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बुधवार, 6 मार्च 2013
मंगलवार, 5 मार्च 2013
वामपंथ की चुनौतियां और माणिक सरकार : दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित(6 मार्च-13)
अगर आप भूले ना हों तो अभी कुछ ही महीने पहले संपन्न हुए गुजरात चुनाव को सियासी गलियारों से लेकर मीडिया महकमे तक खूब चर्चा मिली और आज भी मोदी को केंद्रीय सियासत का चेहरा साबित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही ! लेकिन इसके ठीक विपरीत हाल ही में संपन्न हुए त्रिपुरा चुनाव में चौथी बार जीत दर्ज करने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के माणिक सरकार को लेकर ना तो सियासी चौराहों पर ही कोई खास चहल-पहल दिखीं है और ना ही मीडिया द्वारा ही ज्यादा कुछ इस चुनाव पर ज्यादा ध्यान दिया गया है ! हालाकि यहाँ मोदी बनाम माणिक पर बहस किये जाने की प्रासंगिकता बेशक नहीं हो लेकिन संघराज्य भारत के संदर्भ में त्रिपुरा बनाम गुजरात एवं वामपंथ बनाम मुख्यधारा की केंद्रीय राजनीति पर तो बहस होनी ही चाहिए ! लोकतांत्रिक चुनावी पद्धतियों के जिन मानकों के आधार पर गुजरात से तीसरी बार चुनकर नरेंद्र मोदी आते हैं उन्ही पद्धतियों से होकर त्रिपुरा से चौथी बार माणिक सरकार आते हैं ! समान लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से चुनकर आने के बावजूद केंद्रीय सियासत के विश्लेषकों का नजरिया दोनों को लेकर अलग-अलग है ! यहाँ गुजरात बनाम त्रिपुरा की बात करना इसलिए भी जरूरी लगता है क्योंकि पिछले कार्यकाल की अपेक्षा अपनी पार्टी को एक सीट कम दिला पाने वाले नरेंद्र मोदी को बड़े ही नाटकीय ढंग से केंद्रीय सियासत का सबसे चर्चित चेहरा बनाकर पेश किया जाता है ! वहीँ रिकोर्ड सीटों के साथ चौथी बार बहुमत में आने वाली इस वामपंथी सरकार के सबसे गरीब मुख्यमंत्री का नाम मीडिया के लिए कोई मुद्दा नहीं बन पाता है ! इस बात को खारिज नहीं किया जा सकता है कि त्रिपुरा भारत का ही एक राज्य है और वहाँ भी इसी लोकतंत्र का जनमत रहता है, एवं अपनी जनसँख्या के अनुपात में राजनीति में उस भूभाग की भागीदारी भी उतनी ही है जितनी किसी अन्य राज्य की ! ऐसे में सवाल ये है कि आखिर एक राज्य की विधानसभा चुनाव जिसमे एक अलग तरह की पारम्परिक विचारधारा को भारी जनादेश मिला हो,को देश की राजनीति में इतने हल्के में क्यों लिया गया ! ऐसा भी नहीं है कि इस देश में वामपंथ अपवाद है या यहाँ से वामपंथ की जड़ें पूरी तरह से उखड चुकी हैं ! हाँ, इतना जरूर है कि आजादी के बाद से लागातार वामपंथ की जड़े बहुत हद तक कमजोर जरुर हुई हैं ! पश्चिम बंगाल की करारी शिकस्त एवं दक्षिण भारत के राज्य केरल में अपना जनादेश गंवा चुकी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पास खोने और सजोने के लिए त्रिपुरा ही शेष बचा है ! उत्तर भारत के राज्यों आज वामपंथ की लहर बेशक कहीं नही दिखती हो लेकिन पचास और साठ के दशक वाले इतिहास के पन्ने इस बात के गवाह हैं कि आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में वामपंथी जनाधार उत्तर भारत के तमाम राज्यों में भी बढ़-चढ़कर था और उत्तर-प्रदेश एवं बिहार जैसे राज्यों में भी हंसिया वाले लाल-पताका लिए लोग लाल-सलाम करते आसानी से दिख जाते थे ! उस दौर में जब जनसंघ का लोकतांत्रिक जनाधार एक या दो सीट पर सिमट रहा था और लोहिया का समाजवाद भी अभी लगभग सुसुप्त ही था तब लाल-सलाम के नारे अक्सर चरखा का विरोध करते मजदूरों की आवाज बुलंद कर रहे थे ! लेकिन आज सियासत का स्वरुप और जनाधार की मानसिकता दोनों में व्यापक बदलाव आ चुका है ! आज उत्तर भारत के हिन्दी भाषी राज्यों में लाल सलाम का ना ही कैडर ही सशक्त है और ना ही उसका कोई सियासी जनाधार ही कायम रह पाया है ! आज लोहिया का समाजवाद यू.पी के तख़्त पर ताजपोशी कर रहा है तो जनसंघ केंद्रीय राजनीति में सत्ता से विपक्ष तक की भूमिका में नजर आ चुका है ! अपने पुख्ता जनाधार वाले दो राज्यों में सत्ता खो चुकी मार्क्सवादी पार्टी के लिए त्रिपुरा चुनाव भले ही सुकुन देने वाला रहा है लेकिन वर्तमान परिवेश में राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथ के समक्ष कई तरह की चुनौतियाँ भी उत्पन्न हुईं हैं ! विश्व के मजदूरों को एक मंच पर लाने का आह्वान करने वाले कार्ल मार्क्स के पथों पर चलते-चलते भारतीय वामपंथ में हुए इस राजनैतिक बिखराव के मायनों को समझने की जरुरत है ! जिस धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक समानता के उद्देश्यों को मजदुर बनाम पूँजीवाद का स्वरुप देकर संघर्ष करने की कोशिशे भारतीय वामपंथियों द्वारा की गयी उसका लाभ अन्य राजनीतिक दलों को मिला ! आजाद भारत के शुरुआती दिनों में कांग्रेस को सवर्णों एवं पूजीपतियों की पार्टी बताकर निचले तबके के मजदुरों को एकीकृत करने का नारा वामपंथी दलों द्वारा दिया गया था उसका लाभ यू.पी में कभी मायावती का बहुजन तो कभी मुलायम का समाजवाद लेता दिख रहा है ! धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों वाले संघर्षों को बीजेपी बनाम कांग्रेस ने धुल धसरित कर दिया ! भारतीय राजनीति में वामपंथ के प्रति लागातर कम हुए राजनैतिक आकर्षण के तमाम कारणों में सबसे बड़ा कारण यह है कि यह भारतीय मजदूर वर्ग को पूँजीवाद के खिलाफ एकीकृत कर पाने में नाकामयाब रहा ! इस नाकामयाबी का सबसे बड़ा कारण यह है कि भारतीय समाज अन्य मुल्कों की अपेक्षा अत्यधिक राष्ट्रवादी भावना से ओत-प्रोत है क्योंकि हजारों साल गुलामी के बाद आजादी के संघर्षों एवं बलिदानों के इतिहास ने यहाँ के आम आदमी तक को राष्ट्रनिष्ठ ज्यादा बनाया बजाय कि पूंजीवादी संघर्षों के तरफ ले जाने के ! राष्ट्रवादी मानसिकता का विकास होने की वजह से परम्पराओं, धरोहरों एवं संस्कृति के प्रति अनोखी निष्ठां भी इस मुल्क में अधिकाधिक रही जिससे मार्क्सवादी उद्देश्यों को काफी हद तक नुकसान हुआ है ! दरअसल, वामपंथी विचारक अथवा प्रचारक इस बात को समझने में चूक कर गए कि कोई भी विचारधारा राजनैतिक रूप से तभी समृद्ध हो पायेगी जब वो उस आवाम के परम्पराओं एवं संस्कृतियों के अनुरूप खुद में बदलाव लाने को लेकर उदार हो !भारतीय समाज में ईशनिंदा कभी भी स्वीकार्य नहीं थी लेकिन वामपंथ ने ईशनिंदा पर खुद को कायम रखा जो कि उसके लागातार हो रहे पतन का तमाम कारणों में से एक कारण कहा जा सकता है ! एक राष्ट्र जहाँ राष्ट्रवाद हर वर्ग हर तबके के खून में समाया हो वहाँ अगर राष्ट्रीयता के मूल्यों को दरकिनार कर कोई सियासी फार्मूला तय किया जाएगा तो उसकी सफलता की गुंजाइश अत्यंत कम रहती है ! यहीं कारण है कि मजदुर वर्ग की लड़ाई को ही जातिगत वर्गीकरण के आधार पर लड़ते हुए बसपा और सपा सरीखे दल राजनीतिक रूप से ज्यादा जनाधार बना पाने में कामयाब रहे ! हमें सियासत के इस तकनीकी पहलू पर गौर करना चाहिए कि जिस वर्ग की लड़ाई वामपंथ द्वारा आजादी के शुरुआती दशक में लड़ी का रही थी कमोबेश उसी वर्ग की लड़ाई लड़कर आज के क्षेत्रीय दल केंद्रीय सियासत में भागीदारी कर रहे हैं ! आज जब मोदी का नाम माणिक सरकार पर भारी पड रहा है तो यह शिकायत वाजिब है और सियासत एवं मीडिया के दोहरापन पर शिकायत होनी भी चाहिए ! लेकिन इस बात को कैसे खारिज किया जाय कि कहीं ना कहीं वामपंथ अपनी विचारधारा को जनता से जोड़ पाने में लगातार नाकामयाब रहा जिससे उसका राजनीतिक महत्व कम होता गया परिणामत: मुख्यधारा की केंद्रीय राजनीति में उसकी भूमिका लगातार अप्रासंगिक होती गयी ! आज मजदुर खुद ही वर्गीकृत हो गया है और वो अपने अपने स्तर पर अलग-अलग तरह के संघर्ष करता नजर आ रहा जबकि उसे एकीकृत होना चाहिए था ! इससे हास्यपद बात और भला क्या हो सकती है कि वेतन बढ़ाने के मजदूरों के संघर्षों को पूँजीवाद के खिलाफ संघर्ष के तौर पर देखा जा रहा है ! आज वामपंथ खुद ही बहुविचारों में बट चुका है ऐसे में जबतक वो केंद्रीय सियासत में अपनी प्रभावी भूमिका नहीं कायम कर पायेगा उसका बहुत विकास संभव नहीं है ! माणिक सरकार द्वारा दिलाई गयी इस जीत से इस वामपंथी दल को हौसला जरुर मिला होगा मगर चुनौतियाँ अभी बड़ी हैं !
शिवानन्द द्विवेदी सहर
सोमवार, 4 मार्च 2013
मोदी को लेकर मुगालते में भाजपा : दैनिक जागरण में प्रकाशित (5 मार्च)
लोकसभा चुनाव जितना ही नजदीक आ रहा है, भाजपा का सियासी पारा उतना ऊपर उठता दिख रहा है। शायद यह पहली बार ही है कि राजनीतिक उद्देश्यों से नरेंद्र मोदी ने एक महीने के अंदर दूसरी बार दिल्ली का रुख किया गया हो। अगले लोकसभा चुनावों की रणनीतियों को तय करने लिए भाजपा द्वारा आयोजित राष्ट्रीय परिषद का महाअधिवेशन पूरी तरह से मोदी पर केंद्रित रहा और पार्टी अध्यक्ष से लेकर सभी बड़े नेता नमो नम: का जाप करते दिखे। कार्यक्रम के दौरान पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने जिस तरह से मोदी का महिमा मंडन किया, वह इस बात का संकेत है कि भाजपा भी बतौर प्रधानमंत्री मोदी की दावेदारी को लेकर अब काफी हद तक खुलकर बोलने लगी है। हालांकि इस कार्यक्रम के दौरान मंच से ऐसा कुछ भी नहीं बोला गया, जिससे इस बात की पुष्टि हो जाए कि नरेंद्र मोदी आगामी चुनाव में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। मगर पूरे कार्यक्रम के दौरान मोदी को कार्यकर्ताओं और पार्टी नेताओं द्वारा जो तवज्जो दी गई, उस आधार पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा के सबसे वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की भूमिका अब पार्टी संरक्षक की होगी, न कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की। आज मोदी भले ही भाजपा का सबसे चर्चित चेहरा बन चुके हैं, मगर ये मोदी समर्थकों के अंध उत्साह के अलावा कुछ भी नहीं है कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर मोदी को आगे खड़ा कर देने मात्र से भाजपा बहुमत में आ जाएगी या सरकार बना लेगी। मोदी के नाम पर अगर भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव लड़ती है तो उसके तमाम फायदे भी होंगे और तमाम नुकसान भी। हमें इस बात को समझना होगा कि लोकतंत्र में सरकार संख्या बल से बनती है, न कि नारेबाजी और हो-हल्ला मात्र से। संख्या बल जुटा पाने की क्षमता को नजरंदाज कर मोदी मंत्र का जाप करना सिवाय ख्याली पुलाव पकाने के कुछ भी नहीं है। कार्यकर्ताओं को यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि जिन मोदी का नाम लेकर वह मोदी की छवि का राष्ट्रीयकरण कर रहे हैं, उन्हीं मोदी को इसी गुजरात विधानसभा चुनाव में पिछली बार के मुकाबले एक सीट कम पर संतोष करना पड़ा है। मोदी को सारथी बनाकर रथ हांकने वाली भाजपा के समक्ष प्रमुख सवाल यह है कि मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनाए जाने मात्र से भाजपा कहां-कहां लाभ ले सकती है और कहां-कहां उसे नुकसान झेलना पड़ सकता है? इन सवालों के आधार पर मोदीमय होती जा रही भाजपा की चुनावी कसरत के निहितार्थ को समझने का प्रयास करें तो इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है कि औपचारिक रूप से मोदी का नाम आगे आते ही कांग्रेस मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण करने का प्रयास कर सकती है। अगर यह समीकरण यूपी जैसे राज्यों में बन गया तो भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। मोदी के आने से भाजपा के अंदरूनी समीकरण भी डगमगाने का खतरा है, जो सियासी नजरिये से चुनाव के ठीक पहले नाकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। पिछले डेढ़ दशक में केंद्रीय राजनीति में सत्ता तक पहंुचने में घटकों के सहयोग का व्यापक प्रभाव देखा जा रहा है और वर्तमान राजनीतिक समीकरण ऐसे बन चुके हैं कि बिना मजबूत घटकों के सहयोग से सरकार किसी की बनती नहीं दिख रही है। ऐसे में गठबंधन के नजरिये से मोदी का नाम भाजपा के लिए कितना माकूल है, इसका मूल्यांकन करना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है। वर्तमान सियासी परिस्थितियों में गठबंधन के नजरिये से कांग्रेस की स्थिति पहले से ही भाजपा से बेहतर है, जबकि मोदी के आने के बाद भाजपा को सबसे ज्यादा खतरा गठबंधन टूटने को लेकर है। केंद्रीय राजनीति में आज जब सत्ता तक पहंुचने के लिए गठबंधन को मजबूत करने पर बल दिए जाने की बात की जाती रही है, ऐसे में अगर भाजपा अपने गठबंधन में नए घटकों को नहीं जोड़ पाती है या वर्तमान गठबंधन को कायम नहीं रख पाती है तो उसके लिए सत्ता की राह दूर की कौड़ी साबित होगी। गुजरात में विकास पुरुष की छवि रखने वाले नरेंद्र मोदी अगर विकास के नाम पर गुजरात चुनाव में ही पिछली बार के मुकाबले बढ़त नहीं हासिल कर पाए तो उनसे विकास के नाम पर देश में भाजपा को बढ़त दिलाने की उम्मीद करना भरोसे का सियासी कार्ड प्रतीत नहीं होता। जहां तक मोदी के हिंदुत्व वाली छवि की बात है तो शायद भाजपा और मोदी दोनों के लिए ही यह मुद्दा बेशक सीटें बढ़ाने वाला हो जाए, लेकिन इस मुद्दे के आधार पर कोई भी ऐसा समीकरण नहीं दिख रहा, जो भाजपा को सत्ता के गलियारों तक ले जा सकता है।
शिवानन्द द्विवेदी सहर
रविवार, 3 मार्च 2013
भाषाई साम्रज्यवाद के खतरे : राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित(3 मार्च -13)
एक भाषा को बोलने वाला समाज जब किसी अन्य भाषा का अनुसरण करने वाले समाज के संपर्क में आता है तो दोनों के बीच पहला आदान- प्रदान भाषा का ही होता है। यानी अलग-अलग भाषाओं वाले समाजों के बीच सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक या अन्य किसी भी प्रकार के समन्वय को व्यवहार में लाने के लिए प्राथमिक तौर पर भाषाओं के बीच का समन्वय अनिवार्य होता है। भाषाओं के समन्वय में शब्दों के आदान-प्रदान की संभावना सर्वाधिक होती है क्योंकि किसी भी भाषा को समझने के लिए उसके शब्दों को समझना जरूरी है। भाषाई इतिहास को पलटें तो काफी हद तक यह बात सही प्रतीत होती है कि शब्दों के आदान-प्रदान के क्रम में वही भाषा भौगोलिक दृष्टि से ज्यादा व्यापक व समृद्ध बन पाई है जिसने अपने शब्दों का वर्चस्व बड़े भूभाग पर कायम रखने में सफलता हासिल की है। इस बात को सिरे से कतई खारिज नहीं किया जा सकता है कि समय और वैश्विक विकास के समानांतर भाषाओं के बीच का अंतर्सघर्ष भी दशकों पूर्व शुरू हो चुका है। साम्राज्यवाद के शुरु आती दौर में दुनिया की साम्राज्यवादी ताकतों ने यह बात मान ली थी कि किसी भी भू-भाग पर साम्राज्य विस्तार के लिए उनकी भाषाओं का विस्तार भी जरूरी है। हालांकि एक समाज के दूसरे समाज में जाने से भाषाओं एवं शब्दों का आदान-प्रदान स्वत: संचालित प्रक्रिया भी है जो भाषाई विकास की दृष्टि से ठीक भी कही जा सकती है क्योंकि शब्द आदान-प्रदान की स्वत: होने वाली प्रक्रिया में किसी भी भाषा के मूल शब्दों के गौण होने का खतरा नहीं रहता है, बेशक नए शब्द स्वीकार कर लिए जाएं। इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि भाषा की सम्पन्नता एवं समृद्धि के लिए अगर अनिवार्य हो जाए तो अन्य भाषाओं के शब्दों को स्वीकार किया जाना चाहिए, क्योंकि शब्दों के अभाव में भाषा विपन्न सी नजर आती है। भौगोलिक दृष्टि से भाषा के विस्तार के लिए भी शब्दों का संतुलित एवं अनुशासित आदान-प्रदान जरूरी है ताकि शब्दों की समृद्धि के साथ-साथ भाषा को भी व्यापक बनाया जा सके। हालांकि दो या दो से अधिक भाषाओं के बीच शब्दों के आदान-प्रदान की स्वत: चलने वाली प्रक्रिया को भाषाई साम्राज्यवाद ने काफी हद तक नुकसान पहुंचाया है। उदाहरण के लिए पश्चिमी व यूरोपीय साम्राज्यवाद के दौर में भाषाएं भी काफी प्रभावित हुईं। साम्राज्यवाद के स्वर्णिम दौर में साम्राज्यवादी राष्ट्र जहां भी गये, अपनी भाषा का प्रभाव अन्य भाषाओं को बोलने वाले समाज पर इस कदर छोड़ आये कि उसे महज भाषाई आदान-प्रदान कहना तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता। कहीं न कहीं उनकी भाषा ने समाज को प्रभावित किया, साथ ही उस समाज अथवा भू-भाग की मूल भाषा को भी अंशत: ही सही, लेकिन प्रभावित करने में सफलता पायी। भाषाई साम्राज्यवाद का असर जिस समाज अथवा भूभाग पर दिखा, उसकी पारंपरिक भाषा को प्रभावित करने अथवा उस भाषा में बेवजह घुसपैठ करने की कोशिश की गयी जो समय के साथ विकसित ही हो रही है। बेशक आज न वो साम्राज्यवाद है और न ही उन साम्राज्यवादी ताकतों का शासन लेकिन उनके द्वारा स्थापित भाषाई साम्राज्यवाद का प्रभाव या कुप्रभाव आज भी न सिर्फ देखने को मिल रहा है बल्कि त्वरित गति से विकसित भी हो रहा है। इस संदर्भ में यह आंकड़ा उल्लेखनीय है कि एक अनुमान के मुताबिक समूची दुनिया में लगभग पांच हजार के आस-पास बोली-भाषाएं चलन में रही हैं। लेकिन वर्तमान में इन पांच हजार भाषाओं में से लगभग तीन हजार से ज्यादा विलुप्त होने की कगार पर हैं या विलुप्त हो चुकी हैं। इसी आंकड़े का दूसरा पहलू यह भी है कि वर्तमान में पूरी दुनिया में लगभग पांच सौ भाषाएं ऐसी हैं जो विभिन्न भूभागों में सशक्त रूप से प्रयोग में लाई जा रही हैं और इनमे से लगभग दो सौ की अपनी लिपि न होने बावजूद वे काफी प्रचलित हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर के भाषाई मानकों के आधार पर भूभागीय दृष्टिकोण से बोली जाने वाली भाषाओं की संख्या भी लगातार कम होती जा रही है और कुछ गिनी- चुनी भाषाओं का ही बोल-बाला बढ़ता जा रहा है, जो तमाम भाषाओं के विकास की दृष्टि से ठीक नहीं कहा जा सकता। तीन हजार के आस-पास विलुप्त हो रही भाषाओं के संदर्भ में यह भी गौर करना जरूरी है कि विलुप्त हो रही इन भाषाओं को बोलने वाला समाज आज अन्य भाषाओं को स्वीकार कर चुका है, जबकि उस समाज की मूल पारंपरिक भाषा विलुप्त होने के कगार पर है। दुनिया में बढ़ते अंग्रेजी सहित कुछ अन्य अंतरराष्ट्रीय भाषाओं के वर्चस्व एवं उन भाषाओं द्वारा अन्य भाषाओं में की जा रही घुसपैठ के नजरिये से अगर हिन्दी को देखें तो आदान-प्रदान का भारी असंतुलन नजर आता है। शब्दों का एक संतुलित आदान-प्रदान किन्हीं दो भाषाओं के लिए स्वीकार्य हो सकता है। मगर यदि शब्दों के आदान-प्रदान में असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होने लगे तो यह उस भाषा के लिए नुकसानदायक सिद्ध हो सकता है जिस भाषा ने शब्दों का निर्यात, आयात के अनुपात में कम किया हो। दो भाषाओं के बीच शब्दों के आयात और निर्यात का संतुलन ही शब्द आदान-प्रदान कहलाता है, जबकि यदि इनके बीच असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होने लगे तो एक भाषा का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। आज हिन्दी में सहजता से प्रयुक्त हो रहे अंग्रेजी भाषा के शब्दों को देखा जाय तो तमाम शब्द ऐसे मिलेंगे जो मुख्यधारा की हिन्दी में तो शामिल हो चुके हैं लेकिन हिन्दी के विकास की दृष्टि से उनका कोई ठोस औचित्य नहीं नजर आता। उल्लेखनीय होगा कि हिन्दी में अन्य भाषा के शब्दों को मुख्यधारा के शब्द के तौर पर शब्दकोश में जगह देने या उनके प्रयोग करने से पहले भाषाई अनुशासन का पालन करना अनिवार्य होना चाहिए। इस बात का खास ख्याल रखा जाना चाहिए कि जिस शब्द को हम हिन्दी की मुख्यधारा के शब्द के रूप में स्वीकार कर रहे हैं, हिन्दी को उसकी जरूरत कितनी है और क्या उस शब्द के लिए हमारी भाषा में कोई पर्याय शेष नहीं बचा है? अंग्रेजी के शब्दों की धड़ल्ले से हिन्दी में हो रही घुसपैठ इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि, हम बड़ी सहजता से अंग्रेजी के शब्दों का अपने वाक्य संरचना में हिन्दीकरण कर दे रहे हैं जिस वजह से उस शब्द का हिन्दी भाषा में पर्यायवाची शब्द गौण होता जा रहा है ! उदाहरणार्थ, अगर हिन्दी के विद्यालय शब्द को देखें तो इसकी स्थिति ‘स्कूल’ शब्द के समक्ष नाजुक प्रतीत होती है। जिस तरह स्कूल शब्द को वाक्य संरचना में स्कूल या स्कूलों की तरह बनाकर हिन्दीकरण किया जा रहा है, इसे विद्यालय या पाठशाला जैसे हिन्दी के पारंपरिक शब्दों को विलुप्त करने की शुरुआती कवायद के रूप में देखा जा सकता है। मुख्यधारा की हिन्दी में विद्यालय शब्द की मौजूदगी में स्कूल शब्द का हिन्दीकारण होना शब्द आदान- प्रदान नहीं, बल्कि भाषाई घुसपैठ का नमूना मात्र है। इसमे दो राय नहीं कि जिस अनुपात में हम अंग्रेजी शब्दों को हिन्दी की मुख्यधारा में ला रहे हैं, उस अनुपात में हिन्दी के शब्द अंग्रेजी की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पा रहे हैं। अंग्रेजी अपने भाषाई अनुशासन के अंतर्गत ही शब्दों के आयात को स्वीकार करती है और सिर्फ उन्ही वाह्य भाषा के शब्दों को लेती है जिनके पर्याय अंग्रेजी में उपलब्ध नहीं है, जैसे ‘साड़ी।’ साड़ी जैसा परिधान क्योंकि उस समाज की परंपरा या संस्कृति का हिस्सा नहीं है इसलिए उसके लिए वहां उसका पर्यायवाची नहीं है लिहाजा जरूरत के मुताबिक उसे प्रयोग में लाना उसकी मजबूरी है। हिन्दी और अंग्रेजी के बीच के भाषाई आदान-प्रदान के असंतुलन को गंभीरता से लेने की जरूरत है। हमारे भाषाविदों व साहित्यकारों को शब्द चयन के प्रति अत्यधिक उदार होने की बजाय भाषा के प्रति अनुशासित होने की जरूरत है। सहजता व उदारता के अन्ध उत्साह में कहीं न कहीं हिन्दी की क्षति हो रही है और अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ रहा है। इस विषय पर खुली बहस की जरूरत है और हिन्दी में शब्दों के आदान-प्रदान में अनुशासन का दायरा निर्धारित करने की जरूरत है। विलुप्त हो रही भाषाओं से सबक लेते हुए हिन्दी को पुन: परिभाषित किये जाने और अनुशासन के दायरे में समेटने की जरूरत पर बल दिया जाना चाहिए। अगर हिन्दी अपने मूल स्वरूप और पारंपरिक शब्द खोती जाएगी तो कहीं अंतरराष्ट्रीय भाषा बनने की बजाय महज बोली में न सिमट जाए। शिवानंद द्विवेदी |
शुक्रवार, 1 मार्च 2013
पिछले बजट के क्या हासिल : दैनिक जागरण में प्रकाशित लेख
देश के कुल आय-व्यय का लेखा जोखा प्रस्तुत किए जाने वाले इस सालाना बजट को परंपराओं में भले ही आम बजट कहा जाता रहा है, लेकिन हमेशा से इस बजट ने देश की आम जनता को निराश ही किया है। 28 फरवरी को पेश किए गए इस आम बजट में सरकार द्वारा आम जनता के हितों में की गई घोषणाओं की व्यावहारिकता को तो अभी देखना बाकी है, लेकिन सवाल यह भी है कि पिछले साल सरकार द्वारा पेश किए गए आम बजट के निर्धारित लक्ष्यों को कहां तक प्राप्त किया जा सका है। भारतीय संसदीय व्यवस्था में जितनी बहस वर्तमान में पेश हुए बजट को लेकर होती है, उतनी बहस पिछले बजट की समीक्षा एवं उसकी उपलब्धियों या खामियों को लेकर नहीं होती। हर साल फरवरी-मार्च महीने में आम जनता, किसान, मजदूर, छोटे-बड़े व्यापारियों सहित तमाम नौकरी पेशे वाले लोग बजट की राह ताकते हैं कि शायद इस बार उनके ऊपर भी उनकी चुनी सरकार मेहरबान हो जाए और उन्हें कुछ राहत मिले। इसी आस और विश्वास की उधेड़-बुन में वे भूल जाते हैं कि पिछली बार के बजट में इसी सरकार ने उनके लिए क्या दिया था, कितना दिया था और उनको कितना मिला। इस बात से तो कतई इन्कार नहीं किया जा सकता कि आम जनता के लिए सिरदर्द बन चुकी महंगाई के कारण तमाम क्षेत्रों में आए भारी असंतुलन को दूर कर पाने में अब तक के सारे बजट बौने साबित हुए हैं। पहली पंचवर्षीय योजना से लेकर अब तक की बारहवीं पंचवर्षीय योजना तक हर एक योजना में कृषि को महत्वपूर्ण जगह दी गई और हर साल कृषि बजट में इजाफा किया गया। इसके बावजूद कृषि का स्तर सुधरने की बजाय लगातार अपने अवसान की तरफ जाता दिख रहा है। कृषि के क्षेत्र में पिछले वर्ष के बजट में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत 9,270 करोड़, द्वितीय हरित क्रांति के नाम पर एक हजार करोड़, कृषि ऋण के नाम पर 5,75,000 करोड़, सिचाई योजना के नाम पर तुलनात्मक वृद्धि के साथ 14,270 करोड़ रुपये का बजट पेश किया गया था। लेकिन बजट के कागजों में लुटाया गया यह धन आज तक किसानों की किसानी को चमकदार बना पाने में कामयाब नहीं हो पाया है। फिर इस बार इस बजट से कैसे उम्मीद करें!
मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013
बाल तस्करी के नेटवर्क को ध्वस्त कीजिये : अमर उजाला में प्रकाशित लेख
कहाँ गुम हो रहे नौनिहाल
शिवानन्द द्विवेदी
जनसमस्याओं से बेपरवाह सरकारें जब मनमानी करने लगती हैं तो कई बार न्यायालय को सरकार के कार्यों में हस्तक्षेप करने को मजबूर होना होना पढ़ता है ! बच्चों पर काम करने वाली एक गैर सरकारी संस्था द्वारा भारी संख्या में लापता हो रहे बच्चों के संदर्भ में दाखिल एक याचिका की सुनवाई करते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायलय द्वारा केन्द्र एवं राज्य सरकारों को इस मामले में गंभीर कदम उठाने के साथ-साथ जल्द ही तय सीमा के अंदर प्रगति स्टेट्स रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया था ! तय सीमा बीत जाने के बावजूद सर्वोच्च न्यायलय के निर्देशों की अवहेलना करते हुए किसी भी राज्य की सरकार द्वारा इस मामले में गंभीरता नहीं दिखाई गयी ! यहाँ तक कि कई राज्यों के सरकारों के सचिव कोर्ट की नोटिस को ताक पर रखते हुए पेशी के दौरान हाजिर तक नहीं हुए ! परिणामत:, नौनिहालों के मसले पर हीला-हवाली का रुख अख्तियार कर रहीं सभी सरकारों के खिलाफ सख्त होते हुए सुप्रीम कोर्ट को यहाँ तक कहना पड़ा कि इस गंभीर समस्या के प्रति काम करने वाले लोगों के बीच आपसी समन्वय ही नहीं है और इसी वजह से वो अपनी जवाबदेही से कतराते नजर आ रहे हैं ! नौनिहालों के मामले में सर्वोच्च न्यायलय तक के निर्देशों की उपेक्षा कर रही सरकारों से देश के नौनिहालों के सुरक्षित भविष्य की अपेक्षा रखना आसमान में पौधे उगाने जैसा लगता है ! लापता बच्चों के मामले में जारी हुए तमाम आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि पिछले कुछ सालों में लापता हुए बच्चों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है ! पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर नजर डाले तो पिछले एक साल में लगभग साठ हजार की संख्या में सिर्फ उन लापता बच्चों का आंकड़ा उपलब्ध है जिनके गुमशुदगी का मामला थाने में प्राथिमिकी के तौर पर दर्ज किया गया है ! इसके अलावा हजारों कि संख्या में वो बच्चे भी हैं जो लापता तो हैं मगर ना तो आंकड़ों के ग्राफ में दिख रहे हैं और ना ही उनके मामलों का कोई पुलिस रिकॉर्ड ही मौजूद है ! इन्ही आंकड़ों में 2008 से 2010 के बीच लापता हुए बच्चों की संख्या लगभग 1 लाख 20 हजार के आस-पास बताई गयी है जबकि वास्तविक आंकड़े इससे बहुत ज्यादा होने की संभावना तमाम संस्थाओं द्वारा जताई जा चुकी है ! सरकारी फाइलों में दर्ज 2008 से 2010 के बीच के लापता बच्चों में से बेशक तमाम बच्चों का पता लगाया जा चुका है लेकिन फिर भी 45000 के आस-पास वो बच्चे हैं जिनके बारे में अभी तक पुलिस द्वारा कोई जानकारी नहीं जुटाई जा सकी है और उन बच्चों का नाम अभी भी लापता बच्चों की सूची में ही दर्ज हैं !
सरकार की बेपरवाही का दंश झेल रही बच्चों की गुमशुदगी की इस समस्या से उत्पन्न होने वाले परिणामों के प्रति अगर संजीदगी से सोचा जाय तो अनेक तरह के ऐसे सामाजिक समस्याओं के उत्पन्न होने का खतरा नजर आता है जो स्वस्थ एवं सुरक्षित समाज के नजरिये से बेहद चिंताजनक है !इस पुरे मामले में तमाम ऐसे सवाल हैं जो ना सिर्फ बच्चों कि जिंदगी मात्र से जुड़े हैं बल्कि इन सवालों के तमाम सामाजिक मायने और महत्व भी हैं ! यहाँ सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि आखिर भारी संख्या लापता हो रहे ये बच्चे जा कहाँ रहे हैं ? सवाल ये भी उठता है कि आखिर पिछले कुछ सालों से गुमशुदगी के मामलों में भारी इजाफा क्यों हो रहा है ? इन सवालों के साथ-साथ यह सवाल भी कायम है कि कहीं बच्चों की गुमशुदगी के पीछे तमाम तरह की बड़ी आपराधिक वारदातों को अंजाम तो नहीं दिया जा रहा ? इन सवालों के संदर्भ में इस बात की संभावना सबसे प्रबल है कि गुमशुदगी के अधिकतम मामले समाज के आपराधिक तत्वों द्वारा अंजाम दिये जाते हैं ! इस बात को कतई खारिज नहीं किया जा सकता कि समाज में आपाराधिक तत्वों का एक बड़ा नेटवर्क बच्चों को अलग-अलग गलत उद्देश्यों में निहित कार्यों के लिए गायब करने में सक्रिय है ! ऐसे आपराधिक तत्वों द्वारा जिन प्रमुख कार्यों में लापता किये गए बच्चों का इस्तेमाल किया जा रहा है उनमे बाल-तस्करी, दूर-दराज के क्षेत्रों में बाल-मजदूरी एवं साथ ही साथ अंगों की तस्करी सहित यौन शोषण आदि प्रमुख हैं ! इसके अलावा इन्ही लापता बच्चों को आपराधिक कार्यों के लिए प्रशिक्षित कर इनका दुरपयोग भी किये जाने की संभावना से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है ! लापता बच्चों के मामलों में फिरौती के लिए अपहृत बच्चों से ज्यादा उन बच्चों की तादाद है जिनकों अन्य उद्देश्यों से अगवा किया जाता रहा है ! फिरौती के लिए अपहृत बच्चों को या तो अपराधिक तत्वों द्वारा जान से मार दिया जाता है या फिरौती आदि मिल जाने पर सही सलामत छोड़ दिया जाता है ! हालाकि फिरौती के कई मामलों में पुलिस आदि की भूमिका सराहनीय भी होती है ! लेकिन बाल-तस्करी एवं अंग-व्यापार सहित यौन-शोषण के उद्देश्यों से अगवा किये गए बच्चों के मामलों में पुलिस प्रशासन नाकामयाब ही साबित हुआ है जबकि इन बच्चों के साथ तो और बुरा बर्ताव हो रहा है ! कहीं ना कहीं सरकारी नियंत्रण की लचरता से मनबढ़ हो रहे इन आपराधिक तत्वों का हौसला इतना बुलंद हो चुका है कि इनके मन में क़ानून और प्रशासन का बिलकुल भी खौफ नहीं है ! लापता बच्चों के मसले पर प्रशासन की लचरता का नतीजा ही है कि प्रत्येक साल लापता बच्चों का ग्राफ और ज्यादा ऊँचा होता जा रहा है !
लापता हो रहे बच्चों के कारण उत्पन्न होने वाले सामजिक दुष्परिणामो को अगर समझने का प्रयास करें तो इससे एक तरफ जहाँ आपराधिक प्रवृतियों को बढ़ावा मिलता नजर आ रहा है वहीँ देश के भावी कर्णधार कहे जाने वाले मासूमो का बचपन एवं भविष्य दोनों हाशिए पर जाते दिख रहे हैं ! सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि अपराधियों द्वारा लापता किये गए बच्चों को अगर मार दिया जा रहा है तो सामाजिक तौर इससे जघन्य अपराध भला और क्या हो सकता है ! वहीँ दूसरी चिंता इस बात की भी है कि जिन बच्चों को गलत कार्यों में धकेला जा रहा है और वो अपराधिक गतिविधियों में सक्रिय हो रहे हैं जिससे समाज में अपराध का बोलबाला कायम हो रहा ! समाज के भावी कर्णधारों को अगवा कर जिन उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है वो समाज एवं देश के वर्तमान एवं भविष्य दोनों के लिए खतरे का संकेत है ! कहीं ना कहीं प्रशासन की लचरता एवं इस गंभीर समस्या के प्रति सरकार की असंवेदनशीलता का नतीजा है कि ये आपरधिक गतिविधियां समाज में सक्रिय हो रहीं हैं ! बच्चों के भविष्य के साथ-साथ दाव पर समाज के भविष्य पर भी हमारी सरकार सिवाय टाल-मटोल करने के कुछ भी सकारत्मक करती अभी तक नजर नहीं आ रही है ! ना तो इसके लिए कोई नीतिगत निर्देश ही जारी किया गया है और ना ही इस पर ठोस कार्यवाही के लिए कभी कोई सीमा ही तय की गयी है ! आज अगर माननीय सर्वोच्च नायालय को एक याचिका के आधार पर सरकार को फटकार लगानी पड़ रही है तो इसका सीधा मतलब यही निकलता है कि इस मसले पर सरकार पंगु साबित हुई है ! सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर अमल करते हुए एवं माननीय न्यालय के गुस्से के निहितार्थ को समझते हुए सरकार को नींद जागकर कुछ ठोस कदम उठाने की जरुरत है ! लापता बच्चों के मसले पर त्वरित एवं सख्त कदम उठाकर समाज में पैठ बना चुके इन आपरधिक नेटवर्क को तोड़ने की जरुरत पर बल दिया जाना चाहिए ! समय रहते अगर इस नेटवर्क की तह तक पहुँच कर अगर इसे ध्वस्त नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में ना तो देश का नौनिहाल महफूज होगा ना ही समाज ही सही दिशा में अग्रसर हो पायेगा !
शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013
भारत बंद के निहितार्थ : दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित लेख
राष्ट्र की कीमत पर ना हो विरोध
यू.पी.ए सरकार की मजदुर विरोधी नीतियों के खिलाफ देश के लगभग दो दर्जन व्यापारिक संगठनो द्वारा शुरू की गयी दो दिवसीय हड़ताल में प्रदर्शनकारियों द्वारा उत्तरप्रदेश एवं हरियाणा राज्यों में कई जगहों पर हिंसक उत्पात मचाना सरकार के खिलाफ एक सफल भारत बंद की धार को कुंद करने वाला कृत्य रहा ! इसमें कोई दो राय नहीं कि इस मुल्क में आंदोलन एवं प्रदर्शन की आजादी सबको है और सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ जनता को सडक पर आना भी चाहिए ! मगर संविधान द्वारा प्राप्त विरोध की आजादी के दायरों एवं उसकी शुचिता की समझ रखे बिना ही अगर जनता भीड़ के रूप में सडकों पर उतरने लगे तो विरोध-प्रदर्शन के मूल उद्देश्यों को प्राप्त करने की बजाय विरोध-प्रदर्शन एक दिशाहीन पथ की तरफ भटक जाता है और इसका सबसे ज्यादा नुकसान उस विरोध-प्रदर्शन के निहिति लक्ष्यों को ही झेलना पड़ता है ! व्यापारिक संगठनों के आह्वान पर हुए दो दिवसीय भारत बंद का पहला ही दिन हिंसा कि भेंट चढ़ जाना प्रदर्शनकारियों की इसी अपरिपक्वता एवं समझहीनता की मिसाल प्रस्तुत करता है ! इस तरह के आंदोलन या प्रदर्शन करने वाले लोग अक्सर इस बात का बिलकुल ख्याल नहीं रखते कि जिस प्रकार सरकार की अपनी गलत या सही नीतियां होती हैं जिनका वो विरोध करने जा रहे हैं, ठीक उसी प्रकार आंदोलनों एवं प्रदर्शनों की भी कुछ नीतियां होती हैं ! संविधान के मानकों से इतर जाकर कोई भी आंदोलन या विरोध-प्रदर्शन अपने उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर सकता है ! प्रदर्शन के नाम पर मचाये गए इस भारी उत्पात के बाद लोकतांत्रिक नजरिये से दो बातें गौर करने वाली हैं जिनको इस आंदोलन के संबंध में बारीकी से समझने की जरुरत है ! पहली बात ये है कि अगर किसी भी संगठन द्वारा आंदोलन का आह्वान किया जाता है तो यह जरुर देखा जाना चाहिए कि उस आंदोलन से किस स्तर पर आम लोग या उस संगठन के लोग जुड़ रहे हैं ! अगर भारी संख्या स्वत: लोगों का समर्थन आंदोलन को नहीं मिल पाया इसका सीधा अर्थ यह है कि या तो संगठनों द्वारा अपनी बात को लोगों तक पहुचाया नहीं जा सका है यह लोग उस विरोध में कोई रूचि नहीं दिखा रहे हैं ! ट्रेड यूनियन द्वारा घोषित इस हड़ताल को इस नजरिये से भी असफल माना जा सकता है कि इनके पूर्व आह्वान के बावजूद बड़ी संख्या में मजदुर वर्ग अपनी कंपनी में पहुँचे और लगभग सारी छोटी बड़ी दुकाने खुली रहीं ! आम जन के समर्थन के अभाव में संगठनो के कार्यकर्ताओं के बूते खड़े किये गए बड़े स्तर के इस बंद प्रदर्शन ने अपनी सफलता दिखाने के अंधउत्साह में पुरे मामले को हिंसा का रूप दे दिया ! किसी भी सरकार के नीति के खिलाफ प्रदर्शन में जनाधार दो पक्षों में बटा होता है ! एक पक्ष के रूप में सरकार खुद होती है जो जनता के बीच से चुनकर आई है और दूसरा जनधार उसका होता है जो विरोध कर रहा होता है ! समझने वाली बात ये है कि आखिर हिंसा और जबरदस्ती के बूते अगर आप जनाधार दिखाने की कोशिश करते हैं तो यह बेहद अलोकतांत्रिक आंदोलन कहलायेगा जिसका लोकतंत्र के सिद्धांतों में कोई स्थान नहीं है ! दिल्ली से सटे नोएडा में कमोबेश यही स्थिति रही ! प्रदर्शन के आह्वान के बावजूद नोएडा के विशेष आर्थिक जोन की हजारों कंपनियों के उत्पादन सेवा में कर्मचारियों का असहयोग नहीं होना इस बात की पुष्टि करता है कि आम मजदुर वर्ग का स्वत: जनसमर्थन इस भारत बंद को नहीं था वरना लोगों द्वारा कम से कम बंद के समर्थन में दफ्तर के कार्यों को बायकाट तो जरुर किया गया होता ! ना दुकाने बंद रहीं ना कंपनियां बंद रहीं ना निजी ट्रांसपोर्ट बंद रहे और ना ही आम मजदुर वर्ग ही इस भारत बंद से जुड़ा ! अंतत: प्रदर्शन का जनाधार कमजोर पड़ने लगा और इस स्थिति में प्रदर्शन का हिंसक होना स्वाभाविक था ! लोकतान्त्रिक मूल्यों के आधार पर प्रदर्शनों को भी बिना परिभाषित किये नहीं छोड़ा जा सकता और विरोध-प्रदर्शनों के जनाधार का भी मूल्यांकन किया जाना चाहिए ! जनाधार के मूल्यांकन की बुनियाद पर अगर उत्तरप्रदेश आदि राज्यों में इस भारत बंद का असर देखें तो यह बेहद असफल विरोध कहा जा सकता है ! इस बावत गौर करने वाली बात ये भी है कि कलकत्ता आदि के अलावा जहाँ-जहाँ भी इस भारत बंद को जनता का स्वस्फूर्त समर्थन मिला है वहाँ से किसी भी तरह की हिंसात्मक वारदात की खबरें नहीं आई है !
अगर इस भारत बंद के हासिल के नाम पर देखें तो निश्चित तौर पर यह प्रदर्शन सरकार के लिए चिंता का सबब जरुर बना मगर इसका ये कतई अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि इसके उद्देश्यों में को बड़ी कामयाबी हासिल हुई है ! इस पुरे प्रदर्शन को संगठनात्मक समर्थन तो व्यापक मिला मगर आम समर्थन का अभाव रहा ! बैंकों के एक बड़े यूनियन द्वारा इस विरोध प्रदर्शन को समर्थन दिये जाने की वजह से बेशक बैंकिंग सेवाएं ठप रहीं और आर्थिक रूप से इसका काफी प्रभाव पड़ा लेकिन ठप हुए बैंकिंग सेवाओं के प्रभावों को आंदोलन की सफलता के निहितार्थ में देखना कतई प्रासंगिक नहीं प्रतीत होता ! हमें नहीं भूलना चाहिए कि इस बंद से हुए लगभग अनुमानित 26 हजार करोंड़ के नुकसान की भरपाई भी आज नहीं तो कल इसी मजदुर वर्ग को करनी पड़ेगी ! ऐसे में बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या हिंसा और उत्पात के बूते अपनी शक्ति प्रदर्शन को अपना लोकतांत्रिक अधिकार समझना लोकतंत्र के नजरिये से ठीक कदम कहा जा सकता है ? सवाल ये भी है कि हिंसात्मक प्रदर्शन के दौरान हुई छतिपूर्ति की जिम्मेदारी क्या उन ग्यारह व्यापारिक संगठनो द्वारा ली जायेगी जो इस प्रदर्शन को अत्यंत अभूतपूर्व एवं सफल मान रहे हैं ? मजदूरवर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे इन संगठनो को क्या इस बात का भान नहीं है कि इस पुरे फसाद के बाद जिस समुदाय को सबसे ज्यादा परेशानी उठानी पड़ी वो मध्यम तबके से आने वाला मजदुर वर्ग ही है ! हिंसा और फसाद के रास्ते बिना किसी नीतिनिर्धारण के यूँ ही भारत बंद जैसे नुकसानदायक विरोध प्रदर्शन रख देने मात्र से भला क्या हासिल हुआ इसका कोई जवाब ना तो उन संगठनो के पास ही है और ना ही किसी और के पास ! काम-काज ठप कर हड़ताल कर देने को विरोध का प्राथमिक हथियार नहीं माना जा सकता है और गौर करना होगा कि विरोध प्रदर्शन के हडताली हथकंडों पर अदालतें भी सख्त ही रहीं हैं ! अगर वाकई इन संगठनो के कार्यकर्ताओं अथवा विभागीय कर्मचारियों को लग रहा है कि उनके साथ हो रही ज्यादती चरम पर है और हड़ताल के सिवा कोई चारा नहीं है तो उन्हें अनिश्चितकालीन बंद पर जाना चाहिए बजाय कि दो दिवसीय और एक दिवसीय बंद की सियासत का हिस्सा बनने के ! संगठनात्मक रूप से जब भी कोई बंद या प्रदर्शन बुलाया जाता है तो वो राजनीति से प्रेरित होता है और ट्रेड यूनियन के इस हड़ताल को भी सियासत से परे नहीं रखा जा सकता ! किसी भी विरोध प्रदर्शन का हिंसात्मक होना ना तो प्रदर्शन और ना ही लोकतंत्र के लिए ही बेहतर कहा जा सकता है ! हिंसात्मक आंदोलन महज उत्पातियों को पनाह देने के अवसर के तौर पर इस्तेमाल होते रहे हैं और प्रदर्शन में जितनी ज्यादा हिंसा होगी सरकार पर जवाबदेही का दबाव उतना ही कम होगा ! अत: किसी भी विरोध प्रदर्शन की सबसे बड़ी मजबूती यह है कि वो कितना नियंत्रित एवं लक्ष्योंमुख है और सरकार पर अपना असर छोड़ पाने में कितना कामयाब रहा है ! कम से इस बंद के बाद इतना तो कहा ही जा सकता है कि यू.पी एवं हरियाणा जैसे राज्यों में हड़ताल का असर कम और हिंसा का असर ज्यादा रहा जो कि सरकार को सुकुन देने वाला है ! क्योंकि, बंद का असर सरकार पर दबाव बनाता है जबकि हिंसा का दबाव महज पुलिस-प्रशासन पर होता है !
शिवानन्द द्विवेदी सहर
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