का सागर मंथन करने निकले मोदी को इस बात का आभास होना चाहिए कि सागर मंथन करना अलग चीज़ है और अमृत पान करना अलग चीज़ ! कोई जरूरी नहीं कि जो आज सियासी माहौल तैयार कर रहा कुर्सी भी उसी के लिए तैयार की जा रही हो ! लेकिन इस सबके बावजूद इतना तो कहा ही जा सकता है कि अबतक कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी से दो-दो हाथ करते नरेंद्र मोदी को अब अपने पार्टी में दो-दो हाथ करते देखें जाने की पहल हो चुकी है ! भाजपा में कुछ भी नया नहीं हो रहा बल्कि वो वही कर रही है जो हमेशा से करती आई है ! नफा-नुकसान तो बहुत बाद की बात है !  

शिवानन्द  द्विवेदी सहर 


शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

बदहाली की ओर गन्ने की खेती : अमर उजाला कॉम्पैक्ट में (6-अप्रैल-13) को प्रकाशित मेरा लेख


उत्तर प्रदेश में गन्ने की खेती अब तक के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है! पिछले कुछ वर्षों में लगातार चीनी उत्पादन में कमी इस बात का सुबूत है कि प्रदेश में गन्ना खेती के हालात बहुत बेहतर नहीं हैं! एक दौर में देश के कुल चीनी उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश से आता था, लेकिन उसमें अब साल-दर-साल कमी होती जा रही है! पिछले कई वर्षों से यह देखने को मिल रहा है कि चीनी उत्पादन के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश अपने तय लक्ष्यों को छू पाने में लगातार विफल साबित हुआ है! आज न तो पहले की तरह गन्ने की लहलहाती खेती नजर आती है और न ही गन्ना पेराई के लघु उद्योग के रूप में क्रेशर मशीनें ही दिखती हैं! ज्यादातर चीनी मिलें बंद हो चुकी हैं और जो मिलें बची हैं, वे जर्जर अवस्था में हैं।
एक वह भी दौर था, जब केवल पूर्वांचल के गोरखपुर मंडल में दो दर्जन से ज्यादा चीनी मिलें चलती थीं और चीनी उत्पादन होता था! लेकिन आज स्थिति यह है कि गन्ना उत्पादन में अग्रणी देवरिया जिले की पांच में से चार सरकारी चीनी मिलें वर्षों से ठप पड़ी हैं, जबकि एक मात्र चीनी मिल किसी निजी के कंपनी के नियंत्रण में चल रही है! हालाकि अब उन चीनी मिलों को सरकारी भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि लगभग सभी चीनी मिलों को सरकार ने निजी कंपनियों के हाथों बिना किसी उचित करार और कीमत के बेच दिया है! पूर्वांचल में चीनी मिलों और गन्ने की खेती की दुर्दशा पर प्रख्यात भोजपुरी कवि एन डी देहाती ने ठीक ही लिखा है, ना उंख लऊकी ना ही उखियार बबुआ, नाही लऊकी कवनो गांवे कोल्हार बबुआ...!
पिछले डेढ़ दशकों में तेजी से बंद हुई चीनी मिलों के साथ-साथ गन्ने की खेती के प्रति किसानों के मोहभंग को समझने की कोशिश करें, तो कई सवाल सामने आ खड़े होते हैं! बड़ा सवाल यह कि आखिर किन वजहों से पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में चीनी मिलें बंद हुईं ? क्या गन्ने की खेती से मोहभंग के लिए यही तो जिम्मेदार नहीं है?
असल में गन्ना खेती के प्रति किसानों की उदासीनता की कई वजहें हैं। सही समय पर उनके उत्पादों का वाजिब भुगतान न होना किसानों के मोहभंग के प्रमुख कारणों में से एक है! गन्ना किसानों का साफ कहना है कि अगर उनके उत्पादों का उचित मूल्य समय पर नहीं मिलेगा, तो वे आखिर क्यों इसकी खेती करेंगे! गन्ना किसानों के भुगतान के मामले में हमेशा से ही सहकारी चीनी मिलों का रवैया बहुत ही लेट-लतीफ रहा है! महीनों इंतजार के बाद चीनी मिलों द्वारा मनमाने ढंग से भुगतान करने के चलते किसानों का रुझान गन्ने की खेती से निरंतर टूटता गया है! प्रदेश के ज्यादातर गन्ना किसान इसे घाटे का सौदा मानते हैं! अभी पिछले वर्ष ही प्रदेश की सभी चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का संयुक्त बकाया लगभग 900 करोड़ रुपये के आसपास था, जिसका अब तक पूरी तरह से भुगतान नहीं किया जा सका है! इसके अलावा, गन्ने में रोगों के कारण भी उत्पादन घटा है।
हालांकि उत्तर प्रदेश की सरकारों का रुख भी बहुत सकारात्मक नहीं रहा है! घाटे के नाम पर बंद हुई दर्जनों से ज्यादा सहकारी चीनी मिलों को पुनः: संचालित करने की दिशा में कोई प्रयास करने के बजाय सरकारों ने उन्हें निजी कंपनियों के हाथों औने-पौने दामों पर बेच दिया। अरबों की संपत्ति को महज कुछ करोड़ में बेच देने वाली सरकारों की नीयत पर सवाल इसलिए भी उठते हैं, क्योंकि गन्ने की खेती की बदहाली में सरकार के इस कदम का काफी योगदान है। इसके अलावा इस पूरे खरीद-फरोख्त में भ्रष्टाचार का भी अंदेशा जताया जा रहा है, जिसे खारिज नहीं किया जा सकता।
गन्ने की खेती में हो रही कमी का सीधा असर चीनी की कीमतों पर पड़ने वाला है! किसानों के मोहभंग के कारण ही गन्ना उत्पादन घटने से चीनी की कीमतें नियंत्रण से बाहर होती जा रही हैं। जब तक इस स्थिति को बदलने के लिए सरकारी स्तर पर ठोस प्रयास नहीं किए जाएंगे, तब तक चीनी उत्पादन के लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकता। 
शिवानन्द  द्विवेदी सहर