सोमवार, 7 अक्टूबर 2013

निष्पक्ष चुनाव कराने की आचार संहिता : नवभारत टाइम्स में प्रकाशित



  • शिवानन्द द्विवेदी सहर

दिल्ली सहित पाँच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों की तारीखों का ऐलान
चुनाव आयोग द्वारा किया जा चुका है ! चुनाव आयोग द्वारा अलग-अलग तारीखों के ऐलान के साथ ही चुनावी कोड ऑफ कंडक्ट यानी आदर्श आचार संहिता इन सभी राज्यों में प्रभावी हो चुकी है ! आइये जानते है कि क्या है चुनावी आचार संहिता का असर ?

क्या है आदर्श आचार संहिता
भारतीय संविधान के जनप्रतिनिधित्व क़ानून 1951 के तहत देश में आम चुनाव कराने का प्रावधान है ! इसी के तहत अनुच्छेद 324 में उन सभी नियमों का वर्णन है कि किस प्रकार से चुनावों का आयोजन हो और चुनाव संपन्न कराये जाय ! आदर्श चुनाव आचार संहिता भी संविधान के इसी क़ानून का एक हिस्सा है जिसके तहत देश संसद एवं विधायिकाओं के चुनाव शान्तिपूर्ण ढंग से चुनाव आयोग द्वारा संपन्न कराये जाते हैं !

सत्ता पक्ष पर नियंत्रण
आचार संहिता लागू होने के बाद सत्ताधारी पार्टी का कोई भी मंत्री विधायक किसी भी सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल चुनाव प्रचार के लिए नहीं कर सकता है ! साथ ही आचार संहिता लागू होते ही उन सभी विज्ञापनों पर रोक लग जाती है जो पूर्णतया सरकारी होते हैं और सरकार की उपलबधिया बताते हैं ! इस दौरान न तो सरकार के तरफ से किसी योजना अथवा कार्य की घोषणा हो सकती है और ना ही कोई अन्य लुभावने वादे किये जा सकते हैं !

देना होगा कदम-कदम का हिसाब
आचार संहिता लागू होते ही सभी तरह की राजनीतिक रैलियों एवं बैठकों पर चुनाव आयोग अथवा स्थानीय पुलिस की निगरानी रहती है एवं बिना तारीख एवं रैली की जगह बताये कोई भी राजनीतिक दल रैली आदि नहीं कर सकता है ! इसमें यह तय किया जाता है कि रैली कब शुरू होगी, कहाँ से कहाँ तक जायेगी एवं इस दौरान यातायत कैसे प्रभावित नहीं होगा !

टीका-टिप्पणी में अनुशासन
आचार संहिता के दौरान चुनाव आयोग इस बात पर नजर रखता है कि कोई भी राजनीतिक दल व्यक्तिगत अथवा साम्प्रदायिक टीका-टिप्पणी तो नहीं कर रहा ! हालाकि वैचारिक स्तर पर तो आलोचना की छूट सबको होती है लेकिन कोई भी ऐसी टिप्पणी नहीं हो सकती है जो निहायत व्यक्तिगत हो !

अंतिम दिन
चुनाव के दिन से चौबीस घंटे पहले किसी प्रकार की चुनाव प्रचार-प्रसार की गतिविधि एवं चुनावी भ्रमण आदि पर विराम लगा दिया जाता है ! साथ ही चुनाव के दिन किसी भी राजनीतिक दल के चुनावी कैम्प पर भीड़-भाड़ एवं लाव-लश्कर नहीं दिखना चाहिए !

शिकायत एवं पर्यवेक्षण
आचार संहिता के नियमों के अनुसार अगर किसी व्यक्ति, उम्मीदवार आदि को ऐसा लग रहा है कि कहीं आदर्श आचार संहिता का उलंघन हो रहा है, ऐसे में वो अपनी शिकायत चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त पर्यवेक्षक को दर्ज करा सकता है !

आचार संहिता उलंघन प्रावधान
किसी भी तरह से किसी उम्मीदवार द्वारा अचार संहिता उलंघन किये जाने कि स्थिति में कई तरह के दंड प्रावधान हैं ! शस्त्र लाइंसेंस रद्द किये जाने के अलावा गंभीर मामला होने की स्थिति में उम्मीदवारी भी निरस्त किये जाने का प्रावधान है जिसके तहत उम्मीदवार की उम्मीदवारी निरस्त की जा सकती !

मतदाताओं को प्रोत्साहित करना
आचार संहिता का मकसद होता है कि चुनाव निष्पक्ष हो और देश का हर आम और खास व्यक्ति चुनावों में अपनी उच्च भागीदारी दे सके ! चुनाव आयोग द्वारा मतदाताओं को अपना मत प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयोग पिछले कुछ सालों में किया गया है ! विज्ञापनो एवं अन्य माध्यमों से चुनाव आयोग अब ऐसा प्रयास करता रहा है !      

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2013

लालू की सजा के राजनीतिक निहितार्थ : डीएनए में प्रकाशित लेख



  • शिवानन्द द्विवेदी सहर

कुछ दिनों पहले भोपाल में अपनी रैली को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा था कि आगामी लोकसभा चुनाव कांग्रेस की सीबाआई लड़ेगी ! नरेंद्र मोदी के इस कथन की प्रासंगिकता चारा घोटाले पर झारखंड की सीबीआई अदालत के ऐतिहासिक फैसले से काफी हद तक पुष्ट होती दिख रही है !  आखिरकार आज सत्रह साल बाद बिहार के बहुचर्चित चारा घोटाले के आरोपियों पर सीबीआई अदालत का फैसला आ ही गया ! अदालती फैसले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव एवं जगन्नाथ मिश्र सहित
44 आरोपियों को अदालत ने अलग-अलग धाराओं में दोषी करार दिया ,जिन्हें जल्द ही सजा भी सुना दी जायेगी ! आज के सत्रह साल पहले बिहार के सिंहभूमि जिले के पशु विभाग के दफ्तर में पड़े आयकर के छापों के बाद यह चारा घोटाला सबके सामने आया था और बाद में इस बात की पुष्टि भी हुई कि इस घोटाले में लगभग 9 अरब रुपयों का चुना सरकारी खजाने को लगाया गया है ! फिलहाल सीबीआई अदालत के इस फैसले को कई कोणों से समझने की जरुरत है क्योंकि यह पूर्णतया न्यायिक फैसला नहीं है बल्कि इस सजा के तमाम राजनितिक मायने भी हैं ! इस फैसले को लेकर बिहार की अंदरूनी राजनीति, आगामी लोकसभा चुनाव एवं राष्ट्रीय जनता दल के भविष्य के साथ-साथ कांग्रेस की सीबीआई नीति पर भी सवालों की सुई अटक रही है ! लालू पर आया यह फैसला अपने आप में कई पेंच कसता तो कई पेंच खोलता भी नजर आता है ! सबसे पहले गौर करने वाली बात ये होगी कि लालू यादव पहले बड़े नेता होंगे जो सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देश पर सजायाफ्ता दागी होने के कारण अपनी संसद सदस्यता गवाएंगे ! अब बड़ा सवाल ये है कि यह फैसला लालू को किनारे करने की कांग्रेस की चाल तो नहीं है ? बिहार की हाल की राजनीति पर गौर करें तो राजग से अलग होने के बाद जनता दल यूनाइटेड के यूपीए से संबंधों में निकटता देखी जा रही है और सालों से विशेष राज्य के दर्जे पर चल रही रार को विराम देते हुए केन्द्र सरकार ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा भी दिया है ! अब नितीश कुमार से कांग्रेस की बढ़ती निकटता के मायने यही हैं कि लोकसभा चुनावों के बाद अगर संख्याबल की जरुरत पड़ी तो बिहार में नितीश को यूपीए का हिस्सा बनाने में आसानी होगी ! इतना तो लगभग तय है कि चुनाव के पहले जदयू यूपीए का हिस्सा नहीं बनेगा और अकेले चुनाव लड़ेगी ! चुकि, बिहार के राजनितिक समीकरण में लालू यादव का माय समीकरण टूटने के बाद लालू की राजनितिक साख लागातार गिरती गयी और ना तो राज्य में और ना ही केन्द्र में ही उनका कोई महत्व शेष रह गया था ! वरना आपको याद हो तो नब्बे के दशक में जेल जाते-जाते लालू यादव अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना गए थे,मगर अब ना तो वैसी स्थिति है और ना ही वो प्रभाव ही बचा है ! हाँ, यूपीए और कांग्रेस द्वारा दरकिनार किये जाने के बावजूद भी लालू यादव कांग्रेस का लागातार समर्थन शायद इसी सीबीआई अदालत के फैसले से डर कर अबतक कर रहे थे ! फिलहाल लालू के जेल जाने के बाद बेशक पूर्व मुख्यमंत्री और लालू यादव की पत्नी राबड़ी देवी ने यह कहा है कि वो अपनी पार्टी अपने बेटे के साथ मिलकर चला लेंगी लेकिन राबड़ी और तेजस्वी यादव जनता के बीच लालू की तरह प्रभाव छोडने में कामयाब होंगे ऐसा कहना जल्दीबाजी होगी ! अपने नेता के जेल जाने से हतोत्साहित नितीश विरोधी वोटर अगर भाजपा का दामन थाम लिए तो यह नितीश की बजाय लालू के लिए बड़ी मुश्किल का सबब होगा ! आगामी लोकसभा में कांग्रेस बिहार में कुछ खास करती नहीं दिख रही इसीलिए उसने नितीश का सहारा लेने की सियासी चाल चली है ! अगर आगामी लोकसभा चुनाव में राजद की स्थिति में सुधार नहीं हुआ और सीटों में इजाफा नहीं हुआ तो इसे राजद और लालू के अवसान के तौर पर देखा जाना चाहिए ! क्योंकि सीबीआई के पेंच में उलझा लालू का राजनीतिक भविष्य और भी उलझता ही जाएगा ! हाँ, अगर राजनीतिक उलटफेर हुआ और लालू फिर लोकसभा चुनाव 2009 की तरह 20 सीटे लाने में कामयाबी हासिल किये तो बहुत कुछ फिर से पटरी आते देर नहीं लगेगी ! लालू यादव राजनीति को वो खिलाड़ी हैं जो अपने रबर स्टैम्प मोहरों के लिए जाने जाते हैं ! अगर आगामी चुनाव में सबकुछ ठीक रहा तो खुद चुनाव ना लड़ पाने की स्थिति में भी वो समय रहते अपनी विरासत अपने पुत्र तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव को सौप देंगे ! इतना तो लगभग तय माना जाना चाहिए कि लालू और राजद का भविष्य फिलहाल आगामी लोकसभा चुनाव पर टिका है और आगामी लोकसभा चुनाव के बाद काफी हद तक यह स्पष्ट हो पायेगा कि लालू का और राजद का राजनितिक भविष्य क्या है ?
     रही बात चारा घोटाले में न्याय पर तो निश्चित तौर पर लालू यादव सहित अन्य तमाम आरोपियों को दोषी करार दिये जाने के फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए ! यह देर से आया एक बेहतर फैसला है उस इसमें लालू यादव को तीन से सात साल तक की सजा भी हो सकती है ! लालू यादव की जेल पर बीजेपी ने एकतरफ स्वागत योग्य फैसला बताया है तो वहीँ जदयू सहित कांग्रेस भी ज्यादा कुछ बोलने को तैयार नहीं दिख रहीं ! हाँ, एकमात्र दिग्विजय सिंह ऐसे नेता हैं जो यह कह रहे हैं कि लालू यादव राजनीतिक खड्यंत्र के शिकार हुए हैं ! दरसअल, दिग्ग्विजय की बातों को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है ! वाकई लालू यादव का पर आया सीबीआई अदालत का यह फैसला पूर्ण रूप से न्यायिक नहीं है बल्कि इसमें व्यापक राजनीति हस्तक्षेप है ! अगर लालू यादव के साथ राजनीतिक हित साधने की बात नहीं होती तो संभवत: यह फैसला बहुत पहले आ गया होता अथवा अगर लालू यादव की लोकसभा में 20 सीटें होती तो संभवत: यह फैसला आज भी नहीं आया होता ! लिहाजा, यह मानने में कतई गुरेज नहीं होनी चाहिए कि लालू यादव पर यह फैसला कांग्रेस के सियासी समीकरणों को दुरुस्त करने की कवायद का हिस्सा है ! कांग्रेस लालू को निष्क्रिय कर अपना गठबंधन प्रबंधन कर रही है ! कांग्रेस यह तो चाहती थी कि लालू यादव जेल जायें और उन्हें दोषी करार दिया जाय, मगर ये नहीं चाहती थी कि लालू की सदस्यता भी जाए ! क्योंकि राजनीति में कोई पूर्णकालिक दोस्त नहीं होता और कोई पूर्णकालिक शत्रु नहीं होता ! फिलहाल ऐसे फैसले और भी आने की संभावना है ! यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है कि लालू का जेल जाना भी सीबीआई के कंधे पर बन्दुक रखकर कांग्रेस द्वारा लगाया गया एक राजनितिक निशाना है और मुलायम-मायावती पर चल रही आय से अधिक सम्पति का मामला सीबीआई द्वारा वापस लेना भी कांग्रेस का एक सियासी फैसला है !  

बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

अमेरिका से सबक लें प्रधानमंत्री : नई दुनिया नेशनल में प्रकाशित लेख



  • शिवानन्द द्विवेदी सहर    

भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों की न्यूयार्क में होने मुलाक़ात से लगभग 72
घंटे पहले हुई जम्मू के कठुवा और साम्बा में पाकिस्तान सीमा से घुसे आतंकियों द्वारा हमला कर दिया गया जिसमे एक दर्जन सेना और पुलिस के जवान शहीद हुए ! इस हमले के बाद भारत में इस बात को लेकर सियासी बयानबाजियों और कयासों का दौर तेज हो गया था कि क्या ऐसी परिस्थिति में पाकिस्तान के साथ बात-चीत किया जाना चाहिए ? बयानों और विरोधों के बीच रही सही कसर दिल्ली की रैली में बोलते हुए नरेंद्र मोदी ने इस मुलाक़ात में प्रधानमंत्री की भूमिका पर सवाल उठाते हुए पूरी कर दी ! हालाकि तमाम विरोधों और बयानों  के बावजूद न्यूयार्क से आई खबर के मुताबिक़ यह स्पष्ट हो गया था कि दोनों देशो के प्रधानमंत्री मिलेंगे और यह मुलाक़ात हुई भी ! आखिरकार तमाम वाह्य एवं आंतरिक विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलाक़ात की गयी ! दोनों देशो के राजनयिकों के बीच हुई इस मुलाक़ात के बाद ऐसा नहीं है कि सबकुछ ठीक हो गया है,बल्कि कई सवाल हैं जो अब भी कायम हैं ! सबसे बड़ा सवाल ये है कि भारतीय प्रधानमंत्री ने शरीफ से हुई बातचीत में किन निर्णायक बिंदुओं पर बातचीत की है ? क्या वाकई किन्ही ठोस एवं निर्णायक बिंदु पर मनमोहन सिंह ने नवाज शरीफ के साथ बात की है अथवा महज औपचारिकताओं के वही रटे-रटाए पुराने राग एक बार फिर अलाप आये हैं हमारे प्रधानमंत्री ? हालाकि बातचीत के बिंदुओं पर अगर गौर करें तो  निर्णायक स्तर पर कोई बातचीत हुई है ऐसा कुछ भी नहीं प्रतीत हो रहा !  आज देश का अपने प्रधानमंत्री से वाजिब सवाल है कि आप नवाज शरीफ से जो बातचीत करके आये हैं,उसका हासिल क्या है ? हम बेशक एक शांतिवादी राष्ट्र हैं मगर एक शांतिप्रिय और उदार राष्ट्र होने का ये भी तो अर्थ नहीं होता कि विश्व समाज के मंच पर हम कोई कड़ा संदेश भी ना दे सके और केवल खुद पर हुए हमलों की कड़ी निंदा और चेतावनी देते हुए आगे बढते रहे ! जिस न्यूयार्क में बैठ कर प्रधानमंत्री यह मुलाक़ात कर रहे थे,उन्हें कुछ सीख और सबक तो वहीँ के राष्ट्रप्रमुख से लेनी चाहिए थी ! अगर आपको याद हो तो आज के तकरीबन दो साल पहले 9/11की दसवीं बरसी पर आयोजित श्रद्धांजली सभा में अमेरिकी  राष्ट्रपति ओबामा का भाषण समूचे विश्व ने सुना ! आतंकवाद के परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति ओबामा के संवाद में कहीं ना  कहीं आत्मविश्वास से ओत-प्रोत राष्ट्रवाद कि झलक दिखाई दे रही थी ! वह एक ऐसा संबोधन था जो राष्ट्रीय जनमानस को संतुष्ट करने और आतंकवाद के प्रति अपना  दृष्टिकोण विश्व पटल पर स्पष्ट करने के लिए दिया गया था ! जिस स्पष्टवादिता से उस शक्तिशाली प्रशासक ने अपनी बात रखी थी और अपनी बातों पर कायम भी रहा, उस स्पष्टवादिता का भारतीय राजनयिकों में सदा से अभाव सा रहा है ! ओबामा द्वारा ग्राउंड जीरो से दिया गया वो भाषण अपने राष्ट्र के नागरिकों को आतंकवाद से महफूज रखने की गारंटी दे रहा था ! ग्राउंड जीरो से अपने राष्ट्र को संबोधित करते हुए बराक ओबामा का यह कहना कि हमने अपने हमलावर और शत्रु ओसामा बिन लादेन को मार गिराया है,कहीं ना कहीं वो अंतिम बयान था जो कोई राष्ट्र प्रमुख अपने राष्ट्र को संतुष्ट करने के लिए दे सकता था ! उस वक्त जब ओबामा यह बयां दे रहे थे तब अमेरिका के दोनों राजनीतिक दल रिपब्लिक और डेमोक्रेटिक एक दूसरे के कंधे से कंधा मिलाते नजर आ रहे थे जो कि भारतीय राजनीतिक परिस्थितियों में दिखना अब नामुमकिन के करीब प्रतीत होता है ! यही एकजुटता वो कड़ी है कि अमेरिका में 9/11 को दोहराया नहीं जा सका है !

    
इन सभी तथ्यों के बीच अगर आतंकवाद पर भारतीय रुख एवं भारत पर आतंकवाद के रुख की विवेचना करें तो तमाम तथ्य ऐसे परिलक्षित होंगे जो जो आतंकवाद के प्रति भारत के लचर एवं अदुरदर्शी रुख को स्पष्ट करते हैं ! प्राय: देखा जाता है कि ऐसी वारदातों के बाद जवाबी तौर पर हमारी कार्यवाही महज़ "कड़ी निंदा" ,भर्त्सना और चंद मुआवजों तक सिमित होकर रह जाती है ! कई बार तो हमारे राजनयिकों द्वारा दिए जाने वाले कुछ बयान तो राष्ट्रीय आत्मविश्वास की धज्जियां उड़ाने में उत्प्रेरक का काम करते रहे है ! ऐसी परिस्थितियों में जब हमारी राजनीति ही अलग-अलग कई विचारों में बटी हुई नजर आती है तो इसका साफ़ अर्थ यही है कि राजनितिक स्तर पर देश की सुरक्षा को लेकर हमारे पास कोई एकजुट होकर तैयार की गयी नीति नहीं है ! हमारे प्रधानमंत्री को यह समझना चाहिए कि यह निंदा करने और पाकिस्तान से मधुरता दिखाने का नहीं बल्कि ठोस निर्णय करने का वक्त है ! ऐसे हालातों को चंद बयानों और बैठकों  से कतई नहीं पाटा जा सकता है ! ऐसे ना जाने कितने तथ्य ऐसे हैं जो पाकिस्तान सीमा से होने वाले आतंकी वारदातों के प्रति भारतीय राजनीतिक दृष्टिकोण के लचीलेपन एवं असंवेदनशीलता से पर्दा हटाते हैं ! हम आतंकवाद जैसी वैश्विक समस्या को भी राजनीतिक हथियार बनाने से बाज नहीं आ रहे ! जहां एक तरफ अपने एकमात्र आतंकवादी हमले से सबक लेते हुए अमेरिका अपने दुश्मन को मारकर अपनी जनता को प्रतिशोध का तौफा देता है वहीँ हम आतंकवादीयों को सरकारी खर्चे पर वकील मुहैया कराते हैं ! अब वक्त हाथ से निकलता जा रहा कि आतंकवाद के खिलाफ कोई कड़ा कदम उठाया जाय ! समझ में यह बात नहीं आती कि अगर उधर से हो रहे हमलों के कारण बातचीत प्रभावित नहीं हो सकती है तो इधर से की गयी जवाबी कार्यवाही से भला बातचीत कैसे प्रभावित हो जायेगी ? कम से कम हम समुचित और कड़ा जवाब तो पड़ोसी मुल्क को दें ! क्या विश्व समाज के मंच हम कूटनीतिक स्तर पर इतने विपन्न और पंगु हो चुके हैं कि अपनी बात को सख्ती के साथ चेतावनी के तौर पर रखने से भी परहेज करते हैं ?  सच तो ये है कि हम आजतक आतंकवाद को लेकर को सर्वसम्मति से परिणाम की तरफ जाने वाला मार्ग ही नहीं तलाश पाए, और ना ही कोई निति निर्माण ही कर पाए जिसका  नतीजा आज हमारे सामने है ! हम सिफ गिन रहे हैं और वो आतंक का नंगा तांडव एक के बाद एक करते जा रहे हैं ! आतंकवाद के मोर्चे पर लचर और पस्त दिख रही सरकार को अमेरिका से सबक और सीख लेनी चाहिए !

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

गाँधी और पत्रकारिता के सरोकार : राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित लेख

  • शिवानन्द  द्विवेदी सहर
पिछले सौ सालों के इतिहास में अगर किसी व्यक्ति अथवा विचारधारा की प्रासंगिकता को लेकर सबसे ज्यादा
चिंतन हुआ है तो वह गांधी और गांधीवाद है. सत्य और अहिंसा के प्रतिमान बन चुके गांधी और उनके दर्शन की प्रासंगिकता न सिर्फ  भारत बल्कि अफ्रीका सहित दुनिया के तमाम देशों में आज भी कायम है. गांधी के सत्य-अहिंसा के नैतिक मूल्यों पर तो न जाने कितनी बहसें होती रही हैं, न जाने कितना कुछ लिखा जा चुका है मगर सामयिक संदर्भ में उनके व्यक्तित्व का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष भी बहुत विचारणीय है. वह पक्ष है पत्रकारिता संबधी उनके सरोकार. अहिंसा के पथ-प्रदर्शक, सत्यनिष्ठ समाज सुधारक और महात्मा के रूप में विश्व विख्यात गांधी सबसे पहले कुशल पत्रकार थे. उनकी पत्रकारिता की बारीकियों को समझने का प्रयास किया जाए तो वह व्यावहारिक पत्रकारिता के स्तंभों में अग्रणी नजर आते हैं.गांधी की पत्रकारिता भी उनके गांधीवादी सिद्धांतों के मानकों पर ही आधारित है. उनकी पत्रकारिता में उनके संघर्ष का बड़ा व्याहारिक दृष्टिकोण नजर आता है. जिस आमजन, हरिजन एवं सामाजिक समानता के प्रति गांधी का रुझान उनके जीवन संघर्ष में दिखता है, बिल्कुल वैसा ही रुझान उनकी पत्रकारिता में भी देखा जा सकता है. गांधी का मानना था कि पत्रकारिता की बुनियाद सत्यवादिता के मूल चरित्र में निहित होती है. असत्य की तरफ उन्मुख होकर विशुद्ध व वास्तविक पत्रकारिता के उद्देश्यों को कभी प्राप्त नहीं किया जा सकता है. गांधी का यह दृष्टिकोण इस बात की पुष्टि करता है कि उनकी पत्रकारिता और व्यावहारिक जीवन के सिद्धांतों में किसी भी तरह का दोहरापन नहीं है. निश्चित तौर पर अपने सिद्धांतों एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में किये गए कार्यों के बीच का सामंजस्य ही गांधी को पत्रकारिता के महान मार्गदशर्क के रूप में स्थापित करता है.
पत्रकारिता में गांधी के योगदान की ऐतिहासिकता पर नजर डालें तो उनकी पत्रकारिता की शुरु आत ही विरोध की निडर अभिव्यक्ति के तौर पर हुई थी. जब गांधी अफ्रीका में वकालत कर रहे थे, उसी दौरान वहां की एक अदालत ने उन्हें कोर्ट परिसर में पगड़ी पहनने से मना कर दिया था. अपने साथ हुए इस दोहरेपन का विरोध करते हुए गांधी ने डरबन के एक स्थानीय संपादक को चिट्ठी लिखकर अपना विरोध जाहिर किया, जिसको उस अखबार द्वारा बाकायदा प्रकाशित भी किया गया. अखबार को लिखे उस पत्र को गांधी की पत्रकारिता का पहला कदम माना जा सकता है हालाकि  तत्कालीन दौर में गांधी को भारत में भी कोई नहीं जानता था.पत्रकारिता के प्रति गांधी की निष्ठा और विश्वास का ही परिणाम रहा कि अफ्रीका प्रवास के दौरान उन्होंने ‘इन्डियन ओपिनियन’ के जरिए अपने विचारों और सिद्धांतों का प्रतिपादन करते हुए देशवासियों के हित में आवाज उठायी. यह गांधी की सत्यनिष्ठ और निर्भीक पत्रकारिता का असर ही था कि अफ्रीका जैसे देश में रंगभेद जैसी विषम परिस्थितियों के बावजूद पांच अलग-अलग भारतीय भाषाओं में इस अखबार का प्रकाशन होता रहा. इसके प्रकाशन के साथ-साथ गांधी के निर्भीक स्वर अन्य अखबारों के सम्पादकीय पृष्ठों में भी गूंजने लगे थे. यह वह दौर था जब मोहनदास करमचंद गांधी ‘पत्रकार गांधी’ के रूप में ख्याति अर्जित करने लगे थे.  महात्मा गांधी ने ‘इंडियन ओपिनियन’ के माध्यम से अफ्रीका में रह रहे भारतीय मूल के लोगों की समस्याओं को शिद्दत से उठाया. उनकी पत्रकारिता के स्वर इतने निर्भीक रहे कि उनके लेखों से विचलित अफ्रीकी प्रशासन ने 1906 में उन्हें जोहांसबर्ग में एक जेल में बंद कर दिया. लेकिन पत्रकारिता में निर्भीकता का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करते हुए गांधी ने जेल से ही संपादन कार्य जारी रखा. पत्रकारिता की पारदर्शिता कायम रखने का यह कठिन किन्तु बड़ा फैसला गांधी ही ले सकते थे कि संपादक रहते हुए उन्होंने कभी अखबार के लिए किसी से विज्ञापन की मांग नहीं की. उनके सम्पादकीय लेखों का असर उन दिनों की अफ्रीकी सरकारों पर भी खूब रहा. यही नहीं, भारत में अंग्रेजी हुकूमत पर भी उनके लेखों का व्यापक असर दिखने लगा था. गांधी की प्रखर लेखनी का लोहा मानते हुए एक अंग्रेजी लेखक ने यहां तक कहा है कि गांधी के संपादकीय लेखों के वाक्य ‘थाट फॉर द  डे के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकते हैं.
गांधी की पत्रकारिता के मार्ग में भाषाई दायरे कभी अवरोधक नहीं बने. वह समय और अवसर के अनुकूल हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी में लेखन करते थे. गांधी की  नजर में पत्रकारिता का उद्देश्य जनजागरण था. वह जनमानस की समस्याओं को मुख्यधारा की पत्रकारिता में रखने के प्रबल पक्षधर थे. भारत आने के बाद गुलामी की परिस्थितियों से रूबरू गांधी ने सत्य,अहिंसा के समानान्तर पत्रकारिता एवं लेखन को भी अपना हथियार बनाया. उन्होंने स्व-संपादन में ‘यंग इंडिया’ का प्रकाशन शुरू किया जो जनमासन के बीच बहुत लोकप्रिय था. बाद में इसका गुजराती संस्करण ‘नवजीवन’ के नाम से शुरू किया गया. समाज के निचले तबके के प्रति गांधी की चिंता उनकी पत्रकारिता में खुलकर सामने आती है. दलित-शोषित समाज की आवाज उठाने के उद्देश्य से उन्होंने समय-समय पर ‘हरिजन’ में विचारोत्तेजक लेख लिखे, जिसका तत्कालीन समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ा.
गांधी की पत्रकारिता के उस काल से लेकर आज की पत्रकारिता के बीच बदलावों का एक बड़ा दौर रहा है. सुविधाओं व संसाधनों के दृष्टि से आज की पत्रकारिता काफी हद तक सहज एवं सुलभ हो गयी है. आज बेशक पत्रकारिता तकनीक संपन्न हो गयी है लेकिन वर्तमान पत्रकारिता के स्वरूप  पर सवाल भी कुछ कम नहीं उठ रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल तो यही उठता है कि आज की तेज रफ्तार जिंदगी में पत्रकारिता ने कहीं गांधीवादी पत्रकारिता के उन आदर्श मूल्यों को तो हाशिए पर नहीं ला दिया है जिसके बिना ‘पत्रकारिता’ शब्द ही अर्थहीन नजर आता है. आज पत्रकारिता को लेकर जिस तरह के सवाल आये दिन उठते रहते हैं, ऐसे में क्या यहां भी गांधी प्रासंगिक नहीं हो जाते हैं? कहीं यह सच तो नहीं कि हमने अपनी सहूलियत और निजी हितों को ऊपर रखकर गांधी की पत्रकारिता के उन मूल्यों को सामने ही नहीं आने दिया, जिनका सामने आना वर्तमान पत्रकारिता के बिगड़ते स्वरूप के लिए सबसे जरूरी जान पड़ता है. गांधी द्वारा पत्रकारिता के क्षेत्र में जो आदर्श स्थापित किये गए, वह अपने आप में पत्रकारिता के स्थापित और प्रामाणिक सिद्धांत कहे जा सकते हैं. भारतीय ही नही, विश्व के पत्रकारिता जगत को चाहिए कि वह  गांधी को महज महात्मा तक सीमिति न कर ‘पत्रकार गांधी’ के मूल्यों, आदर्शों व सिद्धांतों को भी पढ़ें-समझें और आत्मसात करें. यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का कल्याणकारी पक्ष है.

आयात के भरोसे भारत में इलेक्ट्रोनिक्स उद्द्योग :भारत सरकार की पत्रिका योजना में प्रकाशित लेख



  • शिवानन्द द्विवेदी सहर  

सुचना एवं प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में हुई क्रान्ति के बाद भारत इलेक्ट्रोनिक्स उपकरणों के सर्वाधिक
उपभोक्ताओं का वाला देश बन चुका है ! इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले कुछ सालों में भारत में इलेक्ट्रोनिक्स का बाजार गुणात्मक स्तर पर तेजी से बढ़ा है और लागातार इसमें बढोत्तरी ही होती जा रही है ! भारत में इस समय तकनीक और संसाधनों की क्रान्ति अपने चरम पर है और इलेक्ट्रोनिक उत्पादों की मांग लागातार बढ़ती जा रही है ! भारत में इलेक्ट्रोनिक्स उपकरणों की बढ़ती मांग और लागातर तेजी से बढते जा रहे इस बाजार का सही अंदाजा संसद में पेश की गयी पिछले दो सालों की सम्बंधित रिपोर्ट से ही लगाया जा सकता है ! वर्ष 2010-11 में हुए इलेक्ट्रोनिक्स उपकरणों के कुल आयात का ब्यौरा प्रस्तुत करते हुए तत्कालीन केबिनेट राज्य मंत्री मिलिंद देवड़ा ने बताया था कि इस वित्तीय वर्ष में कुल एक लाख इक्कीस हजार करोंड़ का कुल इलेक्ट्रोनिक उपकरणों का आयात हुआ है ! जबकि उसके ठीक एक साल बाद लोकसभा में पेश रिपोर्ट में यह आंकड़ा 30 फीसद के उछाल के साथ लगभग एक लाख सत्तावन हजार करोंड़ तक पहुच गया ! इन आंकड़ों को ठीक से समझने के बाद एक बात तो साफ़ तौर पर नजर आती है कि अब इलेक्ट्रोनिक्स का बाजार इतना बड़ा तो हो ही चुका है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर प्रभावित कर सके !  इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि सुचना एवं प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में तेजी से विकसित हो रहा इलेक्ट्रोनिक्स बाजार भारत के लिए कई स्तरों पर विकास एवं बेहतरी की संभावना ले कर आया है ! लेकिन समानांतर रूप से इस बात पर भी व्यापक बहस जरूरी है कि बड़े स्तर पर फ़ैल चुके इस बाजार को लेकर हमारी नीतियां कितनी मजबूत और कारगर साबित हो रही हैं ! इस पुरे मसले में अगर देखा जाय तो हमारी अर्थव्यवस्था पर इस बाजार क्या ज्यादा प्रभाव भारी मात्रा में होने वाले आयात की वजह से पड़ता नजर आ रहा है ! दरअसल लाखों करोंड़ के इस आयात की सबसे बड़ी वजह ये है कि अभी तक भारत इन उत्पादों के निर्माण की दिशा में बुनियादी स्तर पर भी कोई काम कर पाने में सफल नहीं रहा है ! जिस देश में इलेक्ट्रोनिक्स का बाजार इतना बड़ा हो वहाँ इलेक्ट्रोनिक्स उत्पादों के उत्पादन का बिलकुल ना होना आश्चर्यचकित करने वाली बात है ! इस सच्चाई को कतई खारिज नहीं किया जा सकता कि इलेक्ट्रोनिक उत्पादों के आयात के मामले में भारत जितना आगे जा चुका है उनके मैन्युफैक्चारिंग मामले में उतना ही पीछे खिसकता गया है ! एक ताजा आंकड़े के अनुसार भारत में इलेक्ट्रोनिक्स निर्माण का कुल उद्द्योग पुरे विश्व का मात्र 0.7% है,जो कि भारतीय सेमीकंडक्टर के मांग  के हिसाब से बहुत ही कम एवं निराशाजनक कहा जा सकता है ! भारत आज भी इस मामले में इतना परिपक्व नहीं हो पाया है कि वो एक ट्रांजिस्टर लेवल के मामूली कंपोनेंट की मैन्युफैक्चारिंग तक कर सके, शेष आईसी-चिप आदि का तो सवाल ही नहीं उठता ! आज भी इलेक्ट्रोनिक कम्पोनेंट्स के मामले में हम चाइना और कोरिया जैसे देशों पर निर्भर हैं ! लिहाजा, इलेक्ट्रोनिक्स की दिशा में देश का लाखों करोंड़ मात्र आयात के नाम पर विदेशों में जा रहा है ! आश्चर्य जनक तथ्य यह है कि बहुत कम समय में विकसित हुए इलेक्ट्रोनिक्स बाजार की वर्तमान स्थिति के आधार पर यह आकलन किया जा चुका है कि आगामी 2020 तक  भारत का इलेक्ट्रोनिक्स आयात भारत के कुल तेल आयात से बड़ा हो चुका होगा ! चुकि इलेक्ट्रोनिक्स निर्माता ना होने की वजह से भारत की इलेक्ट्रोनिक्स निर्यात की स्थिति नगण्य है जबकि पड़ोसी मुल्क चीन दुनिया के कुल इलेक्ट्रोनिक्स निर्यात का 30% निर्यात अकेले करता है !
            हालाकि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि इलेक्ट्रोनिक्स उदय के शुरुआती दिनों में भारत में इन कम्पोनेंट्स के मैन्युफैक्चारिंग को लेकर सरकारी स्तर पर कोई पहल बिलकुल नहीं हुई है ! इस दिशा में इलेक्ट्रोनिक्स उद्द्योग को बढ़ावा देने एवं मैन्युफैक्चारिंग तकनीक को विकसित करने के नजरिये से ही सरकार द्वारा सबसे पहले सन 1983 में सेमीकंडक्टर लैबरोटरी की स्थापना मोहाली  में की गयी थी ! इस प्रयोगशाला की स्थापना का उद्देश्य यही था कि शुरुआती दिनों में अनुसंधान कार्य होगा एवं आगे चलकर इसे ही मैन्युफैक्चारिंग हब के रूप में विकसित कर लिया जाएगा !  लेकिन फिलहाल ऐसा हुआ नहीं है और ना ही भविष्य में भी ऐसा होता दिख रहा है ! क्योंकि,बाद में आगे चलकर भारत सरकार द्वारा ही 1 मार्च 2005 को इस प्रयोगशाला को सुचना प्रौद्दोगिकी विभाग से हटाकर अंतरिक्ष अनुसंधान विभाग के अंतर्गत कर दिया गया एवं संस्था पंजीकरण अधिनियम के तहत इसका पंजीकरण करा दिया गया ! पंजीकरण के बाद इस संस्था के उद्देश्यों में  लिखित तौर यही बताया गया कि संस्था का मुख्य उद्देश्य माइक्रो-इलेक्ट्रोनिक्स के क्षेत्र
में अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देना है लेकिन सेमीकंडक्टर निर्माण को लेकर कुछ ठोस नहीं कहा गया ! इलेक्ट्रोनिक्स निर्माण उद्द्योग को सरकार द्वारा गंभीरता से ना लिए जाने की वजह से वैज्ञानिक स्तर के तमाम लोग जो मोहाली लैब से शुरुआत में जुड़े, आगे चलकर इस मुहीम को छोड़ दिये और निजी कंपनियों के साथ जुड़ गए ! कहीं ना कहीं इस पुरे मामले में इलेक्ट्रोनिक्स के उद्द्योग को बढ़ावा देने में सरकारी उदासीनता भी एक बड़ी वजह रही है !  फिलहाल भारत में कुल दो प्रयोगशालाएं चल रहीं हैं जो इलेक्ट्रोनिक अनुसंधान की दिशा में काम कर रहीं हैं, मगर मैन्युफैक्चारिंग के मामले में कहीं भी कोई पहल अभी ना के बराबर है ! इसी क्रम में हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इलेक्ट्रोनिक्स पुर्जों के मैन्युफैक्चारिंग को लेकर सरकार द्वारा हैदराबाद में एक सेमीकंडक्टर हब लगाने के लिए फैबसिटी के नाम से कोई योजना शुरू की गयी थी, जिसका उद्देश्य तमाम इलेक्ट्रोनिक्स सेमीकंडक्टर निर्माता कंपनियों की मदद से इलेक्ट्रोनिक्स उद्द्योग लगाना था ! लेकिन राजस्व एवं वित्तीय कारणों से इस पूरी योजना को ठप करना पड़ा ! परिणामत: एक बार और इस दिशा में निराशा ही हाथ लगी ! अगर कारणों की तहों को पलट कर देखें तो इस पुरे उद्द्योग की स्थापना करने एवं उत्पादन शुरू करने में जो सबसे बड़ी रुकावट आ रही है वो है वित्तीय अभाव अथवा फंड की कमी ! दरअसल वर्तमान परिस्थितियों में भारत सरकार द्वारा इस दिशा में प्रस्तावित बजट का बहुत बड़ा हिस्सा आयात एवं रिसर्च आदि में ही खर्च होता है, जबकि इस उद्योग की स्थापना के लिए हजारों एकड़ की जमीन के अलावा लगभग 400 बिलियन अमेरिकन डॉलर के निवेश की जरुरत है ! फिलहाल ठंढे बस्ते में जा चुके हैदराबाद के फैब सिटी प्रोजेक्ट के बाद अब सरकार ने भारत में सेमीकंडक्टर के मैन्युफैक्चारिंग उद्योग स्थापित करने का लक्ष्य 2020 तक का रखा है ! भारत सरकार की केबिनेट द्वारा हाल ही में इलेक्ट्रोनिक सिस्टम डिजाइन एंड मैन्युफैक्चारिंग(ESDM) को वित्तीय मदद देकर इस उद्द्योग को स्थापित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गयी है ! ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि अगर इस पुरे उद्द्योग को स्थापित करने में कामयाबी मिल जाती है तो भारत में कई तरह की संभावनाओं को बल मिलेगा ! इलेक्ट्रोनिक्स मैन्युफैक्चारिंग का बड़ा और महत्वपूर्ण फायदा यह है कि इससे भारत में रोजगार की असीम संभावनाओं के द्वार खुलेंगे ! अगर रोजगार के नजरिये से देखें तो भारत में रोजगार एक बड़ी समस्या की तरह है ! अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में श्रमिक उत्पादकता के अनुपात में रोजगार के अवसरों में भारी स्तर पर गिरावट हुई है ! सन 2004 से लेकर अबतक भारत में रोजगारों के अवसरों में 0.1% की मामूली बढोत्तरी दर्ज की गयी है जबकि बेरोजगारों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है ! ऐसे में इलेक्ट्रोनिक्स  मैन्युफैक्चारिंग उद्द्योग स्थापित होना एक परिवर्तनकारी कदम साबित हो सकता है ! इलेक्ट्रोनिक्स में रोजगार के लिहाज से देखें तो भारत में इलेक्ट्रोनिक्स मैन्युफैक्चारिंग लेवल पर रोजगार का दायरा बहुत छोटा और सीमित है ! अत: ज्यादातर इंजीनियर विदेशों की तरफ पलायन करने को मजबूर हैं एवं जो बाहर नहीं जा पा रहे वो भारत में व्यापक अवसर नहीं मिलने के कारण बेरोजगार की स्थिति में रहने को मजबूर हैं !    एक विदेशी कंपनी के साथ कई सालों से इलेक्ट्रोनिक्स इंडस्ट्री को करीब से देख रहे इलेक्ट्रोनिक्स प्रोफेसनल एम.टेक इन इलेक्ट्रोनिक्स शिवेश दुबे बताते हैं कि रोजगार के लिहाज से इस पुरे प्रोजेक्ट के स्थापित होने के बाद लगभग 2.8 करोंड़ लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तौर पर रोजगार का अवसर मिल सकता है एवं  भारत पर चीन जैसे प्रतिस्पर्धी देशों से होने वाले इलेक्ट्रोनिक्स आयात का बोझ कम होगा एवं भारत इलेक्ट्रोनिक्स निर्यात की दिशा में एक कदम आगे बढ़ सकता है ! अत: यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत अगर इलेक्ट्रोनिक्स कम्पोनेंट्स का निर्माता बन पाने में सफल होता है तो भारत में रोजगार को काफी बल मिलेगा !  हालाकि डॉलर के सामने मुह की खाती भारत की वर्तमान अर्थव्यवस्था, इस निवेश को अमली जामा पहने की स्थिति में हैं ऐसा बिलकुल नहीं लगता है ! लेकिन कारण जो भी हों लेकिन इस बात से तो किसी को गुरेज नहीं होनी चाहिए कि इलेक्ट्रोनिक्स की दिशा मैन्युफैक्चारिंग इंडस्ट्री के ना होने के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को दोहरी मार का सामना करना पड़ रहा है ! डॉलर के मुकाबले लागातर गिर रहे रुपये की कीमत का बड़े स्तर पर प्रभाव इलेक्ट्रोनिक्स के बाजार एवं आयात पर भी पड़ रहा है और इसका अप्रत्यक्ष वित्तीय नुकसान सरकार को ही उठाना पड़ता है !

      इस पुरे प्रोजेक्ट में सरकार का लक्ष्य 2020 तक 400 बिलियन अमेरिकन डॉलर के निवेश एवं टर्नओवर के साथ  इस पुरे उद्योग को भारत में स्थापित करने का है ! अगर सरकार अपने लक्ष्य में 2020 तक भी कामयाब हो जाती है तो निश्चित तौर पर यह सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री के अलावा इलेक्ट्रोनिक्स बाजार की दिशा में बड़ा और परिवर्तनकारी कदम होगा ! एकतरफ जहाँ हम इलेक्ट्रोनिक्स निर्माता होने के बाद आयात के इस जंजीर से मुक्त होकर दुनिया के तमाम विकसित एवं विकासशील देशों के साथ प्रतिस्पर्धा की कतार में खड़े होने की योग्यता हासिल कर पाने में सफल होंगे तो वहीँ रिसर्च एंड डेवलपमेंट की दिशा में और अधिक आत्मनिर्भर बनेंगे ! यह प्रोजेक्ट ना सिर्फ में भारत को इलेक्ट्रोनिक्स के क्षेत्र में विकसित करेगां बल्कि आर्थिक,सामाजिक,वैज्ञानिक,अंतरिक्ष अनुसंधान,रोजगार आदि की दिशा में व्यापक स्तर पर परिवर्तनकारी साबित होगा !  आज लाखों करोंड़ के आयात का बोझ झेल रहे देश को महज इलेक्ट्रोनिक्स का बड़ा बाजार होने की बजाय बड़ा उत्पादक भी बनना होगा ! अगर हम उत्पादक बनने की बजाय इसी तरह से  आयात के भरोसे चलते रहे  यह पूरा खेल देश की अर्थव्यवस्था पर प्रहार करता रहेगा और हमारी अर्थव्यस्था आदि में इसी तरह की विषम परिस्थितियां आती रहेंगी  ! प्राचीन काल में दुनिया को राह दिखाने वाले भारत को एक राह दुनिया से भी देखने की जरुरत है कि इलेक्ट्रोनिक्स को लेकर दुनिया की रफ़्तार क्या है और हम इतने कच्छप चाल से क्यों चल रहे हैं ? हम इलेक्ट्रोनिक्स का बाजार तो बहुत बड़ा खड़ा किये हैं लेकिन उत्पादक छोटे स्तर का भी नहीं बन पाए हैं ! हम जिस तरह से सॉफ्टवेयर उद्द्योग में तेजी से प्रगति कर रहे हैं उसी तरह से हार्डवेयर के क्षेत्र में भी आगे बढ़ना होगा,क्योंकि हार्डवेयर के मोर्चे पर बेहद लचर हैं ! इलेक्ट्रोनिक्स की दिशा में बाजार और उत्पादन के बीच का यह असंतुलन बेहद घातक और नुकसानदेय है ! जितनी जल्दी संभव हो इससे निजात पाना एवं आत्मनिर्भर होना जरूरी है !