शनिवार, 10 अगस्त 2013

पंथ निरपेक्ष लेखन के पर्याय प्रेमचंद : राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित मेरा लेख




  • शिवानन्द द्विवेदी सहर
(फेसबुक से लेकर जनसत्ता तक प्रेमचंद पर उठे विमर्श के बाद लिखा गया मेरा अपना विचार)
 

राष्ट्रीय सहारा से
विगत 31 जुलाई को हिंदी साहित्य इतिहास के सबसे बड़े कथाकार प्रेमचंद के जन्मदिवस पर हंस पत्रिका की तरफ से प्रतिबन्ध और अभिव्यक्ति विषय पर संघोष्ठी का आयोजन था ! आयोजन में बतौर मुख्य वक्ता माओवादी विचारधारा के वामपंथी लेखक वरवरा राव एवं अरुंधती राय के अलावा लेखक एवं साहित्यकार अशोक वाजपेयी सहित दक्षिणपंथी धारा के गोविंदाचार्य भी आमंत्रित थे ! वक्ताओं के लिहाज से देखें तो आयोजक के रूप में हंस के संपादक राजेन्द्र यादव ने शायद इस बार के आयोजन में प्रेमचंद को याद करने के बहाने उस विमर्श को भी टटोलने का प्रयास किया जिसमे प्रेमचंद को अपने पंथ का साबित करने की होड़ ना जाने किस-किस पंथ के लोगों में मची हुई है ! ये सच है कि साहित्य इतिहास के ख्यातिलब्ध विभूतियों पर अपना वैचारिक अधिपत्य साबित करने का कु-चलन वर्तमान में तेजी से विकसित हुआ है एवं इस कुरीति के दंश ने महान पंथनिरपेक्ष कथाकार प्रेमचंद को भी नहीं बख्सा है ! अलग-अलग पंथ के विद्द्वानों द्वारा यह साबित करने का हर संभव प्रयास किया जाता रहा है कि  प्रेमचंद का वैचारिक झुकाव उनके अपने पंथ की तरफ था ! प्रेमचंद को लेकर वामपंथ बनाम दक्षिणपंथ की बहस तो बहुत पहले से चलती आ रही है ! बेशक इस बहस का निष्कर्ष अब तक कुछ नहीं निकला हो लेकिन दोनों ही पंथ के लोग प्रेमचंद के कृतियों से अपने हिस्से की सामग्री ढूढ कर यह साबित करते रहे हैं कि प्रेमचंद उनके अपने पंथ के लेखक थे और उनपर सिर्फ उनका ही अधिकार है ! प्रेमचंद को लेकर वामपंथी धड़ा उन्हें धुर वामपंथी मानता है जबकि दक्षिण झुकाव वाले बुद्धिजीवी उन्हें धुर राष्ट्रवादी  लेखक  मानते हैं ! वर्तमान बुद्धिजीवियों के विचारों से इतर अगर प्रेमचंद को तलाशने के लिए साहित्य के इतिहास के पन्नों को पलटे तो स्थिति कुछ और ही नजर आती है ! इतिहास के पृष्ठ कुछ यूँ बयां करते हैं कि मानो प्रेमचंद ना तो वामपंथी थे और ना ही दक्षिण से ही उनका कोई सरोकार था ! वो निहायत पंथनिरपेक्ष लेखक थे और निरपेक्ष लेखन करते रहे ! प्रेमचंद के बारे में लिखते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं कि अगर आप उत्तर भारत की समस्त जनता के आचार-व्यवहार, भाषा-भाव, रहन-सहन, आशा-आकांक्षा, दुःख-सुख और सूझ-बूझ को जानना चाहते हैं तो प्रेमचंद से  उत्तम परिचायक आपको नहीं मिल सकता ! सही अर्थों में अगर बिना किसी आग्रह से ग्रसित हुए देखा जाय तो प्रेमचंद सामाजिक सरोकारों के लेखक नजर आते हैं, जिनपर किसी पंथ की बजाय तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों का प्रभाव ज्यादा था ! प्रेमचंद के कहानियों एवं उपन्यासों में शोषित वर्ग की पीड़ा को बखूबी दिखाया गया है ! चुकि प्रेमचंद की लगभग हर कृति शोषित वर्ग को शोषक सत्ता के खिलाफ आंदोलित करती नजर आती है जिसके आधार पर तमाम बुद्धिजीवी उन्हें वामपंथी धारा का लेखक करार देते हैं ! लेकिन महज इस आधार पर प्रेमचंद को वामपंथी करार देना कतई उचित नहीं है ! प्रेमचंद के बारे में अगर ठीक से देखा जाय तो वे कई पहलुओं पर महात्मा गाँधी के अहिंसक विचारों के समर्थक नजर आते हैं  तो कई जगह उनकी लेखनी में राष्ट्रप्रेम के भी दर्शन होते हैं ! प्रेमचंद द्वारा राष्ट्र को खारिज करके किसी वर्गसंघर्ष की हिमायत की गयी  हों ऐसा उनकी कृतियों में नहीं मिलता है ! गाँधी के अहिंसावाद का दर्शन उनके लगभग हर उपन्यास में देखने को मिल सकता है ! कर्मभूमि उपन्यास तो पूरी तरह से गाँधी सिद्दांतों को पुष्ट करती कालजयी कृति है !  अपने उपन्यासों एवं कथानकों के माध्यम से प्रेमचंद ने ना सिर्फ तत्कालीन भारत के निम्न शोषित वर्ग की दशा को दिखाया है बल्कि गुलाम भारत के जमीदारों एवं सरकारी मुलाजिमो की मजबूरियों  को भी पूरी इमानदारी के साथ चित्रित किया है ! प्रेमचंद के उपन्यास प्रेमाश्रम पर नजर डालें तो इस उपन्यास के माध्यम से प्रेमचंद ना सिर्फ मजदुर वर्ग के एकजुट  होने की बात करते हैं बल्कि कथाभाव से स्पष्ट होता है कि वो समूचे भारतीय समाज जिसमे निम्न और उच्च दोनों वर्ग आते हैं,को एकजुट होकर अंग्रेजी हुकुमत के दमन के खिलाफ आंदोलित करते हैं ! चाहें मजदुर वर्ग के प्रति चिंता हो अथवा तत्कालीन भारतीय समाज में स्त्रियों की दशा का चित्रण हो, प्रेमचंद के उपन्यासों एवं कहानियों में इनका बखूबी दर्शन संभव है ! प्रेमचंद द्वारा की गयी कृति  प्रतिज्ञा तत्कालीन भारतीय समाज में फैले विधवा विवाह निषेध की कुप्रथा के जड़ों पर सीधा चोट करती है ! निश्चित तौर पर प्रेमचंद की लेखनी में स्त्री संघर्षों पर भी काफी प्रकाश डाला गया है !       
     दरअसल शोषित समाज पर ज्यादा लिखने की वजह से वामपंथी आग्रह से ग्रसित बुद्धिजीवियों को ऐसा लगता है कि प्रेमचंद वामपंथी लेखक थे ! बेशक प्रेमचंद पर मार्क्स के विचारों अथवा रूस की क्रान्ति का अंशत: प्रभाव रहा हो लेकिन केवल इसी आधार पर उन्हें वाम विचारों का लेखक घोषित करना कुतर्क के सिवाय कुछ भी नहीं है ! मार्क्स ने विश्व के मजदूरों को एकजुट कर सरहदों को पाटने का ऐलान किया था लेकिन इसके ठीक उलट प्रेमचंद का मजदुर अपनी सरहद को बचाने की लड़ाई लड़ता नजर आता है ! प्रेमचंद का मजदुर कहीं ना कहीं मार्क्स उस मजदुर को सिरे से खारिज करता है जो सरहदों को तोड़ कर अंतर्राष्ट्रवाद की पहल में संघर्षरत है ! मार्क्स और प्रेमचंद के इसी विरोधाभाष के कारण  राष्ट्रवादी बुद्धिजीवी कहीं ना कहीं उनमे राष्ट्रवाद की संभावनाएं तलाश लेते हैं और उन्हें राष्ट्रवादी बताते नजर आते है ! अगर बारीकी से देखें तो प्रेमचंद की कृतियों में कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक खुद अपने पात्रों के साथ वैचारिक संघर्ष कर रहा हो ! प्रेमचंद की कृतियों का कोई एक पात्र अगर हिंसा की हिमायत करता है तो दूसरा पात्र उसे गलत ठहराते हुए उसे हिंसा से रोकता है ! यह दूसरा पात्र ही प्रेमचंद की मूल विचारधारा का परिचायक है ! बहुआयामी नजरिये से अगर बिना किसी आग्रह से ग्रसित हुए निष्पक्ष तरीके से प्रेमचंद का मूल्यांकन करें तो प्रेमचंद ना तो धुर वामपंथी नजर आते हैं ना ही धुर राष्टवादी ही दिखते है ! प्रेमचंद की लेखनी में बहु विचारों के दर्शन आसानी से उपलब्ध हैं ! बतौर लेखक प्रेमचंद अगर  तमाम अलग-अलग विचारधाराओं को सहजता से स्वीकार लेते हैं तो वहीँ दूसरी तरफ उन्ही विचारधाराओं के जड़ पड़ गए सिद्धांतों को बेहिचक खारिज भी करते नजर आते हैं ! सही मायनों में देखा जाय तो प्रेमचंद ना तो वामपंथी थे ना ही धुर राष्ट्रवादी ही थे और ना ही किसी एक आग्रह से ग्रसित ही थे ! प्रेमचंद का शुरू से ही गांधीवाद के प्रति रुझान रहा और उनकी लेखनी देश के लिए समाज को एकजुट करने वाली रही है ! प्रेमचन्द की लेखनी के यही तेवर उनको एक पंथ निरपेक्ष लेखक के रूप में स्थापित करते हैं !


शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

पाकिस्तान के चरित्र को समझे : दैनिक जागरण नेशनल में प्रकशित लेख


  •  शिवानन्द द्विवेदी सहर
 आजादी के बाद अंग्रेजी हुकुमत द्वारा चली गयी भारत-पाक विभाजन की अंतिम चाल आज दोनों मुल्कों के लिए नासूर बन चुकी है ! आज भारत और पाकिस्तान के बीच शान्ति और समझौतों की सारी संभावनाएं थकी हारी सी लाचार नजर आ रही हैं ! इसमें कोई दो राय नहीं कि विभाजन के बाद पाकिस्तान को तो भारत के रूप में एक पड़ोसी मिला था लेकिन भारत को पाकिस्तान के रूप में एक दुश्मन ही मिला ! अपने दोहरे चरित्र के लिए हमेशा से कुख्यात पाकिस्तान ने एक बार फिर भारत-पाक सीमा पर वही किया है जिसके लिए वो जाना जाता  है ! अभी दो दिन पहले ही पाकिस्तानी सेना ने पाँच भारतीय सैनिकों की नृशंस हत्या कर दी,जिसको लेकर भारत-पाक के बीच एक बार फिर तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गयी है ! दरअसल, पाक द्वारा की गयी यह नापाक हरकत तो उसके चरित्र के अनुरूप है लेकिन इस गंभीर मामले पर भारत सरकार के रक्षामंत्री का गैर जिम्मेदाराना बयान ज्यादा  दुखद और आश्चर्यजनक है ! इस दुर्भाग्य पूर्ण घटना के तुरंत बाद पाकिस्तान पर सख्त नीति अख्तियार करने की बजाय रक्षामंत्री का यह कहना कि यह पाकिस्तानी सेना के लिबास में आये आतंकवादीयों की करतूत है, बेहद निराशापूर्ण बयान है ! एकतरफ जब भारत-पाक सीमा पर हमारे जाबांज सैनिक बिना किसी वजह के जान गवां रहे हैं वहीँ दुसरी तरफ हमारे सियासी रहनुमा अपने बयानों से देश और सेना का हौसला पस्त करने में लगे हैं ! क्या हमारे जांबाज सिपाहियों के जान की कीमत चंद मुआवजों और नौकरियों से ही चुकाई जा सकती है और मुआवजा दे देना भर इस समस्या का समाधान है ? इतिहास पर अगर नजर डालें  तो आजादी के समय हुए भारत-पाक विभाजन के बाद से ही भारत-पाकिस्तान के बीच रिश्तों में तल्खी रही है ! चुकि पाकिस्तान एक ऐसा अस्थिर देश है जिसकी वजह से वो अंतर्राष्ट्रीय कुटिलताओं के मोहरे के तौर पर इस्तेमाल होता रहा है ! इसमें कोई दो राय नहीं कि काश्मीर को हथियार बनाकर चीन जैसे देश भी पाकिस्तान का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करते रहे हैं! भारत-पाक संबंधो को सुधारने की दिशा में भारत की तरफ से तमाम पहल की की गयी लेकिन उसका कोई साकारात्मक परिणाम आज तक नहीं निकला ! चाहे वो जनवरी 1966 में किया गया ताशकंद समझौता हो या जुलाई 1972 का शिमला समझौता हो, हर समझौते को सबसे पहले पाकिस्तान  द्वारा ही खारिज किया गया है !सफ़ेद पट पर लिखा यह काला सत्य झुठलाया नहीं जा सकता कि  संबंध सुधार की दिशा भारत की तरफ से लागातार किये समझौतों के परिणाम भी बेहद नकारात्मक निकले और पाकिस्तान की तरफ से हर समझौते को खारिज ही किया जाता रहा है ! बावजूद इसके हम यह समझ नहीं रहे या समझने की कोशिश नहीं कर रहे कि चाहे जो भी हो जाय पाकिस्तान की नीयत भारत के प्रति ना तो कभी उदार और सौहार्दपूर्ण  रही है और ना ही आगे रहेगी ! भारत को लेकर पाकिस्तान की नीयत में तो हमेशा से खोट रहा है लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण इस बात को समझना है कि पाकिस्तान को लेकर भारत की आंतरिक राजनीति का चरित्र कैसा है ? क्या ऐसा नहीं लगता कि पाकिस्तान के इस मनबढ़ रवैये के लिए काफी हद तक हमारी आंतरिक राजनीति और रणनीति भी जिम्मेदार है ! इससे ज्यादा ढुलमुल नीति और क्या हो सकती है कि पाकिस्तान द्वारा भारतीय सैनिकों के कत्लेआम के बाद पाकिस्तान से सवाल पूछने एवं उसपर रणनीतिक दबाव बनाने की बजाय हमारे रक्षामंत्री पाकिस्तानी सेना के बचाव में मोर्चा सम्हाल लेते हैं ! भारत के रक्षा मंत्री का बयान सुनने पर ऐसा महसुस होता है कि मानो यह भारत के नहीं बल्कि पाकिस्तान के रक्षामंत्री का बयान हो ! बेशक वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय हालातों के नजरिये से यह माना जा सकता है कि केवल युद्ध ही इस समस्या का पहला और अंतिम विकल्प नहीं है और युद्ध से दोनों ही मुल्कों को ही नुकसान  होगा ! लेकिन इसका ये भी अर्थ नहीं कि देश द्वारा अपने लिए सख्त रक्षात्मक रणनीति भी न अपनाई जाय ! अगर देखा जाय तो सही मायनों में पाकिस्तान को लेकर अन्तराष्ट्रीय स्तर पर तो दूर की बात, आंतरिक स्तर पर भी हमारी कोई तय रणनीति नहीं है ! यही कारण है कि ऐसी घटनाओं के बाद इस तरह के गैर जिम्मेदाराना बयान सुनने को मिलते रहते है ! भारत के मामले में यह मशहूर कहावत भी गलत साबित हो रही है कि बाहरी दुश्मन जब हमला करता है तो ऐसे हालात में घरेलु दुश्मन एकजुट होकर बाहरी शत्रु का मुकाबला करते हैं ! क्योंकि इस लिहाज से भारत में स्थिति बिलकुल उलट है और भारत में जैसे ही इस तरह की कोई घटना होती है तो आपसी आरोप-प्रत्यारोप का  दौर शुरू हो जाता है !
   पाकिस्तान मसले को लेकर राजनितिक दलों के बीच मचे इस आरोप-प्रत्यारोप और सरकार की तरफ से जारी सिरफिरे बयानों के बीच बड़ा सवाल ये है कि आखिर हम अपने पड़ोसी मुल्कों को लेकर इतने लापरवाह क्यों होते जा रहे हैं ? भारतीय सीमा सुरक्षा के मामले में भी हमारी नीतियां ढाक के तीन पात से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं ! अगर देखा जाय तो एक तरफ जहाँ चीन आये दिन सीमा पर अतिक्रमण कर रहा है तो वहीँ दूसरी तरफ पाकिस्तान अपनी नापाक हरकतों से सीमा सम्बन्धी समझौतों को तार-तार करता रहा है ! इन हरकतों के जवाब में भारत सरकार के पास सिवाय कड़ी निंदा के और कोई दूसरा फार्मूला अभी तक नहीं दिख सका है ! भारत के वर्तमान आंतरिक राजनितिक हालात और सरकार की निष्क्रियता को देखते हुए तो यही लगता है कि सीमा पर हो रही इन घटनाओं के लिए पाकिस्तान से कम जिम्मेदार भारतीय हुकुमत भी नहीं है, बल्कि एक कदम ज्यादा ही है ! अगर दुश्मन अपना दुश्मन चरित्र दिखा रहा है और हम जबरन उसे दोस्त समझने की कोशिश कर रहे हैं, तो यह हमारी मूर्खता पूर्ण सोच के अलावा कुछ भी नहीं है ! सवाल है कि आखिर भारत सरकार द्वारा पाकिस्तान के साथ दोस्ती कायम करने के लिए और कितनी कुर्बानियों को यों ही चुप रहकर स्वीकार किया जाता रहेगा ? कितने जाबांजों की जान झोंकने के बाद हमारी सरकार को यह अहसास होगा कि वाकई पाकिस्तान के साथ नरम रुख रखना राष्ट्रहित में नहीं है ! बेशक शान्तिप्रिय मुल्क होने के नाते आप खुद युद्ध की पहल नहीं कर रहे लेकिन कम से कम जवाब देना तो सीखिए ही ! आखिर इस सब्र का बाँध कितना जड़ है कि इतना कुछ होने के बावजूद टूटता नहीं ! पाकिस्तान को सख्त और मुहतोड  जवाब देने का वक्त हाथ से निकल रहा है लेकिन भारत सरकार के रवैये को देखते कहना मुश्किल है कि ऐसा कब हो सकेगा ? 
    

गुरुवार, 8 अगस्त 2013

हंस की चाल : जनसत्ता चौपाल में प्रकाशित टिप्पणी

  •  शिवानन्द द्विवेदी सहर

साहित्य और विमर्श का ये वो दौर है जहाँ साहित्य और विवाद के बीच चोली-दामन का संबंध बन चुका है ! अभी कुछ दिन पहले की ही बात है प्रेमचंद जयन्ती पर हंस द्वारा एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था ! आयोजकों(राजेन्द्र यादव) की माने तो उक्त कार्यक्रम में अभिव्यक्ति और प्रतिबन्ध विषय पर बोलने के लिए गोविन्दाचार्य, अशोक वाजपेयी के अलावा मावोवादी विचारधारा के हिमायती लेखक वरवरा राव एवं अरुंधती राय को भी आमंत्रित किया गया था ! वक्ताओं में से दो आये और दो नहीं आये ! नहीं आने वाले दो वक्ताओं में से एक वरवरा राव दिल्ली पहुँच कर भी कार्यक्रम में नहीं पहुचे ! खैर, वरवरा राव के ना आने को लेकर खूब बतकही और विमर्श हो चुका है, सच कहूँ तो हद से ज्यादा ! अत: अब इस विषय पर बात करने की गुंजाइश शेष नहीं बची ! सोशल मीडिया के मंचों पर इस कार्यक्रम को लेकर एक सवाल ये भी उठा था कि हंस के साहित्यिक कार्यक्रम में बिहार के कुख्यात बाहुबली पप्पू यादव क्या कर रहे थे ? राजेन्द्र यादव पर निशाना साधते हुए कहा गया कि क्या राजेन्द्र यादव ने पप्पू यादव को कार्यक्रम में आमंत्रित किया था अथवा वो खुद से आये थे ? फेसबुक विमर्शों में तो यहाँ तक कहा गया कि कहीं पप्पू यादव से इस पुरे कार्यक्रम के लिए आयोजकों द्वारा आर्थिक मदद तो नहीं ली गयी ? हालाकि इन सवालों पर अपना रुख रखते हुए अपने फेसबुक वाल से राजेन्द्र यादव(पता नहीं उनका वाल कौन चलाता है) ने  इन आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए लिखा “न मेरी पप्पू यादव से कोई सहानुभूति है, न उनके गुनाहों से। लेकिन संगोष्ठ में उनकी मौजूदगी पर आपत्ति उठाना मुझे उचित नहीं जान पड़ता। संगोष्ठी में किसी के प्रवेश पर प्रतिबन्ध नहीं था। न कार्ड साथ में लाने की हिदायत थी, न प्रवेश से पहले आगंतुक के चरित्र की जांच का प्रावधान। कोई मुलजिम या मुजरिम साहित्य न पढ़े या साहित्य की चर्चा न सुने, ऐसा कोई नैतिक या कानूनी बंधन भी आज के दौर में नहीं सुना। सुना तो यह है कि जेल में कैदियों के समक्ष कविता-पाठ के आयोजन करवाए जाते हैं। इसमें बुराई भी क्या है! क्या अपराधी पाठक या श्रोता नहीं हो सकता ?
       हालाकि जिस भोलेपन के साथ राजेन्द्र यादव ने हंस के कार्यक्रम में पप्पू यादव के आने के मसले को टाल कर खुद को इससे अलग कर लिया है, उस भोलेपन के साथ पप्पू यादव के आगमन को पचाया नहीं जा सकता ! बेशक कोई मुलजिम या मुजरिम साहित्य पढ़े, कार्यक्रम में जाए और वक्ताओं को सुने मगर पप्पू यादव का हंस के कार्यक्रम में यूँ पहुच जाना इतनी सीधी और सुपाच्य बात नहीं लगती जितने भोलेपन से राजेन्द्र यादव इसे बता रहे हैं ! जेल में रहते हुए पप्पू यादव ने अपनी आत्मकथा अथवा डायरी सम्बन्धी कोई किताब भी लिखी है ! क्या इसी तर्क के आधार पर कि कोई क्या मुलजिम लेखक नहीं हो सकता, हंस प्रकाशन  उस किताब को प्रकाशित करवा सकता है ? शायद राजेन्द्र यादव ऐसा करके भी भविष्य में दिखा दें तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा ! पप्पू यादव के अंदर साहित्यिक प्रेम जागना स्वागत योग्य है और इसे उनके अंदर हो रहे वयक्तिक सुधार के लिहाज से भी स्वीकार किया जा सकता है ! मगर यह तो कतई स्वीकारना मुश्किल हो रहा है कि उस कार्यक्रम में पप्पू यादव बिन बुलाये मेहमान की तरह पहुच गए थे और इसकी खबर राजेन्द्र यादव को बिलकुल भी नहीं थी ! आज सवाल कूछ ऐसा खड़ा हुआ है कि प्रेमचंद और कन्हैया लाल मुंशी की परम्परा में चलने की बजाय राजेन्द्र यादव वाला ये नया हंस कहीं कौवे की चाल तो नहीं चलने लगा है ?

समाज का ये कैसा कुरूप चेहरा : प्रकाशित लेख (DNA)





  • शिवानन्द द्विवेदी सहर


देश के सबसे बड़े विश्वविद्दयालय के रूप में ख्यातिलब्ध जेएनयू के प्रांगण में हाल ही में जो कुकृत्य हुआ उसमे न सिर्फ दो जाने गयीं हैं बल्कि उस घटना के बाद एक बार फिर हमारा समाज तमाम सवालों के कठघरे में खड़ा हो चुका है ! पूरी घटना पर नजर डालें तो प्रेम में लडकी की तरफ से अस्वीकृति से छुब्ध होकर लड़के द्वारा पहले तो बेरहमी के साथ लड़की के ऊपर कुल्हाड़ी से जानलेवा हमला किया गया एवं बाद में खुद भी जहर की गोलियाँ खाकर आत्महत्या कर लिया गया ! बेशक ऐसा नृशंस मामला जेएनयू के इतिहास में पहली बार हुआ हो लेकिन ऐसा कतई नहीं है की यह मामला हमारे समाज के लिए कोई अद्वितीय घटना है ! इसी वर्ष बिहार एवं उत्तप्रदेश में इस तरह की कई घटनाएँ सामने आ चुकी हैं जिसमे हत्या अथवा आत्महत्या को अंजाम दिया गया हो ! बेशक यहाँ मामला विश्वविद्यालय प्रांगण में हुआ है लेकिन हमें इस बात को समझना होगा कि जेएनयू अथवा कोइ भी विद्द्यालय-विश्वविद्यालय न तो समाज से बड़ा होता है और न ही समाज के आचरण और चरित्र निर्माण का मुख्य श्रोत ही होता है ! अत: इस पुरे मामले को जेएनयू के दायरे में चिन्हित कर विश्वविद्यालय पर सवाल  दागने से ज्यादा जरूरी है कि समाज के गिरेबान की तहों में छुपे कुत्सित प्रवृतियों पर सवाल उठाया जाय ! यह मसला न तो विद्यालय प्रांगण की सुरक्षा से जुड़ा है और न ही ऐसे मामलों को सुरक्षा का हवाला देकर इसका ठीकरा प्रशासन आदि पर फोड़ कर चुप हो जाने की जरुरत है !    भारतीय समाज के बिगड़ते हुए इस वर्तमान चरित्र में अब ऐसी घटना का कहीं भी और कभी भी घटित होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, और यत्र-तत्र घटित होती भी रहीं है ! अगर इस तरह की  घटनाओं के घटित होने के पीछे की वजहों को तलाशने का प्रयास करें तो मामला सीधा और सपाट प्रेम-प्रसंगों से शुरू होकर दुराव की कुंठा की तरफ जाता नजर आता है ! इस तरह के ज्यादातर मामलों में कारण यही साबित होता रहा है कि प्रेम में असफलता अथवा दुराव की कुंठा से ग्रसित प्रेमी द्वारा प्रेमिका पर हमला किया गया एवं उसकी हत्या कर गयी ! आत्महत्या के ज्यादातर मामलों की वजहों में भी प्रेम-प्रसंगों के खुलासे ही सामने आते रहे हैं ! लिहाजा विश्वविदद्यालय प्रांगण में हुई इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर हमारा समाज कहाँ जा रहा है और किस दिशा को पकड़ रहा है ? इन सवालों से उठे इस पुरे बहस में अगर समाज पर प्रश्नचिन्ह उठेगा तो विमर्श का एक कोण प्रगतिशीलता बनाम परम्परावाद की तरफ भी घूम सकता है ! समाज का एक खेमा जो धुर परम्परावादी है वो इस पुरे मसले को प्रगतिशीलता के अतिवाद के तौर पर देख रहा है ! वहीँ दुसरी तरफ प्रगतिशीलता का झंडा उठाये दूसरा खेमा इस पुरे मामले को अपने तरीके से परिभाषित करने पर तुला है ! इन सबके बीच अब सवाल यही है कि विमर्श के दोराहे पर खड़े भारतीय समाज को ऐसी कुत्सित और अमानवीय घटनाओं से कैसे उबारा जाय ?
          दरअसल, ऐसी समस्याओं के पीछे एक बड़ी वजह हमारा अतिवादी चरित्र है ! विचारधारा को समझने और समझाने के मामले में हम इतने अतिवादी हो चुके हैं कि किसी भी संवेदनशील मामले में किसी बीच के रास्ते की गुंजाइश शेष नहीं रहने देते ! अतिवादी सोच से बाहर निकलकर यह बात समझने की जरुरत सभी को है कि जेएनयू प्रांगण में जो कुछ भी हुआ है वो प्यार के किसी भी स्वरुप का परिणाम नहीं है बल्कि अपरिपक्वता,नासमझी और सामाजिक दुराचरण का एक डरावना चेहरा है ! अगर एक तेईस साल का लड़का एक बाईस साल की लड़की के ऊपर जानलेवा हमला करता है और फिर खुद को मार लेता है तो इसमें प्रेम शब्द कहीं भी वजह के रूप में नहीं दिखता ! अगर वाकई इसमें प्रेम कहीं भी होता तो तो यह घटना ही नहीं हुई होती ! कहीं न कहीं आकर्षण के अन्धुत्साह को प्रेम समझ बैठने की नासमझी के परिणाम स्वरुप ही हमारे देश के युवाओं में ऐसा चरित्र उत्पन्न होता जा रहा है जिसके परिणाम स्वरुप वो ऐसे कुंठा से ग्रसित गलत कदम उठा रहे हैं  !  हमारे समाज और तंत्र का ताना-बाना भी इतना फ़िल्मी और कल्पना की कहानियों वाला होता जा रहा है कि आज का युवा वास्तविकता के धरातल से मुह मोडकर खोखले फ़िल्मी चरित्रों में ही खुद यत्र-तत्र फिट करने लगा है !  स्वस्थ समाज के निर्माण आदि पर काम करने की बजाय समाज के साथ-साथ कई बार सरकारी स्तर पर भी कई ऐसे निर्णय देखने को मिल जाते हैं जो कि सामाजिक विद्रूपताओं की वजह बन सकते हैं  ! गौर करना होगा कि एक साथ घूम लेने और सड़कों पर अपने अन्तरंग संबंधो का नंगा प्रदर्शन कर देने मात्र से ही प्रगतिशील लोकतंत्र और अभिव्यक्ति के सारे मानक मुक्कम्मल नहीं हो जाते, बल्कि लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्य कहीं इनसे ऊपर की चीज़ है ! आज जरूरी है कि हम इश्क और मुहब्बत के नाम पर बदचलनी की तरफ बहकते युवाओं के कदम को रोकने की दिशा में अभिभावक स्तर पर अपनी जवाबदेही तय करें क्योंकि बच्चों के परवरिश और संस्कार की प्रथम जिम्मेदारी अभिभावक की होती है, न कि सरकार की ! प्रेम और आकर्षण को एक समझ कर उन्हें उन्मुक्त आजादी की हिमायत अगर हमारा प्रगतिशील समाज करता रहा तो आने वाले दिनों में आधुनिक प्रेम के इस नए संसकरण के परिणाम और भी घातक होंगे ! अच्छे और बेहतर समाज के लिए जरुरी है कि हम बेहतर मानसिक क्षमता वाले युवाओं की जमात तैयार करें न कि कुंठित भेंडीयों की भीड़ खड़ी कर दें ! प्राथमिक स्तर पर स्वस्थ युवाओं वाले समाज का निर्माण करना हर अभिभावक की जिम्मेदारी है एवं द्वितीय स्तर पर यह समाज की जिम्मेदारी है, तब जाकर इसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप हो सकता है ! 
  

सोमवार, 5 अगस्त 2013

निलंबन के बहाने तुष्टिकरण की राजनीति : यह लेख अखबारों की नजर से



  • शिवानन्द द्विवेदी सहर 


गौतमबुद्ध नगर जिला स्थिति ग्रेटर नोएडा में बतौर उप जिलाधिकारी कार्यरत महिला आईएएस दुर्गाशक्ति नागपाल का निलंबन अब समाजवादी पार्टी के लिए ही गले का घाव बनता जा रहा है ! निलंबन रद्द कराने एवं महिला आईएएस के समर्थन में सोनिया गाँधी द्वारा प्रधानमंत्री को पत्र लिखने के कारण यह मामला अब उत्तरप्रदेश की राजनीति से ऊपर उठता दिख रहा है ! निलंबन की पूरी प्रक्रिया को अगर शुरू से देखा जाय तो एक बात साफ़ तौर पर सामने आती है कि उत्तरप्रदेश की सत्तानशीं समाजवादी पार्टी सरकार ने इस पुरे मामले को राजनितिक रंग देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है ! इस बात में कोई संदेह नहीं कि भू-खनन माफियाओं के काली-कमाई के लिहाज से ग्रेटर नोएडा एवं नोएडा एक मलाईदार जगह है ! नोएडा क्षेत्र एक ऐसी जगह है जहाँ निजी कन्सट्रक्सन कंपनियों द्वारा भू-खनन के लिए दिये जाने वाले ठेकों में बड़े स्तर पर रेत आदि अवैध तरीके से बेचा जाता है और रातो-रात काली कमाई की जाती है ! वैसे तो ऐसी जगहों पर अपनी तैनाती के लिए अधिकारी वर्ग हर हथकंडा अपनाने को तैयार रहते है फिर भी अगर कोई ईमानदार अधिकारी इस क्षेत्र में गलती से आ जाए तो उसका भू-माफियाओं की नजर में खटकना लाजिमी है ! निलंबन के बाद आ रहे बयानों के आधार दुर्गाशक्ति नागपाल मामले में भी कुछ ऐसा ही होता प्रतीत होता दिख रहा है ! अपने ही द्वारा चले गए पैंतरों के उल्टा पड़ने के बाद कटघरे में खड़ी समाजवादी पार्टी की इस मामले में भूमिका एक तीर से दो-दो निशान करने वाली रही है ! दुर्गाशक्ति का निलंबन कर समाजवादी पार्टी सरकार ने एक तरफ जहाँ भू-खनन माफियाओं को राहत देने का काम किया है तो वहीँ दूसरी तरफ इसे एक वर्ग विशेष की हिमायत से जोड़कर तुष्टिकरण की सियासत करने का भी काम किया है ! इस निलंबन के बाद सरकार के तरफ से शुरुआत में दिये गए तर्कों से यह साफ़ तौर पर स्पष्ट होता है कि सरकार एक खास वर्ग को यह संकेत देना चाहती थी कि यह सारा निलंबन उन्ही के हितों में किया गया है ! जबकि निलंबित अधिकारी ने अपने जवाब में साफ़ तौर पर कहा है कि जिस मस्जिद की दीवार गिराए जाने को लेकर उनका का निलंबन किया गया, उस दीवार को उन्होंने नहीं बल्कि ग्रामीणों ने खुद ही आपसी सहमति से गिरा दिया था और कहीं कोई विवाद आदि नहीं हुआ था ! इसमें कोई दो राय नहीं कि उत्तरप्रदेश में वर्ग विशेष के तुष्टिकरण की सियासत करने वाली समाजवादी पार्टी द्वारा इस मामले को भी बेवजह सियासी रंग देकर अपनी तुष्टिकरण की राह पुख्ता की जा रही है ! सवाल उठता है कि अगर वह दीवार गिरने से साम्प्रदायिक सदभाव बिगड़ सकता था तो इसकी सूगबुगाहट तक क्यों नहीं हुई अथवा किसी समुदाय द्वारा अधिकारी के निलंबन की मांग क्यों नहीं की गयी ? इस मामले में ज्यादा आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि सरकार की कृपा से मंत्री का दर्जा पाकर घूम रहे नरेंद्र भाटी द्वारा इस मामले को इतने त्वरित स्तर पर संज्ञान में कैसे ले लिया गया और मात्र चालीस मिनट में निलंबन का आदेश करा लिया गया ! नरेंद्र भाटी का यह कहना आज सरकार के गले की हड्डी बन गया है कि मैंने मात्र चालीस मिनट में इस अधिकारी का निलंबन करा दिया,यही लोकतंत्र की ताकत है ! बड़ा सवाल ये है कि अगर वाकई वहाँ सामाजिक सदभाव बिगड़ सकते थे तो यह मामला जिलाधिकारी तक पहुचने से पहले मुख्यमंत्री तक कैसे पहुच गया जबकि जिलाधिकारी मौके पर भी नहीं पहुचे थे ! जबकि स्थानीय जिलाधिकारी अपनी रिपोर्ट में दुर्गाशक्ति नागपाल को क्लीन चीट दे चुके हैं, लेकिन सरकार उस रिपोर्ट को मानने को तैयार नहीं दिख रही ! निश्चित तौर पर सरकार की तरफ से दिये जाने वाले बयानों के पेंच इतने ढीले हैं कि मामला साफ़ तौर पर समझा जा सकता है ! इस पुरे मामले में सिवाय तुष्टिकरण की राजनीति और भू-माफियाओं को प्रश्रय देने के अलावा और कुछ नहीं किया गया है !
दैनिक जागरण में प्रकशित
     राजनितिक चश्मे से अगर देखा जाय तो आगामी लोकसभा चुनाव के लिहाज से समाजवादी पार्टी द्वारा एक बार फिर ऐसे संकेत दिये जाने की पहल शुरू हो चुकी है कि वो एकमात्र ऐसी पार्टी है जो अल्पसंख्यकों की हिमायती है ! चुकि उत्तरप्रदेश में मुस्लिम वोटर्स पर हमेशा से समाजवादी पार्टी की नजर रही है और कांग्रेस के पारम्परिक मुस्लिम वोटबैंक को तोड़ने का काम भी समाजवादी पार्टी ने ही किया है ! अत: लोकसभा चुनाव को देखते हुए दुर्गाशक्ति नागपाल के निलंबन जैसे मामलों को तुल देकर सरकार अपना संदेश देने का काम कर रही है ! हालाकि दुर्गाशक्ति मामले में सरकार के पैतरें उसी के गले का घाव बन चुके हैं क्योंकि सरकार के इस पैतरें के खिलाफ खुद मुस्लिम संगठन ही खड़े हो चुके हैं ! दारुल उलूम ने तो साफ़ तौर पर कहा है कि समाजवादी पार्टी मुस्लिमों को अपने राजनीति का ढाल बनाने का प्रयास ना करें क्योंकि मुस्लिम समुदाय सब समझने लगा है ! हालाकि यूपीए की चेयरमैन सोनिया गाँधी ने इस मामले को संज्ञान में जरुर लिया है लेकिन अभी भी केन्द्र सरकार इस पर कुछ परिणामी कार्यवाही करेगी,ऐसा होता नहीं दिख रहा है ! चुकि, मामला मुस्लिम वोटबैंक का है तो कांग्रेस भी अपने कदम फूंक-फूंक कर ही उठाना चाहेगी ! गौरतलब है कि सोनिया गाँधी का यह पत्र तब लिखा गया जब उत्तरप्रदेश के मुस्लिम संस्थाओं की तरफ से समाजवादी पार्टी का विरोध किया गया ! अत: कांग्रेस इस बात को जरुर प्रचारित करना चाहेगी कि इस पुरे मामले में समाजवादी पार्टी सिवाय मुस्लिम वोटर्स को लुभाने के और कूछ नहीं कर रही ! दरसल, उत्तप्रदेश सरकार को बखूबी पता है कि यह रमजान का पाक महीना चल रहा है ऐसे में इन मामलों को तूल देना ज्यादा मुश्किल नहीं है ! कुल मिलाकर अगर देखा जाय तो निलंबन के बहाने अपनी राजनीति को पुख्ता करने में लगी समजवादी पार्टी फिलहाल अपने ही बयानों में फंसती नजर आ रही है ! क्योंकि, निलंबित अधिकारी दुर्गाशक्ति ने मुख्य सचिव को लिखे पत्र में साफ़ कहा है कि दीवार मैंने नहीं बल्कि ग्रामीणों ने खुद सहमति से गिरा दी ! वहीँ दूसरी तरफ विपक्ष भी पुरे मामले पर अपना विरोध जता रहा है ! निलंबन से सम्बंधित नूतन ठाकुर द्वारा दायर एक याचिका पर हाईकोर्ट की तरफ से बेशक इस निलंबन पर कोई टिप्पणी न की गयी हो लेकिन कोर्ट द्वारा भी भ-खनन की समस्या को संज्ञान में लिया गया है ! फिलहाल मामला जो भी हो लेकिन इतना तो तय है कि उत्तरप्रदेश सरकार अपने सियासी लाभ के लिए निलम्बन के बहाने तुष्टिकरण की सियासत कर रही है ! समजवादी पार्टी के चाल-चरित्र के बारे में यह शेर काफी प्रासंगिक नजर आता है कि “सियासत में जरूरी है रवादारी,समझता है, वो रोज़ा तो नहीं रखता मगर इफ्तारी समझता है !!
 
जनसंदेश टाइम्स में प्रकाशित

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

सावधान ! लालबत्ती आ रही हैं : जनसंदेश में प्रकाशित लेख

  • शिवानंद द्विवेदी सहर
अभी कुछ ही महीने पहले वीवीआईपी सुरक्षा मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने सड़कों पर बेलगाम दौड़ रहीं लालबत्ती वाली गाडिय़ों पर सख्त होते हुए केन्द्र एवं राज्य की सरकारों से इस संबंध में ब्यौरा मांगा था। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल पूछते हुए साफ तौर पर कहा था कि इन बत्तीधारी गाडिय़ों को लेकर सरकारें क्या नियामक तय कर रही हैं और कुल कितनी बत्तीधारी गाडिय़ां सड़कों पर दौड़ रहीं हैं इसका लेखा-जोखा कौन रख रहा है। दरअसल ,सन् 2002 में सड़क एवं राज्य परिवहन मंत्रालय द्वारा लालबत्ती धारकों की पात्रता की सूची जारी की गयी थी एवं यह भी तय किया गया था समय-समय पर राज्य सरकारें भी लालबत्ती पात्रता के संबंध में अपना नोटिफिकेशन जारी कर सकती हैं। लेकिन लालबत्ती किसे दी जाये और किसे नहीं,इसको लेकर कोई ठोस प्रावधान नहीं बनाया गया। लिहाजा नियमों में ढिलाई की वजह से लालबत्ती कल्चर नेताओं के रसूख और स्टेटस का सिम्बल बनती गयी। कोई ठोस नियामक न होने की वजह से बड़ी संख्या में सायरन होर्न वाली लालबत्ती गाडिय़ां सड़कों पर दौड़ती नजर आने लगी। चूंकि, लालबत्ती का मसला अप्रत्यक्ष तौर पर अति विशेष दर्जे की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है अत: इस पर नीति-नियामक तय करने का दायित्व कार्यपालिका पर है। मगर सरकारों द्वारा हीला-हवाली बरतने एवं कुछ पुख्ता उपाय न कर पाने के कारण सर्वोच्च न्यायलय को स्वत: इस मामले को संज्ञान में लेना पड़ रहा है। हालांकि इस संबंध में न्यायमित्र हरीश साल्वे ने पहले ही लालबत्ती के कारण बढ़ते अपराधों का हवाला देते हुए कहा था कि लालबत्ती और सायरन लगाने की अनुमति सिर्फ राष्ट्रपति ,प्रधानमंत्री, राज्यपाल ,मुख्यमंत्री, संसद के स्पीकर एवं मुख्य न्यायाधीशों सहित कुछ संवैधानिक पदों को ही दी जानी चाहिए। साल्वे ने यह भी कहा था कि लालबत्ती के मामले में एम्बुलेंस, पुलिस की गाडिय़ों आदि को छोड़कर किसी भी पदासीन को इस सुविधा की छूट नहीं दी जानी चाहिए। साल्वे की दलीलों को संज्ञान में लेते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने जब दिल्ली में लालबत्ती लगी कुल गाडिय़ों की संख्या जाननी चाही तो इसका जवाब सरकारों की तरफ से पेश सालिसिटर जनरल तक नहीं दे पाए। अब इस बात से यही अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब देश की राजधानी दिल्ली में लालबत्ती को लेकर कोई पुख्ता नियामक नहीं हैं तो बा$की राज्यों में तो स्थिति और भी खराब होगी। इस मामले में सबसे अधिक सांसदों और विधायकों वाले राज्य उत्तरप्रदेश में लालबत्ती गाडिय़ों की संख्या कितनी होगी,अंदाजा लगाना मुश्किल है । अगर एक नजर उत्तर प्रदेश पर डालें तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में ऐसी गाडिय़ां सड़कों पर दौड़ती नजर आ सकती हैं जिनको लालबत्ती लगाने की इजाजत नहीं है। उत्तर प्रदेश आरटीओ विभाग के मुताबिक राज्य में सांसद तक को गाड़ी के हेड पर फ्लैशर वाली लालबत्ती लगाने का प्रावधान नियामकों के अनुसार नहीं है। लेकिन स्थिति इसके ठीक उलट देखी जा सकती है। उत्तर प्रदेश के ही अकेले गोरखपुर, देवरिया सहित मऊ आदि जिलों में सांसदों और विधायकों सहित कई पार्टी पदाधिकारियों एवं उनके सगे-संबंधियों तक की गाडिय़ों पर लालबत्ती चमचमाती नजर आ सकती है। हालाकि यह स्थिति केवल उत्तरप्रदेश की ही नहीं है बल्कि हर राज्य के कमोबेश ऐसे ही हालात हैं।
कोर्ट द्वारा मामले को संज्ञान में लेने एवं इस मसले पर केन्द्र एवं राज्य सरकारों की हीला-हवाली के बीच कई सवाल ऐसे हैं जो आज भी अनुत्तरित कायम हैं, जिनका जवाब न तो सरकार के पास है और न किसी अन्य के पास। सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर हमारी सरकारें सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर गंभीर क्यों नहीं हो रही और इस बत्ती कल्चर के दुरुपयोग पर लगाम कसने के लिए पुख्ता नियामक क्यों नहीं तय कर रही हैं? हालांकि ये कोई नई बात नहीं है कि अपनी सुविधाओं की कटौती के मसले पर न सिर्फ सत्तापक्ष बल्कि सभी राजनीतिक दल एकजुट होकर चुप्पी साध लेते हैं। इस मामले में भी काफी हद तक यही होता दिख रहा है। लालबत्ती के नाम पर बिना किसी नियम-कानून के अपनी धौंस दिखा रहे सांसद,विधायक यहां तक कि उनके सगे संबंधी भी सड़कों पर सरेआम कानून की धज्जियां उड़ाते नजर आ रहे हैं जबकि बत्ती का रसूख होने के नाते छोटे स्तर के सिपाही अथवा अधिकारी उनके खिलाफ कार्यवाही से कतराते हैं। समाज में रसूख और धौंस के नाम पर न जाने कितने गैर-कानूनी कामों को अंजाम इसी बत्ती कल्चर के कारण दिया जाना संभव हो पा रहा है। लालबत्ती आवंटन में स्पष्ट और कठोर नियामक न होने के कारण इस बात का सही आकलन तक करना संभव नहीं हो पा रहा कि कहां कितनी गाडिय़ां लालबत्ती वाली हैं अथवा हो सकती हैं। लालबत्ती को लेकर कानूनी असमंजस की आड़ में इसका धड़ल्ले से दुरुपयोग किया जा रहा है। लालबत्ती की तेज़ी से बढ़ रही अपसंस्कृति ने अपराधों को बढ़ावा दिया है। इस संबंध में वर्तमान कानून की लचरता का सबब ये है कि अगर कोई व्यक्ति अवैध तरीके से लालबत्ती का प्रयोग अपनी गाड़ी के हेड पर करता हुआ पकड़ा जाता है तो उसे महज तीन हजार के चालान पर बत्ती उतारकर छोड़ दिया जाता है। वर्तमान कानून का एक पहलू यह भी कहता है कि बत्ती का प्रयोग केवल ड्यूटी के दौरान ही मान्य है। मगर लालबत्ती का प्रयोग केवल ड्यूटी के दौरान हो रहा है कि नहीं इसके निर्धारण का कोई इंतजाम लालबत्ती आवंटन कानून में नहीं है। कानूनी खामियों से जुड़े तमाम सवालों पर नजर रखते हुए लालबती के दुरुपयोग पर लगाम के लिए अदालत की इस पहल को इस नजरिये से भी अनिवार्य माना जा सकता है कि जब कार्यपालिका अपने दायित्वों का निर्वहन ढंग से न करे तो न्यायपालिका द्वारा हस्तक्षेप किया जाना आवश्यक हो जाता है।
आज जरूरत है कि लालबत्ती की अपसंस्कृति पर लगाम कसने की दिशा में त्वरित कार्यवाही की जाये। सख्त कानून एवं नियामक लागू कर लालबत्ती आवंटन की सुनिश्चित एवं स्पष्ट नीति समान रूप से केन्द्र व राज्यों द्वारा लागू की जाये। लालबती के दायरे को सीमित करते हुए एवं हरीश साल्वे की सिफारिशों पर अमल करते हुए ऐसे प्रावधान बनाये जायें जिससे कि लालबत्ती का दायरा अति विशिष्ट लोगों तक ही सीमित हो सके। सांसद,विधायक सहित पंचायती स्तर पर भी इसके उपयोग की न तो कोई आवश्यकता है और न ही इसे होना चाहिए। निचले स्तर पर लालबत्ती का उपयोग रसूख और धाक ज़माने से ज्यादा कुछ भी नहीं होता है,अत: उस स्तर पर इसे सख्ती के साथ प्रतिबंधित किया जाना जरूरी है।